सुविचार 1076

कुछ कर गुजरने की चाह में कहाँ-कहाँ से गुजरे,

अकेले ही नजर आये हम जहाँ-जहाँ से गुजरे..

सुविचार – बढ़ती उम्र में इन्हें छोड़ दीजिए – 1075

😊 बढ़ती उम्र में इन्हें छोड़ दीजिए।।😊

एक दो बार समझाने से यदि कोई नहीं समझ रहा है तो सामने वाले को समझाना,
🙏🏼 छोड़ दीजिए। 🙏🏼
बच्चे बड़े होने पर ख़ुद के निर्णय ख़ुद लेने लगें तो उनके पीछे लगना,
🙏🏼 छोड़ दीजिए।🙏🏼
गिने-चुने लोगों से अपने विचार मिलते हैं, यदि एक दो से नहीं मिलते तो उन्हें अथवा उनके बारे में सोचना,
🙏🏼 छोड़ दीजिए।🙏🏼
एक उम्र के बाद कोई आपको न पूछे या कोई पीठ पीछे आपके बारे में गलत कह रहा है तो दिल पर लेना,
🙏🏼 छोड़ दीजिए।🙏🏼
अपने हाथ कुछ नहीं, ये अनुभव आने पर भविष्य की चिंता करना,
🙏🏼 छोड़ दीजिए।🙏🏼
यदि स्वयं की इच्छा और क्षमता में फर्क काफी नजर आ रहा हो तो खुद से अपेक्षा करना,
🙏🏼 छोड़ दीजिए।🙏🏼
हर किसी का पद, कद, मद, सब अलग है इसलिए इनकी तुलना करना,
🙏🏼 छोड़ दीजिए।🙏🏼
बढ़ती उम्र में जीवन का आनंद लीजिए, रोज जमा-खर्च की चिंता करना,
🙏🏼 छोड़ दीजिए।🙏🏼
उम्मीदें होंगी तो सदमें भी बहुत होंगे, यदि सुकून से रहना है तो उम्मीदें करना,
🙏 छोड़ दीजिए। 🙏

सुविचार 1074

अगर सही राह मिली है तो फिर आगे बढ़ना, बार- बार भटकोगे, जगह- जगह कुंआ खोदोगे, तो पानी नहीं मिलेगा, एक जगह कुंआ खोदोगे तो पानी अवश्य मिल जाएगा.

सुविचार – खुद को इतना भी मत बचाया कर – 1073

खुद को इतना भी मत बचाया कर, बारिश हो तो भीग जाया कर

चाँद लाकर कोई नहीं देगा, अपने चेहरे से जगमगाया कर

दर्द हीरा है, दर्द मोती है, दर्द आँखों से मत बहाया कर

काम ले कुछ हसीन होठों से, बातों – बातों में मुस्कुराया कर

धूप मायूस लौट जाती है, छत पे किसी बहाने आया कर

कौन कहता है दिल मिलाने को, कम – से – कम हाथ तो मिलाया कर

खुद को इतना भी मत बचाया कर ..

सुविचार – सब जी रहे हैं – 1071

” सब जी रहे हैं “

जिसको जैसे समझ आ रहा है, _ वह वैसे जी रहा है.
कोई मछली को खाना खिला रहा है, _
_ कोई मछली को खा रहा है।
कोई किसी की जान बचा रहा है, _
_ कोई किसी की जान ले रहा है।
जिसको जैसे समझ आ रहा है, _ जी रहा है.
कोई देश के लिए जान दे रहा है, _
_ कोई देश बेच रहा है.
पर यह किसी को समझ नहीं आ रहा है, _ कि वह सही कर रहा है या ग़लत कर रहा है.
पता है कि मैं गलत कर रहा हूं, _ फिर भी उसे सही साबित कर रहा है.
इसलिए जिसको जैसे समझ आ रहा है, _ जी रहा है.
शायद रब ने दुनिया ही ऐसी बनाई कि तुम कभी सही ग़लत का भेद कर ही नहीं पाओगे.
आपस मे ही लड़ कर मर जाओगे.
मेरी इस सुंदर रचना का रसपान नहीं कर पाओगे.
कुछ ही फरिस्ते होगें.
वहीं समझ पाएंगे और रब की सृष्टि का रसपान कर पाएंगे.
बाकी रोते आए हैं रोते ही चले जाएंगे.
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