सुविचार – बात उन दिनों की है – वो ज़माना और था. – 1028

बात उन दिनों की है जब बाज़ार में

छोले भटूरे 4-5 रु के दो होते थे।
मकान छोटे मगर दिल बड़े होते थे।
यह Space/Privacy जैसे शब्दों के तो माने भी नहीं पता थे क्योंकि छतें पड़ोसियों से जुड़ी होती थी और
टायलेट तक सांझा होते थे।
दूर के रिश्तेदारों के नाम तक पड़ोसियों को रटे होते थे।
डेढ़ दर्जन के परिवार का 3 कमरों में ठाठ से बसर होता था।
छुट्टियों में रिश्तेदारों का परिवार भी साथ होता था।
काली दाल को घी में सूखे धनिए का छौंक लगा छक कर खाते थे, फिर आम और ठंडे दूध पीते हुए बच्चे छत पर बिस्तर मिनटों में लगाते थे।
सूर्य उदय से पहले उठ भी जाते थे।
पैसे कम पर खुशियां बहुत थी।
फ़िल्मों के डायलॉग से शामें कटती थी।
ईगो,अहम् या नखरे कहाँ किसी में होते थे ?
VCR किराये पर लेकर रात भर पड़ोसियों के साथ मिल कर फिल्मे देखते थे,तेरा मेरा नहीं, सबकुछ हमारा कहलाता था।
भाई की शादी में आया सामान,ननद की शादी में ही जाता था।
शादी ब्याह अपने आप में त्योहार होते थे, बाहर से आए संबंधी पड़ोसियों के घर ही सोते थे।
मांगे हुए गद्दे, मटर छीलते परिवार, कढ़ाई में पकती सब्ज़ियों ओर,पनीर और आइसक्रीम पर नज़र रखे फूफा जी, वाह क्या नज़ारे होते थे..
घंटे भर की कुट्टी और मिनटों में अब्बा होते थे।
बुआ मामा, चाचा और मासी के बच्चे सब भाई बहन कहलाते थे, उनके आगे की रिश्तेदार भी पूरी डिटेल से गिनवाते थे।
सब बड़े भाई बहनों के कपड़े बिना शर्म के पहनते थे,बताया था ना कि ईगो और अहम् पास भी ना मंडराते थे।
आज दौर बदल गया।
छोले भटूरे खाने हल्दीराम जाने लगे हैं,
पांच सौ का नोट बेफिक्र थमाने लगे हैं।
मकान आलीशान, मन परेशान हो रहे हैं,
कमरों से जुड़े टायलेट हैं फिर भी प्राइवेसी को रो रहे हैं।
बच्चों से बड़ों तक को स्पेस चाहिए,बगल वाले घर में कौन रहता है, नाम तो बताइए ?
आज सबको अलग कमरा चाहिए,
बीबी को पंखा पति को AC चाहिए।
अब कौन गर्मी की छुट्टियों में किसी के घर बिताता है? अपने कहाँ Vacation पर हैं,Facebook बताता है।
फिक्र और वज़न बढ़ रहे हैं,आज पैसा और कैसे बढ़ाएं इसी फिक्र में घुल रहे हैं।
आज 56 भोग खाते हैं, फिर पचाने बेमन से Gym जाते हैं।
घर, गाड़ी, बैंक में जमा धन, खुशियों के सामान सब हैं, खुशियाँ बांटने वाले नहीं हैं।
मामा चाचा के बच्चे अब Cousins और उनके आगे के Distant Relatives हो गए हैं।
Social Media पर कई बहनें और Bro ज़रूर हो गए हैं,
अब लोग समय बिताने के लिए Mall जाते हैं और Mall में Shopping करने के लिए कपड़े खरीदते हैं।
अब बच्चों को कोई Cousin कपड़े नहीं देता क्योंकि लेने वाले का ईगो और अहम् पीछा नहीं छोड़ता।
अब शादियों में भी रिश्तेदार बस मूंह दिखाने आते हैं,
घर में नहीं उन्हें अब होटल में ठहराते हैं।
सारे परिवार वाले अब मेकअप करवा,
खुद मेहमानों की तरह जाते हैं।
अब फूफा जी नहीं, खाने का ज़िम्मा Caterer उठाते हैं।
*दिखावे की दुनिया में रिश्ते नाते छूट गए,*
*मेरे बचपन के साथी कहाँ गुम गए ?*
*अगर ज़िन्दगी से ब्लाक सभी रिश्ते अनब्लाक कर दें, तो खुशियों के पल मिल सकते हैं।*
*पर बनावटी दुनिया मे बनावटी रिश्तों के बीच बनावटी ज़िन्दगी जी रहे है …*

सुविचार -अच्छी थी पगडंडी अपनी, सड़कों पर तो जाम बहुत है.. – 1027

अच्छी थी पगडंडी अपनी, सड़कों पर तो जाम बहुत है..

_ फुर्र हो गई फुर्सत अब तो, सबके पास काम बहुत है..
_ नहीं जरुरत बूढ़ों की अब, हर बच्चा बुद्धिमान बहुत है..
_ उजड़ गए सब बाग़ बगीचे, दो गमलों में शान बहुत है..
_ मट्ठा, दही नहीं खाते हैं, कहते हैं जुकाम बहुत है..
_ पीते हैं जब चाय तब कहीं, कहते हैं आराम बहुत है..
_ बंद हो गई चिट्ठी-पत्री, व्हाट्सप्प पर पैगाम बहुत है..
_ आदी हैं ए सी के इतने, कहते बाहर घाम बहुत है..
_ झुके-झुके स्कूली बच्चे, बस्तों में सामान बहुत है..
_ नहीं बचे कोई सगे-संबंधी, अकड़-ऐंठ-अहसान बहुत हैं..
_ सुविधाओं का ढेर लगा है, पर इंसान परेशान बहुत है..
_अच्छी थी पगडंडी अपनी, सड़कों पर तो जाम बहुत है..

सुविचार – हम वो आखरी पीढ़ी हैं – 1026

* हम वो आखरी पीढ़ी हैं, जिन्होंने कई- कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है.

* हम वो आखरी लोग हैं, जिन्होंने बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ परम्परागत खेल, गिल्ली- डंडा, छुपा- छिपी, खो- खो, कबड्डी, कंचे जैसे खेल खेले हैं.

* हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं, जिन्होंने कम या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है और किताबें पढ़ें हैं.

* हम वही पीढ़ी के लोग हैं, जिन्होंने अपनों के लिए अपने जज़्बात, खतों में आदान प्रदान किये हैं.

* हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं, जिन्होंने कूलर, एसी या हीटर के बिना ही बचपन गुजारा है.

* हम वो आखरी लोग हैं, जो अक्सर अपने छोटे बालों में, सरसों का ज्यादा तेल लगा कर, स्कूल और शादियों में जाया करते थे.

* हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं, जिन्होंने स्याही वाली दावात या पेन से कॉपी, किताबें, कपडे और हाथ काले, नीले किये हैं.

* हम वो आखरी लोग हैं, जिन्होंने टीचर्स से मार खाई है.

* हम वो आखरी लोग हैं, जो मोहल्ले के बुजुर्गों को दूर से देख कर, नुक्कड़ से भाग कर, घर आ जाया करते थे.

* हम वो आखरी लोग हैं, जिन्होंने अपने स्कूल के सफ़ेद केनवास शूज़ पर, खड़िया का पेस्ट लगा कर चमकाया है.

* हम वो आखरी लोग हैं, जिन्होंने गोदरेज सोप की गोल डिबिया से साबुन लगा कर शेव बनाई है. जिन्होंने गुड़ की चाय पी है. काफी समय तक सुबह काला या लाल दंत मंजन या सफेद टूथ पाउडर इस्तेमाल किया है.

* हम निश्चित ही वो आखरी लोग हैं, जिन्होंने चांदनी रातों में, रेडियो पर बीबीसी की खबरें, विविध भारती, आल इंडिया रेडियो और बिनाका जैसे प्रोग्राम सुनें हैं.

* हम ही वो आखरी लोग हैं, जब हम सब शाम होते ही छत पर पानी का छिड़काव किया करते थे. उसके बाद सफ़ेद चादरें बिछा कर सोते थे. एक स्टैंड वाला पंखा सब को हवा के लिए हुआ करता था. सुबह सूरज निकलने के बाद भी ढीठ बने सोते रहते थे. वो सब दौर बीत गया, चादरें अब नहीं बिछा करतीं. डब्बों जैसे कमरों में कूलर, एसी के सामने रात होती है, दिन गुज़रते हैं.

* हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं, जिन्होंने वो खूबसूरत रिश्ते और उनकी मिठास बांटने वाले लोग देखे हैं, जो लगातार कम होते चले गए. अब तो लोग जितना पढ़ लिख रहे हैं, उतना ही खुदगर्ज़ी, बेमुरव्वती, अनिश्चितता, अकेलेपन व निराशा में खोते जा रहे हैं. हम ही वो खुशनसीब लोग हैं, जिन्होंने रिश्तों की मिठास महसूस की है…!!

हम एकमात्र वह पीढ़ी हैं, जिसने अपने माँ- बाप की बात भी मानी और बच्चों की भी मान रहे हैं.

हम वो आखरी पीढ़ी हैं इसने क्या खोया क्या पाया.

मैं तकरीबन 54 साल का हूँ, मैं और मेरे हमउम्र लोग या हमारे मौजूद बुजुर्ग गवाह हैं,
_उस टेक्नोलॉजिकल बदलाव या क्रांति के जो हमने पिछले 40-50 साल में देखा है.
— हमने अपने घरों में हाथ की चक्की पर औरतों को गेहूं पीसते देखा है, घर में औरतों को मटके में दूध बिलोते देखा है,
_हमने खुद चारा काटने की मशीन पर चारा काटा है, औरतों को सिल पर मसाला पीसते देखा है,
_मिट्टी के चूल्हे पर रोटी बनते देखी हैं, बरोसी(हांडी) में 10-12 घन्टे पका हुआ मोटी मलाईयुक्त दूध पिया है,
_हमने घर की औरतों को सेंवई(आज की मैग्गी, चाऊमीन), उड़द/मूंग की दाल की मंगोड़ी/बड़ी, आलू के चिप्स, चावल की कचरी को हाथ से बनाते देखा है.
— हमने वह वक़्त भी देखा है, जब गांवों में बिजली नही होती थी या नामचारे को होती थी,
_हमने मिट्टी के तेल की डिबिया, लालटेन या लैंप में पढ़ाई भी की है,
_हमने मिट्टी के कच्चे पक्के घर और आँगन में पेड़ और छप्पर भी पड़े देखे हैं,
_हमने कंचे, गुल्ली डंडा, कुश्ती कबड्डी खूब खेले/देखें है, हमने कैंची/डंडे की साइकिल भी खूब चलाई है,
_हमने बरसात के पानी मे कागज की नाव भी खूब चलाई हैं, हमने कागज के हवाई जहाज भी खूब उढायें हैं,
हमने खूब ट्यूबवेल की कुंडी में नहाने का भी मजा लिया है,
_हमने खूब पतंगों के पेच भी लड़ायें हैं,
_ हमने बाग के आम, अमरूद, जामुन खूब तोड़कर/चुराकर खाये हैं,
_हमने सिंचाई के साधन हल, ट्रेक्टर, ट्यूबवेल और कुछ हद तक रहट भी देखें हैं,
_हमने संचार के साधन पोस्टकार्ड, अंतरदेशीय पत्र, पीला लिफाफा, टेलीग्राम भी देखें इस्तेमाल किए हैं,
हमने रेडियो, टेपरिकॉर्डर, थोड़ा बहुत ग्रामोफोन, ब्लैक एंड व्हाइट टीवी की इतवार की फ़िल्म और बुधवार के चित्रहार का लोगों में क्रेज भी देखा है,
_हमने छत पर नाचते, पीहू पीहू करते मोर भी देखे हैं, हमने मुर्गे की बांग के साथ दिन निकलते भी देखा है.
_मुझे आज भी सुबह सूरज के निकलने से पहले की दादी नानी द्वारा चक्की पीसने की मद्धम मद्धम सरसराहट भरी आवाज और फाख्ता की बोली से बेहतर कोई रिंगटोन नही लगी.
— हमारी जनरेशन और आज की जनरेशन में जो बुनियादी फर्क है, वह तजुर्बे का है.
_नई नस्ल खुद को स्मार्ट बोल सकती है, पर हम लोग उनकी उम्र में कमोबेश सच्चे, सादा और सरल थे.
_आज की जनरेशन को केवल आज का तजुर्बा है _और हमारी जनरेशन को आज के साथ- साथ गुजरे कल का भी तजुर्बा है.
_आज की जनरेशन की दुनिया कमोबेश स्मार्ट फोन की आभासी दुनिया तक सिमटी हुई है,
_यही इनका मनोरंजन है, यही इनका खेल का मैदान है, यही इनका कारोबार है, और यही इनका ओढ़ना बिछोना है.
–एक और बड़ा फर्क है दोनो में, आज की जनरेशन दिन भर कुर्सी/चारपाई तोड़ने के बाद, शाम को जिम में पसीना बहाने जाती है,
_पैसे देकर आर्टिफीसियल सेहत खरीदती है.
_वहीं पुरानी जनरेशन, क्या आदमी क्या औरत सबकी दिनचर्या में ही जिम था,
_सारा दिन पसीना निकलता था, भूख बढ़िया लगती थी, सेहत तो खुदबखुद बढ़िया रहती थी.
_पहले सभी बच्चे दाई के हाथों घर मे ही पैदा होते थे.
— इतने सारे तजुर्बों का जखीरा रखने के बावजूद, बच्चों को बेहतर खिलाने-पिलाने, पहनाने के बावजूद,
पेट काटकर महंगी पढ़ाई दिलाने के बावजूद,
_जब फेसबुक-व्हाट्सएप्प से ज्ञान हासिल करने वाली नस्ल यह कहती है कि _हमारे बाप को आता ही क्या है _या हमारे बाप ने हमारे लिए किया ही क्या है _तो आदमी ठगा हुआ सा महसूस करता है.
_उसके पास सिवाय खामोशी अख्तियार करके आँसू पीने के अलावा कोई चारा नही होता.
_सयाने लोग शायद इसी चीज को ‘जनरेशन गैप’ कहते होंगे.
Notes : पहले हर चीज़ ज्यादा असली और शुद्ध थी, लेकिन कुछ भी स्थिर नहीं है. केवल परिवर्तन ही स्थिर है.
लेकिन आज जो जीवन जी रहे हैं, ये संभव नहीं है _अगर हम नए उपकरण नए उपकरणों का उपयोग न करें।
मोबाइल की सहायता से ही हमारा टिकट हो रहा, होटल बुकिंग हो रहा, क्या क्या नहीं हो रहा..
उस समय की बात है —

_ जब शाम ढलते ही जैसे प्रकृति खुद एक मौन घोषणा कर देती—
“चलो, अब रोशनी बुझा दें… इंसान थोड़ी देर साथ बैठे.”
_ लोडशेडिंग तब कोई असुविधा नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा था.
_ संध्या घिरते ही बिजली चली जाती, और पूरा मोहल्ला अंधेरे में डूब जाता.
_ लेकिन उस अंधेरे में एक खास तरह की उम्र की गर्माहट थी, एक साझा अपनापन था.
_ तब का जीवन था कुछ अलग—
_ सादा, सौम्य और सजीव.
_ बिजली जाते ही घर के लोग आंगन में चटाई बिछाकर इकट्ठा हो जाते.
_ चारों ओर पसरी नीरवता में जुगनुओं की टिमटिमाहट और तारों से भरा आसमान,
जैसे हमारी बातों का गुप्त श्रोता बन जाता.
_ हवा में तैरती शालिक की आवाज़, दूर कहीं कुत्तों का भौंकना,
_ इनके बीच शुरू होती थी कहानी की महफिल.
_ बड़ों की ज़ुबान से निकलती पुरानी यादें,
_ राजाओं की कहानियाँ, भूत-प्रेत के किस्से—
_ और हम बच्चे, डर और रोमांच के बीच डूब जाते उन शब्दों में.
_ मोबाइल, इंटरनेट और चमचमाती स्क्रीन तब की ज़िंदगी का हिस्सा नहीं थे.
_ व्यस्तता का मतलब होता था खेतों की कटाई, मेहमानों का आना या परीक्षा की तैयारी.
_ रिश्ते महज़ ज़रूरत नहीं थे, बल्कि एक-दूसरे के होने का सुख थे.
_ बातों में था अपनापन, और आंखों में थी समझदारी की मुस्कान.
_ उस समय हमने सीखा था— इंतज़ार करना,
_ किसी की बातों को महसूस करना, और इंसान को समय देना.
_ रिश्ते बनते थे हाथ थामकर, कंधे पर सिर रखकर, या साथ बैठकर तारों को निहारते हुए..
_ लोडशेडिंग ने हमें सिखाया था— अंधेरा सिर्फ खालीपन नहीं होता,
_ कभी-कभी वहीं सबसे गहरा उजाला बसता है— रिश्तों का, समझ का, अपनापन का.
लेकिन आज ?
_ आज सबके पास है रौशनी—बल्बों की, स्क्रीनों की,
_ 24 घंटे इंटरनेट, हर सुख-सुविधा हाथ में.
_ फिर भी कहीं वो सच्ची रौशनी बुझ-सी गई है.
_ अब साथ बैठना है—मगर सबके हाथ में है मोबाइल
_ बातें हैं—मगर सिर्फ चैटबॉक्स में.
_ लोग हैं—पर पास होने का सुख नहीं है.
_ लोडशेडिंग का वो अंधकार अब नहीं है,
_ लेकिन मन के भीतर एक और गहरा अंधेरा घर कर गया है.
_ जहां अकेलापन सबसे चमकीली रोशनी बन बैठा है, और रिश्ते बदल गए हैं खामोश साए.
हाय !
_ इस मशीनों से भरी दुनिया की बनावटी रौशनी में, हम खो बैठे हैं उस अंधेरे में उजाला खोजने का सरल तरीका—
_ हम खो बैठे हैं वो सीधा-सादा सूत्र, जिससे इंसान इंसान से दिल से जुड़ता है.!!

सुविचार – उम्र को” दराज में रख दें, उम्रदराज न बनें – 1025

“उम्र को” दराज में रख दें, उम्रदराज न बनें।

खो जाएं जिन्दगी में, खुद को खोने का इन्तजार न करें।
जिनको आना है आए, जिसको जाना है जाए,
पर हमें जीना है, हैं, ये न भूल जाएं।
जिनसे मिलता है प्यार, उनसे ही मिलें बार बार,
कभी बचपन को जीएं, तो कभी जवानी को,
पर न छोड़ें बुढापे में भी सपने संजोने को।
महफिलों का शौक रखें, दोस्तों से प्यार करें,
जो रिश्ते हमें समझ सकें, उन रिश्तों की कद्र करें।
बंधें नहीं किसी से भी, ना किसी को बँधने पर मजबूर करें।
दिल से जोड़ें हर रिश्ता, और उन रिश्तों से दिल से जुड़े रहें।
हँसना अच्छा होता है, पर अपनों के लिये रोया भी करें।
याद आएं कभी अपने तो, आँखें अपनी नम भी करें,
ध्यान रखें कि जिन्दगी चार दिन की है,
तो फिर शिकवे शिकायतें कम ही करें …
“*उम्र को* दराज में रख दें ” उम्रदराज न बनें।”

सुविचार – जिन्दगी का सफ़र, हैं ये कैसा सफ़र – 1024

जिन्दगी का सफ़र, हैं ये कैसा सफ़र

_ कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं
_ है ये कैसी डगर, चलते हैं सब मगर
_ कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं
_ जिन्दगी को बहोत प्यार हम ने किया
_ मौत से भी मोहब्बत निभायेंगे हम
_ रोते रोते जमाने में आये मगर
_ हंसते हंसते जमाने से जायेंगे हम
_ जायेंगे पर किधर, हैं किसे ये खबर
_ कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं
_ ऐसे जीवन भी हैं जो जिए ही नहीं
_ जिनको जीने से पहले ही मौत आ गयी
_ फूल ऐसे भी हैं जो खिले ही नहीं
_ जिनको खिलने से पहले खिजा खा गयी
_ है परेशान नजर, थक गए चार अगर
_ कोई समझा नहीं, कोई जाना नही.!!
सफ़र कभी खत्म नहीं होता.. जीवन चूकते जाता है आहिस्ता आहिस्ता..
_ हम बीतते जाते हैं.. और एक दिन सब यहीं रह जाता है.!!
ये तस्वीर सिर्फ़ एक सफ़र नहीं, हौसले, जज़्बे और सपनों की कहानी है 🚴‍♂️🌧️

_ बारिश, ठंडी हवा और लंबा रास्ता… फिर भी चेहरे पर मुस्कान और दिल में जुनून 💙
_ क्योंकि असली खुशी मंज़िल में नहीं, हर मुश्किल को पार करते सफ़र में मिलती है ✨
_ आज की थकान, कल की सबसे बड़ी जीत बनेगी. 💪
– Cycle Baba
“उड़ना है तो डरना कैसा? पानी गहरा हो या रास्ता फिसलन भरा… कोशिश जारी रखो!” 😄

और हम इंसान छोटी-छोटी बातों पर टेंशन ले लेते हैं ! 😂
सीख यही है –
हालात कैसे भी हों, अपने हौसलों को गीला मत होने दो. 🕊️
– Cycle Baba[/su_quote
सपने बड़े रखो, दिल शांत रखो, और सफर का मज़ा लो…

_ शहर बदले या हालात, हिम्मत मत बदलना.
– Cycle Baba
जिंदगी भी कभी-कभी ऐसे ही जकड़ लेती है —

EMI 🧾, जिम्मेदारियाँ 🏠, सपने ✨ और लोगों की बातें 😅
पर असली खिलाड़ी वही है जो कहे —
“लिपटो जितना लिपटना है… मैं फिर भी आगे बढ़ूंगा!” 🚴‍♂️🔥
– Cycle Baba

सुविचार – ज़िंदगी के दस सूत्र ” – 1023

ज़िंदगी के दस सूत्र “

इन दसों सूत्रों को पढ़ने के बाद पता चला कि सचमुच खुशहाल ज़िंदगी और शानदार मौत के लिए ये सूत्र बहुत ज़रूरी हैं।

1. *अच्छा स्वास्थ्य* – अगर आप पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं, तो आप कभी खुश नहीं रह सकते। बीमारी छोटी हो या बड़ी, ये आपकी खुशियां छीन लेती हैं।

2. *ठीक ठाक बैंक बैलेंस* – अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए बहुत अमीर होना ज़रूरी नहीं। पर इतना पैसा बैंक में हो कि आप आप जब चाहे बाहर खाना खा पाएं, सिनेमा देख पाएं, समंदर और पहाड़ घूमने जा पाएं, तो आप खुश रह सकते हैं। उधारी में जीना आदमी को खुद की निगाहों में गिरा देता है।

3. *अपना मकान* – मकान चाहे छोटा हो या बड़ा, वो आपका अपना होना चाहिए। अगर उसमें छोटा सा बगीचा हो तो आपकी ज़िंदगी बेहद खुशहाल हो सकती है।

4. *समझदार जीवन साथी* – जिनकी ज़िंदगी में समझदार जीवन साथी होते हैं, जो एक-दूसरे को ठीक से समझते हैं, उनकी ज़िंदगी बेहद खुशहाल होती है, वर्ना ज़िंदगी में सबकुछ धरा का धरा रह जाता है, सारी खुशियां काफूर हो जाती हैं। हर वक्त कुढ़ते रहने से बेहतर है अपना अलग रास्ता चुन लेना।

5. *दूसरों की उपलब्धियों से न जलना* – कोई आपसे आगे निकल जाए, किसी के पास आपसे ज़्यादा पैसा हो जाए, तो उससे जले नहीं। दूसरों से खुद की तुलना करने से आपकी खुशियां खत्म होने लगती हैं।

6. *गप से बचना* – लोगों को गपशप के ज़रिए अपने पर हावी मत होने दीजिए। जब तक आप उनसे छुटकारा पाएंगे, आप बहुत थक चुके होंगे और दूसरों की चुगली-निंदा से आपके दिमाग में कहीं न कहीं ज़हर भर चुका होगा।

7. *अच्छी आदत* – कोई न कोई ऐसी हॉबी विकसित करें, जिसे करने में आपको मज़ा आता हो, मसलन गार्डेनिंग, पढ़ना, लिखना। फालतू बातों में समय बर्बाद करना ज़िंदगी के साथ किया जाने वाला सबसे बड़ा अपराध है। कुछ न कुछ ऐसा करना चाहिए, जिससे आपको खुशी मिले और उसे आप अपनी आदत में शुमार करके नियमित रूप से करें।

8. *ध्यान* – रोज सुबह कम से कम दस मिनट ध्यान करना चाहिए। ये दस मिनट आपको अपने ऊपर खर्च करने चाहिए। इसी तरह शाम को भी कुछ वक्त अपने साथ गुजारें। इस तरह आप खुद को जान पाएंगे।

9. *क्रोध से बचना* – कभी अपना गुस्सा ज़ाहिर न करें। जब कभी आपको लगे कि आपका दोस्त आपके साथ तल्ख हो रहा है, तो आप उस वक्त उससे दूर हो जाएं, बजाय इसके कि वहीं उसका हिसाब-किताब करने पर आमदा हो जाएं।

10. *अंतिम समय* – जब यमराज दस्तक दें, तो बिना किसी दुख, शोक या अफसोस के साथ उनके साथ निकल पड़ना चाहिए अंतिम यात्रा पर, खुशी-खुशी। शोक, मोह के बंधन से मुक्त हो कर जो यहां से निकलता है, उसी का जीवन सफल होता है.

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