अच्छी बातें पसंद तो लगभग सभी को आती हैं, लेकिन उन्हें सुनना, अपनाना और जीना..
_ यह बहुत कम लोगों को पसंद आता है.
उदाहरण के लिए-
“क्रोध कम करना चाहिए” – सब सहमत हो जाएंगे.
“अहंकार छोड़ना चाहिए” – सब सिर हिला देंगे.
“दूसरों को समझना चाहिए” – सब कहेंगे सही बात है.
_ लेकिन जब वही बात खुद पर लागू करने की बारी आती है, तो मन असहज होने लगता है.
– क्यों ?
_ क्योंकि अच्छी बातें अक्सर हमसे कुछ माँगती हैं- थोड़ा त्याग, थोड़ा धैर्य, थोड़ा आत्मनिरीक्षण और कभी-कभी अपने भ्रम छोड़ने का साहस.
_ मन को वह बातें ज़्यादा पसंद आती हैं जो उसे सही साबित करें, न कि जो उसे बदलने के लिए कहें.
_ इसलिए कई बार एक चुटीला व्यंग्य, एक मसालेदार गपशप, या किसी की आलोचना लोगों को तुरंत आकर्षित कर लेती है.
_ जबकि एक गहरी बात सुनकर वे कहते हैं –
“हाँ, बात तो अच्छी है…” और आगे बढ़ जाते हैं.
– “अच्छी बातें सुनने में सबको अच्छी लगती हैं, लेकिन वे जीवन में जगह तभी पाती हैं, जब हम उनकी कीमत चुकाने को तैयार हों”
_ और शायद एक कारण यह भी है कि-
अच्छी बातें अक्सर हमारे भीतर की कमियों पर रोशनी डालती हैं, और हर कोई उस रोशनी में खड़ा होना नहीं चाहता.
लेकिन मेरा अनुभव यह भी कहता है –
_ बहुत कम लोग अच्छी बातों को तुरंत पसंद करते हैं, पर जीवन धीरे-धीरे सबको उनकी ज़रूरत समझा देता है.
_ कई बार जो बात 25 साल की उम्र में उबाऊ लगती है, वही 45 की उम्र में जीवन का सार लगने लगती है.!!





