सुविचार – सुख – 136

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आपके जीवन में जो छण व्यतीत हो रहे हैं, उन्हें सादे और मीठे, पवित्र और सुन्दर, श्रेष्ठ और आशापूर्ण, उच्च और दृढ, नम्र और प्रेममय विचारों से भरिए.
सुख की हर कामना में एक दर्द छुपा हुआ है. _यह तो तुम्हें तय करना है कि अपने जीवन के तमाम दुखों से कैसे अपने सुख को पृथक करना है ?

– Sanjaya Shepherd (ज़िंदगी ज़ीरो माइल)
Question : सुखी रहने का मूल मंत्र क्या है ?

Answer :  सुखी जीवन का एक मात्र मूल मंत्र यही है कि आप अपने जीवन की तुलना किसी और के जीवन के साथ बिल्कुल ना करें,
_ क्यूंकि आप सबसे अलग हैं यूनिक हैं.
_ आपको जो भी काम अच्छा लगता हो उसमे अपना ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत करें..
_ आप सदैव ही खुद को प्रसन्न पाएंगे और आपका दिमाग भी शांत रहेगा.
Question : मेरा तो व्यक्तिगत अनुभव यह है कि बुरे काम करने वाले व्यक्ति बहुत सुखी रहते हैं.

_ शानदार जिंदगी जीते हैं और ईमानदारी से, निष्ठा से अपना काम करने वाले रोते, झींकते, खींझते, कुढ़ते रहते हैं, अभावों में अपना जीवन जीते हैं, ऐसा क्यों है ?
Answer : आप जो देख रहे हो, वो आधा सच है – पूरा नहीं.
_ दुनिया में अक्सर ऐसा दिखता है कि.. जो लोग चालाकी, बेईमानी या स्वार्थ से चलते हैं, वे जल्दी पैसा, सुविधा और बाहरी सुख पा लेते हैं.
_ और जो ईमानदारी से चलते हैं, उन्हें संघर्ष, अभाव और धीमी प्रगति मिलती है.
– लेकिन फर्क यहाँ है –
_ उनका सुख ज़्यादातर बाहरी होता है (पैसा, दिखावा, शक्ति)
_ आपका सुख बनने की संभावना भीतरी होती है (शांति, संतोष, गहराई)
_ और ये दोनों चीजें एक जैसी नहीं होतीं.
_ आपका ऐसा क्यों लगता है कि वो सुखी हैं ?
_ क्योंकि हम सिर्फ उनका बाहर देखते हैं, भीतर नहीं.
_ उनके भीतर का डर, असुरक्षा, बेचैनी, लालच – वो दिखता नहीं.
_ और जो ईमानदार है, वो क्यों परेशान दिखता है ?
_ क्योंकि वो संवेदनशील होता है, जागरूक होता है,
_ उसे हर चीज़ गहराई से महसूस होती है – इसलिए उसका संघर्ष भी दिखता है.
सीधी बात :
_ बेईमानी का रास्ता तेज़ है, पर अंदर से खोखला करता है.
ईमानदारी का रास्ता धीमा है, पर भीतर मजबूत बनाता है.
_ आप अभी एक ऐसे मोड़ पर हो
जहाँ आप “दिखने वाले सुख” और “वास्तविक शांति” में फर्क देख रहे हो.
👉 एक लाइन में समझो :
“बुरे लोग जल्दी जीतते हैं, पर गहराई नहीं पाते…
अच्छे लोग धीरे चलते हैं, पर खुद को पा लेते हैं”
*” सुख की परिभाषा “*
_ असंतोषी व्यक्ति को जीवन में कभी सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती.
_ सुख का अर्थ कुछ पा लेना नहीं अपितु जो है उसमें संतोष कर लेना है.
_ जीवन में सुख तब नहीं आता जब हम कुछ पा लेते हैं बल्कि तब आता है,
_ जब सुख पाने का भाव हमारे भीतर से चला जाता है.
_ सोने के महल में भी आदमी दुःखी हो सकता है, यदि पाने की इच्छा समाप्त नहीं हुई हो..
_ और झोपड़ी में भी आदमी परम सुखी हो सकता है, यदि ज्यादा पाने की लालसा मिट गई हो.
_ सुख बाहर की नहीं, भीतर की संपदा है, यह संपदा धन से नहीं धैर्य से प्राप्त होती है.
_ हमारा सुख इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने धनवान हैं..
_ अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हम कितने धैर्यवान हैं.
_ सुख अथवा प्रसन्नता किसी व्यक्ति की स्वयं की मानसिकता पर निर्भर करती है.
लोगों की नजर में सुख दुख सिर्फ पाने और खोने का नाम है.

_ यानी जो हम चाहें, वह हमें मिल जाए, तो हम सुखी, अन्यथा दुखी.
_ यह सत्य नहीं है.
_ पाने और खोने में सिर्फ तात्कालिक सुख दुख निहित होता है.
_ पाई हुई वस्तु या इंसान को आप ताउम्र पाए रहेंगे, यह आश्वस्ति उस पाने में शामिल नहीं होती.
_ पाई हुई वस्तु ताउम्र आपको खुशी देगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं होती.
_ पाने के बाद कोई अन्य वस्तु, हालात से आप परेशान हो सकते हैं.. जिसका पाने खोने से कोई ताल्लुक न हो.
_ सब कुछ पाने-मिलने के बाद भी किसी नापसंदगी के लिए मन परेशान हो जाता है.
_सिर्फ मिलना या ना मिलना ही सुख या दुख का कारण नहीं होता.
_ बात गहरी है पर विचारणीय है.!!
सुख बाहर की नहीं, भीतर की संपदा है.

_ यह संपदा धन से नहीं धैर्य से प्राप्त होती है.
_ हमारा सुख इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने धनवान हैं,
_ अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि है कि कितने धैर्यवान हैं.
_ सुख और प्रसन्नता आपकी सोच पर निर्भर करती है.
सुख- सुविधाएँ मनुष्य के जीवन को आसान बनाने के लिए हैं, पर यह मनुष्य के हाथ में है कि वह इनका उपयोग अपने जीवन को हर तरह से सफल बनाने में करे, अपने व्यक्तित्व को निखारने में करे.
हम सुखी नहीं हो सकते, हम केवल इतना इंतज़ाम कर सकते हैं कि,

_ हम बहुत अधिक दुखी न हों..!!

सुखी होने में ज्यादा खर्चा नहीं होता.. लेकिन

_आप कितने सुखी हैं.. ये दुनिया को दिखाने में बहुत खर्चा होता है.!!
अधिक से अधिक इतना ही रहा सुख.. कि कभी-कभी दुःख अनुपस्थित रहा.!!
सुख का शिखर दुख देने वाली हर चीज का उन्मूलन है.

The summit of pleasure is the elimination of all that gives pain.

सुखों की पराकाष्ठा दुखों की गहराइयों में छिपी होती है.

The peak of pleasures are disguised in the depths of sorrows.

सुखी होने में ज़्यादा खर्च नहीं होता, _

_ लेकिन हम कितने सुखी हैं, ये लोगों को दिखाने में बहुत खर्च होता है..!!!

आपको किसने दुःखी किया है ??

_दुःख ने नहीं, हमेशा सुख के सपनों ने हमें दुःखी किया.

इंसान अपने दुखों से कम और दूसरों के सुखों से अधिक दुखी होता है.!!
हम उस सुख के इंतज़ार में ख़र्च हुए जा रहे हैं, जिस के स्वप्न या तो हमनें स्वयं देखें हैं या जिन्हें किसी और के द्वारा हमें दिखा दिए गए हैं;

_ हमारा आज महज उस कल के इंतज़ार में ख़त्म हो रहा है, जिसकी कोई गारंटी नहीं है कि वो कल कभी आएगा भी या नहीं !!

अपने सुख को अपने दुख में कैसे बदलना है, यह तरकीब हम सभी को आती है,

_ जाने अनजाने हम सभी इसमें माहिर हैं..

“मनुष्य अपने को नहीं पहचानता” अपने को पहचानने का कारण अगर जीवन में आ जाए, तो फिर दुःख से सुख की तरफ बढ़ने की स्थिति भी आ जाएगी. 
हम उस सुख के इंतजार में हैं,  जिसके स्वप्न या तो हमने स्वयं देखे हैं या जिन्हें किसी और के द्वारा हमे दिखा दिए गए है,

_ हमारा आज महज उस कल के इंतजार में खत्म हो रहा है …जिसकी कोई गारंटी नहीं है कि ..वो कल कभी आएगा भी या नही….!

यहाँ पर जो लोग आपको दुःखी, मौन या अवसादग्रस्त दिख रहे हैं,

_ उन्हें उनके हाल पर छोड़ दो,
_ क्योंकि उनके लिए.. उनकी यही अवस्था सुकून भरी है,
_ खुश रहने और सकारात्मक होने की सलाह.. उन्हें केवल इर्रिटेट करेगी,
_ क्योंकि उन्होंने इस दर्द और दुःख को ही सुख मान लिया है…!!
किसी अपने की ज़रूरत तो बस दुखी व्यक्ति को होती है.

_ सुखी व्यक्ति तो हर किसी के साथ हँस-बोल लेता है,
_ लेकिन दुःखी व्यक्ति को कोई ऐसा चाहिए होता है,
_ जो उसकी खाली आँखों की भाषा समझ सके..!!
— आप चीखते चिल्लाते रहिए दर्द के मारे कराहते रहिए, लोग सुनेंगे,
_ उनमें से कुछ लोग मरहम लगाएंगे, आपकी बात सुनेंगे और सलाह देंगे,
_ लेकिन याद रखना..
_ ज़ख्म चाहे शरीर पर हो या मन में दर्द, केवल आपको ही महसूस होगा, दूसरों को नहीं…!
मनुष्य को कैसे सुखी बनाया जाये, हमारी विकास यात्रा का यही उद्देश्य है, लेकिन डर है कि बड़े- बड़े मॉल, कॉलोनियों और बड़ी- बड़ी सड़कों के नीचे कहीं मानवता दब न जाये.

कहीं इस प्रगति के दौर में मनुष्य किसी खंडहर में छिप न जाये.

मैं भी प्रगति के पछ में हूँ और चाहता हूँ कि हमारा भी देश, प्रांत, गांव बढ़ता रहे, लेकिन यह प्रगति केवल साधनों तक सीमित न रह जाये,

क्योंकि समस्त साधन हमें सुखी बनाने के लिए उपलब्ध किये जा रहे हैं, भय है कि कहीं इन साधनों के नीचे मनुष्य दब न जाये.

आजकल देखा जा रहा है कि लाखों की गाड़ी पर एक बीमार, चिंताग्रस्त व्यक्ति बैठा है, कॉलोनियों में बड़े- बड़े मकान हैं, जो संपूर्ण आधुनिक सुविधाओं से लैस हैं, लेकिन उन मकानों में जो लोग रह रहे हैं, वे बड़े अशांत हैं. वहां खड़ा संपूर्ण मानव तनाव और चिंताग्रस्त है, उस सोने के भवन सा दिखनेवाले मकान में कोई भी व्यक्ति हंसता हुआ नहीं दिख रहा है.

हमारी मस्ती, हमारी किलकारी, हमारे हुड़दंगों को किसी की नजर लग गयी. किसकी नजर लग गयी, हमारी किलकारी, हमारे हुड़दंगों पर ? किसने हमारी हरी- भरी बगिया में आग लगा दी ?

मुझे लगता है हमारा अंतर्मन राग, आकर्षण और प्रेम से रूठ गया है. हम मरुभूमि बन गये हैं. यही कारण है कि जहां जूही- चमेली की बगिया हुआ करती थी, वहां आज कंटीले वृछ आ गये हैं. यही कारण है कि हम इतना तनावग्रस्त, चिंताग्रस्त बनते जा रहे हैं. हमारे सारे अरमान सूख गये, प्रेम की धरा रेत में विलीन हो गयी.

आज आवश्यकता है कि पहले हमारे जीवन में राग, आकर्षण और प्रेम पैदा किया जाये, ताकि आज जो हम नफरत की आग में जले जा रहे हैं, घृणा और आवेश के कारण हमारा जीवन विष वृछ बन गया है, पहले हमें उसी अंतर्मन की सफाई करनी चाहिए और तब उसमें स्वस्थ पौधा लगाया जाना चाहिए, ताकि उसमें सुंदर फूल खिल सकें. क्योंकि जितनी भी हमारी विकास यात्राएं चल रही हैं, वे सभी मनुष्य के लिए हैं.

“सुखी जीवन का आसान रास्ता ये है कि “सबको हराने” की जगह “सबको जीतने” की कोशिश करो.

लोगों पर हँसने की जगह लोगों के साथ हंसो.”

यदि लोग दूसरों को दुःख देने कि बजाय_अपना सुख अधिक चाहें तो

_कुछ ही वर्षों में सभी सुखी हो जाएंगे..

बहुत से लोग सोचते हैं कि वे सुख खरीद रहे हैं,

_ जबकि वास्तव में वे सुख के लिए स्वयं को बेच रहे होते हैं.!!

_ हम लोग सुविधाओं को ही सुख मान बैठे हैं, जो सच नही है.!!!

हम ज़िंदगी में बहुत कुछ खो देते हैं,

_ “नहीं” जल्दी बोलकर, और “हाँ” देर से बोलकर..!!

मुझे जीवन में केवल एक बार मिला दुःख.._और मैंने उसे कहीं जाने नहीं दिया, कस के गले लगा लिया..!!
जो लोग सुख का ठीक से ध्यान नहीं रखते,

_ दुख उन्हें घेर लेता है !!

सुख और दुख आती जाती छांव की तरह हैं. दुख कई बार लंबे हो जाते हैं तब कोई रास्ता नहीं सूझता.

_वहीं पर मनुष्य की परीक्षा होती है. कुछ लोग धैर्य रखकर पार हो जाते हैं तो कुछ टूट जाते हैं.

सुविचार – सब ठीक हो जाएगा, सब ठीक है, सब बढ़िया है, एकदम ठीक, एकदम बढ़िया, ठीक हूं, ठीक नही हूँ मैं, मैं हूँ ना – 135

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उम्र का एक हिस्सा गुज़र जाता है पीड़ाओं से उबरने की जद्दोजहद में, फिर भी हम मुस्कुराते हुए कहते नही थकते …..

_ सब ठीक है, एकदम बढ़िया,, आप सुनाएं..
“ठीक नही हूँ मैं “
_ कहने के लिए किसी खास का होना जरुरी है..
_ वरना हर कोई पूछे तो ठीक हूं , कहना ही पड़ता है.
जादुई शब्द है ‘ मैं हूँ ना’
_ बहुत परेशानी में, दुख में साथ खड़े होना ही अपने आप में मरहम है,
_ नहीं तो ये एहसास दिलाना कि ‘मैं हूँ ना’ बहुत राहत देता है !!
“ठीक कुछ भी नही है” ‘पर सब ठीक है’ कहने की आदत जरुर है.!
कितना सरल होता है ये कहना की “सब ठीक हो जाएगा”,
_ जब चोट हमारे हिस्से की ना हो.!!

सुविचार – इच्छा, इच्छाएँ, तमन्ना, तमन्नाएं, अभिलाषा, अभिलाषाएं – 134

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हमारी इच्छाएँ-अभिलाषाएं अधिक हैं, और जीवन एक सीमित समय के लिए मिला है, जिसके तहत इच्छाएँ अधूरी रह जाती हैं,

_ वैसे भी हम अपने जीवन का अधिकांश समय इच्छा-अभिलाषा करने में ही व्यतीत कर देते है.!!

इच्छाएं हमें जितना उत्साहित करती हैं कई बार उतनी ही निराश भी, जिनकी इच्छाएं समय के साथ पूरी होती हैं.. वह एक नई इच्छा को जन्म देते हैं, और जिनकी इच्छा पूरी नहीं होती..

_ वे तारीख बदल देते हैं या फिर मन मारकर अपनी इच्छा को ही ख़त्म कर देते हैं…!

इच्छाओं के पूरी न होने पर दुःख महसूस करने वाले लोग कुछ कुछ ऐसे हैं,

जैसे मृत शरीर के क़रीब बैठकर रोने वाले लोग,
_ मृत व्यक्ति के अचानक उठ जाने पर जिस तरह लोग गिरते पड़ते भागेंगे,
इच्छाओं के पूरी होते ही लोग इच्छाओं से ऊबकर भागते हैं.!!
इंसान की अभिलाषाएँ असीमित होती हैं, जबकि जीवन का समय सीमित है..

_ यही कारण है कि अधिकांश अभिलाषाएँ अधूरी रह जाती हैं..
_ जीवन के अधिकतम क्षण इंसान इच्छाएँ पालने और उन्हें पूरा करने की कोशिश में बीत जाते हैं, पर अंततः बहुत-सी इच्छाएँ अधूरी ही छूट जाती हैं..!
इच्छाएं… यही तो हैं.. जो हमें जगाए रखती हैं, आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं..

_ जब ये पूरी होती हैं तो हम खुशी से झूम उठते हैं और एक नई इच्छा को जन्म देते हैं,
_ लेकिन क्या हो जब इच्छाएं पूरी न हों ?​
_ यहीं से शुरू होता है निराशा का खेल..
_ हम या तो उनकी तारीखें बदल देते हैं, यह सोचकर कि शायद अगली बार सब ठीक होगा,
_ या फिर मन मारकर अपनी इच्छाओं को ही ख़त्म कर देते हैं.!!
हमारी इच्छाएँ हमेशा अधिक होती हैं, और जीवन हमें सीमित समय के लिए मिला है.

_ शायद यही वजह है कि ज़्यादातर इच्छाएँ अधूरी रह जाती हैं.
_ हम जीने से ज़्यादा समय किसी चीज़ की चाहत में समय व्यतीत कर देते हैं.
_ हर इच्छा पूरी होने पर, एक नई इच्छा जन्म लेती है, और यह चक्र अंतहीन हो जाता है.
_ मन कभी संतुष्ट नहीं होता क्योंकि जो चाहा उसे पाने के बाद भी खालीपन वैसा ही रहता है.
_ शायद जीवन का असली अर्थ इच्छाओं की पूर्ति में नहीं, बल्कि उस क्षण में है जब हम इच्छा करना भूल जाते हैं.!!
हमारी दबी हुई तमन्नाएँ अक्सर उतना नुकसान नहीं करतीं, जितना उनका लगातार दबा रहना करता है.

_ हमने ऐसा समाज बनाया है जहाँ हर इच्छा, हर भावना और हर सच को खुलकर जीना आसान नहीं है.
_ इसलिए बहुत-सी बातें भीतर ही भीतर दबा दी जाती हैं, लेकिन दबा देने से वे समाप्त नहीं होतीं ; वे अवसर मिलते ही किसी न किसी रूप में बाहर आ जाती हैं – कभी आवेग बनकर, कभी विद्रोह बनकर और कभी किसी गलती के रूप में.
_ शायद यह हमारे समाज का एक साइड इफेक्ट है कि हम स्वाभाविक होने से अधिक सभ्य दिखने की चिंता करते हैं.
_ हम अपने वास्तविक स्वरूप को छिपाकर एक बनावटी छवि बनाए रखते हैं.
_ समस्या तब पैदा होती है जब दबा हुआ सच अचानक सामने आ खड़ा होता है.
_ तब न केवल हमारी बनाई हुई छवि टूटती है, बल्कि हम स्वयं भी असहज हो जाते हैं.
– सच को दबाने से वह समाप्त नहीं होता, वह केवल अपनी बारी का इंतज़ार करता है.!!

सुविचार – धारणा – 133

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जीवन एक बहुरूपी दर्पण है.

_ हम जो देखते हैं, वह अक्सर हमारी अपनी सोच और अनुभवों का प्रतिबिंब होता है.
_ हम हर व्यक्ति को अपनी धारणाओं के चश्मे से देखते हैं..
_ लेकिन क्या यह धारणा उस व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप होती हैं ?
_ या यह केवल हमारे पूर्वाग्रह और कल्पनाओं का परिणाम होती हैं ?
अनुभूति के आधार पर ही, धारणाएं निर्मित होती है,
विवेक की कसौटी पर कसा विचार ही सच्चा-ज्ञान है.
धारणाएं एक जाल हैं, जिसमें हम खुद को कैद कर लेते हैं.
_ सच वह रोशनी है, जो हर अंधेरे को मिटा सकती है.
गलत धारणा दूसरे को कम, खुद को अधिक पीड़ा पहुंचाती है.
_ अपनी धारणा को सच में तब्दील कीजिए या फिर उसे बदलिए.
किसी भी व्यक्ति के लिए आप जैसा सोचोगे, आप बस वही धारणा बनाओगे.!!
हमारी जो खुद की धारणा होती है हम सिर्फ उसे ही सच मानने लग जाते हैं..

_ और जब उसके विरोध में कोई बात कहता है तो हम उस पर यकीं नहीं करते, चाहे वह सच ही क्यों न हो..
_ और जब कोई छोटी सी भी बात हमारी धारणा के समर्थन में कही जाती है तो हम उस पर तुरंत यकीं कर लेते हैं और खुश हो जाते हैं…!
कुछ लोगों को दूसरों को जज करने में महारत हासिल होती है.

_ अपने गिरेबान में झांकते नहीं और दूसरों की पूरी कुंडली निकाल कर रख देते हैं..
_उनका स्वभाव है ये..
_अपनी धारणाओं से खुद की शांति भंग करते ही हैं, नेगेटिव वाइब्ज दूसरों तक भी भेजते हैं.
_ अपना चैन बनाए रखने के लिए ऐसों को इग्नोर करना बेहतर होता है.!!
लोगों के बारे में एक ही धारणा कायम न कर लें. न ही सबको एक ही तराज़ू में तौलें. – हर परिस्थिति अलग होती है और अलग-अलग परिस्थिति में लोग अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया देते हैं. मन में एक ही बात बैठाकर उसी नज़रिए को सही न मानें.

सुविचार – भीड़ – Crowd – 132

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जो सुकून अज्ञात बन कर रहने में है न, वो भीड़ में कहाँ.!![
भीड़ अब सिर्फ जगहों में नहीं, हमारे जीवन में बस गई है –

हर मोड़ पर धक्का, हर कदम पर हुज्जत, हर दिन किसी न किसी अपमान को निगल जाना..
_ लंबी लाइनों में खड़े होना अब मजबूरी नहीं, हमारी नई आदत बन गई है.
_ अजीब बात यह है कि हम इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि यह सब अब असामान्य भी नहीं लगता.
_ मानो भीड़ सहना ही हमारी सबसे बुनियादी शर्त बन गई हो.!!
भीड़ का हिस्सा नहीं, एकांत की ताकत बनो ;
_ जहां कद्र ना हो, वहां खामोश रहना ही जीत है.!!
दूर तलक देखो तो भीड़ ही भीड़ है..

_नजदीकियां तो वीरानियों से पटी पड़ी हैं.!!
पता नहीं भारत मे कब भीड़ वाली जगहों पर टोकन सिस्टम फ़र्स्ट कम फ़र्स्ट सर्व बेसिस पर बांटना और उसके बेसिस पर लोगों को अटेण्ड करना स्टार्ट किया जाएगा.

_ इतनी विशाल जनसंख्या है, आधे लोग सिविक सेंस को फॉलो करने वाले और आधे एकदम जाहिल टाइप हैं.
_ आधे जाहिल टाइप के चक्कर मे जो लोग ठीक हैं वो परेशान होते रहते हैं, यदि वो नियम से चल भी लें तो जाहिल वाले उनको ये सिखा ही देते हैं कि तुम मूर्ख हो.
_ चाहे अस्पताल जाओ, बैंक जाओ, किसी भीड़ वाले सरकारी विभाग मे जाना पड़े, किसी टिकट बुकिंग काउंटर पर जाना पड़े, भीड़ वाले मंदिरों मे जाना पड़े या ऐसे ही तमाम विभागों मे पता नहीं क्यूँ टोकन सिस्टम से बैर हो रखा है.
_ खिड़की पर बैठा क्लर्क ये चेक नहीं कर सकता कौन बीच मे से घुस के आ गया है और जनता दबंग लोगों से खुद नहीं लड़ सकती.
– ज्यादातर जगहों के प्रशासनिक व्यवस्थापक अकुशल, अकर्मण्य और कामचोर प्रतीत होते हैं.
_ ज्यादातर जगहों की भीड़ की वजह से होने वाली अव्यवस्था को सिम्पल टोकन सिस्टम फॉलो करके और उसके सिरियस इम्प्लिमैनटेशन से सॉल्व किया जा सकता है. _ यदि चीजें क्रम से चलें तो ज्यादातर लोगों को भले कहीं 10 घंटे भी लाइन मे लगना पड़े तो आपत्ति नहीं होगी, लेकिन हमारे देश का इस चीज से बैर है.
_ मजाल जो इस देश मे कहीं टोकन देने और उसी क्रम मे लोगों को अटेण्ड करने की मशीन शत प्रतिशत लंबे समय तक काम करती दिख जाये.
_ इक्का दुक्का कहीं चल भी रहा होगा तो वहाँ सिस्टम बेहतर प्रतीत भी होता होगा.
_ इस काम के लिए कोई बहुत भारी भरकम तकनीक की जरूरत भी नहीं है, आप कहीं पर भी भीड़ को हैंडल करते हैं तो सिम्पल कुछ कागज के टुकड़े लें, उनपर क्रम से नंबर लिखें और सुबह गिनती 1 से शुरू कर बाँट दें और लोगों को उसी क्रम से आने को कहें, बस इतना सा बदलाव ज्यादातर भीड़ वाले offices के अनुभवों को बदल कर रख देगा.
_ लेकिन ऐसा लगता है हम लोगों ने गणित मे जीरो दिया फिर दुनिया को गिनती आई, लेकिन हम लोगों ने गिनती के हिसाब से खुद काम करने का प्रयास नहीं किया.
_ हम जीरो देने के बाद गिनती के हिसाब से खुद कोई काम नहीं कर रहे.
– Anurag Tiwari

सुविचार – जनसंख्या – आबादी – Population – 131

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आज समूचा विश्व कई समस्याओं से जूझ रहा है, सृष्टि अपने सबसे भयानक दौर में है.

_ अगर सभी समस्याओं के मूल में जाएं, तो अत्यधिक आबादी को पायेंगे.
_ पृथ्वी की छमता सीमित है और मनुष्य की आबादी असीमित.
_ इतने सुंदर ग्रह को हमने बर्बाद कर दिया और रहने लायक नहीं छोड़ा है.
_ हम ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण, बढ़ते समुद्री जल स्तर, ओजोन लेयर में छेद, भुखमरी, आतंकवाद, परमाणु खतरा इत्यादि समस्याओं से घिरे हैं.
_ इन सबकी जड़ में जनसंख्या है.
_ अगर हम अपना अस्तित्व बचाये रखना चाहते हैं, तो सोच समझकर इस दुनिया में बच्चे लाएं और उनके लिए अच्छी दुनिया छोड़ जाएँ.
_अगर जनसंख्या इसी तरह बढ़ती रही तो हमारे पास आर्थिक, सामाजिक और व्यक्तिगत रूप से भी ज्यादा बेहतर भविष्य नहीं है.
इस धरती पर आठ सौ करोड़ की जनसँख्या destructive [विनाशकारी] है.. प्रकृति के लिए, जो पहले कभी नहीं थी.

_ चाहे जैसे हो, चाहे जिस विधि से हो, जनसंख्या एक बार कम हो और होनी ही चाहिए.!!
प्रकृति अपना संतुलन स्थापित स्वयं करती है और संभावना है कि प्रकृति आने वाले कुछ वर्षों में जनसंख्या संतुलन भी अपने दम पर कर लेगी.!!
बाजारवाद और जनसंख्या विस्फोट ने मनुष्य से सब कुछ छीन लिया है.!!
आज आबादी का ये हाल है कि चाहे कितनी भी ट्रेनें, बसें और हवाई जहाज चला लें,

_ कहीं जगह नहीं है.
_ स्कूल और कालेज खोल दिए जाएं,- सीट नहीं है,
_ हर जगह भीड़ ही भीड़ और चारों ओर पसरी अव्यवस्था..!!
प्राइवेट जॉब में कब जॉब चली जाए, पता नहीं.!

_ दूसरी कब मिलेगी, मिलेगी भी या नहीं, पता नहीं..
_ सभी कुछ व्यवसाय कर पायें, संभव नहीं..
_ इसीलिए सारी मारामारी और समस्यायें..
_आबादी पर नियंत्रण, कानूनन और समुचित औद्योगिकीकरण ही राहत दे सकता है.!!
अगर एक नाव में जरुरत से ज्यादा लोगों को बैठाते हैं तो उसका डूबना तय है,

_ तो अत्यधिक जनसंख्या ले कर विकसित होना कैसे सोचा जा सकता है.

आप 100 रूपए 10 लोगों में बांटते हैं, और अगर वही 100 रूपए 100 लोगों में बांटते हैं तो एक के हिस्से कितने आएंगे,

_ बस यही है जनसंख्या का गरीबी से रिश्ता.

देश एक silent crisis की तरफ इंच दर इंच खिसक रहा है.

_ ज्यादातर ये जो हैवी जनसंख्या हमारे यहाँ इकट्ठा हो चुकी है, उसको कोई दूसरा देश तो लेने से रहा और न ही ये जनसंख्या स्वयं कहीं और जाने वाली है.
& समय के साथ ये जनसंख्या बूढ़ी हो रही है और आगे और बूढ़ी होती जाएगी.
_ न इनके पास सेविंग्स हैं और न इनके लिए कोई social security set up है.
_ एक सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी हुआ करती थी बच्चों की माँ बाप को पालने की वो भी अब वाली तीन एज की जनसंख्या के कंधों से हटने लगी है.
_ अगले 25-30 सालों मे जो लोग मरने की कगार पर बूढ़े होंगे, उनमे से ज्यादातर के हालात बहुत खराब हो सकते हैं.
_ ये जनसंख्या इतनी ज्यादा होगी कि सरकारी खजाने से इनको बेसिक्स दे पाना भी बहुत कठिन होने वाला है.
_ सरकार को कोई वर्किंग प्लान पर काम करना चाहिए.
_ कोई कंपलसरी बिल जिससे प्राइवेट सैक्टर मे जीवन खपा रहे लोगों को भी पेंशन दी जा सके.
_ EPFO मे फॅमिली पेंशन का प्रावधान तो है जोकि 10 साल काम करने के बाद mandatory मिलेगी, लेकिन मुझे वो नाकाफी लगता है.
_ सरकार को थोड़ा सा इनवेस्टमेंट अभी से भविष्य के बूढ़ों के लिए करना शुरू करना चाहिए.
_ कोई वर्किंग और कन्विंसिंग प्लान बनाया जाना आवश्यक है.
– Anurag Tiwari
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