सुविचार – *मैंने .. हर रोज .. जमाने को .. रंग बदलते देखा है ….*!!! – 1110

*….ध्यान दीजिएगा….*
*मैंने .. हर रोज .. जमाने को .. रंग बदलते देखा है ….*!!!
*उम्र के साथ .. जिंदगी को .. ढंग बदलते देखा है .. !!!*
*वो .. जो चलते थे .. तो शेर के चलने का .. होता था गुमान..*!!!
*उनको भी .. पाँव उठाने के लिए .. सहारे को तरसते देखा है !!!*
*जिनकी .. नजरों की .. चमक देख .. सहम जाते थे लोग ..*!!!
*उन्ही .. नजरों को .. बरसात .. की तरह ~~ बरसते देखा है .. !!!*
*जिनके .. हाथों के .. जरा से .. इशारे से ..पत्थर भी कांप उठते थे..*!!!
*उन्ही .. हाथों को .. पत्तों की तरह .. थर थर काँपते देखा है .. !!!*
*जिन आवाज़ो से कभी .. बिजली के कड़कने का .. होता था भरम ..*!!!
*उन.. होठों पर भी .. मजबूर .. चुप्पियों का ताला .. लगा देखा है .. !!!*
*ये जवानी .. ये ताकत .. ये दौलत ~~ सब कुदरत की .. इनायत है ..*!!!
*इनके .. जाते ही .. इंसान को ~~ बेजान हुआ देखा है … !!!*
*अपने .. आज पर .. इतना ना .. इतराना ~~ मेरे .. यारों ..*!!!
*वक्त की धारा में .. अच्छे अच्छों को ~~ मजबूर होता देखा है .. !!!*
*कर सको..तो किसी को खुश करो…दुःख देते …हुए….तो हजारों को देखा है ।।।*

सुविचार – जिसे हम बचा रहे हैं क्या वह बच सकता हैं ? – 1109

जिसे हम बचा रहे हैं क्या वह बच सकता हैं ?

हम अपना नाम करना चाहते हैं, _ हम पैसा इकट्ठा करना चाहते हैं..

हम रिश्तों को बचाना चाहते हैं, _ हम बहुत सारे आनंद को पा लेना चाहते हैं..

क्या ये सब बचाया जा सकता हैं ?

ये पृथ्वी पर लाखों और करोड़ों लोग आए और गए, _ कोई भी ये सब बचा नहीं सका..

सब कुछ खत्म ही हो जाता है..

सुविचार – *ज़रा सा फर्क होता है,**रहने में और ना रहने में* – 1108

*ज़रा सा फर्क होता है,*

*रहने में और ना रहने में*
*ये इतने सारे लोग जो गए हैं*
*क्या इनको देखकर कभी ऐसा लगा था कि ये, यूं ही चले जायेंगे ।* *बिना कुछ कहे, बिना कुछ बताए ।*
*उन सब से कुछ लगाव था हमें।* *कुछ शिकायतें थी।*
*कुछ नाराजगी भी हो सकती थीं।* *जो कभी, कही नहीं हमने* *पर कहा तो हमने वो भी नहीं,*
*जो उनमें, बेहद पसंद था हमें ।*
*फिर अचानक एक दिन खबर आती है।*
*’ये नहीं रहे’, ‘वो नहीं रहे’*
*नहीं रहे मतलब , कैसे नहीं रहे ?*
*कैसे एक पल में सब कुछ बदल जाता है।*
*वही सारे लोग, जिनसे हम अक्सर मिला करते थे कल तक।*
*वे इतनी जल्दी कैसे गायब हो सकते है, कि दोबारा मिलेंगे ही नहीं।*
*जैसे कोई बेजान खिलौना,*
*जिसकी चाबी खत्म हो गयी हो।*
*कितना कुछ कहना रह गया था उनको।*
*कहीं घूमने जाना था उनके साथ, खाना भी खाना था , पार्टियां भी करनी थी।*
*कुछ बताना था, कुछ कहना भी था उनको।*
*बहुत सी बातें करनी थी फ़िज़ूल की ही सही।*
*पर वो भी कहाँ हो पाया।*
*सब कुछ रह गया , वो चले गए।*
*न हम ही तैयार थे।*
*न वो ही तैयार थे,*
*रुख़्सती के लिए*
*ऐसे ही एक दिन हमारी सब की खबर आनी है,
‘एक सुबह कि वे नहीं रहे’*
*लोग अरे!!!!! कह कर एक मिनिट खामोश होंगे,*
*फिर जीवन बढ़ जाएगा आगे।*
*इसलिए आओ तैयारी कर लेते हैं,*
*सब नाराज़गी, शिकायतों और तारीफों का हिसाब चुकता करते हैं।*
*ज़िंदगी हल्की हो जाएगी, तो आखरी सांस पर, मलाल नहीं रहेगा।* *क्योंकि*
*ज़रा सा फर्क होता है,*
*जिंदा रहने में, और एक दिन ना रहने में*!!!!!

सुविचार 1107

ज़िन्दगी की जिम्मेदारी कोई डरावनी चीज नहीं है , वह आनंद से ओत – प्रोत है.

सुविचार 1106

जो लोग संतुलित जिंदगी जीते हैं मतलब जिन का जीवन के यथार्थ से आमना सामना है, वे खुशहाल जिंदगी जीते हैं.

सुविचार 1105

2838699666_c7c78ea6b6_b

ज़िन्दगी में अच्छे लोगों की तलाश मत करो, ” खुद अच्छे बन जाओ ” . आपसे मिल कर शायद किसी की तलाश पूरी हो जाए.
error: Content is protected