सुविचार 2253
“सफलता” की ऊँचाईयों को छु कर कभी “अंहकार” मत कीजिए.
*क्योंकि, “ढ़लान” हमेशा “शिखर” से ही शुरु होती है.
*क्योंकि, “ढ़लान” हमेशा “शिखर” से ही शुरु होती है.
साझा किया गया दुख आधा होता है.
*अगर विशाल समुद्र बनना है तो किसी के निर्णय पर अपना ध्यान ना दें| जो करना है अपने हिसाब से करें| जो गुजर गया उसकी चिंता में ना रहे| हार जीत, खोना पाना, सुख-दुख, इन सबके चलते मन विचलित ना करें| अगर जिंदगी सुख शांति से ही भरी होती तो आदमी जन्म लेते समय रोता नहीं| जन्म के समय रोना और मरकर रुलाना इसी के बीच के संघर्ष भरे समय को जिंदगी कहते हैं|*
अरे बस इतना सा करना है, फिर से उठकर और फिर से चलना है.
अपने अंदर झांक लो…उड़ जायेंगे होश.