सुविचार – दिखावा – दिखावे – दिखावटी – बनावट – बनावटी – झूठा ठाठ – ऊपरी तड़क भड़क – 037

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“दिखावे से न्याय मत करो; एक अमीर दिल एक गरीब कोट के नीचे हो सकता है.”

“Do not judge by appearances; a rich heart may be under a poor coat.”

—Scottish Proverb

“केवल दिखावे से निर्णय न लें”

“Do not judge from mere appearances.” —Edwin Hubbel Chapin

मन जितना कम समझता है और जितनी अधिक चीजों को ग्रहण करता है, उसकी दिखावा करने की शक्ति उतनी ही अधिक होती है; और जितनी अधिक बातें वह समझता है, उतनी ही उसकी शक्ति क्षीण होती जाती है.

The less the mind understands and the more things it perceives, the greater its power of feigning is; and the more things it understands, the more that power is diminished. – Baruch Spinoza

“हर चमकती हुई चीज़ सोना नहीं होती, और कुछ लोगों का जीवन इतना तपता है कि बिना दिखावे की चमक के वे खरे सोने की तरह हो जाते हैं.”

– रिदम राही
जिनके दिल पर ग़मों के ज़्यादा बोझ होते हैं, वे अपने इर्द-गिर्द बड़ी भीड़ इकट्ठी करते हैं, हँस-हँस कर अपनी झूठी ख़ुशी का प्रदर्शन करते हैं और बोझ को प्रवचन की शक्ल में उतारते हैं.

_ दिल के बोझ उपदेश देने लायक तो बना ही देते हैं.
_ जो हमने किया, तुम वह न करो.
_ जो हम कहते हैं, तुम वह करो.
_ हमारे बताए मार्ग पर चलो.
_ जितने इस तरह के ज्ञानी हैं, वे सब अपने अतीत में अपने अज्ञान के कारण भटके हुए होते हैं, उस भटकन से निकल कर ही वे इस काबिल बनते हैं कि दूसरों को न भटकने का या भटकन से बाहर निकलने का गुर बता सकें.
_ बिना गलती किए कोई संत-ज्ञानी नहीं बनता.
_ हमारी गलतियाँ, हमारी बेवकूफ़ियां किताबों से ज़्यादा बड़ा ज्ञान हमें सिखाती हैं.
– Manika Mohini
**Question : लोग अपनी खुशी से ज़्यादा दिखावे पर ध्यान क्यों देते हैं?

Answer : क्योंकि दिखावा तुरंत मान्यता देता है,
और असली खुशी भीतर से बनती है – जिसमें समय और सच्चाई लगती है.
_ तुलना, सोशल मीडिया और अंदर की खाली जगह –
इन तीनों के कारण इंसान “कैसा दिख रहा हूँ” में उलझ जाता है,
“कैसा महसूस कर रहा हूँ” ये भूल जाता है.
1) तुलना का खेल
_ हम खुद को अक्सर दूसरों से तौलते हैं.
जब भीतर कमी महसूस होती है, तो बाहर से “ठीक” दिखना आसान रास्ता लगता है.
2) स्वीकार होने की चाह
_ लोग चाहते हैं कि उन्हें सराहा जाए, माना जाए.
_ दिखावा उस स्वीकृति का शॉर्टकट बन जाता है.
3) सोशल मीडिया का असर
_ हर जगह highlight reel दिखती है – सबका best moments.
_ फिर हमें लगता है “मुझे भी वैसा दिखना चाहिए”
4) अंदर की खाली जगह
_ जब भीतर सुकून नहीं होता, तो उसे भरने के लिए
status, चीज़ें, image – इनसे सहारा लिया जाता है.
– सच ये है :
_ दिखावा खुशी जैसा दिखता है…
_ पर वो खुशी देता नहीं, बस कुछ देर के लिए ढक देता है.
_ और जो सच में खुश होता है, उसे कुछ साबित करने की ज़रूरत नहीं होती.
” दिखावा तुरंत मान्यता देता है… और असली खुशी समय लेती है.
_ इसी जल्दबाज़ी में इंसान- “दिखने” में उलझ जाता है, “जीने” को भूल जाता है.
“जो अंदर से भरा होता है, वो दिखाता नहीं…
_ और जो दिखा रहा होता है, वो अक्सर कुछ भर रहा होता है.”
– “दिखावा अंदर की भूख है, और सुकून अंदर की तृप्ति..”
दिखावा करना वास्तव में मेरे लिए चीजों को बर्बाद कर देता है.

_ जब मैं दिखावा करता हूँ कि मैं इस तरह का हूँ, तो यह मेरे लिए चीजों को बर्बाद कर देता है.
_ लेकिन जब मैं इसे सहज रखता हूँ, एक इंसान की तरह, तो सब कुछ ठीक और सहज होता है.
_ मुझे सहज रहना चाहिए, वो काम नहीं करना चाहिए जो मुझे खुद भी पसंद नहीं.
_ इसलिए दिखावा करना वास्तव में मुझे पसंद नहीं.!!
दिखावा और दिखावटी बातों का समय गया,

_ अब वास्तविकता [Reality] को पसंद करने की आदत डालिए.!!

हर कोई दिखावा नहीं करता —

_ कुछ लोग अब भी सच्चे हैं, बस उन्होंने शोर मचाना छोड़ दिया है.
_ सच्चाई मिटती नहीं, बस देखने वालों की नज़र धुंधली हो गई है.
_ जो पहचानने की नीयत रखता है, वो आज भी चेहरों के पार देख लेता है.!!
“दिखावा करना”

_ जब आप दिखावा करते हैं, तो आप दूसरों को दिखाने के लिए कुछ कर रहे होते हैं,
_ बस दूसरों को दिखाने के लिए कि आप क्या कर सकते हैं.
_ जब आप दिखावा करते हैं, तो आप आमतौर पर वह काम अपने लिए नहीं करते,
_ बल्कि आप दूसरों से प्रतिक्रिया पाना चाहते हैं.
इंसान दिखावा क्यों करता है ?

_ लोग दिखावा करते हैं ..क्यूंकि वो प्रसिद्ध होना चाहते हैं,
_ ..क्यूंकि वो चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोग उनकी तारीफ करें,
_ ..क्यूंकि वो लोगों को यह बताना चाहते हैं कि..
_ ..उनके पास बहुत कुछ ऐसा है ..जो औरों के पास नहीं है..!!
दिखावा करने से क्या होता है ?

_ दिखावा करने से हम कुछ समय के लिए तारीफ बटोर सकते हैं..
..लेकिन ज्यादा समय तक नहीं..!!
_ क्योंकि जो हम रियल में है ..कभी ना कभी उभर कर आ ही जाता है,
_ नुकसान — अगर हम सच में भी किसी का अच्छा सोचें या कुछ अच्छा करना चाहते हैं ..तो भी लोगों को दिखावा ही लगेगा,
_ क्योंकि हमने लोगों की नजर में खुद की दिखावटी इंसान की छवि बना दी !!
क्या दिखावा करना बुरी बात है ?

_ अगर आपको किसी चीज़ पर गर्व है और वह प्रामाणिक है,
_ तो दिखावा करना बुरी बात नहीं है.
_ लेकिन अगर आप सिर्फ़ ध्यान आकर्षित करने के लिए कुछ कर रहे हैं,
_ या इससे भी बदतर, दूसरों को बुरा महसूस कराने के लिए,
_ तो दिखावा करना अच्छी बात नहीं है.!!
हम दिखावा और बनावट के लिए, अपनी आर्थिक स्थिति के विपरीत, दूसरों को खुश करने में इतना मशगूल है कि..

_ चाहे कुछ हो जाए, बेशक कर्ज ले लिया जाए, लेकिन हम नहीं सुधरेंगे.
_ नतीज़ा, मानसिक तनाव और दुष्परिणाम ;
_ बेहतर होगा कि सत्यता को स्वीकार करते हुए, अपनी हैसियत के अनुसार ही जीवन यापन करने का प्रयास करें.!!
“ज़िंदगी बहुत छोटी है” – सामाजिक हैसियत, आर्थिक स्थिति, दिखावा, शानो-शौकत का मुलम्मा चढ़ाकर जिंदगी को जटिल बनाना, एक-दूसरे से उलझने-झगड़ने में ऊर्जा एवं समय व्यय करने का कोई फायदा नहीं.!!
कुछ लोग इतने भ्रमित होते हैं कि वे दिखावे पर निर्भर रहते हैं.

_ उनके लिए खुशी दिखावे तक ही सीमित है और वे इसे ही जीवन का उत्सव मानते हैं.
उत्सवों को भी दिखावे की ज़रूरत नहीं होती.!!
आजकल लोग जीते कम हैं और दिखावा ज़्यादा करते हैं.

_ हर कोई मुस्कुराता हुआ चेहरा लिए, अपने अंदर का दर्द छुपाए घूम रहा है.
_ दुनिया को वो दिखाते हैं और दिखाने की कोशिश करते हैं.. जो वे कभी नहीं होते,
_ अब तो सच्चाई और मनगढ़ंत कहानी के बीच की रेखा इतनी धुंधली हो गई है कि लोगों को पहचानना न केवल कठिन, बल्कि लगभग असंभव हो गया है.!!
** सबसे बड़ा सुकून “समझे जाने” में नहीं, बल्कि बिना दिखावे के सच्चा होने में होता है.

_ जब हम “ठीक नहीं हूँ” कहने की हिम्मत जुटा लेते हैं,
_ तो भीतर कुछ हल्का हो जाता है — जैसे कोई बोझ उतर गया हो.
_ सच्चाई स्वीकारना ही भीतर की पहली शांति है.!!
_ “कितना बड़ा सुख है – जब कोई पूछे “कैसे हो” ?
_ तब “ठीक नहीं हूँ” कह पाना.!!”
“आज के समय की सबसे बड़ी कमजोरी”,  – वो दूसरों के नजर में महान बनने के लिए अपनी वास्तविक छवि को खोते जा रहे हैं.!!
दिखावा इंसानों में है, क्योंकि वे अपने भीतर के खालीपन को बाहरी चमक-दमक से ढक लेते हैं.!!
लोग चमक और दिखावे में खो जाते हैं,
_लेकिन सुकून हमेशा सच्चाई में ही मिलता है.!!
इंसान की पहचान शक्ल सूरत, कपड़े, आवाज़ से नहीं होती,

_ उसकी पहचान उसके व्यक्तित्व से होती है..!!
जहां दिखावे की जरूरत नहीं होती, वहां सच्चाई अपने-आप उतर आती है.!!
एक वो दौर था..; जब दिखावा कम और इरादे पक्के होते थे.

_एक ये दौर है.. जहाँ इरादे कमजोर और दिखावा औकात से भी ज्यादा है.!!
जिनके दिल पर ज़्यादा बोझ होते हैं, वे दिखावा करते हैं और अपने चारों ओर बड़ी भीड़ इकट्ठा करते हैं.

_ हँसकर अपनी झूठी खुशी प्रदर्शित करते हैं और डींगे हांककर अपने बोझ को हल्का करते हैं.!!
जिनके मन में कमजोरी होती है, वे ही ज्यादातर बाहरी सजावट-दिखावट-आडंबर और टीमटाम करवाते हैं.!!
आप देखें कि दुनियाभर में जो भी लोकप्रिय व्यक्तित्व हुए हैं,

_ सब में एक बात की समानता है और वह है उनकी सादगी.
_ उनमे किसी तरह का दिखावा नहीं है, न उन्हें अपने ज्ञान का घमंड है, न अपनी कमियों को छिपाने की चिंता.
_ उन्हें न तो अपनी ज्यादा कमाई का अभिमान है, न पैसे कम होने पर झूठ- मूठ का दिखावा है कि मेरे पास बहुत पैसे हैं.
_ यहां तक कि अपनी आर्थिक स्थिति के कमजोर पछ को बताने में उन्हें संकोच नहीं होता.
_ उनका जीवन खुली किताब की तरह होता है.
_ इसका अर्थ यह है कि आप जैसा हैं, वैसा ही दिखने का प्रयास करें.
हर खूबसूरत दिखने वाली चीज़ अच्छी नहीं होती.. हर ख़राब दिखने वाली चीज़ बुरी नहीं होती.. ज़रूरी नहीं कवर प्रभावशाली ना हो तो अंदर लिखी किताब भी प्रभावशाली ना हो.. प्रचार प्रसार दिखावे के ज़माने में मेकअप पर ना जाएं..

_ भीतर की सुंदरता अनमोल होती है क्योंकि मेकअप एक आवरण है जिसमें मौलिकता नहीं होती, वह कुछ पल बाद उतर जाता है.. भीतरी खूबसूरती आजीवन बनी रहती है..
_तय करिए आपको कौन सी खूबसूरती चाहिए क्षणिक या Long Life..
– रिदम राही
“यदि आप अपने से ऊँचे स्तर के लोगों के लिए दिखावा करने की कोशिश कर रहे हैं, तो इसे भूल जाइए ;

_ वे किसी भी तरह आपको नीची दृष्टि से देखेंगे.!!
और यदि आप निचले स्तर के लोगों के लिए दिखावा करने का प्रयास कर रहे हैं, तो इसे भूल जाइए ;
_वे आपसे केवल ईर्ष्या करेंगे..!!
_स्टेटस आपको कहीं नहीं ले जाएगा.
_केवल एक खुला दिल ही _आपको सभी के बीच समान रूप से रहने की अनुमति देगा.”
सुकून से जीना सही है..

_ या दिखावे का कवच पहनकर घुट घुट के जीना.. तय आप कर लो..!!”
_ हम ज़िंदगी नहीं एक दिखावे से भरा पैराडॉक्स [विरोधाभास] जीते हैं !;”
दिखावा एक ऐसा जाल है..
_ जिसमें फंसकर इंसान अपनी असली पहचान और सुकून दोनों खो देता है.!!
लोग दिखावे मे परेशान हैं,
_ अपनी मेहनत की कमाई का सुख भोगने की जगह कुंठा से परेशान हैं.!!
अपने अच्छे दिनों में दिखावाबाजी करने से बचें..

_ ताकि बुरे दिनों में आपको शर्मिंदगी महसूस न हो.!!
जिस इंसान में समझदारी आने लगती है..
_ वो सबसे पहले दिखावा करना बंद करता है.!!
दिखावा करके खरीदी गयी फ़र्ज़ी इज्ज़त साबुन के झाग के समान है,
_ जिसे उड़ जाने में ज़रा भी वक़्त नही लगता..!!!
औकात से बड़े ठाट-बाट और शौक पालोगे तो एक दिन वो ज़मीन भी नहीं बचेगी..
जिस पर खड़े होकर सपने देखे थे.!!
ये एक रोग है “एक दूसरे की देखादेखी करना..”
_ दिखावे के खर्चों ने सबको भीतर से खोखला कर दिया है.!!
दिखावा, खोखलापन, छल, प्रपंच, पाखंड, टीमटाम, ढकोसला, बनावटी, ढोंग, स्वाँग, इत्यादि से दूर जाना ही जीवन का सही मतलब बता सकता है,

_ वरना बेहोशी और भ्रम में पूरी जिंदगी निकल जायेगी.. और लेशमात्र का अनुभव नहीं होगा और जीवन भर जहाँ हैं.. वहीं रह जाएंगे.
_ जागिये और सबको जगाइए.
दिखावटीपन की वजह से बेफिजूल खर्चे बढ़ गये हैं,

_ वरना इंसान रोटी कपड़ा और मकान में भी खुश रहा करते थे.!!

दिखावे का जीवन भी समस्याओं की जड़ होता है.

_ दूसरों की नकल और आमदनी से अधिक खर्च की लालसा भी कभी चैन से जीने नहीं देती.!!
आप अपनी जिंदगी लोगों को क्यों दिखा रहे हैं..

_ जो आपको कोसते हैं न कि आपकी खुशी में खुश होते हैं ?
“जो अंदर से भरा होता है, वो दिखाता नहीं..
_ और जो दिखा रहा होता है, वो अक्सर कुछ भर रहा होता है.”
सच्चाई से कोसों दूर हो कर कितना भी दिखावा कर लें, पर दिखावा कभी छुपता नहीं.!!
दिखावे की दुनिया है, जिसमें गुणवत्ता को महत्व देने वाले लोग बहुत कम हैं.!!
पहले लोग जितना कमाते थे _उसी में संतुष्ट भी रहते थे, परिश्रम भी बहुत करते थे.

_लोगों की कमाई भी उनके जीवनयापन के अनुरूप ही होती थी,
_पेट काट कर कुछ बचा लिया तो बच जाता था, अन्यथा कल की चिन्ता कल पर छोड़ देते थे.
_स्त्री हो या पुरुष- वे सब दिखावे से बहुत दूर रहते थे, बिना प्रेस किए हुए कपड़े पहन कर भी उनमें हीन भावना नहीं उपजती थी.
_न जेब में बहुत पैसे हुआ करते थे, न ही असीमित जरूरतें..
_जिनकी आय अपेक्षाकृत अधिक थी, उसका उन्हें कतई अभिमान न होता था,
_बल्कि दिखावा करने में उन्हें संकोच होता था.
–तब लोग स्वाभाविक जिंदगी जीते थे और थोड़ा कुछ बचा भी लेते थे,
_आज तो दिखावे और स्टैंडर्ड मेंटेन करने का जमाना है,
_ तनखा भी खिसक जाती है और ऊपर से कर्ज और उधारी लद जाती है..
दिखावा और अक़्लमंदी साथसाथ नहीं रह सकते.

_ सूर्य उदय और अस्त होते समय बहुत सुंदर लगता है,
_ लेकिन उस का प्रकाश दोपहर को ही सब से ज्यादा होता है,
_ जब उस में कोई विशेष सौंदर्य नहीं होता.!!
दिखावा नहीं, असली जीवन जीने की कोशिश करें..

_ दूसरों को नहीं, खुद को खुश करने की शुरुआत करें..
_ क्योंकि जब आप बेहतर बनते हैं – तो दुनिया थोड़ी और सुन्दर हो जाती है.!!
दिखावे में रहने वाले को सच्चाई नहीं दिखती, उन्हें दिखावा दिखता है..

_ अगर उनके सामने आप दिखावा करेंगे तो आप उनकी नजरों में अच्छे हैं, नहीं तो आप जाहिल और अनपढ़ हैं.
_ उन्हें लगता है कि दिखावा करना.. मतलब दुनिया के साथ चल रही धाराओं में बहना..पर ऐसा नहीं है.
_ उन्हें ये सोचने की जरूरत है कि दिखावे में अपनी पहचान खो देना व्यक्तित्व नहीं है..!!
दिखावा करने वाले हमेशा अपनी अकड़ में रहते हैं,

_ क्योंकि वे ऐसा नहीं करेंगे तो उनका असली स्वरूप सामने आ जाएगा.!!
दिखावे और हकीकत में अंतर होता है ; दिखावा एक से दो परत अपने ऊपर ढककर चलता है और हकीकत बिना मेकअप के सुंदर रहती है.!!
जहां होश नहीं..वहां सिर्फ दिखावा है..
_ दिखावे में भ्र्म हो सकता है पर जीवन्तता नहीं हो सकती.!!
किसी के जीवन में जीवन्तता कितनी है, इंसान का व्यक्तित्व बता देता है,
_ उसका बाहरी दिखावे का प्रयास किसी काम नहीं आता.!!
इंसानों को ऐसे इंसानों से दूर रहना चाहिए जो किसी की लग्जरी लाइफ देखकर तुरंत अट्रैक्ट हो जाते हैं…!
_ यह वह लोग हैं “जो न तो कभी खुद खुश रह सकते हैं… और ना ही आपको कभी खुश रहने दे सकते हैं…!!
हमारे जीवन में इतना तनाव और बीमारियाँ नहीं होनी चाहिए.

_ इतना दिखावा करने के बाद भी अगर जीवन में अशांति, तनाव, बीमारियाँ और परेशानियाँ हैं, तो हम अपने जीवन के साथ क्या कर रहे हैं ?
_ दिखावा मत करो, यथार्थवादी जीवन जियो..
_ हम इस ढोंग के साथ अपना जीवन क्यों जी रहे हैं ?
आश्चर्य होता है जब लोग किसी प्रसिद्ध व्यक्ति को देखकर पागल हो जाते हैं.

_ अरे भई वे भी रोटी ही खाते हैं, पानी ही पीते हैं, हवा में सांस लेते हैं..
_ वो भी तो अपना काम कर रहे हैं, उनसे इतना चिपकने-चिल्लाने का क्या मतलब है,
_ वो किसी अन्य ग्रह से नहीं हैं, वो भी मनुष्य ही हैं..!!
केवल कुछ अपने लोगों को दिखाने और दिखावा के लिए ही हम खुद कष्ट में ही जीते हैं,

_ पर फिर भी अधूरे ही रह जाते हैं, दिखा भी नहीं पाते हैं और जाने का समय आ जाता है.

Question : सभी लोग अपनी ख़ुशी से ज़्यादा दिखावा करने पर ध्यान क्यों देते हैं ??

Answer : आप पूरी तरह से वही हैं जो आप हैं._ इसके लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है ..जो हम नहीं करना चाहते.
_ तो हम जीना कम और दिखावा ज्यादा करने लगते हैं.
क्या आपको इस बात का अंदाजा है कि खाने, लड़ने या दिखावा करने के अलावा भी जीवन में कुछ और है.!!
किसी काम या किसी व्यक्ति को छोटा दिखाकर स्वयं को बड़ा दिखाने का चलन खत्म होना चाहिए.!!
दिखावे से जुड़ी हर चीज़..चाहे वो रिश्तें हो…लोग हो…व्यवहार हो..स्थिर नहीं रह पाती…और एक न एक दिन अपनी असलियत ज़ाहिर कर ही देती है…

.. जबकि स्थिरता धैर्य और विश्वास के साथ एकरूप रहती हैं…उसे दिखावे की ज़रूरत नही होती…

लोग अपनी आधी से ज़्यादा ज़िंदगी दूसरों को दिखाने में बिता देते हैं.

_ आप आखिर ये सब क्यों कर रहे हो, किसके लिए ???

नकली लोग आपका होने का दिखावा करेंगे..

_ लेकिन आपके जाते ही आपकी पीठ पीछे आपकी चुगली करने से भी नहीं चूकेंगे.!

आप जरूरत के हिसाब से चीजें खरीदें.

_दूसरों को चीज़ों से प्रभावित करने के बजाय _अपने जीवन से प्रभावित करने की कोशिश करें.!!

अमीर होने का दिखावा न करें..

_ हाई मेंटनेंस वाली लाइफ स्टाइल से बचें.!!

यदि वह होने का दिखावा कर रहे हैं.. जो आप नहीं हैं,

_ तो जीवन में बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा.!!

“कभी भी दूसरों का ध्यान आकर्षित करने के लिए ख़ुद का दिखावा न करें”

“झूठ और दिखावे” का सच सामने आ ही जाता है..!!

जान पहचान चाहे आपकी किसी से भी हो..!

_ लेकिन उछलना हो या दिखावा.. वो अपने दम पर हो..!!

दूसरों के दम पर उछलना और उड़ना बंद करो.!!

_ दम है तो अपने दम पर उछला करो.. किसी और के नहीं.!!
_ पंख परिंदों के ही अच्छे लगते हैं, इंसान के लगते ही बर्बादी शुरू हो जाती है.!!
कोई भी इंसान चाहे कितने भी अच्छे और उच्च गुणवत्ता वाले कपड़े क्यों न पहन ले,

_ जब तक उसका व्यक्तित्व निखारा हुआ न हो, उसके अच्छे कपड़े भी गंदे लगते हैं..
_ असली खूबसूरती व्यक्तित्व में होती है कपड़ों में नहीं.!!
छोड़ देते हैं ना सब कुछ ‘आखिर कब तक ये दिखावा करते रहें’ कि सब कुछ ठीक है,

_ जबकि सब को अच्छे से पता है कि कुछ भी ठीक नहीं है.!!
बनावटी-दिखावटी बातों की दीवानी दुनिया,,असली बात जाने ना.!

_ साज सज्जा हर कोई देखे, चेहरा हृदय का पहचाने ना..!!

कमाल की बात है न..कि बिखरे हुए यहा सब अंदर से हैं..

_पर दिखाना संवारना जिस्म और कपड़े का कर रहे हैं.!

लोगो को नेक होने से ज्यादा नेक दिखना अच्छा लगता है,

_ दिखावा करना आसान होता है वाकई में कुछ अच्छा करने से..!!
क्या गजब दिखावा करते हैं लोग, जो होता ही नहीं.. वो भी दिखा देते हैं.!!
दिखावे में जिंदगी जीना सबसे व्यर्थ और निरर्थक रास्ता होता है.!!

_ लोग चमक-धमक में खुद ही खोखले हो रहे हैँ.!!

जीवन में उन सब लोगों से दूर रहना..

_ जो ऊंचे दिखते तो हैं शोहरत के साथ.. पर बुरी तरह से गिरे हुए हैं हर जगह.!!

जो चीज़ें दिखावे पर बनी हो.. उनका टिकना कभी स्थायी नहीं हो सकता.!!
ऐसे लोगों से दूर रहें.. जो सिर्फ़ शोहरत देख कर औरों को इज़्ज़त देते हैं.
ऊंचे सपने जरूर देखें, लेकिन अपने शौक पूरे करने और दिखावा करने के लिए कर्ज न लें..!!
जिस इंसान को भी ये लगता है कि वह कुछ है,

_ तो उसे ये भी लगता है कि कल को लोग भी समझेंगे कि _ वो कुछ है;
_ फिर वो अपना पूरा जीवन लोगों को दिखाने में बिता देता है कि_ वो कुछ है..!
_ लेकिन उन्हें बता दूँ कि ऐसे ही लोग अपनी पूरी ज़िदगी को एक तरह के दुःख में बिताते हैं :
_ और एक समय आता है जब वो जान चुके होते हैं कि जिन लोगों को दिखाने के लिए उसने पूरा जीवन बिता दिया ;
_ वो लोग तो दूर उसके घर वाले तक उसको कुछ नहीं समझते थे.!!
हमें यह दिखावा करना बंद करना होगा कि सब कुछ ठीक है..

_ जब ऐसा नहीं है और दूसरों से झूठी वाहवाही प्राप्त करने का नाटक करना बंद करें.
_ तभी हम सुख-शांति को जान सकते हैं..!
_ ऐसा होने का नाटक करना जो हम नहीं हैं, एक ऐसा जाल है..
_ जिसमें हममें से अधिकांश लोग अपने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर फंस जाते हैं.
_ चाहे वह कम आत्मसम्मान, अनुकूल व्यवहार, या फिट न होने के डर के कारण हो.
_ सुनिश्चित करें कि आप वास्तविक जीवन में खुश हैं न कि केवल दिखावे पर..
जो दुनिया को दिखाया था, उससे हम को क्या मिला ?

_ दुनिया को भी और हमें भी ?
_ दिखावा से क्या मिलता है ?
_ जबकि हम अंदर से खोखले हैं..
>>लेकिन फिर भी, दिखावा तो करना ही है,
_ क्योंकि प्रतिस्पर्धा है, चलन है, मजबूरी है..!!
ध्यान रखें कि _ दिखावा वास्तविकता नहीं है.!!

_ हमारा मन हमें कई अलग-अलग “पोशाक और ड्रेस ” पहनने के लिए प्रेरित करता है ;
_ हालाँकि, इनमें से कुछ हमारी भलाई और प्रगति के लिए हानिकारक हैं;
_ वे हमारे ऊपर बोझ डालते हैं,
_ हमारे वास्तविक स्वरूप की रोशनी को धुंधला कर देते हैं.!!
_ समाज अक्सर हम पर दिखावा करने के लिए दबाव डालता है, एक ऐसा मुखौटा जो हमारी असलियत को छुपाता है.
_ यह मुखौटा एक ऐसा व्यक्तित्व दिखा सकता है _ जिसे हम मानते हैं कि अन्य लोग देखना चाहते हैं.
_ लेकिन आप को उस सार को गले लगाना हैं जो आपको, आप बनाता है.
_दिखावा का मुखौटा उतारें और इसे दोबारा कभी न पहनें.
_ इस बोझ को छोड़ें और अपनी सफलता और खुशी को परिभाषित करना चुनें.
_जीवन नामक इस यात्रा के दौरान, हम अक्सर ऐसी चीजें उठाते और पहनते हैं..
_जो फायदे से ज्यादा नुकसान करती हैं,
_हमारी क्षमता और वास्तविक खुशी में बाधा डालती है.!!
“यदि आप अपने से ऊँचे स्तर के लोगों के लिए दिखावा करने की कोशिश कर रहे हैं, तो इसे भूल जाइए ;

_ वे किसी भी तरह आपको नीची दृष्टि से देखेंगे.!!
_ और यदि आप निचले स्तर के लोगों के लिए दिखावा करने का प्रयास कर रहे हैं, तो इसे भूल जाइए ;
_वे आपसे केवल ईर्ष्या करेंगे..!!
_स्टेटस आपको कहीं नहीं ले जाएगा.
_केवल एक खुला दिल ही _आपको सभी के बीच समान रूप से रहने की अनुमति देगा.”
दूसरों की राय को महत्व क्यों देना चाहिए ?

_ यदि आप कुछ खरीद सकते हैं और यह आपको खुशी देता है, तो इसे खरीदें.!!
_ लेकिन यदि आप लोगों को संतुष्ट करने के लिए और दिखावा करने के लिए खरीद रहे हैं,
_ तो आपको अपनी प्राथमिकताओं की फिर से जांच करने की आवश्यकता है.
दिखावा ना करना.. साधारण कपड़े पहनना.. दाल रोटी खाना..

_ आज के शोर से भरे संगीत के गानों से कहीं ज्यादा.. पुराने संगीत को पसंद करना..
_ अपना काम बनवाने के लिए किसी को ना छलना..
_ दिखावे का चाल ढाल ना करना..
_ जरूरत से ज्यादा बड़ी-बड़ी बोली ना बोलना..
_ अगर इन सबका मतलब कोई समझे.. हम पुराने ख्यालातों के हैं.. तो हां ऐसा ही समझो.. हमें कोई दिक्कत नहीं है..!
_ हमारी नज़र में नए जमाने का अर्थ यह भी नहीं कि.. हर वक्त नकाब में और नकली जीवन जीते रहो..
_ हमको हमारा साधारण-सरल लहजा पसंद है..
_ इसी में सुकून मिलता है हमें..!!
हम एक दूसरे की मदद करने के बजाए एक दूसरे के समक्ष अपना रौब और वर्चस्व दिखाने में जुटे हैं..

अपने सपनों की पूर्ति के बजाए, दूसरों की देखा -देखी करने में लगे हैं… _ मेरा मानना है कि देखा देखी करने और दिखाने से बर्बादी निश्चित है…!!

दुनिया में सबसे ज़्यादा दिखावा है.

_ लोग हँसी दिखाते हैं, अंदर दर्द होता है.
_ लोग प्यार की बात करते हैं, अंदर स्वार्थ होता है.
_ लोग सच बोलने का दावा करते हैं, लेकिन सुविधा के हिसाब से झूठ चुनते हैं.
_ और अगर एक शब्द में कहूँ तो
सबसे ज़्यादा भीड़ है, पर सबसे कम समझ..!
– फिर भी.. इसी दुनिया में थोड़ा-सा प्यार, थोड़ी-सी सच्चाई, और कुछ अच्छे लोग भी हैं..
बस वो शोर नहीं करते, इसलिए कम नज़र आते हैं.!!
– lekhak ki duniya
लोग दिखावा करते हैं !____________

ब्रांड के नाम पर दिखावा-
_ ब्रांडेड कपड़े, जूते, चश्में और डीओ लगाकर खुदको नवाब समझना और बिना बात की अकड़ में रहना.
ज्ञान का दिखावा-
_ अरे अगर आपको ज्ञान हैं तो उससे अपना, अपने समाज और अपने देश का विकास करें. ज्ञान बांटने से बढ़ता है, अहंकार से नही.
किसी को नीचा दिखाना ज्ञानी की नही अज्ञानी की पहचान है.
स्टैंडर्ड का दिखावा-
अरे होंगे आप बड़े आदमी, लेकिन जन्म और मृत्यू सबकी समान होती है तो फिर आप क्यों झूठा दिखावा कर रहे हैं.
ये नही खाते, यहाँ नही जाते, वहाँ नही बैठ सकते, उससे नही बोल सकते.
प्रतिपल नष्ट होने वाले सौंदर्य का दिखावा-
_ पांच तत्वों से बना शरीर और उन्हीं में मिल जाने वाले इस शरीर का कैसा अभिमान..
अगर आप सुंदर है तब भी आपका अंत वैसा ही होगा जैसा किसी कुरूप का.
बड़ी और मेहँगी गाड़ियों का दिखावा-
बड़ी गाड़ी, मेहँगी घड़ी, ब्रांडेड जूते और चश्मे लगाकर इंसान सामने वाले को इंसान नही समझता.
जिस चीज का आपको दिखावा करना पड़े समझना आपकी नही है, स्थिर नही है.
दिखावा चाहे किसी का हो भविष्य में स्वयं के लिए ही घातक होता है,, क्योंकि ब्यक्ति एक भ्रम फैलाता है,, लोगों को दिखाने के लिए..
आप जो वास्तविक है उसे दिखाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है, वह तो सभी को स्वत: ही दिखाई दे जाता है (अनुभूति हो जाती है).
– Neha Chandra
“दिखावे का जीवन जीना बहुत कष्टदायक होता है ;

_ क्यूंकि इंसान कीवास्तविकता कुछ और होती है, और वो दुनिया को कुछ और दिखाना चाहता है.
_ “ये जो((( नकल )))से भरा हुआ जीवन है, जो दूसरे जैसा होने की चाहत है !
_ यही नर्क को जन्म देता है,
_ ये जो हमारा दिखावटी नकली और झूठा जीवन है,
_ यही है गुलामी, यही है.. जो हमें हमारी वास्तविकता से दूर रखता है,
_ और यही है.. जो हमारी आत्मा पर बोझ है,
_ यही है.. जो आपको आजाद और सुंदर नहीं होने देता,
_ आप कमाल हो, बस सोसाइटी ओर लोगों के (( पैरामीटर)) मापदंड से खुद को देखना बन्द करो,_,
_ फिर आप कमाल हो.. आपको किसी से सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं।।
अब क्या ही कहना इस झूठे और कृत्रिम जीवन पर, कहीं से किसी प्रकार की शांति और आनंद का तो प्रश्न ही नहीं है,

_ बस इतना ही खेल है जीवन का कि अगर जीवित रहता है तो खुश दिखने का अभिनय और दिखावा जीवन पर्यन्त करना ही होगा…!
जिंदगी जीने का सबसे सरल तरीका है ; जितना आप साधरण रहोगे उतना ही सुखी रहोगे.

_ अगर दिखावे का ढोंग करोगे, _ परेशानियों से घिरे रहोगे..

जो लोग आपका अच्छा नहीं चाहते ..पर अच्छा करने का दिखावा करते हैं,

_वो लोग अभिनय और दोहरे चरित्र में माहिर होते हैं..!

कुछ लोग दिखने के लिए उतावले रहते हैं, तो कुछ लोग गायब हो जाने के लिए उतावले रहते हैं.

Some people hustle to be seen, others hustle to disappear.

संसार में पशु पक्षी जीव जंतु जानवर यहां तक कि मनुष्य भी, _इन सबकी तृप्ति सिर्फ और सिर्फ भोजन है बाकी सब दिखावा भुलावा है.
कोई तामझाम और दिखावा नहीं, केवल काम की बातें !

_ सुधार की शुरुवात हो जाए, तो बहुत बड़ी बात होगी !!

दिखावा करके खरीदी गयी फ़र्ज़ी इज्ज़त साबुन के झाग के समान है,

_ जिसे उड़ जाने में ज़रा भी वक़्त नही लगता..!!!

दिखावा कर के व्यवहार बनाने से अच्छा है, सच बोल कर दुश्मन बना लो ;

_ आप के साथ कभी विश्वासघात नहीं होगा ..

कुछ लोग बस दिखावे के लिए आपके पास होने का ढोंग करते हैं,

_ लेकिन रहना तो वो आपसे दूर ही चाहते हैं !!

हम चाहे जितना भी बुद्धिमान होने का दिखावा करें, _

_ लेकिन हमारा व्यवहार उस दिखावे से पर्दा हटा ही देता है.

मेरी खुशी में आईना भी खुश हो जाता है, लेकिन जान पहचान वाले.. वो तो ज्यादातर बस दिखावा ही करते हैं.

_ कठिन वक्त में जब ज़िन्दगी नचाती है, तब ढोलक अपने लोग ही बजाते हैं.!!
मुझे ये नकली, दिखावटी और मिलावटी लोग पसंद ही नहीं आते.!!
आत्म-सम्मान, दिखावे से कहीं ज़्यादा कीमती होता है.
_ दुनिया को प्रभावित करने की चाह में खुद को खो देना सबसे बड़ी हार होती है.
_ असली ताक़त तब आती है जब आप अपने उसूलों और पहचान के साथ खड़े होते हैं.. भले ही वो सबको न भाए.!!
मुझे दिखावा करना अच्छा नही लगता, _

_ चार पैसे कमा लिए तो खनका कर क्या बताना..

मुझे ऐसा बनना है जो दिखावा नहीं करता और न ही चाहता कि कोई मुझसे दिखावा करवाए.!

_ और मैं चाहता हूं कि मुझे उस स्थिति से हटा दिया जाए ; जहां मुझे दिखावा करने की जरूरत है.!!
वे जो दिखावा करते हैं, मैं उससे प्रभावित नहीं होता हूं.

_ मुझे ऐसा लगता है कि कैसे चक्र में फंसे हुए हैं ये लोग..

आपका दिखावा है बस कुछ दिन का,

_ वक़्त ने कर दिया कितनों को ख़ामोश..!!

इस संसार में सम्मान से जीने का सबसे अच्छा तरीका है, _

_ हम वही बनें जो हम होने का दिखावा करते हैं.

हमें इसलिए दुख होता है, क्योंकि हम गलत को सही समझते हैं.

_ और बाहर खुश दिखने के लिए.. दिखावा करना पसंद करते हैं..!!

औपचारिकता एक दिखावा मात्र होता है.

_ सबसे महान और सफल कार्य अनौपचारिक हो कर ही किए जा सकते हैं..!!

ये दिखावा और ये नशा दौलत का..

_ सब किरायेदार हैं ..घर बदलते रहते हैं..!!

लोग वस्तुओं और चीजों का एक बड़ा समूह जमा करने और दिखाने में सफल हो गए हैं, _लेकिन खुशी कम हो गई है..!!
दूसरों को दिखावा करके प्रभावित करने की कोशिश, आधी परेशानियों का कारण बनती है.
लोग बाहरी दिखावे के चक्कर में _ अपना आंतरिक संतोष खोए जा रहे हैं.
” दिखावा सबसे हीन प्रवृत्ति है तो, दिखावे से प्रभावित होना, सबसे दीन प्रवृति है,”
दिखावा करने से बेहतर है, आप अच्छे और सच्चे बनें, _  बहुत सुकून मिलता है…
होड़ हमेशा दिखावा करती है, _ और दिखावा कभी सच्चाई तक नहीं पहुंच पाता.
हीन भावना से ग्रस्त आदमी, _ अपनी सारी जिंदगी दिखावे में बर्बाद कर देता है..
#दिखावा कुछ और नही आप का अपने प्रति हीनता ओर खुद का अनादर है.
दिखावे के खेल में मत उलझो, क्योंकि इस खेल का कहीं कोई अंत नहीं…!
जो सच्चा होता है, उसे किसी भी तरह के दिखावे की ज़रूरत नहीं होती है !!
दूसरों को दिखाने के चक्कर में, हम अपनें व्यक्तित्व को खत्म कर लेते हैं..!!
दिखावे से ज्यादा ख़ामोशी से अपना काम करना तरक्की की ओर ले जाता है !!
दिखावा और ढोंग कि ज़िन्दगी से, “ढंग” की ज़िन्दगी बेहतर है !!
व्यर्थ का आडम्बर और बेकार का दिखावा नहीं करना चाहिए.
चैन है सादगी की राहों में, घर बिक जाते हैं दिखावों में !!
खुश रहें सहज- सादगी की राहों में, घर बिक जाते हैं दिखावों में !!
आपका जीवन ज्यादा क़ीमती है, दिखावे की दुनिया से.
आपका सबसे सुंदर रूप छिपाव है __ दिखावा नहीं !!
औकात से बड़े दिखावे इंसान को डूबा देते हैं..
जो सब जानता है, वह दिखावा नहीं करता..!!
जो हो वही रहो, __ दिखावा मत करो..
लोग सोचते कुछ हैं और होता कुछ और है.

_ इस दुनिया में कुछ भी हमेशा हमारे साथ नहीं रहता: दिखावा, शान-शौकत, गाड़ियाँ, हवेलियाँ, हमारी अपनी राय, हमारी अपनी सलाह, कुछ पलों का दिखावा, महंगे कपड़े, या कुछ और..
_ हमारे रिश्ते, अच्छे हों या बुरे, हमारे जाने के साथ ही मिट्टी में मिल जाते हैं.
_ कल की सुबह आज जैसी नहीं होगी.!!
“जब दिशा नहीं होती, तो दिखावा दिशा बन जाता है”

_ ज़्यादातार लोग जीवन की गहराइयों से अनजान होते हैं –
_ उनका जीवन बाहरी बेंचमार्क [benchmarks] के आस-पास घूमता है :
_ दूसरे क्या सोचेंगे, क्या पाना चाहिए, किस स्टैण्डर्ड तक पहुंचना चाहिए, अपने को किसी “रूप” में साबित करना चाहिए.
– लेकिन जब अंदर से कोई दृष्टीकोण या सत्य नहीं होता,
तब बाहर का प्रश्न, प्रतियोगिता [competition], और तुलना ही मनुष्य को चलाने लगती है.
🔹 क्या होता है जब पता नहीं होता “करना क्या है” ?
1. हम दिखाने लगते हैं कि हमें सब कुछ पता है.
2. हम अपने अस्तित्व को दूसरों की नज़रों से देखते और नापते हैं
3. और तभी जीवन एक असली यात्रा नहीं, एक ड्रामा बन जाता है.
> “जब अंदर खाली हो, तो बाहर की चकाचौंध को जीवन का मकसद समझ लिया जाता है”
_ना जाने किस चाहत के पीछे भाग रहे,
_ ना जाने किस रूप में खुद को पांच रहे..
_ पता भी नहीं जीवन से क्या चाहिए,
_ पर फिर भी एक दिखावा – कि सब कुछ समझ रहे हैं.
दिखावे का जाल :- अक्सर जिनके पास असल में कुछ नहीं होता..

_ न सच्चा आत्मविश्वास, न पहचान, न काम..
_ वो दूसरों की रोशनी में खुद को चमकाना चाहते हैं, इसलिए वो बड़े लोगों के साथ तस्वीरें डालते हैं.. ताकि दुनिया को लगे कि वो भी बड़े हैं.
_ दूसरों की पहचान पर जीने वाले ऐसे लोग खुद की मेहनत या पहचान से नहीं, बल्कि दूसरों के नाम से अपनी इज़्ज़त बनाना चाहते हैं.
_ उनकी सोच होती है अगर मैं किसी बड़े लोगों के साथ दिख जाऊं, तो लोग मुझे भी बड़ा समझेंगे.
_ यानी खुद की पहचान उधार पर चलती है – ये भरोसे लायक नहीं..
_ जो इंसान अपने असली चेहरे से नहीं, बल्कि दिखावे से दुनिया को इंप्रेस करता है.. वो कभी भरोसे के लायक नहीं होता.!!
_ क्योंकि उसका रिश्ता सच्चाई से नहीं, फायदे से होता है.
_ जब तक किसी से लाभ मिल रहा है, वो साथ रहेगा जैसे ही फायदा खत्म, वो किसी और की तस्वीर में चला जाएगा.
_ ये अंदर से खोखले लोग होते हैं, बाहर से कनेक्शनवाले दिखते हैं, पर अंदर से बेहद असुरक्षित होते हैं.
_ उन्हें डर लगता है कि अगर यह नकली इमेज गिर गई तो दुनिया में उनकी कोई पहचान नहीं बचेगी.
_ इसलिए वो लगातार दिखावे में निवेश करते रहते हैं.. नए कपड़े, नई फोटो, नए बड़े लोग.
_ जबकि सच्चे लोग चुप रहते हैं.
_ जिन्होंने मेहनत से नाम बनाया है, जो किसी के सहारे नहीं जीते, वो दिखावे में नहीं पड़ते.
_ इसका नतीजा :- नकली चमक, असली अंधेरा.!!

सुविचार – खर्च शादी-विवाह में – 036

शादी- विवाह को आसान करो, क्योंकि लोग आएंगे, खाएंगे, जाएंगे और आप कर्ज चुकाते- चुकाते मर जाएंगे, बात कड़वी है पर सत्य है.!!
विवाह करो तो सादगी से करो, जिसमें न्यूनतम खर्च हो ;

_ कोई दिखावेबाजी नहीं, पूरी सहजता और सादगी के साथ, और चुनिंदा मेहमानों के साथ.!!

हम सब देखते हैं, अधिकांश लोग अपने घर की शादी के मौके पर अपनी आन बान शान को दिखाने के लिए जरुरत से ज्यादा पैसा खर्च करते हैं और जिन लोगों को दिखाने के लिए खर्च करते हैं, वो खा पी कर, नुक्स निकाल कर चलते बनते हैं,

_ अब इस ख़ुशी के मौके पर ये सब करके असल में किस को ख़ुशी मिलती है __ ये बात गौर करने लायक तो जरूर है..!!

शादी में आने वाले लोगों के सामने अपने पैसों की नुमाइश करने का प्रयास आपको नहीं करना चाहिए..

_क्योंकि वह लोग तो सिर्फ मजे लेने के लिए आते हैं और मजा ले करके चले जाते हैं और कर्जे में डूब जाते हैं आप, जिससे उबरने में आपको काफी समय लग जाता है.

आसपास के शादीशुदा लोगों के अंदर झांक के देखो _ बात करो _ उनसे तो आप को पता चलेगा कि सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर शादीयां भव्य की जा रही हैं‌.

पर आपसी रिश्तों की गहराई नापोगे तो _ चाहे वो संबंध वैवाहिक हो या परिवारिक _ उसमें आप को चीजें भव्य नहीं _ उतनी जर्जर मिलेंगी _ जिसकी आप ने कल्पना भी नहीं की होगी..
इसलिए दिल की सुनो दिल से करो ; _ इन सब से इतर रिश्तों में मिठास, प्यार का एहसास कैसे बना रहे _ ताउम्र इस बारे में सोचो..
एक वक्त पर पैसा प्रतिष्ठा और समाज साथ नहीं रह जाने ;
_ साथ रहेगा तो जीवनसाथी का साथ और कुछ नहीं.
शादियों का मौसम शुरू हो चुका है.

“शादियाँ”, शहनाई की गूंज सुनाई दे रही है.
_ अब मुख्य समारोह किराए के मकान में हो रहा है.. नहीं, बिल्कुल मकान नहीं, बल्कि लगभग महल जैसा..
_ अंदर बाहर से कहीं ज्यादा मजा है.. खैर, हमें एक दिन के लिए शाही मेहमान जैसा महसूस हुआ, है ना ?
_ वहाँ, एक ही समय में, मंच पर शहनाई बज रही है, साउंडबॉक्स पर हिंदी गाने बज रहे हैं और बेशक डीजे भी बज रहा है.
_ मुझ जैसे अनभिज्ञ लोगों के लिए, मेरा दिमाग झनझना रहा है, मेरे कान बज रहे हैं और मेरा दिल धड़क रहा है.
_ इन सबके बीच, मैं शादी के हॉल में जाता हूँ.. एक सामाजिक प्राणी होने के नाते..
_ मैं सामाजिक नियमों का पालन करते हुए हॉल में प्रवेश करने से लेकर बाहर निकलने तक अपने चेहरे पर मुस्कान बनाए रखता हूँ.!!
शादी में इतने खर्च के बावजूद किसी की उत्सुकता दूल्हा दुल्हन देखने तक में नहीं रह गई,

_ घराती हों बाराती बस गए खाए पिए, फ़ोटो खिंचाए और निकल लिए..
_ हालांकि दोनों तरफ़ के घरवाले यह मानते हैं कि इतना खर्च करके.. हमने सबसे अद्भुत शादी की है..
_ जबकि किसी को याद भी नहीं रहता कि पिछली रात क्या खाया, क्या देखा, किससे मिले..
_ अब तो बस लकदक कपड़े, मेकअप, सेल्फी और स्टेटस अपडेट करना ही शादी का मतलब रह गया है.
मेरा अपने मध्यमवर्गीय समाज बंधुओं से अनुरोध है ;

_ आपका पैसा है, आपने कमाया है.
_आपके घर खुशी का अवसर है खुशियां मनाएं, पर किसी दूसरे की देखा देखी नहीं..!!
__ कर्ज लेकर अपने और परिवार के मान सम्मान को खत्म मत करिएगा,
_ जितनी आप में क्षमता है… उसी के अनुसार खर्चा करिएगा ;
_ 4 – 5 घंटे के रिसेप्शन में लोगों की जीवन भर की पूंजी लग जाती है,
_ दिखावे की इस सामाजिक बीमारी को अभिजात्य वर्ग तक ही सीमित रहने दीजिए..!
_ अपना दांपत्य जीवन सर उठा के, स्वाभिमान के साथ शुरू करिए और खुद को अपने परिवार और अपने समाज के लिए सार्थक बनाइए..
चाय और नमकीन पार्टी में भी फेरे ले कर विवाह की रस्म  निभाई जा सकती है,

इसके लिए लाखों रूपए फूँकने की जरुरत नहीं है..

लाख टके की बात है पर कोई समझने को तैयार नहीं,

शादी विवाह के नाम पर दिखावापन ही समस्याओं की असली जड़ है.

एक दिन की शादी के लिए _ अपनी ढाई साल की कमाई खर्च करना _

_ और ऊपर से फिर भी ताने सुनना _ पता नहीं _ कितना अच्छा लगता है हमें..

शादियां कम खर्चीली, कम दिखावटी और सरल होनी चाहिए..

_ ताकि लोग जीवन के अन्य पहलुओं पर ध्यान केंद्रित कर सकें और उन पर खर्च कर सकें.!!

शादी पर फिजूलखर्ची को लेकर जब किसी से भी सवाल किया जाता है, तो जवाब मिलता है “शादी कोई बार- बार थोड़े न होती है. इसलिये यह यादगार होनी चाहिए,” पर यादगार किसके लिए ? कर्ज लेकर या फिर अपनी जिंदगी भर की जमा- पूंजी को लूटा कर की गयी फिजूलखर्ची के लिए या फिर हँसते- हँसते माहौल में एक सफल और सुखद दांपत्य जीवन की शुरुआत के लिए ? इस पर गंभीरता से सभी को सोचने की जरुरत है.

शादी हो और खर्च न हो ऐसा संभव नहीं, लेकिन खर्च अगर जरुरत के मुताबिक हो, तो उचित है. कई बार माता- पिता बच्चों की ख्वाहिश के खातिर चुपचाप बोझ वहन करते हैं. शादी के अतिरिक्त खर्चों का खामियाजा बाद में घरवालों को भुगतना पड़ता है. अगर शादी की पोशाक, मंडप की सजावट, खान- पान का मेन्यू, उपहार और दूसरी चीजों पर किया जाने वाला खर्च अगर बजट बना कर किया जाये, तो काफी पैसा बच सकता है. जैसे- शादी की ड्रेस या ज्वेलरी भविष्य में एक या दो बार ही यूज हो पाती है, इसलिए बेहतर है इन्हें रेंट पर ले लिया जाये. बढ़ती महंगाई के इस दौर में किसी एक पछ पर सारा आर्थिक बोझ डालने के बजाय बेहतर है कि दोनों पछ एक तय बजट बना कर ५०- ५० खर्च शेयर कर लें. इससे ही वह शादी यादगार बन जायेगी और लोगों के लिए मिसाल होगी.

आज तक जितनी शादियों मे मै गया हूँ, उनमे से करीब 75% में दुल्हा-दुल्हन की शक्ल तक नही देखी… उनका नाम तक नही जानता था… अक्सर तो विवाह समारोहों मे जाना और वापस आना भी हो गया पर ख्याल तक नही आया और ना ही कभी देखने की कोशिश भी की, कि स्टेज कहाँ सजा है, युगल कहाँ बैठा है…

बैठा भी है कि नहीं, या बरात आई या नहीं…
भारत में लगभग हर विवाह में हम 70% अनावश्यक लोगों को आमंत्रण देते हैं…
अनावश्यक लोग वो है जिन्हें आपके विवाह मे कोई रुचि नही..वे केवल दावत में आये होते हैं…
जो आपका केवल नाम जानते हैं…
जो केवल आपके घर की लोकेशन जानते हैं.. जो केवल आपकी पद-प्रतिष्ठा जानते हैं…
और जो केवल एक वक्त के स्वादिष्ट और विविधता पूर्ण व्यञ्जनों का स्वाद लेने आते हैं…
ये होते हैं अनावश्यक लोग….
केवल आपके रिश्तेदारों, कुछ बहुत निकटस्थ मित्रों के अलावा आपके विवाह मे किसी को रुचि नही होती..
ये ताम झाम, पंडाल झालर, सैकड़ों पकवान, आर्केस्ट्रा DJ, दहेज का मंहगा सामान एक संक्रामक बीमारी का काम करता है.. कैसे..?
लोग आते हैं इसे देखते हैं और सोचते हैं..
“मै भी ऐसा ही इंतजाम करूँगा, बल्कि इससे बेहतर करूंगा “..
और लोग करते हैं… चाहे उनकी चमड़ी बिक जाए..
लोग 70% अनावश्यक लोगों को अपने वैभव प्रदर्शन करने में अपने जीवन भर की कमाई लुटा देते हैं.. लोन तक ले लेते हैं..
और उधर विवाह मे आमंत्रित फालतू जनता , गेस्ट हाउस के गेट से अंदर सीधे भोजन तक पहुच कर, भोजन उदरस्थ करके, लिफाफा पकड़ा कर निकल लेती है..
आपके लाखों का ताम झाम उनकी आँखों में बस आधे घंटे के लिए पड़ता है,
पर आप उसकी किश्तें जीवन भर चुकाते हो…
क्या हमें इस अपव्यय और दिखावे को
रोकना नहीं चाहिए..!
शादी समारोह की औकात बस इतनी ही रह गयी है कि खाना कब चालू होगा…और खा लेने के बाद…कितनी जल्दी घर निकल कर बिस्तर पर लंबे हों… और यहां आप साल भर से प्लान करते मर जाते हो कि कितनी तैयारी कर ली जाय…
हमारी एक कोशिश परिवर्तन की ओर…
“कर्ज” लेकर महंगी शादी, चमकदार बड़े-बड़े टेंट,
और 1 दिन के लिए बारात में 20/50 गाड़ियां,
डीजे, ढोल, ताशे बजाने से क्या होगा.*
1 दिन शेरवानी और घोड़े पर बैठकर नकली राजा बनने के लिए आपको कई सालों तक खच्चर बनकर काम करना पड़ेगा…
*विवाह और शादी समारोह को सिंपल साधे तरीके से करें !
दहेज लेने देने से परहेज करें दिखावटी दुनिया से बाहर निकले और हकीकत का सामना करें !!
अगर भविष्य मे तनाव मुक्त जीवन जीना है तो कर्ज लेकर” घी ” पीना बन्द करें ।
एक संकल्प जरूर करे-न तो कर्ज वाली बहु लायेंगे और न ही कर्ज वाली बेटी देंगे।
शादी जो पहले एक संस्कार होती थी जो अब एक इवेंट बन कर रह गई हैं.

पहले शादी समारोह का मतलब दो लोगों को जुड़ने का एहसास कराते, पवित्र विधि विधान, परस्पर दोनों पक्षों की पहचान कराते रीति- रिवाज, नेग भी मान सम्मान होते थे.
पहले हल्दी और मेंहदी यह सब घर अंदर हो जाता था, किसी को पता भी नहीं होता था. पहले जो शादियां मंडप में बिना तामझाम के होती थी, वह भी शादियां ही होती थी और तब दाम्पत्य जीवन इससे कहीं ज्यादा सुखी थे.
परंतु समाज व सोशल मीडिया पर दिखावे का ऐसा भूत चढ़ा है कि _ किसी को यह भान ही नहीं है कि क्या करना है क्या नहीं ?
यह एक दूसरे से ज्यादा आधुनिक और अमीर दिखाने के चक्कर में लोग हद से ज्यादा दिखावा करने लगे हैं.
शादी की रस्म शुरू होते ही पंडित जी जल्दी करिए, कितना लम्बा पूजा पाठ है, कितनी थकान वाला सिस्टम है” कहते हुए शर्म भी न आती.
वाक़ई, अब की शादियाँ हैरान कर देने वाली हैं. मज़े की बात ये है कि ये एक सामाजिक बाध्यता बनती जा रही है. शादियों में फ़िज़ूल खर्ची धीरे धीरे चरम पर पहुँच रही है.
पहले मंडप में शादी, वरमाला सब हो जाता था. फिर अलग से स्टेज का खर्च बढ़ा, अब हल्दी और मेहंदी में भी स्टेज, खर्च बढ़ गया है.
अब तो सगाई का भी एक भव्य स्टेज तैयार होने लगा है. टीवी सीरियल देख देख कर सब शौक चढ़े है.
प्री वेडिंग फोटोशूट, डेस्टिनेशन वेडिंग, रिसेप्शन, फर्स्ट कॉपी डिजाइनर लहंगा, हल्दी/मेहंदी के लिए थीम पार्टी, लेडिज संगीत पार्टी, बैचलर’स पार्टी,
पहले बच्चे हल्दी में पुराने कपड़े पहन कर बैठ जाते थे अब तो हल्दी के कपड़े पांच दस हजार के आते है. ऊपर से कहते हैं कि शादी एक बार ही होगी..
लड़का -लडक़ी का भविष्य सुरक्षित करने के बजाय पैसा पानी की तरह बहाते हैं.
ज्यादातर लोग दिखावे की नाक ऊंची रखने के लिए कर्जा लेकर घी पी रहे हैं.
कभी ये सब अमीरों, रईसों के चोंचले होते थे _ लेकिन देखा देखी अब मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास वाले भी इसे फॉलो करने लगे है.
रिश्तों में मिठास खत्म ये सब नौटंकी शुरू हो गई. एक मज़बूत के चक्कर में दूसरा कमजोर भी फंसता जा रहा है.
कुछ वर्षों से शादी में औकात से ज्यादा रिसेप्शन का क्रेज तेजी से बढ़ा है. धीरे-धीरे एक दूसरे से बड़ा दिखने की होड़ एक सामाजिक बाध्यता बनती जा रही है.
इन सबमें मध्यम वर्ग परिवार मुसीबत में फंस रहे हैं, _कि कहीं अगर ऐसा नहीं किया तो समाज में उपहास का पात्र ना बन जायें.
सोशल मीडिया और शादी का व्यापार करने वाली कंपनिया इसमें मुख्य भूमिका निभा रहीं हैं.
ऐसा नहीं किया तो लोग क्या कहेंगे / सोचेंगे का डर ही ये सब करवा रहा है.
कोई नही पूछता उस पिता या भाई से जो जीवनभर जी तोड़ मेहनत करके कमाता है, ताकि परिवार खुश रह सके.
वो ये सब फिजूलखर्ची भी इसी भय से करता है कि कोई उसे ये ना कहे कि आपने हमारे लिए किया क्या ?
दिखावे में बर्बाद होते समाज को इसमें कमी लाने की आवश्यकता है, वरना अनर्गल पैसों का बोझ बढ़ते बढ़ते आपको कर्ज में डुबो देगा और वैदिक वैवाहिक संस्कारों को समाप्त कर देगा..
हर साल शादियों के सीजन में एक पोस्ट घूमती रहती है। रिजॉर्ट में शादी एक सामाजिक बीमारी।

Destination Wedding के प्रचलन से पहले शादियों में फिजूल खर्ची के खिलाफ लिखा जाता था। पर जैसे ही वेडिंग्स का ट्रेंड बदला वैसे ही एंटी पोस्ट का ट्रेंड भी बदल गया।

उस पोस्ट में एक बात पर जोर दिया जाता है कि धनी लोगों की विवाह में हुई फिजूल खर्ची देख कर गरीब लोग भी उनकी देखा-देखी कर्जा ले कर फिजूल खर्च करते हैं।

इस पोस्ट में इसी मुद्दे पर बात करूंगा… सिर्फ शादी ब्याह ही नहीं किसी भी चीज में यदि कोई किसी की देखा-देखी फिजूल खर्ची करता है तो उसके प्रति मेरी रत्ती भर भी सहानुभूति नहीं रहती।

यदि मैं अपनी बात करूं तो मेरे आस पास बहुत से लोग हैं जिनके मेरे से अच्छे मकान हैं, मुझसे अच्छी कार हैं, मुझसे मंहगे फोन हैं, मुझसे मंहगे कपड़े पहनते हैं, हर साल विदेश घूमने जाते हैं।

अब यदि मैं उनकी देखा देखी खर्चा करूंगा तो मेरी आर्थिक स्थिति गड़बड़ हो जायेगी और अल्टीमेटली भुगतना मुझे ही पड़ेगा।

और किसी भी चीज की कोई लिमिट नहीं होती और जिंदगी से काश कभी खत्म नहीं होता ।

किसी के लिए splendour भी काश हुआ करती है तो किसी के लिए हार्ले डेविसन।

किसी के लिए सेंट्रो भी काश है तो किसी के लिए फॉर्च्यूनर। किसी के लिए गांव की दहलीज लांघ कर शहर जाना काश है तो किसी के लिए यूरोप टूर करना काश।

किसी के लिए तन ढकने लायक कपड़े पहनना काश है तो किसी के लिए ब्रांडेड कपड़े पहनना काश।

तो भैया कर्जा ले कर शादी करने के फेवर में तो मैं भी नही हूं। पर ये है कि आज कल एक या दो बच्चे ही होते हैं और इंसान जिंदगी भर उनके लिए ही कमाता है।

तो ऐसे में वो शुरू से ही थोड़ी-थोड़ी Savings करना शुरू कर दें तो शादी धूम-धाम से करना बहुत मुश्किल भी नहीं होता। मैं सादगी से शादी करने के बिल्कुल विरोध में नही हूं, इसे हम किसी की भी व्यक्तिगत पसंद पर छोड़ सकते हैं पर धूम-धाम से शादी करने वाले को विलेन बनाना बिल्कुल भी तर्क संगत नही है।

एक बात और यह है कि हर किसी के खर्च करने की अलग-अलग चॉइस होती है। कोई एक चीज पर कमी कर लेता है पर दूसरी चीज पर नहीं करता।

जैसे किसी को गेजेट्स का बहुत शौक होता है, किसी को कार का शौक होता है, किसी को ब्रांडेड कपड़े का शौक होता है, किसी को आलीशान घर में रहने का शौक होता है , किसी को घूमने फिरने का शौक होता है। ऐसे में व्यक्ति किसी दूसरे फील्ड में कमी कर के अपनी पसंद पर ज्यादा खर्च कर लेता है।

तो भैया जो जैसे शादी ब्याह कर रहा है उसे करने दो, ज्यादा किसी के फटे में टांग मत अड़ाओ। उसका पैसा, उसके बच्चे, उसकी खुशियां, उसकी मर्जी फिर दूसरा क्यों खामख्वाह कूदे ? 😅😅

पोस्ट अच्छा लगे तो आगे शेयर करने से मत हिचकना 🫠

भारत में छोटे फंक्शन तक में 500 से ज्यादा लोग आ जाते हैं, और जब ये भीड़ आ जाती है तो हमको लगने लगता है _ हम भी कुछ हैं..

_ बड़का पार्टी / रईस / पैसा वाला या जो भी इमका ढिमका है -स्वाभाविक है ऐसा लगना भी.. पर ये स्वाभाविक बिल्कुल भी नही है !

_ ख़ुशी का इजहार /बधाई ये सब तो ठीक है. फिर आपका मिरर (” प्रतिबिम्ब ” ) क्या है ?

__क्या आपके आसपास कोई है जो बताता है कि आप ठीक नहीं हो ?

_ धरती में आये हो, दुनिया भर में तकनीक ने अद्भुत तरह के अवसर पैदा किये हैं, प्लीज ध्यान दीजिये उसमें..!

_कुछ बनना है तो रिसर्च कीजिये कि _आप अपने जीवन को एक नया नज़रिया कैसे दे सकते हो ! कुछ बन गए तो फिर इस भीड़ में जुड़ जाना..!!

_आपके जीने मरने के बाद कोई फरक नही पड़ने वाला है, कि आपने क्या देखा- दिखाया -लिखा -बोला..!

_ पढ़े लिखे हो और गरीब हो ? स्थिति ठीक नहीं है —तो फिर खुद से पूछो या उसके लिए टाइम नहीं है ?

पूछा तो क्या पूछा ? फिर उस पर काम कितना किया ? और ये जवाब किसी और से मत मांगिये – ये खुद ही तय कीजिये की क्यों हो गरीब ?

_मुझे कारण पता है – आपको भी पता है –पर किसी को कारण से धुर्रा फरक नही पड़ता इस व्यवस्था में..

_इसलिए ये कारण को मत गिनाइये. खूब अनुभव से कह रहा हूँ… मत गिनाइये इसे.

_कौन हो तुम ? क्या है तुम्हारे भीतर –चिल्लाके पूछा है किसी दिन _ कि इतना किल्लत अब नही सहना..!

_ कि मै निकल लूंगा. मेरे अंदर औकात है चीजों को बदलने की…. किया है ?

_कोई हिला रहा है तुम्हारे शरीर को –कि उठ जाओ ! उठ जाओ और इस भीड़ से कुछ अलग कर लो. अपने घर के लिए और खुद के लिए..!!

_प्लीज — करो कुछ अलग, बहुत कुछ है दुनिया में. तुम अकेले नही हो.

_ तुम्हारा दिन जिस दिन तुम तय करोगे उसी दिन से शुरू होगा. अब तक तय किया है कभी ? तो किसने रोका है ?

_पढ़े लिखे लोगों को भी अच्छा जीवन नहीं जीते देख _खीझ /दर्द /दुःख होने लगता है.!

_ हमें इतना व्यस्त नहीं हो जाना चाहिए कि _ हम जीवन में वास्तव में महत्वपूर्ण चीजों की उपेक्षा करें,

_ जैसे कि हमारा व्यक्तिगत जीवन, अपने ईश्वर के करीब आने के लिए समय निकालना, पढ़ने के लिए समय निकालना आदि.

_ हम सभी को आराम करने, सोचने और ध्यान लगाने, सीखने और बढ़ने के लिए समय लगाना चाहिए. नहीं तो तो हम सुस्त हो जाएंगे और अपनी प्रभावशीलता खो देंगे.

शादी शादी शादी
सबसे अलग और सबसे शानदार दिखने की चाहत में शादी ब्याह हो या सगाई सब कितने एक जैसे होते जा रहे हैं..
सस्ता हो या महंगा सगाई के गाउन एक जैसे लगते हैं
जयमाल पर भारी लहंगा, जूलरी और मेकअप एक जैसा लगता है
लड़के इंडो वेस्टर्न में एक जैसे लगते हैं
युवा दढ़ियल मिलते हैं
प्रौढ़ तुंदियल दिखते हैं
बूढ़े बुढ़िया जवान दिखने के चक्कर में हास्यास्पद दिखते हैं..
रही सही कसर हल्दी, मेंहदी के बनावटी दिखते फंक्शन ने पूरी कर दी है..
टीवी सीरियल, फिल्मों की कृपा से अलग अलग राज्यों, धर्मों, समुदायों के रीति रिवाजों की खिचड़ी संस्कृति शादियों में दिखती है और उस जगह के ओरिजनल रिवाज या तो समाप्त हो गए हैं या नेपथ्य में चले गए होते हैं..
और इस सबके बावजूद सबसे हैरानी की बात है कि किसी को न तो दूल्हे दुल्हन का चेहरा याद रहता है न सजावट, न खाना पीना..
बस जिन्होंने पैसे खर्च किए हैं और जिनकी शादी होती है वह और उनके घर वाले अपने इंतजामात और सजावट पर रीझे रहते हैं..
अपनी सजी धजी तस्वीरों पर स्वयं मुग्धा दुल्हनें अपनी और अपने पति की तस्वीरें महीनों सोशल मीडिया पर डालती रहती हैं..
_बाकी शादी में गए लोग अपनी अपनी तस्वीर के अलावा किसी की तस्वीर में इंटरेस्टेड नहीं रहते _पर जयमाल के समय सब ऐसे फोन लेकर स्टेज घेर लेते हैं _जैसे अभी जादूगर की टोपी से खरगोश निकलेगा..
मैं ऐसी भयंकर एकरूपता वाली शादियों में जाने के नाम से ही डर जाता हूँ, _पर सामाजिकता का तकाजा निभाने के लिए बचते बचाते भी एक दो शादियां अटेंड करनी पड़ती हैं..
क्यूरेटेड फंक्शन
क्यूरेटेड मुस्कुराहट उकताहट पैदा करते हैं
हर शादी, हर फंक्शन रिपीट टेलीकास्ट जैसा लगता है
यार बस करो _अब कुछ नया सोचो और न सोच पाओ तो _पुराने पर लौट आओ..
अब शादियों में सहजता की कमी हो गई है.

_ ये कमी कई कारणों से हो सकती है जैसे बढ़ती औपचारिकता, सामाजिक दबाव, और व्यक्तिगत अपेछाएं.
_ पहले शादियों में अपनापन और सहजता ज्यादा होती थी.
_ क्योंकि लोग एक दूसरे के साथ खुलकर मिलते थे और परिवार के साथ समय बिताते थे.
_ अब शादियों में भीड़ और औपचारिकता बढ़ गई है.. जिससे सहजता कम हो गई है .!!
शादी विवाह या फिर ऐसे ही अन्य समारोहों में लोग कितना भी कहें कि अब खाने पीने कौन जाता है,

_ इन फंक्शन्स में लेकिन अभी भी सारी भीड़ खाने पीने के स्टॉल्स पर ही लगी होती है और जब तक खाना बंटता रहता है लोगों की भीड़ लगी ही रहती है.
_ और वो लोग भी सब व्यंजन चख कर ही वापस आते हैं.. जो खाने पीने कौन जाता है बोलते हैं.
_ यानी भारत की जनता में भोजन का क्रेज बरकरार है.
_ नकली पनीर की सप्लाई के बाद भी ये क्रेज कम नहीं हुआ है.!!
– Anurag Tiwari
भारतीय शादियों में क्या बदला – एक विहंगावलोकन

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1 – शादी के नाम कर संस्कार नहीं – बस दिखावा और इवेंट हो रहे हैं, सेलिब्रिटी और नेता के आने पर जो गदर हो रहा है वह शोचनीय है, उनके साथ सेल्फी का अजब तमाशा चलता है.
2 – मेहमानों को आने के पहले सोचना पड़ता है कि मेहंदी, हल्दी, महिला संगीत, वर या वधू निकासी के समय के कपड़े, शादी के समय कपड़े, पार्टी के कपड़े, फेरों के समय के कपड़े, आवागमन के लिए महंगी गाड़ियां, परफ्यूम से लेकर जेवर आदि की आवश्यकता – क्या सारे रिश्तेदार इतने सक्षम है.
3 – परिवार के बड़े और बूढ़े लोगों की उपेक्षा कर यार – दोस्त और कार्यालयीन स्टाफ की ओर ज्यादा ध्यान दिया जाता है.
4 – बारात में कान फ़ोड़ू डीजे से लेकर भयानक कर्कश ढोल और ताशे से लेकर बाकी सबका भौंडा प्रदर्शन.
5 – सड़क पर देर तक नाच – गाना और आसपास के लोगों को, राहगीरों को त्रस्त कर देने की हद तक का जाम लगवाना और यह भूल जाना कि आसपास अस्पताल, मरीज, बूढ़े, बच्चे, परीक्षाएं या कोई अन्य संकट हो सकते है, एंबुलेंस भी निकल नहीं पाती, पूरी पूरी रात अश्लील गानों पर नाचना – क्या सभ्यता हो गई है हमारी.
6 – भोज में न्यूनतम सौं प्रकार के आईटम रखना – जिनकी सिर्फ और सिर्फ बर्बादी होती है, लोग बेहद बदतमीजी से खाने के बजाय बर्बाद करते है, फिर वो भारतीय चाट के स्टाल हो या चाईनीज के नाम पर घातक सॉसेज और मसाले डालकर बनें व्यंजन, माॅकटल्स, आईसक्रीम या कॉफी, पान के स्टाल्स.
7 – मिठाइयों के नाम पर कम से कम दस प्रकार की मिठाइयां और आईसक्रीम अलग से, कभी सोचिए इतना दूध देने के लिए क्या हमारे परिवेश में मवेशी बचें भी है जिनके दूध की अतिरिक्त आपूर्ति हो रही है, गांव कस्बों या शहरों में दैनंदिन पूर्ति के अतिरिक्त जरूरत कैसे पूरी हो रही है – जिससे पनीर से लेकर बाकी सब गरिष्ठ व्यंजन बनाएं जा रहे है, एक ही दिन में एक छोटे शहर में पचास जगह शादियां हो रही है तो क्या इतना दूध सच में है भी हमारे पास, पानी की बर्बादी का तो पूछो मत.
8 – संगीत, डीजे और मनोरंजन के नाम पर सिवाय शोर, प्रदूषण के अतिरिक्त क्या है और.
9 – लेनदेन के नाम पर जो कपड़ा, बर्तन या उपहार हम दे रहे हैं – उससे किसका फायदा हो रहा है, छोटे व्यापारी, बड़े घराने, या व्यवसायियों का, और ये उपहार कपड़े दो – तीन साल में घूमफिरकर क्या हमारे घर में ही लौटकर नहीं आ रहें है किसी कार्यक्रम में, लोग पर्ची भी नहीं निकालते और बगैर सोचे गिफ्ट कर देते हैं.
10 – क्या नव विवाहित संपत्ति को मालूम भी है कि शादी जैसे पवित्र बंधन में आशीर्वाद देने कौन आ रहा है या कौन – कैसे समय निकालकर, कष्ट में यात्राएं करके या अपनी जेब का बजट बिगाड़कर आ रहा है – इन्हें तो देखने और मिलने का समय ही नहीं है – रात दस – ग्यारह बजे मंच पर भारी मेकअप के साथ बैठना है और फोटोग्राफर या वीडियोग्राफर के इशारों पर नाचना है – ताकि एल्बम या वीडियो अदभुत और अप्रतिम बन सकें और सोशल मीडिया पर वर्षों तक शेयर किए जा सकें.
फिर आखिर में क्या करें –
1 – शादी को परम्परागत ढंग से करना है तो संस्कारों पर ध्यान दें, बेहतर है पंजीकृत विवाह करें और एक छोटी सी पार्टी दे दें.
2 – भीड़ न बुलाएं, शादी आपकी प्रतिष्ठा, समाज में स्थान, या व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा का प्लेटफॉर्म नहीं है.
3 – बैंड – ढोल और ताशे बुलाए, पर शोर ना हो, प्रशासन भी सभी डीजे के डेसिबल का स्तर चेक करें और जो मानकों के हिसाब से ज्यादा हो – उसको जप्त कर लें, ढोल और ताशे वालों को हिंदी में समझा दें नहीं तो जेल में दो – चार दिन रख दें, सब सुधर जायेंगे.
4 – मैरिज गार्डन वालों को ग्यारह बजे के बाद कोई भी छूट ना दें अन्यथा उनका लायसेंस रद्द कर दें.
5 – आतिशबाजी वालों को लिमिट बांध दें कि बीस या तीस हजार से ज्यादा के पटाखें नहीं बेचे और प्रदूषण अधिनियम का इस्तेमाल कर सकते है इसको रोकने के लिए.
6 – भोजन में दस या बीस से ज्यादा व्यंजन ना बनाएं किसी भी हालत में, क्या हम अपने घर रोज या कभी भी दस मिठाई खाते है या पचास प्रकार के स्टार्टर खाते है, केटरिंग वाले हलवाई को भी रडार पर रखें.
7 – भोजन छोड़ने वालों को वही सार्वजनिक रूप से कहें, अपमानित करें और अगली बार किसी आयोजन में ना बुलाएं समाज जन – इसकी घोषणा करें माइक से.
8 – दुल्हा – दुल्हन शिष्टता से रहें और बजाय इवेंट के इस पवित्र बंधन में बंधने वाले रिश्ते का महत्व समझकर आने वालों का सम्मान करें, सभी रीति रिवाजों को माने, बजाय कैमरे, ड्रोन और वीडियो कैमरे की निगाह में आने के अपने लोगों की निगाह में प्यार और सम्मान के साथ रहें.
9 – लेनदेन में ना पड़े, लोग आएं, प्रेम से रहें, मिलें – जुले खाए और सुकून से मधुर स्मृतियों के साथ एक ये दो दिन में ही अपने घर लौटे, भंडारे समझकर पड़े ना रहें हफ्ते भर तक.
10 – जितना रुपया आप झोंक रहे है उसका नतीजा सिर्फ यह है कि लोग अंत में आपका ही खाकर “गुलाब जामुन कड़क थे, पूरी कच्ची थी, रोटी गर्म नहीं थी, पानी बहुत ज्यादा ठंडा था या हमको तो स्टेज पर फोटो खींचने को नहीं मिला” कहकर निकलते है.
– मेरी ओर से ये चंद सुझाव है, बाकी आप जोड़ सकते है, दिनों – दिन शादियां इस सबसे भी टूट रही है और उसके बाद अदालतों में जो मासिक निर्वहन भत्ता, एक मुश्त राशि के लिए नंगा नाच दोनों पक्षों से होता है – वह बेहद दारुण और भयावह है – इससे बचिए.
और अंत में समाहार –
– दिखावे, भौंडेपन, और बाजार के ट्रैप में फंसने के बजाय अपने बच्चों के लिए कोई फ्लैट, जमीन या कोई अचल संपत्ति आप खरीद कर देंगे – तो वह उनके काम आएगी, लेनदेन में भी यदि आवश्यक हो तो नगदी दें – पर वह भी हजार – पांच सौं से ज्यादा ना हो, ताकि किसी और को अपराध बोध ना हो.
– Sandip Naik

सुविचार – खर्च – बचत – 035

अगर बदल न सकूं अपने पुराने कपड़े.. तो रफू करने की काबिलियत जरुर देना मेरे मालिक..
_ सुना है बाजार में मंहगाई बहुत हो गयी है.!!

– Tejbeer Singh sadher

घर खर्च की जरूरतें उतनी ही रखो, जितना कमा रहे हो.

_ यहाँ उधार माँग कर पैसे किसी से, क्यूँ काम चला रहे हो॥
_ घर खर्च की जरूरतें उतनी ही रखो, जितना कमा रहे हो.
_ किसी के आगे रोना धोना, किसी के आगे हाथ फैलाना,
_ माँगे गए उधार के पैसों से, अपने घर का खर्च चलाना,
_ समझ में नहीं आता खुद को, क्यूँ भिखारी बना रहे हो॥
_ यहाँ उधार माँग कर पैसे किसी से, क्यूँ काम चला रहे हो॥
_ घर खर्च की जरूरतें उतनी ही रखो, जितना कमा रहे हो.
_ कम कर लो जरूरतें अपनी, अगर पूरी नहीं ये होती,
_ जरूरतों के आगे हो कर बेबस, क्यूँ जिन्दगी है रोती,
_ क्यूँ जरूरतें रुला रही है तुम्हें, और तुम रोए जा रहे हो॥
_ यहाँ उधार माँग कर पैसे किसी से, क्यूँ काम चला रहे हो॥
_ घर खर्च की जरूरतें उतनी ही रखो, जितना कमा रहे हो.
_ मेहनत करो मजदूरी करो, जिसम की खिचवा दो खाल,
& देकर धोखा मगर किसी को, यहाँ चलो न टेडी चाल,
_ सब वापिस लौट कर आऐगा यहाँ, क्यूँ पाप कमा रहे हो॥
_ यहाँ उधार माँग कर पैसे किसी से, क्यूँ काम चला रहे हो॥
_ घर खर्च की जरूरतें उतनी ही रखो, जितना कमा रहे हो.
Lekhak :- MAHESH KUMAR CHALIA.
दुनिया का सबसे बेहतरीन लाइफ स्टाइल ये है के..

_ इंसान अपनी आमदनी में गुज़ारा करना सीख ले.!!

खर्च के साथ अपनी खुशी को जोड़ना बंद करो; _

_ इसके बजाय, बचत के साथ खुशी को जोड़ें.

हमें अपने आने वाले कल के लिए संचय करना पड़ता है..
_ जिससे जरूरत पड़ने पर दूसरों से मांगने की आवश्यकता न हो.!!
ऐसी चीज़ें खरीदिए जो पैसा कमा कर दे या बचाए.

_ ऐसी चीज़ों से भरसक बचें जो खर्च बढ़ाएं.!!
व्यर्थ का खर्चा**जीवन की व्यवस्था को*

*तथा**व्यर्थ की चर्चा**मन की अवस्था को**प्रभावित करते हैं*

या तो खर्च घटाओ..या कमाई बढ़ाओ,

_वरना लाइफस्टाइल नहीं.. लाइफ बिगड़ जाएगी.!!
खुद कमाकर खर्च करना सीखो..
_ शौक भी सीमित हो जाएंगे और सोच भी मजबूत.!!
हमारी ज़रूरतें कम हैं, लेकिन चाहतें ज़्यादा हैं..

_ जरूरतें पूरी की जा सकती हैं, लेकिन चाहतों का इस दुनिया में कोई अंत नहीं..!!

कमाई कि तुलना में खर्च कुछ ज्यादा ही बढ़ गए हैं,

_हमारी निगाह इतनी पैनी नहीं है कि सच्चाई को ठीक से देख सकें..

खरीदारी हमें कभी भी वो चीज़ें नहीं देती जो हम सबसे ज़्यादा चाहते हैं;

_हमें कहीं और देखना होगा.. केवल वही खरीदें, _जो हमें चाहिए.!!

हम वह खरीदना बंद कर दें.. जो कुछ लोग चाहते हैं कि हम खरीदें.

_ भीड़ भरा रास्ता हमें अपने रास्ते पर नहीं ले जा सकता.!!

बढ़ती महंगाई के इस दौर में सबसे बुद्धिमान व्यक्ति वही है,

जिसने समय रहते बचत की जरुरत को समझा हो.

जितना कमाने कि ताकत है, उतना ही खर्च करो…

_या फिर जितना खर्च करने कि इच्छा हो, _उतना कमाने की ताकत रखो..

आपको _उन चीजों पर खर्च करना चाहिए _जो आपके लिए सबसे ज्यादा मायने रखती हैं..

_और उन चीजों पर जमकर कटौती करनी चाहिए _जो आपके लिए मायने नहीं रखती हैं.!!
_कुछ चीजें हैं _जो पैसे से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं !!
अपने खर्चों पर ध्यान रखें. अच्छा हो कि अपने खर्चों को लिखें ताकि अनावश्यक खर्च पर रोक लग सके.
खर्चे कम कीजिए — बेकार की चीजें छोड़ने पर अपने आप खर्च कम हो जाएगा.
दिखावे में घर का बजट बिगड़ता है, वरना खाने पीने और दैनिक जीवन के इतने खर्चे नहीं है !
अगर आपकी आमदनी रुपया है तो खर्चा अठन्नी ही करें. शेष पैसे को बचा कर निवेश करें.

आपके द्वारा निवेश किया गया पैसा आने वाले सालों में बढ़ता जायेगा और आकस्मिक समय आपके ही काम आएगा.

सिर्फ टाइमपास के लिए शौपिंग करने न जाएं, साथ ही, बोर हो रहे हैं या स्ट्रैस में हैं तो चलो शौपिंग कर लेते हैं, वाली आदत भी ठीक नहीं.

ऐसे में बेकार की चीजों पर पैसे खर्च हो जाते हैं.

खर्च के विषय में बेखबर रहने से मनुष्य की पूरी आयु नष्ट हो जाती है.

इसी के सदुपयोग से जीवन सरस बनता है, समाज में आदर और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है.

जरुरत पड़ने पर ही शॉपिंग करें. इसे अपनी हौबी या प्रेस्टीज इश्यू न बनने दें.
अपनी बार्डरोब हलकी रखें, क्योंकि पहनेंगे वही जो आप को बहुत पसंद है.
जिन चीज़ों की हमें ज़रूरत नहीं होती, वो भी हम खरीद लेते हैं. जिससे हमारे हाथ में एक रुपया नहीं टिकता !

यह तब एक समस्या बन जाता है, जब हमें कोई बड़ा खर्च उठाना पड़ता है.

कमाई और आमदनी से नहीं, आपकी आर्थिक स्थिति आपके खर्च से नापी जाती है.

यदि खर्च आमदनी से अधिक हुआ तो बड़ी आय से क्या लाभ?

ज्यादातर लोग भविष्य के भौतिक सुखों की आस में हाथों में मौजूद वर्तमान का आनन्द खो देते है.

_ बचत एक अच्छी आदत है पर जीवन के अत्यावश्यक सुखों की तिलांजलि की शर्त पर नही होनी चाहिए.!!
दूरदर्शी व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं और खर्चों का पहले से ही बजट तैयार करता है. उसकी आय वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति में ही व्यय नहीं होती प्रत्युत वह भविष्य के लिए, बच्चों की शिक्षा, विवाह, बुढ़ापे के लिए धन एकत्रित रखता है. अपनी परिस्थिति के अनुसार कुछ न कुछ अवश्य बचाता है.
जब आप अपनी कमाई घर लाते हैं, तो पहले से तय कर लीजिए कि किस चीज़ के लिए आप कितना पैसा खर्च करेंगे और उसके हिसाब से पैसे को अलग-अलग हिस्सों में बाँट दीजिए, ताकि आपकी आज की और भविष्य की ज़रूरतें पूरी हो सकें। जब आप तय हिसाब से पैसे खर्च करते हैं तो आप देख पाते हैं कि पैसा किन चीज़ों में खर्च हो रहा है और कितना पैसा गैर-ज़रूरी चीज़ों में जा रहा है। इससे आपको यह पता करने में मदद मिलेगी कि आप कहाँ बचत कर सकते हैं।
आप यह उद्देश्य सामने रखिये कि परिवार के प्रत्येक सदस्य को जीवनरक्षक पदार्थ और निपुणता दायक वस्तुएँ पर्याप्त परिणाम में प्राप्त होती रहें. जब तक ये चीजें न आ जावें, तब तक किसी प्रकार की आराम या विलासिता की वस्तुओं से बचे रहिये. यदि किसी का स्वास्थ्य खराब है, तो पहले उसकी चिकित्सा होनी चाहिए. यदि किसी विद्यार्थी का अध्ययन चल रहा है, तो उसके लिए सभी को थोड़ा बहुत त्याग करना चाहिए.
आप अपनी बचत से कितना खर्च करते है यह Important नहीं होता बल्कि आप अपने खर्चो में से कितनी बचत करते है यह ज्यादा important है. इसलिए बचत करने के सिद्धांत को समझे और बचत को हल्के में न ले. बचत का पैसा वह पैसा होता है जो आपके इमरजेंसी में आपका साथ निभाता है और आपको कई समस्याओ से बचाता है.
ऐसी जगहों से सामान खरीदिए जहाँ वे सस्ते मिलते हैं,

मगर ध्यान रखिए कि जितनी बचत होगी उससे ज़्यादा खर्चा आने-जाने में न हो जाए.

खरीदने से पहले सोचिए

खुद से ये सवाल पूछने की आदत डालिए: ‘क्या मुझे सचमुच इसकी ज़रूरत है? क्या पुराना सामान वाकई खराब हो गया है या मैं बस नयी चीज़ चाहता हूँ?’ अगर आप किसी चीज़ को बहुत कम इस्तेमाल करेंगे तो क्या उसे किराए पर लेना काफी होगा? या फिर अगर आपको लगता है कि आपको उसकी अकसर ज़रूरत पड़ेगी तो क्या पुराने (सेकंड हैंड) सामान से आपका काम चल सकता है?

दरअसल बात यह है कि अगर आप छोटी-छोटी चीज़ों में बचत करने की आदत डालें, तो आप बड़े-बड़े खर्चों में भी बचत करने की सोचेंगे।

कितना गुस्सा आता है, जब वास्तव में पैसों की ज़रूरत हो लेकिन बटुआ ख़ाली मिले. इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आपके पास कितने ज्यादा या कितने कम पैसे हैं, बल्कि उन पैसों को समझदारी के साथ खर्च करना ही एक अच्छा उपाय है जिससे आप बहुत से पैसे बचा भी सकते हैं.
अगर सही जांच ना की जाए तो फालतू खर्च करना एक आदत बन जाता है. अपने खर्चों को नियंत्रित करने के लिए आप चुनें कि आपको किन चीजों की जरूरत है और किन चीजों की चाहत है. इसमें अंतर रखें और अपने बजट के मुताबिक अच्छी तरह खर्च करें.
“जो इंसान अपनी कमाई और खर्च को बेहतर तरीके से संभाल ले और हिसाब से फैंसले ले_ तो वह खेल जीत ही जाता है”

_ अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए किसी तरह के लोन पर निर्भर न रहें..!
_हम ऐसी चीजें खरीदते हैं ..जिनकी हमें जरूरत नहीं है लेकिन हम जीवन में चाहते हैं !
_ हम ऐसी चीजें इसलिए खरीदते हैं ..क्योंकि उससे हमारा भावनात्मक जुड़ाव होता है.
_ कुछ भी खरीदना एक भावनात्मक निर्णय है, तार्किक निर्णय नहीं !!
पुरानी और नई पीढ़ी की सोच में ये बड़ा अंतर है.

_ हम बचत पर जोर देते हैं और वे खर्च पर..
_ हम कर्ज लेने से डरते हैं और वे क्रेडिट कार्ड सबसे पहले बनवाते हैं.
_ हम बुढ़ापे में घर और वाहन ले पाते थे..
_ और वे जॉब लगते ही बैंक लोन लेकर घर और कार खरीदना चाहते हैं.
हर बीस वर्ष के बाद cost of living, ten times बढ़ जाती है.

_ यह एक चुनौती होती है, हर वक़्त आय के स्रोत को उस स्तर पर बनाए रखना,
_ जिस स्तर पर हम जीवन जीते हैं, इसके अतिरिक्त बीमारियों का ख़र्च, सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वाह.
_ मैं यह सुझाव दूंगा कि कुछ इसकी भी तैयारी पहले से ही करते हुए चलें..
_ जैसे :- घर अपना हो, कुछ मासिक आमदनी आती रहे इसकी व्यवस्था हो, सिर पर कोई क़र्ज़ न हो, इमरजेंसी फण्ड हो, हेल्थ इन्स्योरेन्स हो.!!
The cost of living increases ten times after every twenty years.
It is a challenge, at all times to maintain the source of income at that level, the level at which we live, in addition to the cost of diseases, social responsibility.
I would suggest that some should go on preparing for it in advance..
For example:- The house should be its own, some monthly income should be maintained, there should be no debt on the head, there should be emergency fund, there should be health insurance.!!
सदा अपनी आमदनी पर दृष्टि रखिये, आमदनी से अधिक व्यय करना नितान्त मूर्खता और दिवालियापन की निशानी है.
उतना ही खर्चा करें, जितना आप में सामर्थ्य हो. दिखावे के चक्कर में या किसी होड़ में न पड़ें, यह न तो आपकी आर्थिक सेहत के लिए अच्छा है और न ही आपकी मानसिक सेहत के लिए,

क्रेडिट कार्ड या पर्सनल लोन लेकर केवल दिखावे के लिए खर्चा करना बेवकूफी है.

उधार एक ऐसी बला है, जो मनुष्य की सब शक्तियों को क्षीण कर डालती है. उसे सबके सामने नीचा देखना पड़ता है, हाथ तंग रहता है. इसलिए निश्चय करना चाहिए कि कभी कोई चीज या रुपया उधार नहीं लेंगे.
आमदनी और खर्च के ऊपर तीखी दृष्टि रखिये. व्यय से पूर्व आमदनी खर्च का एक चिट्ठा-बजट-तैयार कर लीजिये. जो बुद्धिमान व्यक्ति अपने रुपये से अधिकतम लाभ और उपयोगिता प्राप्त करना चाहता है, कर्ज से बच कर सज्जन नागरिक का प्रतिष्ठित जीवन व्यतीत करना चाहता है, उसे बजट बनाना आवश्यक है. बजट हमें फिजूलखर्ची से सावधान करता है. सब व्यय तथा आमदनी नक्शे की तरह हमारे समाने रहती है. टिकाऊ वस्तुओं पर खर्च होता है, विलासिता से मुक्ति होती है.
बजट कैसे बनाएँ

(1) महीने के ज़रूरी खर्चों को लिख लीजिए। एक महीने में खाने, मकान (किराया या किश्‍त), बिजली, पानी, गैस, गाड़ी और ऐसी ही दूसरी ज़रूरी चीज़ों पर कितना खर्चा होता है, उसका पूरा हिसाब रखिए। जो पैसे आपको साल में एक बार चुकाने पड़ते हैं, उन्हें 12 से भाग कीजिए ताकि यह पता चले कि हर महीने उनके लिए कितना पैसा अलग रखना चाहिए।

(2) खर्च को अलग-अलग वर्गों में बाँटिए। जैसे कि खाने, घर, गाड़ी, आने-जाने और बाकी चीज़ों का खर्च।

(3) देखिए कि आपकी जमा-पूँजी में से हर महीने, हर वर्ग में कितने पैसे खर्च होंगे। “हिसाब” लगाइए कि जिन बिलों का भुगतान साल में एक बार किया जाता है, उनके लिए आपको हर महीने कितने पैसे अलग रखने चाहिए।

(4) घर के सभी सदस्यों की कुल आमदनी लिख लीजिए। उसमें से टैक्स वगैरह के पैसे घटा दीजिए, फिर उसकी तुलना कुल खर्च से कीजिए।

(5) एक महीने में हर वर्ग में कितना खर्चा होगा उसके पैसे अलग रखिए। अगर आप नकद रुपए इस्तेमाल करते हैं, तो एक आसान तरीका है कि आप हर वर्ग के लिए एक अलग लिफाफा बनाएँ। फिर समय-समय पर लिफाफे में तय खर्च के हिसाब से पैसे रख दीजिए।

सावधानी: अगर आप क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं, तो इसके इस्तेमाल में एहतियात बरतिए! कई लोगों का बजट गड़बड़ा जाता है, क्योंकि उनके सामने ‘अभी खरीदो, बाद में चुकाओ’ का लालच रहता है।

मैं प्रमाणित कर सकता हूं कि हममें से अधिकांश लोग जितना सोचते हैं _उससे अधिक पैसा अनावश्यक खरीदारी पर बर्बाद करते हैं..!!

कोई भी खरीदारी मनमाने ढंग से न करें,_कई लोगों के लिए, खरीदारी महज़ एक आदत है – _ और आदत हमेशा _असावधानी पर हावी हो जाती है.

_ और बचत करना सीखना _ कोई बलिदान नहीं है, _यह हमारे लिए एक उपहार है.
हम 80% समय अपने 20% कपड़े पहनते हैं, यह स्पष्ट है कि हम बहुत कम कपड़ों में काम चला सकते हैं..
_ हमेशा बदलते फैशन के साथ बने रहना कीमत के लायक नहीं है.
__ अक्सर, हम ऐसी चीजों के लिए भुगतान कर रहे हैं _जिनका हम शायद ही कभी उपयोग करते हैं.
पैसा बचाने का उद्देश्य _ इसके लिए जीवन का बलिदान देना नहीं है, बल्कि इसके कारण स्वतंत्रता प्राप्त करना है.
इन खर्चों को अपने जीवन से हटाकर, हम न केवल पैसे बचाते हैं, हम तनाव भी दूर करते हैं, और अधिक आनंद पाते हैं ;
_ और क्या वास्तव में जीवन इसी बारे में नहीं है ?
हमारे पास कपड़ों की इतनी अलग-अलग वस्तुएं और हमारी ज़रूरत से कहीं ज़्यादा चीज़ें क्यों हैं ?

_ क्या ऐसा इसलिए है _क्योंकि हम उन सभी से प्यार करते हैं _ या हमें इतनी सारी शर्ट या जूते की ज़रूरत है ?
_ नहीं, हम उन्हें खरीदते हैं _क्योंकि हम बदलते फैशन के साथ बने रहने की कोशिश कर रहे हैं,
– वही बदलती शैलियाँ जिनके बारे में फैशन उद्योग ने हमें बताया था कि _हमें स्टाइल में बने रहने की जरूरत है.
_ हर बार, हम अपने आप को उस चीज़ की चाहत में पाते हैं _जो वर्तमान में हमारे पास नहीं है ;
_ हम उस पर केंद्रित हो जाते हैं जो हमारे पास नहीं है, और जो अच्छाई हम में पहले से ही है, __ उस पर से अपना ध्यान खो देते हैं.
_ यदि, मनुष्य के रूप में, हम मानते हैं कि केवल कुछ नया प्राप्त करके उच्च स्तर की खुशी पाई जा सकती है, तो हम हमेशा निराश होंगे.
_ हमारी आंतरिक आवाज़ इस तरह कभी संतुष्ट नहीं होगी.
_ कोई भी चीज़ कभी भी पर्याप्त अच्छी नहीं होती…. क्योंकि हमारे अंदर लगातार असंतोष भड़कता रहता है.
_ इस प्रकार आंतरिक और बाह्य दोनों ही दृष्टियों से हमारे हृदय, मन और आत्मा में निरन्तर असन्तोष भड़कता रहता है।
_ इस असंतोष के परिणामस्वरूप क्या होता है कि _ हम जल्दी ही अपने आस-पास की और अपनी अच्छाइयों को नज़रअंदाज कर देते हैं.
क्यूँ जीते हो आप ऐसी ज़िन्दगी, जिस से हो जाये लोन- क़र्ज़.!

_ जितनी कमाई उतना खर्च, ये हुनर सीख लो ना..,
_ लेकर लोन, अन्जाने में घोट रहा, अपना गला तो नहीं..,
_ बेवजह दुनियाँ को दिखाने के लिए, क्यूँ जरूरतें बढाता है..,
_ जितना कुछ है तेरे पास, क्यूँ उसी में खुश नहीं रह पाता है..,
_ क्यूँ जरूरतें हो जाती है, जिन्दगी पर फिर सवार॥
_ अगर नहीं है सब्जी तेरे घर में, तो नमक से रोटी खा ले..,
_ अगर जरूरतें पूरी करनी है तुझे, तो मेहनत कर कर कमा ले..,
_ क्यूँ जीते हो आप ऐसी ज़िन्दगी, जिस से हो जाये लोन- क़र्ज़..!!
मैं तो हर किसी समारोह में नहीं जाता,

_ क्योंकि अगर जाऊं तो ..उस खर्च को जोड़ें तो..
_ सबसे पहले अपने काम से छुट्टी लेनी पड़ेगी ..जिस पर पैसा कटेगा,
_ यात्रा के टिकट का पैसा लगेगा, अपने घर से रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट व वहां से समारोह वेन्यू तक का भाड़ा,
_ लौटने पर यही खर्च और रास्ते में खाना पीना अलग,
_ घर में जिसको छोड़ कर जाएं ..तो उसकी देखभाल के लिए किसी को छोड़ना होगा.
_ जिसके लिए शायद पैसा भी खर्च करना पड़े.
_ दो दिन में पहनने को चार जोड़ी कपड़े चाहिए ..जो शायद नये लेना पड़ें,
_ वहां देने के लिए कोई सौजन्य भेंट खरीदनी होगी, ना ना करते 8 से 10 हजार रूपया,
_ जो पति-पत्नी दोनों जा रहे हैं ..उनका खर्च दुगना हो जाएगा..
_ कहीं ऐसा ना हो कि भावनाओं से जुड़ कर खर्च करके..
_ चादर से ज्यादा पैर पसारने की कीमत ..अगले साल भर तक जरूरी खर्चों में कटौती करके करते रहें..!!
ये पांच नियम खर्च-बचत के फॉलो करें : –

1. पहले बचत फिर खर्च करें, – थोड़ी बचत भी बहोत होती है !
2. पहले चर्चा फिर खर्चा – घर में आपस में सलाह करें की इस खर्च की जरुरत है भी या नहीं !
3. खुद के पैसे गिनो दुनिया की मत सुनो – दुनिया सलाह देती है कि ये खरीद लो वो खरीद लो !
4. लिख कर बजट बनाना और निभाना – कहीं से भी लोन नहीं लेना !
5. कार्ड से नहीं नकद खर्च करें !!
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“यह सब लिखो ! यदि आप सोच रहे हैं कि आपका पैसा हर हफ्ते या महीने कहां जाता है, तो अपने खर्च पर नज़र रखना महत्वपूर्ण है ;_
_ हर महीने की शुरुआत में एक ही जगह पर अपने खर्चों, बचत, और ‘पैसे खर्च’ का नक्शा तैयार करें.; महीने के अंत में, अपने खर्च की समीक्षा करें और उसी अनुसार प्लानिंग करें !!
“अपना बजट बनाते समय, यह महत्वपूर्ण है कि आप ज़रूरतों और इच्छाओं के बीच के अंतर को जानें ;_ जरूरतें ऐसी चीजें हैं जो आपको जीवन जीने के लिए बिल्कुल जरूरी हैं !!
ये भोजन, पानी, घर, परिवहन, उपयोगिताओं आदि जैसी चीजें हैं ‘ जैसे बाहर खाना, खरीदारी, जिम की सदस्यता, छुट्टियां, केबल, आदि !!
“सेल का लाभ उठाने में कुछ भी गलत नहीं है – लेकिन अगर आपको ज़रूरत नहीं है तो पैसा खर्च न करना ही बेहतर है !”
“आपको जो चाहिए _वह खरीदें, न कि वह _जिसका आप लालच करते हैं.”
_ कंपनियों द्वारा चालाकी से खरीदारी करने के लिए बनाया हुआ जाल है,
_ जो हमें हमारी मेहनत की कमाई से अलग करने के लिए डिज़ाइन किया गया है.!!
“–इस तरह से बजट बनाएं और आपको कभी भी पैसों की समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा”
जरूरतों पर 50%, इच्छाओं पर 20%, बचत के लिए 30% –“

सुविचार – जीवनसाथी – 034

ज़िंदगी में ऐसा कभी-कभी हो जाता है.. जब हम कुछ रिश्तों में गलतफहमी के शिकार हो जाते हैं.

_ कई बार कोई झूठ हमारी ज़िंदगी में इस कदर सच बन कर समाहित हो जाता है कि हम सच का चेहरा ही नहीं देख पाते.
_ हम मन ही मन अपनी ही गलतफहमी की आग में झुलस कर रह जाते हैं.
_ हम कई बार मान लेते हैं कि सामने वाला आदमी ऐसा होगा, उसने ऐसा किया होगा और हम उसी आधार पर अपने रिश्तों की कड़ियों को तौलते चले जाते हैं.
_ गलतफहमी किसी भी रिश्ते में हो सकती है.
_ लेकिन यह गलतफहमी अगर जीवन साथी के साथ रिश्तों में हो, तो ज़िंदगी दुखों से भर जाती है.
– Sanjay Sinha
आप का जीवन साथी, आपके जीवन में हर चीज को प्रभावित करता है ; _ आपका मानसिक स्वास्थ्य, आपके मन की शांति, आपकी खुशी, आपकी सफलता, आप त्रासदियों से कैसे बाहर निकलते हैं और भी बहुत कुछ..!
जीवन में हर चीज़ मेहनत से हासिल की जा सकती है, पर एक सच्चा और समझदार जीवनसाथी मिलना किस्मत की बात होती है.

_ अगर आपको ऐसा साथी मिला है, तो उसे सिर्फ अपना मानकर नहीं, बल्कि उसकी भावनाओं, उसके भरोसे और उसके साथ को सहेजकर रखना चाहिए,
_ क्योंकि ऐसे रिश्ते बार-बार नहीं मिलते.!!
दुनिया में सबसे बड़ा कोई क़ैदख़ाना है तो वह है बिना सुकून का घर.!

_ इसलिए अपना जीवनसाथी चुनते वक्त.. उसकी ख़ूबसूरती से ज़्यादा वो इंसान कैसा है इस पर ध्यान देना.!!
जीवनसाथी वही होता है,

_जो अपने साथी के जीवन को जीवंत बनाता है.

जीवन साथी ऐसा चुनो कि जो प्रेरणा दे,

_ ना कि चिंता, दबाव और तनाव दे !!

अपना जीवनसाथी बहुत सोच समझ कर चुनना.. क्योंकि सुकून के बिना घर का होना..

_इससे बड़ा दुनिया में कोई दूसरा क़ैदख़ाना नहीं है.

जिंदगी आसान हो जाती है ; जब जीवनसाथी समझदार होने के साथ- साथ ;

समझने वाला भी मिल जाता है.

_ हमसफ़र विनम्र चुनो, ज़िन्दगी ख़ूबसूरत बन जाएगी.!!

जीवन साथी अच्छा या बुरा नहीं होता, वह सिर्फ साथी होता है.

_ आपने कैसा निभाया- वह अच्छा या बुरा होता है.

जीवन साथी की मौजूदगी को महसूस कर उसके रहते जीवन में उसको समझने की जिम्मेदारी निभाईये..

_ याद रखिए उन बिछड़े हुए रिश्तों को.. वो रिश्ते नहीं.. आपके शरीर के हिस्से होते थे.!!

चाहे कितना भी मजाक बना लो, जीवन साथी पर ; लेकिन एक बात याद रखना,

जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर दुनिया साथ नहीं देगी, आपका हमसफर ही काम आएगा…

जीवन साथी ऐसा होना चाहिए जो आपके जीवन में मूल्य जोड़ता है ; _ जो आपको बढ़ने में मदद करे.
जीवनसाथी वक्त को बदलने वाला होना चाहिए, _ वक्त के साथ बदलने वाला नहीं..
जब हम किसी को बस यूं ही उसकी ऊपरी खूबियों से चाहने लगते हैं तो ..कोई ज़रूरी नहीं कि.. वो जीवन साथी के रूप में भी वैसा ही हो..!!
जीवनसाथी के चुनाव में जल्दबाजी ना करें, अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखें ;

लड़कियां यहां ध्यान दें, पहले खुद के लिए कुछ करें ;

दूसरे के घर रोटी बेलने और बर्तन धोने से बेहतर है कि

जिसने आपको पढ़ाया – लिखाया, पालन – पोषण किया,

नाज – नखरे उठाकर परवरिश दी, उनके लिए कुछ करें ..

कोई स्त्री सर्वगुणसम्पन्न नहीं होती।

1 यदि मैं एक सीधी-सादी स्त्री का चुनाव करता हूँ तो मुझे यह मानना पड़ेगा कि वह मुझ पर निर्भर रहेगी।
2 यदि मैं खूबसूरत लड़की चुनता हूँ तो मेरे खर्चे भी बढ़ेंगे |
3 यदि मैं एक कामकाजी स्त्री को प्राथमिकता देता हूँ तो यह भी तय है कि घर के सारे काम वह नहीं कर पाएगी।
4 यदि वह गृहिणी होगी तो स्वाभाविक है कि वह धनार्जन नहीं करेगी ।
5 यदि मैं महान स्त्री चुनता हूँ तो उसकी दृढ़ता और कठोरता के साथ भी मुझे निर्वाह करना होगा।
6 यदि मैं वीर स्त्री का चुनाव करता हूँ तो यह मानना पड़ेगा कि उसके अपने भी कुछ विचार होंगे। एक स्त्री की कुछ अच्छी विशेषताएं जाहिर करतीं हैं कि वह कौन है और उसे क्या सबसे हटकर मौलिक बनाता है।
अनुवादक : किसी ने सही कहा है कि “सर्वगुणसम्पन्न स्त्री एक ही nation में मिलती .., …वह है imagination.😃
वास्तव में “कभी किसी को मुकम्मल जीवनसाथी नहीं मिलता, दोनों एक दूसरे की कमियों को अपनी खूबियों से पूरा करके मुकम्मल बनते हैं।”
यह बात उम्र बढ़ने के साथ जिनको समझ में नहीं आती, वे सारी जिन्दगी एक दूसरे से उलझते रहते हैं।

सुविचार – नारी – स्त्री – महिला – औरत – 033

किसी दिन ऐसी लड़कियां और महिलाएं होंगी जिनके नाम का मतलब केवल पुरुष के विपरीत नहीं होगा,

_ बल्कि अपने आप में कुछ ऐसा होगा, जो किसी पूरक और सीमा के बारे में नहीं, बल्कि केवल जीवन और वास्तविकता के बारे में सोचता है: “महिला इंसान” ~ Rainer Maria Rilke

एक स्त्री जो अपने लिए कुछ नहीं मांगती, वह सब कुछ पाने की हकदार है.
समर्थ स्त्री ‘वो’ के ज़िक्र में अपना वक्त बरबाद नहीं करती.!!
स्त्री अपने जीवन का निर्णय खुद से करे, ये तभी संभव है जब वो आर्थिक रूप से सक्षम हो..- खुद की कमाई से एक खुद का घर ख़रीदे, खुद का घर यानी एक श्रेष्ठ ज़िन्दगी.!!

_तुम एक दिन अपना घर ज़रूर बनाना, फ़िर कोई कह नहीं पाएगा.. यहां से निकल जा.!!

ये दुनिया चतुर-चालाकों-ठगों-धूर्तों से और चालबाजों भरी पड़ी है,

_इसलिए लड़की और महिला को भी आत्मनिर्भर होना जरुरी है..!!

कुटिलता को लिंग आधारित नहीं किया जा सकता, स्त्री को भी सामान्य इंसान माना जाना चाहिए

_ जिस दिन उन्हें स्त्री नहीं इंसान मात्र मानकर वही पॉवर, वही माहौल, वही समाज मिलेगा ..जो पुरुषों को मिला हुआ है..
_ तो वह भी वीरता/कायरता..प्रेम/घृणा…क्रूरता/संवेदनशीलता ..बुद्धिमत्ता/मूर्खता सबमें पुरुषों जैसी ही होंगी, उनसे अलग नहीं..
_ उन्हें मनुष्य मात्र समझो तो उनके किसी भी कदम पर हैरानी नहीं होगी.!!
कोई भी लड़की ये नही चाहेगी की बड़ी होकर वो लोगो के झूठे बर्तन धोए सारी उम्र और किचन में लगी रहे दिन रात.. _ ऐसा बोरिंग जीवन कोई क्यों चुनेगा ,भविष्य का ??

जो काम मा करती है सारी उम्र ,वो एक कूक भी कर सकता है, _ न जाने कितनी पढ़ी लिखी ओरतो का जीवन किचन में ही घिस जाता है.
_अन्याय होता है उन स्त्रयों के साथ जो इतनी तपस्या करके पढ़ाई करती है ओर फिर विवाह के बाद दोयम दर्जे की रह जाती है.
_ पूरी संभावना तो यही है कि वो पुरुष से ज्यादा कमा सकती है.
_ पितृसत्ता बचपन से ही मासूम ह्रदय में बैठा दी जाती है कि पैसे सिर्फ पुरूष कमाएगा और ओरत सिर्फ घर की चार दिवारी में सीमित है ,त्याग की मूर्ति है ,संस्कार ,इज्जत है घर की और पुरुष आजीवन आवारा बैल !
बाप वहां तो रोटी बना सकता है जहां पैसे मिले ; बड़े बड़े होटल में कुक बन जाएगा, पर घर पर अनपेड रोटी नही बनाएगा.
ये दोहरी मानसिकता तभी बदलेगी जब बच्चो का बचपन मे ब्रेनवाश करना बंद होगा.
ऐसी कविता ,कहानी बन्द होनी चाहिए, जो लिंग के आधार पर कार्यों का बंटवारा करे !
कार्य का निर्धारण क्षमता और योग्यता पर होना चाहिए, न कि स्त्री और पुरुष देखकर !!
आदमी औरत को नहीं छोड़ता क्योंकि उसे घर संभालने वाली, रोटी बनाने वाली चाहिए.
_ औरत अब अपमानित होने की बजाय आदमी को छोड़ना बेहतर समझती है,
_ क्योंकि अब उसे पैसा कमाना आ गया है.
_ अब वो अपमान क्यों बर्दाश्त करे ?
_ इज़्ज़त से साथ रहना है तो रह, वरना चलता बन._साफ़ कहना, सुखी रहना..!!
एक दिन ज़रूर महिलाएं रोने धोने,गंडा ताबीज धागा मन्नत की जगह पति को छोड़ देंगी.
_ अपने मज़बूत निर्णय लेंगी, आत्मनिर्भर बनेंगी, संघर्ष करेंगी..
_ मगर दो रोटी, एक छत, दो वस्त्रों के लिए पति का ज़ुल्म ग़ैरबराबरी बेवफाई हिंसा गाली बर्दाश्त नहीं करेंगी.
एक बुद्धिमान [intelligent], बौद्धिक [intellectual] महिला प्यार में नहीं डूबती.
_ उसकी प्राथमिकता उसकी महत्वाकांक्षाएं हैं, पुरुष नहीं.
हर स्त्री का हाथ हवा में तना हुआ होना चाहिए… चाहे खेल हो या कोई क्षेत्र . बाँहें खोलो और आकाश भर लो ….
_ उठो लड़कियों उठो… फैल जाओ दसो दिशाओं में. ज़मीन अपनी है… डटी रहो और आकाश फ़तह कर लो..!!
गुलामी ऐसी ही होती है. इससे निकलने का साहस तभी आ सकता है ..जब महिलाये अपने पैरों पर खड़ी हों और अपने विचारों में सुदृढ़ हों.
जो समझदार पुरुष होते हैं, वह अपनी माँ, बहन, बेटी और पत्नी को आज़ादी देने के साथ उन्हें मजबूत और सशक्त बनाने की दिशा में कार्य करते हैं,
_ ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर वह किसी के आगे भीख न मांगे, अपने दम पर वह अपने जीवन को जी सके, अपनी सुरक्षा स्वयं कर सके.!!
“सिर्फ सौन्दर्य के लिए इतनी जागरूकता..”

_लड़कियों- महिलाओं की दूसरी कई योग्यता को कम कर रही है..!!
_ वे चेहरे पर इतना मोटा मोटा मेकअप थोप कर सेल्फी डालने के चक्कर में क्यों रहती हैं.
_ कितना ही अच्छा हो कि वह अपने स्किल को संवारने पर समय लगाएं.!!
महिलाओं की आधी सी ज्यादा बीमारी का कारण “उनकी अधूरी नींद है”,

_ यदि वो अपनी नींद की खुराक को पूरा कर ले तो वो बिल्कुल स्वस्थ रहेंगी,
_ पर उनके जीवन में सुकून की नींद गायब सी होती है, क्योंकि उनके लिए घर के काम हद से ज्यादा होते हैं, जिससे वो ख़ुद को मानसिक रूप से रिलैक्स नहीं कर पाती.!!
मायका साथ न दे तो कोई बेचारी नही होती.

पति तलाक दे तो व्यक्तित्व में कोई कमी नही होती.
सब साथ छोड़ दे, तो भी अनाथ नही होती स्त्री.
खुद कमाओ, खुद की शक्तियों को जगाओ, अपने अस्तित्व को चुनोती दो और शेरनी की तरह दहाड़ो..
ये घिसे पिटे डायलॉग बाजी बन्द हो जानी चाहिए अब, जबकि आज इतने अवसर है खुद के पैरों पर खड़े होने के.!!
अपनी कमजोरी और आलस को अपने दिन-हीन होकर sympathy मत बटोरो.
समाज को और सिस्टम को अक्सर कमजोर लोग कोसते रहते हैं.
बहादुर तो अक्सर सिस्टम को चुनोती देकर उसे बदलने का साहस दिखाते है.
मुझे पर्सनली बहुत बकवास लगती है किसी हारे हुए व्यक्ति की पोस्ट !!
मैं चुनोती दे सकता हूं, अकेले होकर भी तुम बहोत कुछ कर सकती हो ; बस शर्त की ईमानदार हो अपनी इच्छा के प्रति..!
जो स्वतन्त्रता मांगकर ली जाए, उसका मूल्य ही कितना होगा ?
“स्वतन्त्र होना हर व्यक्ति का जन्म सिद्ध अधिकार है.”
मजबूर नही हो तुम सब कुछ सहने को, बस स्वयम की खुशियों और आजादी को लेकर ईमानदार नहीं हो.
नदियों में और स्त्रियों में इतनी समानता देखी है ;

_ पत्थर किसी के भी जीवन में हों __ साथ देना उनका… कभी नहीं छोड़ती..

कमाई कितनी भी बड़ी हो,
_ फिर भी घर की नींव, घर की औरत के अच्छे बर्ताव से ही मजबूत होती है.
“माहौल के हिसाब से ख़ुद को ढाल लेने की जैसी खूबी महिलाओं में होती है..
..वो पुरुष को हासिल नहीं है.”
मैं नारी… हर वक्त अपने रिश्तों के लिए झुक जाती हुं,

गलती हो हमारी या न… हो _ बस सभी को मनाने के लिए झुक… जाती हुं..

चिड़ियां होती हैं लड़कियां _इनके पर नहीं होते..

_ ससुराल होते हैं ..मायके होते हैं ..घर नहीं होते..!!

मायका केवल मौसम नहीं होता स्त्री के लिए..
“वह एक पुल होता है”
_ बचपन से बुढ़ापे तक के सारे अधूरे रिश्तों को जोड़ने वाला.!!
” नारी के बिना घर बिना मवेशियों के खलिहान के समान है “
एक शब्द हैं… पितृसत्ता… इसका अर्थ कतई वह नहीं जिस अर्थ में इसे प्रयुक्त किया जाता है.

_ पितृसत्ता स्त्री पर ज़ुल्म ढा रही है, स्त्री पितृसत्ता का दंश भोग रही है, पितृसत्ता के कारण स्त्री गुलाम है,
_ पितृसत्ता अपनी हुकूमत, संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण स्त्री को उसके अधिकारों से वंचित किए है, आदि आदि..
_ पितृसत्ता यानी पिता की सत्ता, पिता का वर्चस्व, पिता द्वारा प्रदत्त संरक्षण, पिता के साये में सुरक्षित रहते हम…
_ हममें से कितने लोग हैं जो यह चाहेंगे कि हमारे पिता की सत्ता खत्म हो जाए ?
_ कोई नहीं..
_ इसलिए मेरा सोचना है कि हम पितृसत्ता शब्द का गलत प्रयोग करते हैं.
_ जिस नफ़रत ने पितृसत्ता शब्द को गढ़ा है, उसका प्रयोजन पितृसत्ता से न होकर पुरुषसत्ता से है,
_ अतः शब्द के गलत प्रयोग से बचा जाए और सही शब्द पुरुषसत्ता का प्रयोग प्रचलन में लाया जाए.
क्या कभी आपने अपने घर की औरतों से सुबह शाम सलाम दुआ की है, क्या आपने कभी उनसे पूछा है कि कैसी हो आप.

_ वे हम लोगों की परवाह में अपनी आंखों, दिल गुर्दा सब घिस देती हैं..

_ क्या कभी आपने अपने घर की औरत से पूछा है कि वो परेशान तो नहीं, अगर परेशान हैं तो क्यों हैं.

_ अरे प्यारे प्यारे भाईयो, दोस्तों और शुभचिंतकों आप सब हमारी चिंता में अपने दिल और दिमाग पर बोझ ना डालें.

_ आजकर वैसे भी दिल का कोई भरोसा है नहीं कि कब रुक जाए.

_ तो ऐसे में मेहरबान, कदरदान, साहिबाना, पानदान अपने घर की औरतों पर ध्यान दें,

_ उनकी परवाह करें और खुद खुश रहेंगे और वो भी खुश रहेंगी..!!

नारी, तुम किसी से कम नहीं हो,

ईश्वर की किसी अद्भुत रचना से कम नहीं हो।
अलग अलग किरदारों को जी पाना,
हर किसी के बस का खेल नहीं है।
समय की जरूरत के अनुसार,
हर माहौल, हर परिस्थिति में ढल जाना,
तुम्हारी इस खूबी का कोई मेल नहीं है।
कभी बहन, कभी भाभी, कभी अर्धांगिनी, कभी मां,
नारी के हर रूप को इतनी बखूबी निभाना,
किसी करिश्माई चमत्कार से कम नहीं है।
हमारे अंतर्मन का आधार, घर की जान हो तुम ,
श्रद्धा हो, आदर्श हो, हमारा सम्मान हो तुम,
हर बुरे वक्त को तुमने बखूबी झेला है,
परिवार की हर बड़ी मुसीबत को पीछे धकेला है।
हर मुश्किल का समाधान हो तुम,
चट्टान हो तुम, हमारा सत सत प्रणाम हो तुम ।।
।। पीके ।।
स्त्री, माननीय है :-

जब वो मांग में सिंदूर आते ही लड़की से औरत बन जाती है।
जब वो शादी के तुरंत बाद दीदी से आंटी बन जाती है जबकि उसका पति दो बच्चों के बाद भी भैया ही बना रहता है
जब शादी की अगली सुबह बेटे को आराम करने दिया जाता है और उसे रसोई में प्रवेश मिल जाता है ;
सबकी पसंद का खाना बना के खिलाओ, अपनी पसंद का कोई पूछेने वाला नही.
जब उसकी हर ग़लती भी उसकी और उसके पति की हर ग़लती भी उसी की ग़लती कहलाती है.
जब उसका शादी से बाहर का आकर्षण उसको धोखे बाज़ बना देता है और उसके पति का आकर्षण उसके प्यार की कमी कहलाता है.
जब मायके आने के लिए किसी की इजाजत जरूरी हो जाती है.
जब मायके की यादों की उदासी को उसके काम ना करने का बहाना करार दिया जाता है.
जब जरूरत पड़ने पर ना वो पति से पैसे मांग पाती है और ना ही पिता से.
जब उसकी माँ उसे समझौता करने को कहती रहती है और अपनी सफल शादी की दुहाई देती रहती है.
जब ऑफिस से थक कर आने के बाद कोई पानी तक नहीं पूछता है.
जब रात को पति के बाद सोती है और सुबह पति से पहले उठती है.
जब अपने सपने/ख्वाहिशें भूल जाती है और कोई पुरानी सहेली उसको याद दिलाती है.
शादी सभी के लिए उतनी मीठी नहीं होती जितनी नज़र आती है, महिलाओं के लिए आज भी जीवन मुश्किल है.
वो जो महिला को आप रोज़ देखते है और उससे उसकी आँखों के नीचे काले घेरे होने का कारण पूछते है, मत पूछिए, _ वो कभी नहीं बताएगी और अगर बताती भी है तो आप कभी नहीं समझेंगे.
अरे भई ! जिसे उसकी माँ ने नहीं समझा, आप क्या खाक समझेंगे ?
और भी जाने क्या-क्या बकवास दलीलों के रूप में सुनने को मिलती है.
महिलाओं के शांत चेहरों और फूल से हँसी के पीछे कौन-कौन से तूफ़ान गुज़र रहे होते है, आप कभी नहीं समझोगे। स्त्री को समझने के लिए सात जन्म कम पड़ जायेंगे.
एक दिन स्त्री की जगह लेकर तो देखो दिन में तारे नज़र आयेंगे.
समस्त स्त्री जाति को समर्पित
काम करने वाली महिला को चुनते समय आपको यह स्वीकार करना होगा कि वह घर नहीं संभाल सकती.

_ यदि आपने एक गृहिणी को चुना है, जो आपकी देखभाल कर सकती है और आपके घर का पूरा प्रबंधन कर सकती है,
तो आपको यह स्वीकार करना होगा कि वह पैसा नहीं कमा रही.
_ यदि आप एक आज्ञाकारी महिला चुनते हैं, तो आपको यह स्वीकार करना चाहिए कि वह आप पर निर्भर है और आपको उसका जीवन सुनिश्चित करना है.
_ यदि आप एक मजबूत महिला के साथ रहने का फैसला करते हैं, तो आपको यह स्वीकार करना होगा कि उसकी अपनी राय है.
_ यदि आप सुंदर स्त्री को चुनते हो तो आपको बड़े खर्चे उठाने पड़ेंगे.
_ यदि आप एक सफल महिला के साथ रहने का फैसला करते हैं, तो आपको यह समझना चाहिए कि उसके पास अपनी अलग जीवन शैली है और उसके अपने लक्ष्य और महत्वाकांक्षाएं हैं.
_ परफेक्ट जैसी कोई चीज नहीं होती, हर किसी की अपनी अपनी ढब होती है, जो उसे अनोखा बनाती है !
_ हर स्त्री परिपूर्ण है… हर बेटी अनोखी…
स्त्री पिता के घर से पति के घर आती है.

_ पति से दुखी होती है तो वापस पिता के घर आ जाती है.
_ पिता का घर और पति का घर, इन दोनों घरों के बीच डगमगाती रहती है,
_ लेकिन यह कोई भी उसका अपना घर नहीं कहलाता.
_ स्त्री अपना घर खुद क्यों नहीं बनाती ?
_ कमाने वाली स्त्रियां अपना मकान खरीद सकती हैं.
_ यह क्या कि कभी पति, कभी पिता के आगे भीख मांगती रहें.
_ आधुनिक स्त्रियों, सोचो.
” महिलाएं तब सशक्त होंगी जब उनके नाम से उनका मकान होगा, उनके नाम की तख्ती (नेमप्लेट) उस मकान पर लगी होगी”
“वो महिलाएं जो अपना वाहन भी खुद चलाती है, वो किसी पर आश्रित नहीं, वो आत्मनिर्भर हैं”
_ आत्मनिर्भरता आखिर पैसे और सुविधा संपन्न संसाधनों से ही आती है.
औरत उस घर में ज़्यादा खुश रहेगी…

_ जिस दिन उसका अपना घर होगा, जो कि उसके नाम पर होगा.
_ वह अपने घर को अपनी मर्ज़ी से सजाएगी
_ एक औरत के लिए उसका अपना घर होना बहुत ज़रूरी है,
_ क्योंकि बाकी जगह वो केवल पराई होती है.!!
*” स्त्रियाँ “*, *कुछ भी बर्बाद* *नही होने देतीं*

*वो सहेजती हैं* *संभालती हैं* *ढकती हैं * *बाँधती हैं*
*उम्मीद के आख़िरी छोर तक*
*कभी तुरपाई कर के*
*कभी टाँका लगा के*
*कभी धूप दिखा के*
*कभी हवा झला के*
*कभी छाँटकर*
*कभी बीनकर*
*कभी तोड़कर*
*कभी जोड़कर*
*देखा होगा ना आपने ?*👱‍♀
*अपने ही घर में उन्हें*
*खाली डब्बे जोड़ते हुए*
*बची थैलियाँ मोड़ते हुए *बची रोटी शाम को खाते हुए*
*दोपहर की थोड़ी सी सब्जी में* *तड़का लगाते हुए*
*दीवारों की सीलन तस्वीरों से छुपाते हुए*
*बचे हुए खाने से अपनी थाली सजाते हुए*
*फ़टे हुए कपड़े हों*
*टूटा हुआ बटन हो*
*पुराना अचार हो*
*सीलन लगे बिस्किट,*
*चाहे पापड़ हों*
*डिब्बे मे पुरानी दाल हो*
*गला हुआ फल हो*
*मुरझाई हुई सब्जी हो*
*या फिर*
*तकलीफ़ देता ” रिश्ता “*
*वो सहेजती हैं*
*संभालती हैं*
*ढकती हैं*
*बाँधती हैं*
*उम्मीद के आख़िरी छोर तक…*
*इसलिए ,*
*आप अहमियत रखिये*👱‍♀!
*वो जिस दिन मुँह मोड़ेंगी*
*आप उसे ढूंढ ही नहीं पाओगे…।*
” *मकान” को “घर” बनाने वाली रिक्तता उनसे पूछो जिन घर मे नारी नहीं वो घर नहीं मकान कहे जाते हैं*
*सभी नारियों को सर्मापित* 💐💐☺️
बहुत सी चीजों के प्रति हम आकर्षित होते हैं – लेकिन हर आकर्षित करने वाली चीज़ को हम अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाना पसंद नहीं करते.

_ पुरुष पर निर्भर रहने वाली स्त्री से अधिक वह स्त्री पुरुष को आकर्षित करती है, जो किसी पुरुष पर आश्रित नहीं होती और अपनी दुनिया का निर्माण खुद करती है.
_ अपनी दुनिया का निर्माण खुद करने वाली स्त्री के पास दिमाग़ के साथ ज़ुबान भी होती है.
_ समर्थ स्त्री के लिए प्रेम उसकी प्राथमिकता नहीं होता. मन, भावना, शरीर-सुख, बस गुज़ारे लायक काफ़ी होता है, सर्वोपरि होती हैं, उसकी महत्वाकांक्षाएं.
_ इसलिए ऐसी स्त्री पुरुष के केवल आकर्षण का केंद्र होती है, वह उसे दूर से लुभाती है.
_ चुनते समय पुरुष उस पर निर्भर रहने वाली स्त्री को ही चुनना पसंद करता है.
_ बहुत समर्थ स्त्री को चुनना ज़्यादातर पुरुषों के बस की बात नहीं.
– Manika Mohini
सुबह की चाय से लेकर रात के भोजन तैयार करने और अलग अलग समय पर आने वालों को भोजन परोसने की तपस्या, वह भी रोज की तपस्या, ओह, कितनी सहनशील थी उस युग की घरेलू महिलाएं…

_ अब भी बहुतेरे घरों में यही स्थिति है.
_ मैंने संयुक्त परिवार में अपनी अम्मा, भाभी और पत्नी की रसोईघर में संलग्नता को अपनी आंखों से देखा है,
_ वे महीनों तक घर के बाहर की सड़क तक को नहीं देख पाती थी.
_ ऊपर से रोज दो-चार अतिथियों का अचानक आगमन,
_ भोजन बनाने वाले इंसान के लिए दाल और सब्जी तक नहीं बचती थी, अचार का सहारा था.
_ पुरुषों को इन बातों की आहट तक नहीं होती थी.
_ वे खाए-पिए-डकार लिए, मुंह पोछे और चले गए और हां, ‘दाल या सब्जी में स्वाद नहीं आया’- यह बताने में नहीं चूकते थे.
– Mamta Singh
ये सब स्त्रियाँ ही हैं – जो अपनी जिंदगी दाँव पर लगा देती हैं कि उनके परिवार, पति और बच्चें स्वस्थ रहें, सुखी रहें और उन्हें कोई कष्ट ना हो,

पर पतिदेवगण यानी पुरुष कभी नहीं कर सकते इतना – यह मेरा अनुभव है,
_ स्त्रियाँ जीवन में वरदान है, वे किसी भी रूप में हो.. अपना सर्वस्व दे देती हैं..
_ पर अफ़सोस समाज, रूढ़ियाँ, परम्पराएं, अंध विश्वास और हमारे उजबक पूर्वाग्रह उन्हें सम्मान और गरिमा से जीने लायक जीवन भी नहीं दे पातें,
_ धिक्कार है ऐसी मान्यताओं और चलन पर.. जो स्त्रियों को एक पल भी बराबरी, सम्मान और मनुष्य होने का दर्जा ना दे सकें.!!
– Sandip Naik

सुविचार – पुरुष – मर्द – 032

पुरुषों का जीवन परिवार और काम-धंधे में संतुलन बनाये रखने में ही बीत जाता है…
पुरुषों का जीवन भी उतना संघर्ष से भरा होता हैं जितना की एक स्त्री का,

आप शायद समझ इसलिए नहीं पाते कि वो कभी गिनवाते नही…

स्त्री होना कठिन है तो पुरुष होना भी कहाँ आसान है, सच्चाई यही है कि

_ जिसको दर्द होता है वही मर्द होता है..

पुरुष का सम्मान करना सीखा नहीं समाज ने,

_ जबकि पुरूष बहुत कुछ करके परिवार को सहेजता है..

ये सोच कर ही पुरुषों ने पूरी उम्र गुजार दी,

_ मैं कैसे भी रहूं पर मेरा परिवार सुकून से रहे !!

तुम मर्द की मोहब्बत की बात करते हो…

मर्द परिवार, बीवी, बच्चों की रोटी की खातिर, दर दर भटकता रहता है..!

पुरुषों का जीवन भी उतना संघर्ष से भरा होता हैं जितना की एक स्त्री का,
_ हम शायद समझ इसलिए नहीं पाते कि वो कभी गिनवाते नही..!!
दुनियां के बीच मर्द पीसता है, तब जा के घर की दाल रोटी का जुगाड़ होता है.!!
पुरुष के लिए घर भी एक होटल ही है, जहां पैसा दीजिए तो आपको ज्यादा मान- सम्मान- इज्जत मिलेगी,

_ और अगर आप बेरोजगार हैं तो परिवार वाले कोई कसर नहीं छोड़ते ताना मारने में.!!

पुरुष की पीठ सर्वसम्मत पहाड़ है..

_ जिस पर सारी दुनिया की जिम्मेदारियां रेंग कर ही सही, चढ़ ही जाती हैं..!!

पुरुषों के पास मायका नहीं होता, ना कोई ऐसा आँगन, जहाँ वे निःसंकोच लौट सकें,

_ जहाँ कोई कहे- “थक गए हो न ? थोड़ा आराम कर लो…”
_ वे चलते रहते है निरंतर, एक पुत्र, एक पति, एक पिता बनकर,
_ अपने कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ लिए, पर कभी खुद के लिए ठहर नहीं पाते..!!
— पुरुष के लिए यह स्वाभाविक हो जाता है कि वह रोते वक्त अपनी आँखों से बहने वाली आँसुओ का कतरा-कतरा हिसाब रखे…
_ यह ‘मोती’ समाज या गैरों के लिए मोल हो या न हो…. यह स्वयं के लिए विशिष्ट ऊर्जा का ताप है..
_ जो जीवन को एक राजा के भाँति जीने को प्रेरित करता है….!!!!
जब जवान हुआ होगा तो पहले मां-बाप का सहारा बना होगा,

_फिर बहन-भाइयों के लिए दर्द बर्दाश्त करता रहा होगा,
_फिर जवानी भर बीवी की जरूरियात पूरी करने के लिए ज़माने के सितम बरदाश्त करता रहा होगा….और अब बच्चों के लिए अपनी हड्डियां गला रहा है..!!
_बहन-भाई अब कहते होंगे कि, उसने हमारे लिए किया ही क्या है.
_बीवी कहती होगी, मेरी तो किस्मत ही खराब थी, जो इनसे शादी हो गई,
_और बच्चे कहते होंगे, पापा जी आप कोई ढंग का काम कर लेते तो, आज हम भी मजे में होते..
_यही है मर्द की ज़िंदगी है..उफ़ ये जिन्दगी..!!
” पुरुष “

तुम इतने सहनशील कैसे हो सकते हो…
क्या तुमको स्वयं को खो देने का डर नहीं होता..
तुम कठोर बन जाते हो..
और वही कठोरता तुम्हारी पहचान..
कितना लिखा जाता है तुमपर,
कभी तुम्हारे प्रेम से भरे हृदय के बारे में कोई क्यों नहीं लिखता..
एक पिता, एक बेटा, एक पति, एक भाई और भी रिश्ते …
जिनको तुम संभालते फिरते हो..
हर किसी की इच्छा पूरी करते हो..
क्या तुम्हारा मन नहीं होता कि कभी तुम भी नए कपड़े खरीद लो..
हर बार क्यों ये कह के निकल जाते हो की तुम लोग ले लो मेरे पास है
एक जोड़ी मोजे लेने के लिए दस दिन जोड़ घटाना करते हो
क्या हो तुम पुरुष…
हमेशा दूसरो को…आगे रखते हो
और खुद दब जाते हो
तुम्हारा संयम कभी विचलित नहीं होता..
तुम्हारी इच्छाएं हर बार सबसे अंत में आती है, कभी कभी तो आती ही नहीं
तुम्हारे दुःख कोई समझ नहीं पाता
या कहो की कभी तुम जताते ही नहीं की कोई दुःख भी है तुमको
बस…परिवार परिवार परिवार..
पुरुष क्या हो तुम…
हाथ उठाये तो -> बेशर्म
चुप रहे तो –> डरपोक
घर से बाहर रहे तो –> आवारा
घर में रहे तो –> घर कूकड़ा
बच्चों को डाँटे तो –> ज़ालिम
ना डाँटे तो –> लापरवाह
माँ की माने तो –> मावडियो
बीवी की माने तो –> जोरु का गुलाम
बीवी को
नौकरी करने से रोके तो –> शक्की
बीवी को नौकरी करने दे तो –>
बीवी की कमाई खाने वाला
पूरी ज़िंदगी समझौता, त्याग और
संघर्ष में बिताने के बावजूद
वह अपने लिये कुछ नहीं चाहता.
इसलिये … हर एक पुरुष की
हमेशा इज़्ज़त करें , क्योंकि
❗ हर एक पुरुष में ❗
बेटा, भाई, पति, दामाद और
पिता हो सकता है,
जिसका जीवन
हमेशा मुश्किलों से भरा हुआ है.
मजाक नहीं पुरुष बनना…

पूरा जीवन तुम्हारे मुस्कराहट के लिए लड़ता रहता है वो बाप हो भाई हो या पति हो ….

उम्र से छोटा हूं महोदय, पर 22 की आयु में ही समझ गया हूं इतनी आसान नहीं है…

छोटी सी नौकरी खर्चा इतना सारा…

पापा के अरमान मां की मुस्कान घर के छोटे मोटे समान,

दूसरे महीने का बिजली का बिल पहले महीने सिलेंडर का रोना …

मां की साड़ी बाप की दवाई … चार दिन की महफिल सैलरी आने पर फिर वही उलटी गिनती…

सपने हजारों हकीकत कुछ और ही कहती है … सब खुश रहे बस इसी लिए लड़ना पड़ता है..

नहीं तो मजाल कोई आंख उठा के भी देख सके… बस खुद की एक आवाज खुद का शोर खुद की लड़ाई..

बेटा हूं भाई हूं धीरे धीरे समझ रहा हूं इतनी आसान तो नहीं ये जिन्दगी … 

कौन है पुरुष who is a male

¤ रब की ऐसी रचना जो बचपन से ही त्याग
और समझौता करना सीखता है ।
¤ वह अपने चॉकलेटस का त्याग करता है बहन के
लिये ।
¤ वह अपने सपनो का त्याग कर माता-
पिता की खुशी के लिये उनके अनुसार कैरियर
चुनता है।
¤ वह अपनी पूरी पॉकेट मनी गर्ल फ़्रेंड के लिये
गिफ़्ट खरीदने में लगाता है ।
¤ वह अपनी पूरी जवानी बीवी-बच्चों के लिये
कमाने में लगाता है ।
¤ वह अपना भविष्य बनाने के लिये लोन लेता है
और बाकी की ज़िंदगी उस लोन को चुकाने में
लगाता है ।
¤ इन सबके बावजुद वह पूरी ज़िंदगी पत्नी,
माँ और बॉस से डांट सुनने में लगाता है ।
¤ पूरी ज़िंदगी पत्नी, माँ, बॉस और सास उस पर
कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं ।
¤ उसकी पूरी ज़िंदगी दुसरो के लिये ही बीतती है
और बेचारा पुरुष
~~~~~~~~~~
¤ बीवी पर हाथ उठाये तो “बेशर्म” ।
¤ बीवी से मार खाये तो “बुजदिल” ।
¤ बीवी को किसी और के साथ देख कर कुछ कहे
तो “शक्की” ।
¤ चुप रहे तो “डरपोक” ।
¤ घर से बाहर रहे तो “आवारा” ।
¤ घर में रहे तो “नाकारा” ।
¤ बच्चों को डांटे तो “ज़ालिम” ।
¤ ना डांटे तो “लापरवाह” ।
¤ बीवी को नौकरी करने से रोके तो “शक्की” ।
¤ बीवी को नौकरी करने दे तो बिवी की “कमाई
खाने वाला” ।
¤ माँ की माने तो “चम्मचा” ।
¤ बीवी की माने तो “जोरु का गुलाम”।
पूरी ज़िंदगी समझौता, त्याग और संघर्ष में
बिताने के बावजुद वह अपने लिये कुछ
नहीं चाहता ।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
इसलिये पुरुष की हमेशा इज़्ज़त करें ।
पुरुष, बेटा, भाई, बॉय फ़्रैंड, पति, दामाद,
पिता हो सकता है, जिसका जीवन
हमेशा मुश्किलों से भरा हुआ है ।
” हाँ ये पुरुष है “

माना ,,,,माना की इनकी आँखों में नमी नहीं होती
पर इनके दिल में भी जज्बातों की कमी नहीं होती
हाँ ये पुरुष है,, प्यार जताने का इनका अलग ही तरीका होता है
कभी डाँटते हैं, कभी गुस्सा करते हैं, कभी हुक्म चालते हैं, कभी कभी रौब भी जमाते हैं
सीधे सीधे कोई बात ये बताते नहीं, फ़िक्र हमारी सबसे ज्यादा करते हैं
पर प्यार से कभी जताते नहीं,,,,हाँ ये पुरुष है
दफ्तर और घर को लम्बी उम्र तक बैलेंस करते हैं
हालातों से ये भी लड़ते हैं, कभी माँ को कह नहीं पाते, कभी बीवी को कहना नहीं चाहते
और नाराजगी दोनों से ही सहते रहते हैं,
वैसे तो ये निडर है, पर रिश्तों को खोने के डर से अक्सर ये डरते हैं,,, हाँ ये पुरुष है
बातों में सख्ती, कांधों में मजबूती, और सीना फौलादी रखते हैं
पर आँगन से जब उठती है डोली, सबसे ज्यादा यही रोते हैं,,, हाँ ये पुरुष है
बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक की जिम्मेदारियां ये उठाते हैं
ख्वाहिसों को खुद की ये कफ़न उढ़ाकर, पूरी जवानी ये जलाते हैं,,,हाँ ये पुरुष है
जब भी कोई मुसीबत आती है, परिवार से पहले इनसे टकराती है
अरे कुछ नहीं होगा, चिंता छोड़ो, सो जाओ , मैं हूँ ना, कह कर सबको सुलाते हैं
और फिर वही चिंता में खुद को पूरी रात जगाते हैं,,,हाँ ये पुरुष है
जिंदगी भर परिवार के लिए जीते हैं, आधी से ज्यादा जिंदगी घर के बाहर ये जीते हैं
लोन के कर्ज और सामजिक फ़र्ज़ में, एक उम्र गुजर जाती है
खुद के लिए ये भी कहाँ लगातार जीते हैं
पिता पति भाई या दोस्त, इसका हर रूप निराला है
कभी ना कभी किसी ना किसी ने हमें हर वक़्त हरदम संभाला
हाँ ये सच है की इंसान को जन्म देती है औरत
पर इनके बिना क्या वजूद हमारा है
” हाँ ये पुरुष है “
मर्दों के जन्म पे खुशियां तो बहुत मनाई जाती है,

लेकिन ज़िन्दगी औरतों की खुशामदी में ही गुजरती है,
बहनों की पढ़ाई तो कभी उनकी शादी का भार,
कभी बीबी की जरूरतें तो कभी बच्चों की बात,
फिर ममता भरी मां के आदेशों का भी सम्मान,
सभी का ख्याल रखते-रखते खुद टूट जाता है,
घर से दूर जिन्दगी बनवास में गुज़ार देता है,
दिनभर मेहनत मजदूरी रात में चिंता में सोता है,
कमाते-कमाते जवानी में ही उम्र ढल जाती है,
फिर भी जरूरतें कहां सबकी पूरी हो पाती है,
मर्दों की जिंदगी यूंही खुशामदी में गुज़र जाती है,
संघर्षों से भरी ये दुनिया में वह चैन कहां पाता है,
गमों के बादल ओढ़ आह् तक नहीं भरता है,
लाखों दर्द छुपा सीने में चुपचाप रह जाता है,
शिकस्त चेहरे पे कभी भी नहीं आने देता है,
मुश्किलों में भी सबके सामने मुस्कुरा लेता है,
मर्दों की जिंदगी यूंही खुशामदी में गुज़र जाती है !
मर्दों की जिंदगी यूंही खुशामदी में गुज़र जाती है !
कहना जितना आसान तुम पुरुष हो,

मगर पुरुष होना कहाँ आसान है !
पुरुष के सिर पर है ज़िम्मेदारी सारी,
पत्नी मेरा हक़ है तुम पर,
माँ कहती मेरे दुध का क़र्ज़ है तुम पर !
बच्चे रोज़ नई नई फ़रमाइश करते हैं !
पत्नी, बच्चों, माँ को खुश करने में गुज़री ज़िंदगी सारी !!
कहना जितना आसान तुम पुरुष हो,
मगर पुरुष होना कहाँ आसान हैं !
हम औरते बात बात मे रो देती हैं,
कहती है तुम क्या जानो दर्द क्या होते है !
पुरुष भी प्रेम का सागर है कठोर नही होते !
बस अपनी भावनाओं को हर किसी के आगे व्यक्त नहीं करते !!
कहना जितना आसान तुम पुरुष हो,
मगर पुरुष होना कहाँ आसान है !
नारी तुम्हारे चहरे पर जो मेकअप है,
ये तुम्हारी पति की दिन भर की मेहनत हैं !
घर के चूल्हे जलाने से लेकर बच्चों की कॉपी किताब,
माता पिता की दवा तक सिर्फ़ पुरुष के सिर पर भार है !!
कहना जितना आसान तुम पुरुष हो,
मगर पुरुष होना कहाँ आसान है !
पुरुष कभी बता नहीं सकते भीतर का शोर

वो क्या हैं लोग तमाशा बनाने में देर नहीं लगाएँगे
रो नहीं सकते
कमजोर और कायर बता दिये जाएँगे
क्रोध नहीं कर सकते
निष्ठुर साबित हो जाएँगे
शांत नहीं बैठ सकते
अभिमानी साबित हो जाएँगे
बस मुस्कुरा सकते हैं क्युकी यही उनको बचपन से बताया और सिखाया गया हैं परिवार और समाज द्वारा
क्या हो रहा हैं उनके साथ या उनके जीवन में इससे किसी को
शायद ही फर्क पड़े या पड़ता हो…
भावनाओ का क्या करना हैं शायद..
……जब मर्द टूटते हैं न तो वो अपने दर्द को समेट कर मौन हो जाते हैं..

…सारी पीड़ा सारी घुटन, सारी चुभन महसूस होती है.. केवल और केवल उनके अंतर्मन में…
_ जिंदा लाश बन जाते हैं वो.. किसी से नहीं कहते वो अपने मन का दुख…
_ रो भी नहीं सकते वो.. क्यूंकि लोग हंसेंगे उन पर क्यूंकि मर्द को दर्द नहीं होता न..
..पर उनकी घुटन.. उनकी बेबसी.. उनकी पीड़ा ..उनके आंसू.. वो खुद रोकर खुद को खुद ही चुप कराते हैं…
_ जब एक पुरुष रोता है न तो उसका विलाप प्रकृति भी नहीं सह पाती.!!
पुरुष के आँसू देख पाना कोई साधारण बात नहीं होती,

_ क्योंकि वो अपनी तकलीफ़ों को शब्दों में नहीं, मुस्कानों में छिपा लेना जानते हैं
_ वो दुनिया के सामने मज़बूत बने रहते हैं,
_ पर जब किसी अपने के सामने टूट जाते हैं, तो समझ लेना उस इंसान की जगह उसके दिल में बहुत गहरी है
_ अगर किसी के सामने उनके आँसू बह निकले हैं, तो वो व्यक्ति उसके लिए सिर्फ महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि सुकून होता है,
_ जिसके सामने वो बिना डर, बिना दिखावे के खुद जो वो है वो बन पाता है.!!
पुरुष ख़ुद को ख़र्च करता है उन तमाम जगहों पर

जहाँ कोई सेल नहीं लगती
बॉस की फटकार, इंक्रिमेंट की पुकार
घर के ख़र्चे, दवाओं के पर्चे
उसके कुछ सपने बेच देते हैं
नींद का वक्त वो सपनों को देता है
और सपनों में नींद पूरी करता पुरुष
चाहकर भी कल्पनाओं में नहीं भटक पाता
तो छोड़ आता है कल्पनाओं को बचपन में लिखी डायरी के पास
माँ के पुराने बक्से में उसकी कल्पनाओं के चित्र
आख़िरी साँस ले रहे हैं
उसका कुछ हिस्सा उन खंडहरों में रह गया है
जहाँ उसे चुपके से चूम लिया था उसने
कुछ उस पेड़ के पास, जिसकी छाँव में
आख़िरी बार उसकी हथेली थामी थी
उसके पैंट के दाहिनी जेब में एक सूची पड़ी है
जिसने बताया कि दस का किलो मिलने वाला आटा
अब तीस में मिलने लगा है
शर्ट की जेब में लगी क़लम मुस्कुराते हुए कहती है
उसका कुछ हिस्सा मेरे पास गिरवी पड़ा है
हर महीने का बढ़ता सूद उसे कभी मेरे क़र्ज़ से मुक्त नहीं होने देगा
पुरुष का बिकना कहीं नहीं लिखा जाता
कभी नहीं कहा गया कि पसीने में भीगा
उसका कुर्ता दुनिया का सबसे कीमती ज़ेवर है
फिर भी हर रिश्ते में मौजूद उसकी बाहें
सुकून और सुरक्षा का पर्याय हैं।
हाँ नहीं होते कुछ पुरुष, पुरुष की तरह
तो कहाँ होती हैं सारी स्त्रियाँ, स्त्री की तरह
✍🏻 • पल्लवी विनोद 💮 ( @pallavivinod )
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