सुविचार 2255

स्वाभिमान इतना भी मत बढ़ाना कि अभिमान बढ़ जाए,

_ और अभिमान इतना भी कम मत करना कि स्वाभिमान मिट जाए.

अभिमान और स्वाभिमान में बहुत स्पष्ट किंतु बारीक अंतर होता है..

_ अक्सर लोग अभिमान को स्वाभिमान से रिप्लेस कर देते हैं,
_ जबकि अभिमान सस्ता है और आत्म-सम्मान महंगा है,
_ लोग अभिमान अफोर्ड कर लेते हैं ..पर स्वाभिमान नहीं..
_ होता यह है कि ..लोग उन लोगों के सामने अभिमान दिखाते हैं ..जो उनसे कमज़ोर हैं..
_और जो उनसे ताकतवर हैं ..उनके सामने अपना स्वाभिमान ताक पर रख देते हैं.

सुविचार 2254

ठोकर खाने पर पता चला कि आगे बढ़ने के लिए झुकना भी पड़ता है,

और हादसे के बाद समझ में आया कि कुछ मोड़ पर रुकना भी पड़ता है.

सुविचार 2253

“सफलता” की ऊँचाईयों को छु कर कभी “अंहकार” मत कीजिए.

*क्योंकि, “ढ़लान” हमेशा “शिखर” से ही शुरु होती है.

सुविचार 2251

*समुद्र के किनारे जब एक लहर आयी तो एक बच्चे का चप्पल ही अपने साथ बहा ले गई| बच्चा रेत पर अंगुली से लिखता है “समुद्र चोर है”| उसी समुद्र के एक दूसरे किनारे कुछ मछुआरे बहुत सारी मछली पकड़ लेते हैं| वह उसी रेत पर लिखता है “समुद्र मेरा* *पालनहार है”| एक युवक समुद्र में डूब कर मर जाता है| उसकी मां रेत पर लिखती है “समुद्र हत्यारा है”| एक दूसरे किनारे एक गरीब बूढ़ा टेढ़ी कमर लिए रेत पर टहल रहा था| उसे एक बड़े सीप में एक अनमोल मोती मिल गया| वह रेत पर लिखता है “समुद्र दानी है”|* *अचानक एक बड़ी लहर आती है* *और सारे लिखा मिटा कर चली जाती है| लोग जो भी कहे समुद्र के बारे में लेकिन विशाल समुद्र अपनी लहरों में मस्त रहता है| अपने तुफान और शांति वह अपने हिसाब से तय करता है|*

*अगर विशाल समुद्र बनना है तो किसी के निर्णय पर अपना ध्यान ना दें| जो करना है अपने हिसाब से करें| जो गुजर गया उसकी चिंता में ना रहे| हार जीत, खोना पाना, सुख-दुख, इन सबके चलते मन विचलित ना करें| अगर जिंदगी सुख शांति से ही भरी होती तो आदमी जन्म लेते समय रोता नहीं| जन्म के समय रोना और मरकर रुलाना इसी के बीच के संघर्ष भरे समय को जिंदगी कहते हैं|*

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