सुविचार 1105

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ज़िन्दगी में अच्छे लोगों की तलाश मत करो, ” खुद अच्छे बन जाओ ” . आपसे मिल कर शायद किसी की तलाश पूरी हो जाए.

सुविचार 1104

महत्वपूर्ण और उपयोगी बात यह है कि हमारा ज्ञान बढे, उचित को ग्रहण करने और अनुचित को त्यागने की मनोवृत्ति बढे, ताकि हम दुःख से बच सकें और सुख प्राप्त कर सकें. स्वस्थ, सुखी, सफल और संपन्न बनने के लिए हमें अच्छा जानकार और उस जानकारी का विधिवत पालन करने वाला बनना ही होगा. इस रहस्य को हम जितनी जल्दी समझ लें और धारण कर लें, उतना ही हमारा भला है.
मनोवृत्ति या वातावरण. यदि आप अपने जीवन में नाखुश हैं, तो एक या दोनों को बदल दें.

Attitude or Environment. If you’re unhappy in your life, change one or both.

सुविचार 1103

आप अपने जीवन मूल्यों का विशलेषण करें. यह देखें कि जो चाहते हैं, उसके अनुरुप आप की जीवन दृष्टि और जीवन शैली है या नहीं है. यदि इस में जरा भी असंगति की अनुभूति हो, स्वयं को परिमार्जित करें, स्वयं की उन कमियों को दूर करें.

सुविचार 1102

दूसरों के दोष ढूंढ़ने में अपनी ताकत को खर्च मत करो अपितु अपने गुणो को निखारने में वक़्त बिताओ.

सुविचार 1101

हर इनसान के जीवन जीने का मकसद भले अलग- अलग हो, जीवन को लेकर नजरिया भले अलग- अलग हो, अपने मकसद में कामयाबी के सपने एक जैसे होते हैं. कोई अपने मकसद में असफल होना नहीं चाहता, लेकिन यह सच है कि हर किसी को हर मकसद में कामयाबी नहीं मिलती. कई बार ऐसा होता है, जब इनसान बार- बार की कोशिश के बाद भी असफल रहता है और हालात ऐसे बन जाते हैं कि वह घोर निराशा से घिर जाता है. खुद को असहाय महसूस करता है. यहां तक कि खुद को असफल व्यक्ति मान बैठता है. उसे कोई राह नहीं दिखती और वह कोई फैसला लेने से भी डरने लगता है. अवसाद की यह अवस्था इनसान को इतना कमजोर बना देती है कि वह यह मान बैठता है कि उस के जीवन में सफलता नहीं आ सकती, लेकिन यह सच नहीं है. असफलता से सफलता की ओर लौटना बिलकुल संभव है. इसके लिए आत्मविश्वास, प्रेरणा, प्रोत्साहन, मार्गदर्शन, सहयोग और कार्य- योजना की जरुरत है.

सुविचार – मैं छिपाना चाहता हूँ – 1100

मैं छिपाना चाहता हूँ खाली फटी जेब के छेद, उनमें उंगलियां डालकर, मुट्ठियां भर कर..

मैं छिपाना चाहता हूँ, घर से दफ्तर जाते _ दफ्तर से घर आते, वह एक बड़ी लंबी सी सूची _ जिसमें लिखा होता है _ दफ्तर जाते वक्त करना है क्या ? पर रोज मैं उस लंबी सूची के मुताबिक न कुछ कर पाता हूं _ न ला पाता हूं..

मैं छिपाना चाहता हूँ, कमीज की उघड़ी सिलाई, टूटे बटन, पेंट की तुरपाई, _ कभी इस कमीज को कभी उस पैर को बदल- बदल कर _ लेकिन आस्तीन से बाहर झांकती _ अंदर की धुलाई से लंबी हो गई बनियान की लटकती बाहें – दबे छुपे कह ही देती हैं _ बहुत कुछ..

जरूरत और चाहत में बहुत फ़र्क है, तालमेल बिठाते बिठाते ज़िन्दगी गुज़र जाती है.!
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