सुविचार – नवाब – बादशाह – बादशाहत – बादशाही – अलमस्त – फ़क़ीर – फ़कीर – फकीर – फ़क़ीरी – फ़कीरी – फकीरी – 082

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अपनी ग़ैरत के लिए फ़ाक़ा कशी भी मंज़ूर,

तेरी शर्तों पे ख़ज़ाना भी नहीं चाहते हम – हसीब सोज़

जीवन जीने के केवल दो ही तरीके हैं… या तो ऐसे चलो जैसे तुम राजा हो या ऐसे चलो जैसे तुम्हें परवाह ही नहीं कि राजा कौन है.

There are only two ways of living life…
Walk like you are the King or Walk like you don’t care who is the king.
– Sanjay Shukla
फकीरों को कोई बर्दाश्त नहीं करता, असल में सच्चे फकीर कहीं भी बर्दाश्त नहीं किये जाते _ क्योंकि सच्चे फकीरों की सच्चाई लोगों को काटती है ;

_ उनकी सच्चाई से लोगों के झूठ नंगे हो जाते हैं, उनकी सच्चाई से लोगों के मुखौटे गिर जाते हैं.

फ़क़ीर : जिसे न दुख से मतलब न सुख से, न दिन से न रात से, न सम्मान से मतलब न ही अपमान, न किसी के पाने की लालसा न किसी के खोने का ग़म !!

_ जिसकी सांसारिक इच्छाएं मिट गईं हो, जिसे सभी मनुष्यों में एक ही रब दिखे, जिसे सारा संसार एक लगे, जो केवल ब्रह्म की खोज में हो…
शायद यही वैराग्य है और जिनमें ये गुण हैं शायद वही बैरागी ….. अब और किसी के अनुसार और क्या हो सकता है ये वही जाने.!!
फ़क़ीर : जो अपनी मस्त धुन में मदमस्त मस्तमौला है, जिसे दुनिया के रंग में रंगने का कोई शौक नहीं,

_ जो ख़ुद की ज़िन्दगी ख़ुद के बनाए तरीके से जीना पसंद करता है..!!

ये शक्ल ये सूरत सब क़र्ज़ पे ले रक्खी है, वक़्त आने पर इसके मालिक को लौटाना होगा.!!
किस्मत भी बादशाह उसी को बनाती है ; जो खुद कुछ करने का हुनर रखता है.
दिल अगर फ़क़ीरी पे उतर आए,,,_तो उलझ पड़ता है बादशाहों से….!!!
ये फकीरों की महफ़िल है चले आओ, हम जैसे लोग हैसियत नहीं पूछते.!!
न ढूंढ हमें दुनिया की भीड़ मैं, हम फ़क़ीर हैं हमेशा तन्हा ही मिलते हैं .!!
हम फ़क़ीर मिलते हैं टूट कर और बिछड़ते हैं शान से..!!
सलामत रहे गुरुर आपका, हम तो वैसे भी फ़क़ीर ठहरे..!!
बादशाहों का इंतज़ार करे.. इतनी फुर्सत कहाँ फकीरों को..!!
अध्यात्म का वास्तविक रूप फक्कड़पन /फकीरी में ही है.-  इसे कोई नहीं बदल सकता.!!
पूछ के मेरा पता वक्त जाया न करो, मैं तो फ़क़ीर हूं जानें किधर जाऊंगा.!!
फकीरों की फ़कीरी पर मत जाइए,

_ उसके भीतर बहुत बेतरतीब सा एक शख्स रहता है कोई.!!

“मुझे भीख की खुशियां मंजूर नहीं, _ मैं जीता हूँ अपनी तकलीफों में भी नवाबों की तरह.”

_ किस्मत की गुलामी नहीं करता मैं, _ अपनी मेहनत का नवाब हूं मैं !

मेरी ग़ुरबत को देख कर रास्ता ना बदल मुर्शद,

_ मैं दिल का बादशाह हूँ, मुक़द्दर तो खुदा लिखता है..!!

जरुरी नहीं कि फकीर फटेहाल ही दिखे,

_ जेब वो जगह है जिसे कोई न देख पाया.!!

हम फकीरों की सूरत पर ना जाना, _ _ हम कई रूप धर लेते हैं !
गुनगुनाता जा रहा था एक फ़क़ीर, धूप रहती है ना साया देर तक..!!
वक्त के एक तमाचे की देर है प्यारे, मेरी फकीरी क्या तेरी बादशाही क्या..!!
अमीरी में क्या है जो फकीरी में नहीं, _ दुनिया मेरी है नहीं तो दुनिया तेरी भी नही.
हर मांगने वाले को फ़क़ीर कहते है पर इसका मतलब ये नही है के जो सिर्फ सड़को पर गली मोहल्लों में फिर कर मांगते हैं, _ वही सिर्फ फ़क़ीर कहलाते हैं,

असल में फ़क़ीर तो हम सब हैं जो कुछ न कुछ हर रोज़ खुदा से मांगते हैं, _ कभी अपनी ज़रूरतों की चीज़ें कभी अपनी ज़िंदगी की भीख, कभी अपनी खुशी की भीख,,,, तो फ़क़ीर हम सब हैं

_ बस हमारा मांगने का तरीका उन मांगने वालो से थोड़ा अलग है जो सड़को पर मांगते हैं और हम दिल मे मांगते हैं तो हम सब फ़क़ीर हैं.

जीवन को तो बेशर्त ही जिया जा सकता है, दूसरों की तो छोड़ें _ जीवन को अपनी भी शर्तों पर नहीं जिया जा सकता है.

जीवन की अपनी ही मौज है, और अपनी मौज में ही जीवन जिया जा सकता है, दूसरों की मौज में नहीं.

दूसरों की शर्तों पर सम्राट बनने से तो बेहतर है कि अपनी ही मौज में फ़क़ीर हो जायें. दूसरों की शर्तों पर सम्राट बन कर कभी आनन्द उपलब्ध नहीं हो सकता, अपनी मौज में फ़क़ीर बन भी वो आनन्द मिलता है, जो दूसरों की शर्तों पर सम्राट बनने से नहीं मिलता.

जरूरतों के मुताबिक जियो, _ ख़्वाहिश मुताबिक नहीं. _ क्यूंकि

_ जरुरत फ़क़ीर की भी पूरी हो जाती है, _ ख्वाहिश बादशाह की भी अधूरी रह जाती है.

” हम अपनी फ़क़ीरी में भी बादशाह रहे, _ यह उन लोगों को बहुत अखरा,

_ जो दौलत कमा कर भी गरीब रहे और हम, _ आज भी बादशाह हैं,”

ज़िन्दगी सब कुछ देकर भी, किसी ना किसी चीज के लिए _

_ फकीर बना कर ही रखती है..

किसी ने पूंछा … फकीर कौन होता है … !!

_ मैंने कहा …जिसका कोई नहीं और … जो सबका..!!

जिसका ये ऐलान है कि वो मज़े में है,

_ या तो वो फ़कीर है या फिर नशे में है.!!

सच ही कहा था मुझ से एक फ़क़ीर ने..

_ कि तुझे लोग अपना तो कहेंगे, पर कभी अपना नहीं मानेंगे !!

आप फकीरों से क्या लोगे, आप फकीरों को क्या दोगे..

_ कभी ज़िक्र ए यार आएगा, बार-बार मेरे बारे में सोचोगे..!!

फ़कीरों की सोहबत में बैठा कीजिए साहब,

बादशाही का अन्दाज़ ख़ुद ब ख़ुद आ जायेगा.

दुसरो की शर्तों से सुल्तान बनने से अच्छा, _

_खुद की खुशी से फकीर बनना ज्यादा बेहतर है.

हमें मंजूर नही था तेरी शर्तों पर सुल्तान बनना, _

_ इसलिए मै अपनी सल्तनत का फकीर बन गया…

कभी फ़क़ीर, कभी शाह, कभी दिलनशीं की तरह.. _

_ जिन्दगी, हमसे रोज मिलती है अजनबी की तरह..

जिसका ये एलान है कि वो मजे में है,

_ या तो वो फ़कीर है या नशे में है..!!!

मैं खुल कर हंस रहा हूं फकीर होते हुए,

वो मुस्करा भी नहीं पाया अमीर होते हुए.

फकीरी न दे सकी मेरे ज़मीर को शिकस्त,

_ झुक कर हर किसी से नहीं मिलता हूँ मैं..!!

खुद से मिलना है तो दिल से फकीर बन जाओ,_

_ मिट सके ना जो वो पत्थर की लकीर बन जाओ..

भौतिक जीवन की विपदाएँ सहते रहता है,

_ घर में रह कर भी दिल से फ़क़ीर होता है..!!

सब कुछ चला जाएगा फिर भी मुस्कुराएंगे,

_ हम दिल में एक फ़क़ीर रखा करते हैं.!!

मंजिल उनको मुबारक जिन्हें होड़ है कुछ पाने की, _

_ हम तो अल्हड़ फ़क़ीर हैं जो हर दम सफ़र करते हैं !!

ज़लील कर के जिस फ़क़ीर को किया तूने रुखसत… _

_ वो भीख लेनें नहीं…. तुझे दुआएँ देने आता था.. 

फ़कीराना तबियत हैं…मिले तो बाँट देते हैं,

_ हमसे तो दुआओं की जमाखोरी नहीं होती….!!

फकीरी ला देती है हुनर चुप रहने का,

अमीरी जरा सी भी हो तो शोर बहुत करती है.

ये खाली जेबें, फ़कीर हुलिया, उदास आंखें..

_ हमें जो कोई गले लगाए, तो क्यों लगाए !!

हम गृहस्थ आश्रम में कर्म करते हुए बैराग और फ़क़ीर मन को रख सकते हैं,

_ सिर्फ आत्मबल की जरूरत है.!!

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