सुविचार – पर्व – त्यौहार – उत्सव – उल्लास – हर्षोल्लास दिवस -समारोह – फेस्टिवल- Festival – 084

13409798154_66c18230e1

जिस दिन आपने खुल कर के अपनी जिंदगी जी ली बस वही त्यौहार है…

..बाकी सब कैलेंडर की डेट्स हैं…

** कोई भी उत्सव इतना खास नहीं होता, अच्छे से जीया गया जीवन ही खास होता है..!!

_ जिंदा रहना सबसे बड़ा अवसर है, तो फिर मुझे अपने कपड़े या अन्य चीजें किसी और खास मौके के लिए क्यों बचाकर रखना चाहिए ?
“ज़िंदगी ही जब सबसे बड़ा अवसर है, तो हर दिन को खास मानकर जीना भी एक समझदारी है –
कल के लिए बचाया गया ‘आज’ अक्सर अधूरा रह जाता है.”
_ अक्सर हम जीवन को भविष्य के किसी “परफेक्ट दिन” के लिए रोक देते हैं,
और आज को बस रिहर्सल मानकर निकाल देते हैं.
_ अगर सच में मान लें कि ‘जिन्दा रहना ही सबसे बड़ा अवसर है, तो फिर –
अच्छे कपड़े “किसी दिन” नहीं, आज के लिए हैं,
पसंदीदा जूते किसी समारोह के लिए नहीं, आज की चाल के लिए हैं, महक किसी को दिखाने के लिए नहीं, खुद को महसूस कराने के लिए है.
_ हम चीज़ें बचाकर इसलिए रखते हैं.. क्योंकि भीतर कहीं डर होता है –
“कहीं ये पल ज़ाया न हो जाए”
_ पर सच्चाई उलटी है –
पल चीज़ों के लिए नहीं होते, चीज़ें पलों के लिए होती हैं.
_ जो जीवन को टालता है,
वह धीरे-धीरे खुद को भी टालने लगता है.
_ और एक दिन समझ आता है – हमने सब संभाल कर रखा था… सिर्फ़ जीना भूल गए थे.
_ आज अगर जी रहे हो, तो आज ही अवसर है.
_ बाकी सब सिर्फ़ तारीख़ें.!!
त्यौहार, पर्व, उत्सव, जीवन में खुशी लाते हैं.

_हमें ये खुशी के अवसर कभी नहीं छोड़ने चाहिए.!!
त्यौहार ख़त्म हो गए हैं अब, अब सिर्फ तारीखें बची हैं.!!
जीवन एक यात्रा है, और यह यात्रा अकेले नहीं की जाती.. इसे उत्सव बनाइए..!

_ जब किसी के साथ हैं, तो सिर्फ़ शारीरिक रूप से ही नहीं, मन का साथ दीजिए.. क्योंकि असली साथ वही है.!!

उत्सव का कारण कभी भी और हर समय बनाया जा सकता है.
जीवन सुंदर है उन लोगों के कारण _ जो साधारण खुशियों को बड़े उत्सवों में बदलने की कला जानते हैं.
प्रसन्न रहना, संतुष्ट रहना, शांत रहना, उत्साहित रहना, जीवन उत्सव के रंग हैं.

इसलिए हर पल को जी भरकर जीओ, हर दिन महोत्सव है.

जब हम सार्थक जीवन [meaningful life] जीते हैं, तो हमें किसी उत्सव का इंतजार नहीं करना पड़ता,

_ हमारे जीवन की हर छोटी-बड़ी उपलब्धि एक उत्सव [celebration] होती है.!!
पहले त्यौहार में उतना थोड़ा भी बहुत ज्यादा होता था,

_ _ अब बहुत ज्यादा में उतना बहुत की खुशी गुम सी है..!!

लोग अगले ही दिन भूल जाते हैं कि कल कोई उत्सव भी था..

_ लोग कितने प्रतिबद्ध [Committed] हैं अपने-अपने दुखों में लौटने के लिए.!!

त्यौहार, पर्व, उत्सव, चाहे उनका ताल्लुक देश से हो या व्यक्तिगत खास अवसरों से, जीवन में खुशियाँ लाते हैं.

हमें ये खुशी के अवसर कभी नहीं छोड़ने चाहिए..

_ जब हम इन्हें सेलिब्रेट करते हैं तो हमारे ख़ुशी के पल बढ़ जाते हैं.

किसी भी पर्व, त्यौहार या ख़ास अवसर में ऐसा कुछ न करें ..जिससे किसी की या आपकी ही ज़िंदगी तबाह हो जाए.

_ आप ख़ास अवसर को मनाएं, पूरे हर्षोल्लास से मनाएं.
_ लेकिन सावधानी का साथ ..एक पल को भी न छोड़ें.
_ जीवन अनमोल है, और ज़रा-सी लापरवाही जीवनभर का दर्द दे सकती है.
अब तो सभी त्यौहार हर साल आते हैं, चुपके से गुजर जाते हैं, _ऐसा क्यों हो रहा है   पिछले कई वर्षों से ?

पहले अपनी भीनी-भीनी खुशबू छोड़ कर जाते थे.

_ और अब ? अब क्या हो गया है जो यह त्यौहार पहले जैसे नहीं रहे ?

अब तो त्योहारों पर बधाई और शुभकामनाएँ लेने-देने का व्यवहार बच गया है, जो थोड़ी-बहुत खुशी दे जाता है ; _ चलिए, इसी खुशी को मना लूँ मैं..!!

_ त्यौहार खत्म होने के बाद के लम्हें को झेलना काफी कष्टकारी होता है.. खैर,

_ हम सभी जानते है कि जीवन में खुशियों का पल क्षण भर के लिए आता है.!!

त्योहारों के मायने बदल गए हैं, लोग बदल गए हैं, रिश्ते बदल गए और खुशियाँ तो ख़ैर.!
एक मेरे बचपन के त्यौहार थे..

_ अब तो जिंदगी की भागदौड़ ने सबकुछ खत्म कर दिया है…
_ जो प्रेम आपस में बचपन में था,, वो बड़े होने पर न जाने कहां खो जाता है…
_ क्या सच में हम समझदार होते हैं,, या बेवकूफ बनते चले जाते हैं…
_ मगर वो बचपन के त्यौहार काफी पीछे छूट चुके हैं..
_ अब तो त्योहारों पर बधाई और शुभकामनाएँ लेने-देने का व्यवहार बच गया है.!!
_ अब तो ऐसा लगने लगा है कि ये दिन आया ही क्यों.. और जब आ ही गया तो जल्दी बीत क्यों नहीं रहा.. _ फिर लगने लगता है कि ये फेस्टिवल जश्न के लिए नहीं आते.. बल्कि ये याद दिलाने आते हैं कि अब खुशी भी अजनबी लगने लगी है.!!
अब तो किसी भी फेस्टिवल का नाम सुनते ही अजीब सा एहसास होने लगता है,
_ और न जाने क्यों मेरे अंदर एक बेचैनी सी पैदा हो जाती है.

_ वो नीरस आवाज़ें अब मेरे कानों में मिठास नहीं लातीं, हँसी और खुशी का शोर अब बोझिल सा लगता है.
_ ऐसा लगता है मानो हर कोई बस खुशी, प्यार और अपनापन का अभिनय कर रहा है.
_ मुझे नहीं पता कि मुझे किससे नफ़रत है: लोगों से या इन रस्मों के पीछे छिपे झूठे सुकून से..
_ मैं बस इतना जानता हूँ कि मेरा दिल अब इन बंधनों को नहीं, सिर्फ़ सच्चे जुड़ाव को चाहता है.!!
ना पहले जैसी खुशी है न पहले जैसे लोग न पहले जैसा समय.. 
_ जैसे जैसे समय बीत रहा.. भावनाएं निर्जीव होती जा रही हैं.!!
हिन्दुओं में इतने त्यौहार होते हैं (अन्यों का पता नहीं) कि सब मनाने बैठो तो आदमी जीवन में और कुछ कर ही नहीं सकता..

_ करने लायक रहता ही नहीं..
_ किसी के पास इतना समय कहाँ है ?
_ हम सिर्फ़ जन्माष्टमी, होली, दिवाली मनाते हैं.!!
पर्व- त्योहार होते रहना चाहिए..

_ नहीं तो निगेटिविटी और नीरसता आ जायेगी।
_ और कितने लोगों के आमदनी पर फ़र्क पड़ने लगेगा;
_ हर समय पर्व- त्यौहार का ध्यान रहता है,
_ बड़ी बड़ी कम्पनियां ही नहीं छोटे मोटे धन्धे वालों को भी इन्तजार रहता है,
_ पर्व- त्यौहार का कि थोड़ा ज्यादा और महंगी बिक्री होगी और कुछ पैसे बच जायेंगे।
_ त्यौहार के बहाने ही सही कपड़े और श्रृंगार के सामान के साथ कुछ जरूरी सामान भी आ जायेगा..!!
_ जश्न की उम्मीद ही जिन्दगी को जीने के लिये सबसे मजबूत कड़ी है, _ वरना तो बेरंग जिन्दगी जीने के कोई मायने नहीं.!!!
कोई भी दिवस हो, कोई भी कार्यक्रम हो ..उसमें लगने वाला समय ..आटे में नमक जितना होना चाहिए,

_ यानी मुख्य कार्य कभी बाधित न हो ..इसका खयाल रखना चाहिए..
_त्योहार, दिवस, पर्व मनाइए …पर ध्यान रहे इसे गौण [secondary] और जीवन को प्रमुख स्थान दें..
..बाकी बड़ी बड़ी बातें, तर्क करने के लिए कुछ भी कहा जा सकता है..
_ अपवादों की बात नहीं करिए, अधिकतर क्या हो रहा ..उसपर विचार करिए न !!…
— हमें न गरीबी चाहिए और न ही अमीरी;
_हमें हमारे लिये सुविधाजनक जीवन चाहिए.!!
त्योहारों को मनाना हमारी परम्परा है लेकिन अब उनमें आवश्यक परिवर्तन ज़रूरी हैं.

पानी, दूध, अनाज, विद्युत ऊर्जा [ इलेक्ट्रिक ] या पेट्रोल- डीज़ल की बर्बादी और पर्यावरण की अशुद्धता- ऐसी समस्या है,

_जिस पर हम यदि गंभीर नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ी हमारी लापरवाही को भुगतेगी.

_हमें अपने ‘साक्षर’ नहीं, सुशिक्षित होने का व्यवहार करना चाहिए.

_एक कहावत है- `बचाया हुआ यानी कमाया हुआ.’

उत्सव क्या है ? एक दिन का उल्लास ;

_ हम खुश ना होकर भी खुश होने और दिखने का अभिनय कर रहे होते हैं.
_ “जिससे भी बात करो तो सब परेशान जैसे कि इस दुनिया में कोई खुश हैं ही नहीं..”
__लेकिन जब आपकी ज़िंदगी में कुछ ऐसे किरदार हों _ जाने अनजाने में वो आपको उस अपनेपन का एहसास करा दें, जो खून के रिश्ते ताउम्र नहीं करा पाते..
_ तो समझिए वही दिन उत्सव है और हर दिन उल्लास..!!
बाजारवाद और आबादी के विस्फोट ने

इंसान से उसका सुकून छीन लिया है.
_ बाजारों की यह भीड़… उफ़!
मेले हों या फेस्टिवल,
_ अब कभी-कभी उत्सव भी जी का जंजाल लगते हैं..
_ लगता है, दुनिया में सबके लिए जगह है,
बस सुकून से जीने के लिए जगह कम पड़ती जा रही है.!!
सब कहते हैं कि त्योहार है तो परिवार के सभी लोगों को एक साथ रहना चाहिए और मिलकर त्योहार मनाना चाहिए..

_ लेकिन मेरा मानना इससे विपरीत है,
_ जब सभी लोग एक साथ होते हैं तो बेवजह की बातें ज्यादा होती हैं और इससे विवाद की स्थिति पैदा हो जाती है,
_ खासकर तब जब कुछ लोग समझदार न हों.!!
– Nirarthak Nirarthak
त्योहारों की रौनक बढ़ने के साथ ही व्यस्तताएँ भी बढ़ती जाती है.

_ दिनचर्या बदलने लगती है, जिम्मेदारियाँ बढ़ जाती हैं और इस दौरान आने वाले बदलाव कभी-कभी भीतर तक थका देते हैं.
_ बाहर की दुनिया रोशनी और उत्साह से भर जाती है, लेकिन इन सबके बीच खुद के लिए थोड़ा सुकून तलाशना भी जरूरी होता है.!!
– Nirarthak Nirarthak
सच कहूँ, जब आज के त्योहारों को देखता हूँ, तो मन में एक सवाल चुपचाप सिर उठाने लगता है.

_ क्या सचमुच हम उत्सव मना रहे हैं, या केवल उत्सव का एक सुंदर-सा दृश्य रचकर दुनिया को दिखा रहे हैं ?
_ कभी जिन त्योहारों की आहट से घर के कोने-कोने में अपनापन उतर आता था, आज उन्हीं त्योहारों के बीच कहीं मन का सुकून खोता हुआ दिखाई देता है.
_ रोशनी पहले भी होती थी, मगर तब उसका उजाला दीवारों से उतरकर रिश्तों तक पहुँचता था ; आज रोशनी की कमी नहीं, फिर भी न जाने कितने मन अपने भीतर उदास बैठे हैं.
_ पहले एक छोटा-सा दीपक जलाकर लोग ईश्वर से घर की सुख-शांति माँगते थे, आज हजारों दीप जलते हैं, मगर उस एक सच्ची प्रार्थना के लिए मन कितनी देर ठहरता है, यह सोचने वाली बात है.
_ उत्सवों की सजावट बढ़ी है, आयोजन भव्य हुए हैं, खुशियों को सँजोने के साधन बढ़े हैं ; लेकिन क्या हमने कभी ठहरकर यह भी देखा कि इस बढ़ती चमक के बीच हमारी परंपराओं का सहज सौंदर्य कहीं धुँधला तो नहीं पड़ रहा ?
_ मन को पीड़ा आधुनिकता से नहीं, उस खालीपन से होती है, जो कभी-कभी सबसे भव्य उत्सव के बीच भी महसूस होता है.
_ लगता है, हमने घरों को सजाने में इतनी मेहनत कर दी कि उन दिलों को सँवारना भूल गए, जिनके मिलने से ही किसी त्योहार का असली अर्थ जन्म लेता है.
_ कभी त्योहार आने वाले होते थे, तो उनकी खुशी कई दिन पहले से घर के वातावरण में घुलने लगती थी.
_ माँ के हाथों में काम बढ़ जाता, मगर चेहरे पर थकान से अधिक संतोष दिखाई देता ; पिता अपनी सामर्थ्य के भीतर रहकर बच्चों की छोटी-छोटी इच्छाएँ पूरी करने की कोशिश करते ; दादी पुराने किस्सों के साथ उन परंपराओं को भी अगली पीढ़ी तक पहुँचा देतीं, जिनमें केवल रीति नहीं, जीवन जीने की सीख छिपी होती थी.
_ घर के आँगन में बनती रंगोली सिर्फ रंगों का मेल नहीं होती थी, वह अपनेपन से घर को सँवारने का एक बहाना होती थी.
_ पूजा की थाली में रखे फूलों की सुगंध, रसोई में पकते पकवानों की महक, मंदिर से आती घंटियों की ध्वनि और दरवाजे पर किसी अपने के अचानक आ जाने की खुशी, इन सबको जोड़कर ही तो त्योहार बनता था.
_ तब खुशी को साबित करने के लिए किसी तस्वीर की जरूरत नहीं पड़ती थी ;
_ किसी अपने का हँसता हुआ चेहरा ही उस दिन की सबसे सुंदर स्मृति बन जाता था.
_ मिठाई का एक छोटा-सा डिब्बा पड़ोसी के घर पहुँचाना, किसी पुराने मनमुटाव को भुलाकर गले मिल लेना, घर में काम करने वाले व्यक्ति को भी सम्मान और स्नेह के साथ उत्सव में शामिल करना, किसी जरूरतमंद के घर थोड़ी-सी खुशियाँ पहुँचा देना.
_ ये छोटे-छोटे काम ही त्योहारों को बड़ा बनाते थे.
_ शायद तब हमारे पास आज जितने साधन नहीं थे, मगर खुशियों को बाँटने के लिए दिल में जगह अधिक थी.
_ आज भी त्योहारों में वही आत्मा लौट सकती है, बशर्ते हम सजावट से थोड़ा समय निकालकर संबंधों को सँवारें, तस्वीरों से आगे बढ़कर चेहरों को पढ़ें और उत्सव की भीड़ में उस अपनेपन को पहचानें, जिसके बिना कोई भी पर्व केवल एक आयोजन बनकर रह जाता है.
_ आखिर त्योहार की सबसे सुंदर पहचान यह नहीं कि हमारा घर कितना जगमगाया, बल्कि यह है कि हमारी वजह से किसी दूसरे के जीवन में कितनी रोशनी पहुँची.
_ मैं आधुनिकता का विरोधी नहीं हूँ.
_ समय बदले, विचार बदलें, समाज आगे बढ़े, स्त्रियाँ अपनी स्वतंत्रता के साथ अपने व्यक्तित्व का विस्तार करें, पुरुष अपनी संकीर्णताओं से मुक्त हों, नई पीढ़ी अपनी रुचियों के अनुसार उत्सव मनाए, इससे सुंदर बात और क्या होगी ?
_ मगर प्रश्न ये है कि क्या आधुनिक होने के लिए हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से विमुख होना आवश्यक है ?
_ क्या स्वतंत्रता का अर्थ विवेक को विस्मृत कर देना है ?
_ क्या नवीनता का अर्थ हर पुरानी मर्यादा को उपहास का विषय बना देना है ?
_ और क्या किसी त्योहार की पहचान अब उसके आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक महत्त्व से नहीं, बल्कि वहाँ उपस्थित कैमरों, प्रचार, शोरगुल और देह के प्रदर्शन से निर्धारित होगी ?
_ मुझे आधुनिक वस्त्रों से नहीं, उस मानसिकता से पीड़ा है जो मनुष्य की गरिमा को उसके प्रदर्शन में तलाशती है.
_ मुझे आपत्ति किसी की स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि उस बाजारवादी दृष्टि से है जो स्वतंत्रता के नाम पर हर भावना को उपभोग की वस्तु और हर उत्सव को लोकप्रियता अर्जित करने का साधन बना देती है.
_ पहनावा किसी व्यक्ति के चरित्र का प्रमाणपत्र नहीं होता, और न ही परंपरा के नाम पर किसी की स्वतंत्रता का अपमान उचित है ; लेकिन ये प्रश्न पूछना भी तो आवश्यक है कि जिस उत्सव में कभी श्रद्धा प्रधान हुआ करती थी, वहाँ आज प्रदर्शन प्रधान क्यों होता जा रहा है ?
_ जिस पर्व में कभी संस्कृति बोलती थी, वहाँ अब प्रायः प्रचार का शोर क्यों सुनाई देता है ?
_ जिस अवसर पर मनुष्य अपने अहंकार को विसर्जित करने निकलता था, वहाँ आज अहंकार ही सबसे अधिक सुसज्जित होकर क्यों उपस्थित होता है ?
_ कभी-कभी लगता है, हमने त्योहारों को मनाना नहीं, उन्हें प्रदर्शित करना अधिक आवश्यक समझ लिया है.
_ प्रसाद चढ़ाने से पहले कैमरा तैयार होता है, आरती में सम्मिलित होने से पहले कोण निर्धारित किया जाता है, रंगों में सराबोर होने से पहले यह चिंता सताती है कि दृश्य कितना आकर्षक आएगा.
_ हम अपने आनंद के साक्षी स्वयं बनने के बजाय दुनिया को उसका साक्षी बनाने में व्यस्त हो गए हैं.
_ हम क्षण को जीने से अधिक उसे दूसरों के सामने प्रमाणित करने लगे हैं, और इस सारी आपाधापी में वह सहज उल्लास, वह निश्छलता, वह आत्मिक तृप्ति कहीं पीछे छूटती जा रही है, जिसके लिए कभी त्योहारों की प्रतीक्षा की जाती थी.
सच कहूँ तो परंपराएँ केवल पुरानी आदतों का संग्रह नहीं होतीं.
_ वे पीढ़ियों के अनुभव, जीवन के अनुशासन, समाज की सामूहिक स्मृति और उन अनगिनत अनकहे मूल्यों की धरोहर होती हैं, जिन्हें किसी पुस्तक में पूरी तरह लिख पाना संभव नहीं.
_ हमारी दादी-नानियों ने शायद संस्कृति की परिभाषाएँ नहीं पढ़ी थीं, मगर वे जानती थीं कि उत्सव में किसका स्मरण करना है, किसके चरण छूने हैं, किसके घर मिठाई पहुँचानी है, किस निर्धन की देहरी पर अन्न रखना है और किस रूठे हुए संबंध को फिर से अपनत्व की डोर में बाँधना है.
_ उनके पास आधुनिक साधनों की बहुतायत नहीं थी, लेकिन उनके पास रिश्तों को सहेजने का हुनर था.
_ वे जानती थीं कि पूजा में चढ़ाया गया फूल तभी सार्थक है, जब मन में किसी के लिए काँटे न हों ;
_ ईश्वर के सामने जो हाथ जुड़ते हैं, वे किसी जरूरतमंद की सहायता के लिए भी उतनी ही सहजता से आगे बढ़ने चाहिए.
_ हमारी संस्कृति की सुंदरता इसी में रही है कि उसने धर्म को केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे करुणा, सेवा, संयम और सद्भाव से जोड़ा.
_ दीपावली का दीप केवल घर को प्रकाशित करने के लिए नहीं, बल्कि अँधेरे के विरुद्ध आशा का प्रतीक भी है.
_ होली केवल रंग लगाने का अवसर नहीं, बल्कि पुराने वैर मिटाकर संबंधों में नई मिठास घोलने का संदेश भी है.
_ नवरात्र केवल सजावट, संगीत और नृत्य का आयोजन नहीं, बल्कि नारीशक्ति के प्रति श्रद्धा, आत्मसंयम और साधना का पर्व भी है.
_ मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ बाँटने के पीछे केवल स्वाद नहीं, बल्कि संबंधों में मधुरता बनाए रखने का भाव है.
_ हर त्योहार के भीतर कोई न कोई जीवन-मूल्य छिपा है.
_ जब हम केवल उसके बाहरी स्वरूप को बचाकर भीतर के संदेश को भुला देते हैं, तब परंपरा का शरीर तो बचा रहता है, मगर उसकी आत्मा धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है.
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि हर पुरानी परंपरा को बिना प्रश्न किए स्वीकार कर लिया जाए.
_ समय के साथ उन रूढ़ियों को बदलना भी जरूरी है, जो किसी मनुष्य की गरिमा, स्वतंत्रता या समानता को चोट पहुँचाती हैं.
_ संस्कृति कोई बंद कमरा नहीं, जिसमें समय की हवा का प्रवेश वर्जित हो ;
_ वह तो बहती हुई नदी है, जो अपने मूल स्रोत से जुड़ी रहकर भी आगे बढ़ती है.
_ मगर नदी का आगे बढ़ना और अपने स्रोत को भूल जाना, दोनों अलग बातें हैं.
_ हमें उन परंपराओं को सँजोना चाहिए जो प्रेम सिखाती हैं, और उन धारणाओं को पीछे छोड़ देना चाहिए जो भेदभाव को जन्म देती हैं.
_ विवेकपूर्ण बदलाव संस्कृति को कमजोर नहीं करता, बल्कि उसे अधिक मानवीय और जीवंत बनाता है.
_ दुख तब होता है, जब धार्मिक आयोजनों में भक्ति से अधिक प्रतिस्पर्धा दिखाई देने लगती है ;
_ जब सेवा से अधिक प्रचार की चिंता होती है ;
_ जब सामूहिक उत्सव का उद्देश्य लोगों को जोड़ना नहीं, बल्कि अपनी उपस्थिति और प्रभाव का प्रदर्शन करना बन जाता है.
_ आयोजन कितना बड़ा हुआ, किसने कितना खर्च किया, किसकी सजावट सबसे आकर्षक रही, किसकी तस्वीर सबसे अधिक लोगों तक पहुँची—इन प्रश्नों के बीच कहीं यह सवाल गुम हो जाता है कि इस पूरे आयोजन से समाज को क्या मिला ?
_ क्या किसी अकेले बुजुर्ग के चेहरे पर मुस्कान आई ?
_ क्या किसी जरूरतमंद बच्चे के घर भी त्योहार की खुशी पहुँची ?
_ क्या किसी टूटते हुए रिश्ते को जोड़ने की कोशिश हुई ?
_ क्या लोगों के भीतर एक-दूसरे के प्रति सम्मान और संवेदना बढ़ी ?
_ यदि इन प्रश्नों का उत्तर हमारे पास नहीं है, तो हमें अपने उत्सवों के स्वरूप पर आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए.
_ क्योंकि किसी आयोजन की भव्यता उसकी सार्थकता का प्रमाण नहीं होती.
_ कभी-कभी मिट्टी के एक छोटे-से दीपक में वह पवित्रता होती है, जो हजारों रंगीन रोशनियों में भी नहीं मिलती ;
_ कभी किसी गरीब के घर पहुँचाई गई मिठाई का छोटा-सा डिब्बा, लाखों रुपये के सार्वजनिक प्रदर्शन से अधिक मानवीय हो जाता है.
_ खुशियों का मूल्य उनके खर्च से नहीं, उनसे पैदा हुई संवेदना से तय होता है.
_ आज की पीढ़ी को दोष देना भी आसान है, मगर शायद यह पूरी सच्चाई नहीं.
_ बच्चे वही सीखते हैं, जो उन्हें अपने आसपास दिखाई देता है.
_ यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ त्योहारों के वास्तविक अर्थ को समझें, तो हमें उन्हें केवल सजावट, खरीदारी और मनोरंजन नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे संस्कारों से भी परिचित कराना होगा.
_ उन्हें बताना होगा कि पूजा केवल हाथ जोड़ने का नाम नहीं, बल्कि अपने व्यवहार को भी विनम्र बनाने का अवसर है ;
_ व्रत केवल भोजन से दूरी नहीं, बल्कि अपने भीतर के लोभ और अहंकार पर विचार करने का समय भी है ;
_ दान केवल वस्तु देने का नाम नहीं, बल्कि किसी की गरिमा बचाते हुए उसकी सहायता करने की कला भी है.
_ बच्चों को संस्कृति पर लंबे भाषण देने से अधिक जरूरी है कि वे हमें संस्कृति को जीते हुए देखें.
_ वे देखें कि त्योहार के दिन हम अपने घर के बुजुर्गों के पास बैठते हैं, पड़ोसियों से प्रेमपूर्वक मिलते हैं, जरूरतमंदों का ध्यान रखते हैं और किसी की मान्यता या पहनावे का उपहास नहीं करते.
_ वे समझें कि धर्म मनुष्य को विनम्र बनाने के लिए है, दूसरों से श्रेष्ठ होने का अहंकार देने के लिए नहीं.
_ वे जानें कि श्रद्धा का अर्थ केवल अपने विश्वास का सम्मान करना नहीं, बल्कि दूसरे के विश्वास के प्रति भी संवेदनशील रहना है.
_ जब आचरण में संस्कार उतरते हैं, तभी संस्कृति अगली पीढ़ी तक पहुँचती है ; अन्यथा वह केवल भाषणों, नारों और पुस्तकों में सिमटकर रह जाती है.
_ हमें यह भी याद रखना होगा कि त्योहारों की आत्मा किसी एक वर्ग, पीढ़ी या पहनावे की बपौती नहीं है.
_ किसी के कपड़ों को देखकर उसके संस्कारों का निर्णय कर देना उतना ही अनुचित है, जितना आधुनिकता के नाम पर हर सांस्कृतिक मर्यादा को पिछड़ेपन का प्रतीक मान लेना.
_ किसी भी उत्सव की गरिमा केवल बाहरी अनुशासन से नहीं, बल्कि उसमें भाग लेने वाले लोगों के व्यवहार, संवेदनशीलता और पारस्परिक सम्मान से बनती है.
_ मर्यादा का अर्थ किसी पर अपनी पसंद थोपना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण बनाना है जहाँ उत्सव की स्वतंत्रता के साथ दूसरों की गरिमा और आस्था भी सुरक्षित रहे.
_ संस्कृति का वास्तविक सौंदर्य नियंत्रण में नहीं, संयम में है ; दिखावे में नहीं, दृष्टिकोण में है ;
_ और दूसरों को बदलने की जिद में नहीं, स्वयं को बेहतर बनाने के प्रयास में है.
_ मैं चाहता हूँ कि त्योहार फिर से हमारे जीवन में वही आत्मीयता लेकर आएँ, जिसके लिए कभी लोग महीनों प्रतीक्षा करते थे.
_ घरों में रोशनी हो, बाजारों में रौनक हो, बच्चे हँसें, युवा उत्साह से भरें, संगीत बजे, नृत्य हो और खुशियाँ पूरे समाज में फैलें.
इन सबमें कोई बुराई नहीं.
_ उत्सव तो जीवन में रंग भरने के लिए ही हैं.
_ बस इतना ध्यान रहे कि इन रंगों में संवेदना का रंग सबसे पहले फीका न पड़े.
_ हमारी आरती की लौ के साथ हमारे भीतर का अहंकार भी थोड़ा कम हो, हमारे घर की मिठास के साथ हमारे शब्दों में भी मिठास आए, हमारी पूजा के साथ हमारे व्यवहार में भी पवित्रता उतरे और हमारी खुशियों में उन लोगों के लिए भी जगह हो, जिनके जीवन में अभावों ने बहुत कम मुस्कुराने दिया है.
_ क्योंकि त्योहार का असली चमत्कार यह नहीं कि एक रात में पूरा शहर रोशनी से भर जाए, बल्कि यह है कि किसी के जीवन में वर्षों से पसरा अँधेरा थोड़ा कम हो जाए.
_ असली उत्सव वह नहीं, जिसमें हजारों लोग एक साथ नाचें, बल्कि वह भी है जिसमें कोई अकेला व्यक्ति पहली बार यह महसूस करे कि वह अकेला नहीं है.
_ असली धार्मिकता वह नहीं, जो केवल मंदिर की चौखट पर सिर झुकाए, बल्कि वह भी है जो किसी दुखी मनुष्य के आँसू देखकर स्वयं को उसकी सहायता के लिए झुका दे.
_ और असली संस्कृति वह नहीं, जिसका हम गर्व से उल्लेख करते रहें, बल्कि वह है जिसका प्रमाण हमारे व्यवहार से मिलता रहे.
_ आइए, इस बार त्योहार मनाते हुए अपने भीतर भी थोड़ा उतरें.
_ एक बार कैमरे को किनारे रखकर उस क्षण को पूरी तरह जीएँ, जिसे हम हमेशा के लिए तस्वीर में कैद करना चाहते हैं.
_ एक बार सजावट से अधिक उन रिश्तों पर ध्यान दें, जिन्हें समय की व्यस्तता ने धूल से ढक दिया है.
_ किसी ऐसे व्यक्ति को फोन करें, जिससे बात किए हुए बहुत समय बीत गया हो ; किसी रूठे हुए अपने की शिकायत सुनें ; किसी जरूरतमंद के घर सम्मानपूर्वक खुशियाँ पहुँचाएँ ; और अपने बच्चों को बताएं कि त्योहार केवल लेने, खाने, पहनने और दिखाने का नाम नहीं, बल्कि बाँटने, समझने, जोड़ने और आभार व्यक्त करने का अवसर भी हैं.
_ याद रखिए, आने वाली पीढ़ियाँ शायद हमारी सजावट की तस्वीरें कुछ समय बाद भूल जाएँगी, हमारे महँगे कपड़ों और भव्य आयोजनों का विवरण भी उनके लिए बहुत मायने नहीं रखेगा.
_ लेकिन उन्हें यह जरूर याद रहेगा कि त्योहारों के दिनों में घर का वातावरण कैसा होता था, बड़े-बुजुर्गों के चेहरे पर कैसी खुशी आती थी, माता-पिता का व्यवहार कैसा होता था और क्या उन दिनों किसी जरूरतमंद के लिए भी हमारे दरवाजे खुले रहते थे.
_ हम उनके लिए कैसी स्मृतियाँ छोड़ रहे हैं, यही हमारे संस्कारों की सबसे सच्ची विरासत होगी.
_ अंततः मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि त्योहारों को आधुनिक बनाने में कोई बुराई नहीं, मगर उन्हें केवल प्रदर्शन बना देना हमारे अपने सांस्कृतिक वैभव के साथ अन्याय है. _ परंपराओं को सँजोने का अर्थ समय को पीछे ले जाना नहीं, बल्कि उन मूल्यों को भविष्य तक पहुँचाना है, जिन्होंने सदियों से हमारे समाज को प्रेम, सहअस्तित्व और आत्मीयता के सूत्र में बाँधकर रखा है.
_ हमें नई रोशनी जरूर अपनानी चाहिए, मगर उस पुराने दीपक को बुझने नहीं देना चाहिए, जिसकी लौ में हमारी स्मृतियाँ, हमारी आस्था और हमारे पुरखों के संस्कार आज भी जीवित हैं.
_ क्योंकि त्योहारों की असली रोशनी बिजली के बल्बों से नहीं, मनुष्यता से पैदा होती है. _ पूजा की असली सुगंध फूलों से नहीं, निर्मल भावनाओं से आती है.
_और संस्कृति की असली पहचान हमारे शब्दों में नहीं, हमारे आचरण में दिखाई देती है.
_ जिस दिन हमारे त्योहारों में किसी गरीब की मुस्कान भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हो जाएगी, जितनी हमारे घर की सजावट ; किसी बुजुर्ग का आशीर्वाद भी उतना ही मूल्यवान लगेगा, जितनी हमारी तस्वीरों पर मिलने वाली प्रशंसा.
_ और किसी बिछड़े हुए अपने से फिर जुड़ जाना भी उतनी ही बड़ी खुशी बन जाएगा, जितनी किसी भव्य आयोजन की सफलता..
_ उस दिन हम सचमुच कह सकेंगे कि हमने त्योहार मनाना ही नहीं, उनकी आत्मा को समझना भी सीख लिया है.
_ आखिर ! त्योहार वही है, जिसके बीत जाने के बाद घर की सजावट भले उतर जाए, लेकिन मन में प्रेम की रोशनी लंबे समय तक जलती रहे.!!
– Ishq Banaras

Submit a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected