सुविचार – किराएदार – किराया – 074

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जो कमाता हूँ, किराए में दे आता हूँ, मैं किराएदार हूँ।

हर बार सोचता पैसे बचाने की, बचा नहीं पाता हूँ, मैं किराएदार हूँ॥
जो कमाता हूँ, किराए में दे आता हूँ, मैं किराएदार हूँ।
इनकम बढ़ती नहीं है मेरी, किराया बढ़ता जा रहा है,
हम कभी उठ नहीं सकते, दुनियां में किराया खा रहा है,
महीने भर की कमाई जाकर, मकान मालिक को चढाता हूं, मैं किराएदार हूँ॥
हर बार सोचता पैसे बचाने की, बचा नहीं पाता हूँ, मैं किराएदार हूँ॥
जो कमाता हूँ, किराए में दे आता हूँ, मैं किराएदार हूँ।
कुछ सपने पूरे करूँगा अपने, सोचकर दिन रात कमा रहा हूँ,
सुबह घर से निकलता हूँ, दिन भर मेहनत करता, रात को लौट के आ रहा हूँ,
सब खर्च हो जाता है, मैं कुछ भी नहीं बचाता हूँ, मैं किराएदार हूँ,
हर बार सोचता पैसे बचाने की, बचा नहीं पाता हूँ, मैं किराएदार हूँ॥
जो कमाता हूँ, किराए में दे आता हूँ, मैं किराएदार हूँ।
कभी खाने-पीने की चिंता, कभी कोई सामान लाना है,
फिर कमा कमा कर मकान मालिक को, हर महीने दान चढ़ाना है,
पैसे मकान मालिक को देकर, अपनों का पेट भर कर, खुद भूखा सो जाता हूँ,
मैं किराएदार हूं॥
हर बार सोचता पैसे बचाने की, बचा नहीं पाता हूँ, मैं किराएदार हूँ॥
जो कमाता हूँ, किराए में दे आता हूँ, मैं किराएदार हूँ।
— Mahesh Chalia
आज हमारा नाम लगा है, कल किसी और का होगा,_किरायों के मकान से इश्क़ कैसा ?
किराए का घर बदलने पर

सिर्फ़ एक किराए का घर नहीं छूटता
उसके साथ एक किराने की दुकान भी छूट जाती है
कुछ भले पड़ोसी छूट जाते हैं
कुछ पेड़
कुछ पखेरू
एक सब्ज़ी की दुकान भी छूट जाती है
उन्हीं के पास
छूट जाते हैं
चाय के अड्डे
वहाँ की धूप-हवा-पानी
कुछ ठेले और खोमचे
वहीं छूट जाते हैं
जिन सड़कों पर सुबह-शाम चलते थे
अचानक उनका साथ छूट जाता है
हमारे लिए एक साथ कितना कुछ छूट जाता है
और उन सबके लिए
बस एक अकेला मैं छूटता होऊँगा
– संदीप तिवारी

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