सच कहूँ, जब आज के त्योहारों को देखता हूँ, तो मन में एक सवाल चुपचाप सिर उठाने लगता है.
_ क्या सचमुच हम उत्सव मना रहे हैं, या केवल उत्सव का एक सुंदर-सा दृश्य रचकर दुनिया को दिखा रहे हैं ?
_ कभी जिन त्योहारों की आहट से घर के कोने-कोने में अपनापन उतर आता था, आज उन्हीं त्योहारों के बीच कहीं मन का सुकून खोता हुआ दिखाई देता है.
_ रोशनी पहले भी होती थी, मगर तब उसका उजाला दीवारों से उतरकर रिश्तों तक पहुँचता था ; आज रोशनी की कमी नहीं, फिर भी न जाने कितने मन अपने भीतर उदास बैठे हैं.
_ पहले एक छोटा-सा दीपक जलाकर लोग ईश्वर से घर की सुख-शांति माँगते थे, आज हजारों दीप जलते हैं, मगर उस एक सच्ची प्रार्थना के लिए मन कितनी देर ठहरता है, यह सोचने वाली बात है.
_ उत्सवों की सजावट बढ़ी है, आयोजन भव्य हुए हैं, खुशियों को सँजोने के साधन बढ़े हैं ; लेकिन क्या हमने कभी ठहरकर यह भी देखा कि इस बढ़ती चमक के बीच हमारी परंपराओं का सहज सौंदर्य कहीं धुँधला तो नहीं पड़ रहा ?
_ मन को पीड़ा आधुनिकता से नहीं, उस खालीपन से होती है, जो कभी-कभी सबसे भव्य उत्सव के बीच भी महसूस होता है.
_ लगता है, हमने घरों को सजाने में इतनी मेहनत कर दी कि उन दिलों को सँवारना भूल गए, जिनके मिलने से ही किसी त्योहार का असली अर्थ जन्म लेता है.
_ कभी त्योहार आने वाले होते थे, तो उनकी खुशी कई दिन पहले से घर के वातावरण में घुलने लगती थी.
_ माँ के हाथों में काम बढ़ जाता, मगर चेहरे पर थकान से अधिक संतोष दिखाई देता ; पिता अपनी सामर्थ्य के भीतर रहकर बच्चों की छोटी-छोटी इच्छाएँ पूरी करने की कोशिश करते ; दादी पुराने किस्सों के साथ उन परंपराओं को भी अगली पीढ़ी तक पहुँचा देतीं, जिनमें केवल रीति नहीं, जीवन जीने की सीख छिपी होती थी.
_ घर के आँगन में बनती रंगोली सिर्फ रंगों का मेल नहीं होती थी, वह अपनेपन से घर को सँवारने का एक बहाना होती थी.
_ पूजा की थाली में रखे फूलों की सुगंध, रसोई में पकते पकवानों की महक, मंदिर से आती घंटियों की ध्वनि और दरवाजे पर किसी अपने के अचानक आ जाने की खुशी, इन सबको जोड़कर ही तो त्योहार बनता था.
_ तब खुशी को साबित करने के लिए किसी तस्वीर की जरूरत नहीं पड़ती थी ;
_ किसी अपने का हँसता हुआ चेहरा ही उस दिन की सबसे सुंदर स्मृति बन जाता था.
_ मिठाई का एक छोटा-सा डिब्बा पड़ोसी के घर पहुँचाना, किसी पुराने मनमुटाव को भुलाकर गले मिल लेना, घर में काम करने वाले व्यक्ति को भी सम्मान और स्नेह के साथ उत्सव में शामिल करना, किसी जरूरतमंद के घर थोड़ी-सी खुशियाँ पहुँचा देना.
_ ये छोटे-छोटे काम ही त्योहारों को बड़ा बनाते थे.
_ शायद तब हमारे पास आज जितने साधन नहीं थे, मगर खुशियों को बाँटने के लिए दिल में जगह अधिक थी.
_ आज भी त्योहारों में वही आत्मा लौट सकती है, बशर्ते हम सजावट से थोड़ा समय निकालकर संबंधों को सँवारें, तस्वीरों से आगे बढ़कर चेहरों को पढ़ें और उत्सव की भीड़ में उस अपनेपन को पहचानें, जिसके बिना कोई भी पर्व केवल एक आयोजन बनकर रह जाता है.
_ आखिर त्योहार की सबसे सुंदर पहचान यह नहीं कि हमारा घर कितना जगमगाया, बल्कि यह है कि हमारी वजह से किसी दूसरे के जीवन में कितनी रोशनी पहुँची.