सुविचार – मकान – 058

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“इन बारिशों से दोस्ती अच्छी नहीं, फराज़

_ कच्चा तेरा मकान है, कुछ तो ख़्याल कर…!!”

“हम सब कच्चे मकान में रह रहे हैं”

‘मकान’ केवल ईंटे भर हैं’ __ घर ईंटो और प्यार से बनता है..!!

A Home is always a house, but a house is not necessarily a home.

मकान ऊंचा होने से नहीं _अपने मयार [ दया करने वाला ] की ऊंचाई से आदमी ऊंचा होता है.
मकान इतने बन गए हैं जगह-जगह, जमीन भर गई है मगर दिल खाली है !!
छोटी-छोटी दरारें अक्सर बड़े-बड़े मकान के ढहने का कारण बनती हैं.!!
पहले मकान कच्चे थे और लोग सच्चे थे..अब मकान पक्के हो गए और लोग कच्चे.!!
एक मकान ऐसा भी था, जिसका हर कोना _ मेरी आहट को पहचानता था ;

_उस घर के कोने में मेरा नाम था _ और सारे खिड़की – दरवाजे मुझे बहुत करीब से जानते थे !!

मकान साथ लेकर कौन जाता है, सब देखभाल ही तो करते हैं.

मूर्ख आदमी मकान बनवाता है, बुद्धिमान आदमी उसमें रहता है,

जिसने भी ये कहा ….उसे ज़िंदगी का कितना गहरा तज़ुर्बा रहा होगा…

दीवार क्या गिरी मेरे मकान की, लोगो ने मेरे घर से रास्ते बना लिए..
तारीखों में गुम पुरखों का पैगाम बुलाता है, मुझे गॉव का टूटा मकान बुलाता है…

_ पुराना समझ के बेच न देना मकान को, शायद कभी ये सर को छुपाने के काम आए..!!

घर अंदर ही अंदर टूट जाते हैं, मकान खड़े रहते हैं बेशर्मों की तरह !!

_ बड़े बड़े मकान ढहा देती हैं छोटी छोटी दरारें !!

कोई साथ न दे तो, हौसला टूट जाता है..!

_ किसी कि बुराई के कारण घर-मकान टूट जाता है..!!

उग आई है घास मकान की दहलीज़ पर…

अपनों को आये हुए एक ज़माना गुज़र गया.

कभी गुलज़ार था जो घर चहचहाट से,

आज ख़ामोशी की बेल पसरी है हर जगह..

नहीं होती रखवाली, जंग वाला ताला अब बेजान है.

_घर तो नहीं है, बस यादों का एक मकान है.

गाँव के घरों की वीरानग़ी बयां करतीं हैं उन की दांस्तां_

_ वारिस इनके बड़े शहरों की रौनक में खो गए..

अकेले छोड़ दिया गया पुरखों का घर, दोष बस इतना था कि मकान गाँव में था.

_ लोग जड़ें भूल जाते हैं ; उन्हें नहीं पता कि बिना मिट्टी के जुड़ाव के, बड़े से बड़ा पेड़ भी महज़ मामूली ईंधन बन जाता है.!!

जिस दिन खुद कि कमाई से ईंट खरीदोगे _

_ उस दिन बाप के झोपड़े की कीमत पता चलेगी..

किराये के मकान में घर नहीं होता !

_ फिर भी मकान अपना हो तो.. किसी का कोई डर नहीं होता..!!

” मकान का दर्द “

मैं गाँव का पुराना मकान हूँ.

गलने लगी हैं मेरी दीवारें और

सड़कर लटकने लगे हैं पलस्तर !

पनाह दी थी मैंने तुम्हारी कई पीढ़ियों को !

यहीं पल कर तुम सब बड़े हुए !

यहाँ गूँजा करती थी, तुम्हारी अठखेलियाँ

और उत्सवों पर मंगलगान !

मेरे कोठों में भरे रहते थे, गेहूँ और धान !

मुझे अपने भाग्य पर गर्व था,

हर एक दिन उल्लासमय पर्व था !

अब झेलना पड़ रहा है, मुझे उपेक्षा और अकेलेपन का शाप !

चिर निर्वासित – सा एकान्त में खड़ा,

क्षीण होता हुआ आँसू बहा रहा हूँ मैं

क्योंकि तुम हो चुके हो संवेदनहीन !

हाँ, तुम्हें शहर प्रिय है, सुखी रहना

तुम्हें कोई कष्ट न हो, दुआ है मेरी !

तुम्हें तो याद _ कभी नहीं आएगी मेरी,

एक दिन यूँही ढह जाऊँगा मैं _ तुम्हें याद करता !!

फट गया है हृदय बेचारे मकान का ….

मकान को अपने ख़ून – पसीने से सींचकर

बनाया था बाप ने बड़े अरमानों से !

आज स्वार्थ की पराकाष्ठा देखिए,

खींच रहे हैं दरकते रिश्तोंवाले

बेबस मकान को _ दम लगाकर

अपनी -अपनी ओर उन्हीं के पुत्र !

हृदय फट गया है इस कुकृत्य को देखकर

उस मकान का !

केवल ईंट – सीमेन्ट पत्थरों और रेती से

नहीं बनता है मकान !

आत्मीयता की अदृश्य किन्तु प्रगाढ़

डोर उसे बाँधे रहती है

तब वह कहलाता है घर !

इन स्वार्थी बेटों को घर की नहीं

अपने -अपने हिस्सों की दरक़ार है फ़कत !

खींचकर ले जा रहे हैं कसाई की तरह जिसे

दो विपरीत दिशाओं में !

साफ़ नज़र आने लगी है टूटती रिश्तों की डोर !

उड़ चुके हैं ‘घर’ के प्राण- पखेरू तो कभी के !

अब गाँवों में भी काफी सारे मकान हैं, जिसमें बाहर ताले जड़े हुए हैं.

_ क्योंकि उन घरों में रहने वाले काम-रोजगार-व्यापार की तलाश में अपने गाँव को छोड़कर कहीं दूर बस गए.
_ ऐसे लोगों का कभी साल-दो साल में दो-चार दिन के लिए यहां आना हुआ करता है.
_ अपने पुराने घर को जी भर कर देख लिया,
_ कुछ पुराने लोगों से मुलाकात कर ली और फिर घर के दरवाजे पर ताला लगाकर वापस लौट जाते हैं.
“सीमेंट के जंगल के पहरेदार”

_ जहां रहता था वहां आलिशान सीमेंट पुते बंगले आठ दस हजार वर्ग फीट में बने थे.
_ अधिकांश घरों के बगीचे में आराम कुर्सी पर बुजुर्ग हस्तदंड लिए बैठे मिलते ;
_ स्वभाव वश हालचाल पूछने पर बताते कि बेटे बेटी विदेश में हैं, पत्नी सिधार गई है.
_ तो अंकल आप विदेश क्यों नहीं चले जाते अपनों के पास ?
-अरे बेटा,चला तो जाऊं पर ये माया मोह के ईंट पत्थर सीमेंट को कौन देखेगा ?”
_ अब कौन समझेगा कि.. जैसे आप अमर फल खा कर बैठे रहेंगे युगों युगों..”
“जिन मकानों- हवेलियों को आप बनाने के लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं..”

_ उनमें से अधिकांश में आपके बच्चे कभी नहीं बसेंगे !
_ वे अपना खुद का पैसा कमाएंगे और निश्चित रूप से अधिक फैशनेबल घर बनाना चाहेंगे या यहां तक कि आप से दूर किसी बडे़ शहर या महानगर में रहना पसंद करेंगे.
_ सच्चाई यही है आप मानो या मत मानो !
_ इसलिए अपनी नेक कमाई के साथ कुछ अपनी सामाजिक एवम नैतिक जिम्मेदारीयों को भी निभाते चलें..!!
मकान बहुत मेहनत से बनते हैं.. पर ऐसी मेहनत किस काम की, जिसके आप सिर्फ पहरेदार बन कर रह जाएं ?

_ सच कहें तो हम लोग मकान के पहरेदार ही हैं.
_ जिसने ये बात कही है कि “मूर्ख आदमी मकान बनवाता है, बुद्धिमान आदमी उसमें रहता है,”
_ उसे ज़िंदगी का कितना गहरा तज़ुर्बा रहा होगा.”
_ मकान लेकर कौन जाता है ? सब देखभाल ही तो करते हैं.
_ जिन्दगी के चार दिन है मिल जुल कर हँसतें हँसाते गुजार लें..
…क्या पता कब बुलावा आ जाए….सब यहीं धरा रह जायेगा..!!

सुविचार – उधार – कर्ज – कर्जा – ऋण – ईएमआई – EMI – लोन – Loan – 057

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उधार की अमीरी चैन की सांस नहीं लेने देती.
जिसकी ईएमआई नहीं चल रही है और कोई कर्ज न हो,

_ समझ लेना उसकी जिंदगी बढ़िया चल रही है..!!

EMI [ईएमआई] या किसी भी तरह के लोन के जाल में न फँसें..
_ जितनी चद्दर उतने ही पांव फैलाये.!!
जितनी अर्निंग [earning] है, उसी में अच्छा जीवन जीना, लोन [loan] से दूर रहना.
_ मेरी जितनी Earning है, उसी में अच्छे से कैसे रह सकते है, Loan से दूर रहना.
– मैं उसी पर ध्यान देता हूँ.
ऋण से जो बच गया वो वास्तव में सुखी है, लेकिन आपने महसूस किया कि आपके चारों  तरफ से इन्हीं चीजों को थोपा जा रहा है..

_ यहां तक अब टूरिस्ट लोन, शिक्षा लोन इत्यादि भी ___ ऋण एक अंधे कुँवे के सामान है, इससे बचिए..

ईमानदार लोग दिखावा नहीं करते, वे कर्ज मुक्त और सादगी से जीवन जीते हैं और खुश से रहते हैं..!!
ईमानदारी से पैसे कमाने वाले लोग सीधे और सच्चे होते हैं, सच्ची बातें करते हैं और अच्छे होते हैं, अच्छा व्यवहार रखते हैं, किसी का कर्ज नहीं रखते अपने ऊपर..!!
ईमानदारी से मेहनत करने वाला कभी कर्जे में नहीं होता,

_ जो आय से ज्यादा खर्च करता है.. वही कर्ज में होता है..!!

सबसे पहले तो हमें अपने बेवजह के खर्चों को खत्म करना चाहिए..
_ क्योंकि लोन के पैसों से लग्जरी जीवन व्यतीत नहीं करना चाहिए.!!
अगर यह दुनिया आपकी एक बार मदद करे, तो यह सौ गुना अहसान जताएगी.

_ क्योंकि दुनिया मदद नहीं कर सकती, सिर्फ़ उधार देती है.
_ जब भी आप इस दुनिया को आईना दिखाएँगे, यह उधार वापस माँगेगी.!!
चादर से बाहर पैर फैलाने वालों का जीवन चिन्ता करने में ही निकल जाता है और आखिर में फिर भी हाथ खाली रह जाते हैं.

_चक्रवृद्धि ब्याज सहित किश्तें पटाते-पटाते ज़िंदगी का सुनहरा दौर यूँ ही निकल जाता है.!!
कर्ज में डूबा हुआ शरीर अपना खून हर दिन सूदखोरों को पिलाता रहता है.
जग में पहला दुखी निर्धन है, _ उससे अधिक दुखी कर्जदार है.
खुद की कमाई से पार पड़ेगी, उधार की रोशनी कब तक चलेगी..!!
औकात से बड़े दिखावे, _ इंसान को कर्ज में डूबा देते हैं.
जिसके पास किसी का कर्ज नहीं, _ वह बड़ा मालदार है.
उधार लेने से धन अधिक खर्च होता हैं.
सही तरीके से कमाने वाले कभी कर्जा लेते ही नहीं.

_ वो अपने खर्चे सीमित रखते हैं.

कर्ज वो बीमारी है जो आदमी को जीते जी नरक में ले जाती है, _

_ कर्ज अच्छे से अच्छे परिवार को तबाह कर देता है.

पैसे उधार लेने का अर्थ है, दूसरों के कर्म को अपने जीवन में लाना,

_ ऐसे काम क्यों ही करना.. ये घोर नकारात्मक ऊर्जा है..!!

उधार देकर बाद में गिड़गिड़ाने से बेहतर है ;
_पहले ही ‘ना’ बोलकर अपना स्वाभिमान बचा लो.!!
लोन देने वाला उस आदमी की तरह है जो सूरज निकलने पर आपको छाता देता है,

_लेकिन पानी बरसते ही वह उसे वापस मांगने लगता है.

“ऋण – कर्ज”

_ यह ऐसी चीज है जो बिना सोचे लिया गया तो आप को निश्चित ही डुबोएगा.
_ एक कर्ज को पूरा करने के लिए दूसरा कर्ज..
_ और इस प्रकार कर्ज बढ़ता ही जाता है.!!
महत्वाकांक्षा पर लगाम लगाएं,

_ देखा देखी में, बाइक, कार, फर्नीचर, टीवी मोबाइल अब ईएमआई पर आज कल धड़ल्ले से लिया जाता है..
_ और अंत में यह इतना बढ़ जाता है की आय से अधिक खर्च होने लगता है,
__ ऐसे में आकस्मिक खर्च की स्थिति होने पर लोन लेना पड़ता है, और फिर आप डूबते ही रहते है कर्ज में.
— इन दिनों रिश्तों में दूरियाँ बढ़ती ही जा रही हैं,
_बढ़ती महँगाई, जानलेवा प्रतिस्पर्धा, आसमान छूते सपने और महत्वाकांक्षाएँ मनुष्य का जीवन इन सबमें पिस रहा है..
उधारी का सामना हमें करना पड़े तो हमारा अन्तःकरण शांत नहीं रह सकता है.

_ जिसने उधार लिया है, वह शांत नहीं रहता.
_ “सादा खाओ, सादा पहनो” आफत न सिर पर आएगी,
_ चार दिन की जिंदगी आराम से कट जाएगी.
किसी भी रिश्तेदार या जान पहचान की लोन लेने में मदद के अनुरूप बैंक में गारंटी देने का मतलब यह होता है कि आवेदक के लोन चुकाने में अगर कोई कोताही होती है तो गारंटर इस बात की जवाबदेही लेता है और लोन चुकाने की जिम्मेदारी भी..!

_ इसलिए लोन लेने वाले के साथ लोन की गारंटी देने वाला भी लोन चुकाने के लिए बराबर जिम्मेदार होता है.!!
उधार लेने वालों से निवेदन है कि फालतू खर्च करने से पहले..

_ उन लोगों का कर्ज जरूर उतार दें, जिन्होंने नेक इंसान समझ कर आपको उधार दिया था.
किसी के भरोसे को मत तोड़ो ; फालतू खर्चों से पहले उस इंसान की पाई-पाई लौटाओ.. जिसने आपको अपना समझकर निस्वार्थ उधार दिया था.
सुविधाओं और साधनों से संपन्न होने की कोशिश हर व्यक्ति को करनी चाहिए,

_ लेकिन अपनी सीमाओं का ध्यान रख कर.
_ जैसे, अगर आप कर्ज ले कर एक के बाद दूसरी वस्तु खरीदते जाते हैं,
_ तो हो सकता है कि आप कर्ज से इस तरह लद जाएँ कि मन की शान्ति भी गँवा बैठें.
_यह कोई जरुरी नहीं कि सुविधाओं व साधनों की प्रचुरता एक व्यक्ति और उस के परिवार को सुखी ही रखे.
_ इसलिए सिर्फ सुख सुविधाएँ ही जुटाने पर जोर न दें.
_ आप की सफलता और लोकप्रियता में आप के व्यक्तिगत गुण ज्यादा काम आएँगे.
ऋण लेकर नया धंधा शुरू करने से पहले उन संभावनाओं पर भी गहन विचार कर लेना चाहिए..

_ कि अगर धंधा ना चला तो आप लिया गया ऋण उतार पाओगे ??
_ कुछ लोगों की जिंदगी ठीक- ठाक चल रही होती है,
_ मगर वो गलत सलाह या अति उत्साह में ऐसा कदम उठा लेते हैं कि वो आत्मघाती सिद्ध हो जाता है.. और वो सड़क पर आ जाते हैं.
_ याद रखिये, रिस्क लेना बुरी बात नहीं,
_ मगर औकात से बढ़कर लिया गया रिस्क तबाह कर सकता है..
_ और जब बुरे दिन शुरू होते हैं, तब सारे अपने मुहँ मोड़ लेते हैं..
_ और जर्रा जर्रा दुश्मन हो जाता है.
क्यूँ जीते हो आप ऐसी ज़िन्दगी, जिस से हो जाये लोन- क़र्ज़.!

_ जितनी कमाई उतना खर्च, ये हुनर सीख लो ना..,
_ लेकर लोन, अन्जाने में घोट रहा, अपना गला तो नहीं..,
_ बेवजह दुनियाँ को दिखाने के लिए, क्यूँ जरूरतें बढाता है..,
_ जितना कुछ है तेरे पास, क्यूँ उसी में खुश नहीं रह पाता है..,
_ क्यूँ जरूरतें हो जाती है, जिन्दगी पर फिर सवार॥
_ अगर नहीं है सब्जी तेरे घर में, तो नमक से रोटी खा ले..,
_ अगर जरूरतें पूरी करनी है तुझे, तो मेहनत कर कर कमा ले..,
_ क्यूँ जीते हो आप ऐसी ज़िन्दगी, जिस से हो जाये लोन- क़र्ज़..!!
बीमारी और उधारी इन दोनों में से अगर किसी एक का सामना हमें करना पड़े तो हमारा अन्तःकरण शांत नहीं रह सकता है.

_ क्योंकि कोई रोग आ जाए तो हमारी सारी ऊर्जा उसी रोग से लड़ने में लग जाती है.
_ जिसने उधार लिया है, वह भी शांत नहीं रहता.”सादा खाओ, सादा पहनो” आफत न सिर पर आएगी, चार दिन की जिंदगी आराम से कट जाएगी.!!
रोग, ऋण, दुश्मन और अग्नि को कभी शेष मत छोड़िए.

_ छोटी सी चिंगारी जंगल जला देती है.
_ छोटा सा कर्ज पहाड़ बन जाता है.
_ छोटा सा रोग जीवन निगल लेता है.
_ और छोटा सा दुश्मन अवसर मिलते ही बड़ा संकट बन जाता है.
–“फैसला”–

“हर फैसले की एक अपनी गति होती है – कुछ तुरंत होते हैं, कुछ इंतजार मांगते हैं.
_ जो भी गति आपको सुकून दे, वही आपका सही रास्ता है” 🌿
_ ये आप अपने मन में दोहरा लीजिए जब भी निवेश या जीवन के किसी निर्णय को लेकर कन्फ्यूजन हो.
_ ध्यान रखना – फैसला लेने से पहले अपना सुकून महसूस करना ही सबसे बड़ी जीत है.
——————————————
“जो ख़ुशी अपनी औकात के अंदर जीने में है, वो किसी उधार की छाया में कभी नहीं मिलती”
“जो पैसा अपना है, उसमें सुकून है; जो पैसा उधार का है, उसमें बेचैनी का बीज है”
“संतोष में जो सुकून है, वो ईएमआई [EMI] भरने की दौड़ में कभी नहीं मिलता”
“अपनी कमाई के अंदर रहकर जीना, असल में आज़ादी का सबसे प्यारा रूप है”
“मैं उधार का बोझ नहीं- अपनी कमाई का सुकून जीता हूँ”
“जितना कम बोझ – उतनी गहरी सांस”
— ये लाइन आप अपने दिल में बसा लीजिए – जब भी लोन/ईएमआई का विचार आए, या दूसरे लोगों को देख कर मन में हल्का सा तुलना [Comparison] आए, बस इसे याद करना– ये आपके सुकून को और मज़बूत करेगी.!!
जो ईमानदारी से कमाता है, वह मस्त रहता है और कोई कर्ज नही होता,
_ क्योंकि जितने में उसका गुजारा हो.. उतना वो ईमानदारी से कमा लेता है.!!
ईएमआई चुकाता आदमी..

वो आदमी,
जिसे तुम दूर से देखते हो और कहते हो –
“क्या बढ़िया आदमी है, सेटल हो गया है!”
जिसके पास एक घर है,
जिसके दरवाज़े पर गाड़ी खड़ी है,
जिसके बच्चे महंगे स्कूल में पढ़ते हैं
मगर कोई उसके भीतर झाँक कर देखे
तो वहां मिलेगा एक आदमी,
जो हर महीने अपनी ही सांसों पर ब्याज भरता है
जो हर महीने अपनी आत्मा की एक किस्त जमा करता है
वो घर जिसे वो अपनी छत कहता है,
असल में वो घर उसकी नींद की गिरवी पर खड़ा है।
हर ईंट पर लिखा है —
“कर्जदार”
हर दीवार पर उकेरा है —
“अधूरा मालिक”
वो गाड़ी जिसे देख कर तुम जलते हो,
असल में वो गाड़ी नहीं,
उसके कर्ज का पहिया है
जो उसे हर सुबह बैंक की ओर घसीटता है
और हर शाम फिर से लौटाता है
खाली जेब, भारी दिल, और एक और दिन की थकान के साथ।
वो आदमी बाजार में सबका चेहरा देखता है
पर भाव नहीं पूछता
क्योंकि वो जानता है
भाव जानकर भी कुछ खरीदना उसके हिस्से में नहीं।
वो सेल के पोस्टर को देखता है,
मन करता है एक खिलौना उठा ले
पर जेब में टकराती ईएमआई की रसीदें
हर ख्वाहिश को कागज़ की तरह मोड़ कर रख देती हैं।
बच्चा पूछता है
“पापा, इस बार मेरी साइकिल पक्की ना?”
वो आसमान की ओर देखता है
मानो ऊपर कोई बैंक हो,
जो किस्तों में खुशियाँ बांटता हो।
बीवी कहती है —
“कब तक खुद को भूलते जाओगे?”
वो मुस्कुरा देता है
क्योंकि खुद के लिए तो उसने
किस्तों में जीना ही सीख लिया है।
वो आदमी
जिसके गुस्से की भी एक कीमत है
कि कहीं नौकरी न छूटे,
कहीं किस्तें न फिसल जाएँ
वो आदमी जो हर महीने खुद से कहता है —
“बस कुछ साल और… फिर चैन आएगा…”
मगर वो जानता है —
ये दौड़ कभी खत्म नहीं होती।
ये किस्तें तुम्हें तुम्हारे सपनों के बहुत पहले
तोड़ कर रख देती हैं
और अंत में,
वो आदमी वही बन जाता है
जो ये समाज सबसे ज़्यादा चाहता है
एक ऐसा आदमी
जो सब कुछ सहता है,
कुछ नहीं कहता।
जो हर महीने अपनी आँखों का पानी
और अपनी आत्मा का चैन
बैंक के खाते में जमा करता है
बिना शोर, बिना आवाज़।
वो आदमी,
जो जीता नहीं है
बस ईएमआई चुकाता है।
कविता : पंकज प्रसून
– Pankaj Prasun

सुविचार – कमाई – Income – Earning – 056

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ठीक है कि हम सभी कमाने के लिए बैठे हैं, क्योंकि हर किसी के पास एक पेट है ;

लेकिन वैध तरीके से कमाएं, ईमानदारी से कमाएं,

_ क्योंकि एक छोटा सा लालच भी हमें बहुत बड़े दुख में धकेल सकता है.

या तो अपनी कमाई के मुताबिक जीना सीखो..

_ या फिर इतना कमाओ कि अपनी हर ख्वाहिश पूरी कर सको.!!

कितना सोचते हैं हम ज़िन्दगी में कुछ अलग करने को,

_ पर ‘कमाते कितना हो’ ने सब बिगाड़ रखा है.!!

आख़िर किस लिये ये “भागा- दौडी”,

आख़िर किस लिये ये “आपा- धापी” , , ?

किस लिये ये बेईमानी , ये चोरी , ,

आख़िर किस लिये ये सीना -जोरी ?

आख़िर क्यूं गरीबों को सताना ? ?

आख़िर क्यूं मजदूरों का हक़ मारना ? ?

आख़िर क्यूं “हराम” के ख़ाने की आदत डालना ?

आख़िर क्यूं दूसरे को “नीचा” दिखाना ?

आख़िर क्यूं बैंकों को “काली” कमाई से भरना ? ?

पीढ़ीयों का तो छोड,

भरोसा नहीं तेरा “कल” का ! !

जब वो “अन्तिम घड़ी” फनफनाती हुई आयेगी,

ये काली कमाई धरी कि धरी रह जायेगी ! !

ये रिश्ते ये नाते कुछ काम ना आयेंगे.,

सिर्फ़ तेरे अच्छे और बुरे “कर्म” ही आड़े आयेंगे ! !

फ़िर “काल” अपना असली रूप दिखाएगा ,

फ़िर तू ख़ून के आँसू रो- रो के पछताएगा ! !

” पंछी” फिर एक पल में आज़ाद हो जायेगा ,

तेरे अपने ही, तेरे “पिंजरे” को आग लगा देंगे ,

पल दो पल आँसू बहाकर, अगले ही दिन तुझे भुला देंगे ! !

जब तेरा ये “मण” भर का शरीर,

एक मुट्ठी राख में बदल जायेगा , ,

तब तेरा मन का सारा वहम पल में ” फुर्र” हो जायेगा ! !

इसलिए दोस्तों आप सभी से अनुरोध है कि शुभ कमाई करिए,

सिर्फ दरवाज़ो पर शुभ- लाभ लिखने से कुछ नहीं होगा !

शुद्ध विचार रखिए, अपने लिये भी और दूसरों के लिये भी ! !

सबकी भलाई के लिये सोचो, ख़ुश रहिये, तनावमुक्त रहिये ! !

छोटी- छोटी बातों में नाराज़ मत होइये ! ! आख़िर क्या साथ जाना है !

लाखों भले ही न कमाओ.. पर इतना ज़रूर कमाओ कि अपने खर्चे खुद उठा पाओ.!!

_ खुद की कमाई से कम खर्च हो.. ऐसी जिंदगी बनाओ.

कमाई की कोई निश्चित परिभाषा नहीं होती..

_ अनुभव, रिश्ते, मान-सम्मान, अच्छे मित्र ..ये सब भी हमारी कमाई के ही रूप हैं.

कमाना ही पड़ेगा.. क्योंकि अब रिश्ते भी तभी टिकते हैं जब जेब में कुछ हो.!!
दो चीज कमाई अब तक की उम्र में …!

_ एक मीठा सा धोखा, और दूजा ! झूठी सी आशा ..!!

कितना सोचते हैं हम ज़िन्दगी में कुछ अलग करने को,

_ ‘पर कमाते कितना हो’ ने सब बिगाड़ रखा हैं.!!

कमाने में इतना मत खो जाना कि जीना ही भूल जाओ.!!
“जब कमाई कम हो और साथ ज़िम्मेदारियाँ भी चल रही हों”

_ किराया देना है, बिजली का बिल है.
_ घर के रोजमर्रा के खर्चे हैं और सबकी ज़रूरतें हैं.
_ इलाज, गाड़ी, समाज सब कुछ चलता रहता है.
_ कमाई कम खर्च ज्यादा है, पर जीवन रुका नहीं है, यही सबसे बड़ी मार है.
“घर का चूल्हा दर्शन से नहीं जलता”
_ जब ऐसे ही चलता रहे, तो केवल हौसला काफी नहीं होता.
_ घर बस इतना पूछता है “आज खर्च कैसे चलेगा ?”
_ यहीं से भीतर का तनाव शुरू होता है.
_ घरवाले सवाल करने लगते हैं.
_ जो कभी भरोसा करते थे, अब सलाह देने लगते हैं और सलाह में ताना छुपा होता है.
_ पेट और सम्मान दोनों साथ चोट खाते हैं.
“भीतर की सच्चाई और बाहर की मजबूरी”
_ यह व्यक्ति भीतर से साफ है, गलत करने की हिम्मत नहीं है.. पर खाली जेब भी साहस तोड़ देती है.
_ यहीं मन सवाल पूछता है – “क्या सही होना ही गलत है ?”
“क्या ईमानदारी की यही कीमत है ?”
— प्रेरणा कुछ समय के लिए सहारा देती है, लेकिन घर के खर्च, ज़िम्मेदारियाँ और जीवन का बोझ नहीं उठाती.
_ जब जेब में पैसा नहीं होता, तो सिद्धांत भारी लगने लगते हैं.
_ पैसा सिर्फ सुविधा नहीं देता, वह रिश्तों को भी स्थिर रखता है और घर में शांति भी खरीदता है.
_ “समझदारी बिना टूटे जीने की कला है”
_ आज के समय में ईमानदारी के साथ समझदारी भी चाहिए.
– उदाहरण के तौर पर : खर्च कम करना भी साहस है,
_ स्तर बदलना भी रणनीति है,
_ छोटे काम स्वीकार करना भी समझ है,
_ समय पर रुक जाना भी हार नहीं..
_ हर बड़ा सपना, हर समय पूरा हो.. यह ज़रूरी नहीं.
_ कभी–कभी पीछे हटना- परिवार को बचाने के लिए होता है.
_ जीवन हर व्यक्ति से अलग सौदा करता है.
“किसी को सब कुछ देकर भी अकेला छोड़ देता है.
किसी से बहुत कुछ लेकर भी उसे भीतर से बचा लेता है.”
_ जीवन में कुछ नुकसान- सिर्फ पैसे का नहीं होता,
_ कुछ नुकसान हमें यह सिखाने आते हैं कि -हम कौन–सा नुकसान सह सकते हैं और कौन–सा नहीं..
_ घर चलाना ज़रूरी है..
_ ज़िम्मेदारियाँ असली हैं..
_ दबाव वास्तविक है..
_ और इन्हीं के बीच मनुष्य को तय करना होता है कि वह किस कीमत तक जाएगा
और किस कीमत पर रुक जाएगा.
_ यही निर्णय उसे अंदर से बनाता है या तोड़ देता है.!!
– Rahul Kumar Jha
किसके लिए कमा रहे हो, कोई बेटा पिता को ड्रम में भरे दे रहा, कोई बंद कमरे में सड़ा गला जा रहा, किसी के बच्चे अंतिम संस्कार भी विदेश से ऑनलाइन करवा देते हैं ?

_ किस पीढ़ी के लिए, किन बच्चों के लिए, किस परिवार के लिए खुद को मशीन बना कर दिन रात अपनी जिंदगी धुआं करे जा रहे हो ?
_ किसने ये कह कर संसार में भेजा था कि गधे की तरह दिन रात काम करना, घर परिवार बीबी बच्चों के लिए खुद को गला देना और बुढ़ापे में सबके ताने सुनना या बच्चों को बाहर भेज कर खुद लावारिश हो जाना ?
_ किसने कहा था कि बहुत पैसा कमा कर बच्चों के लिए छोड़ जाना है, 4 पीढ़ियों के लिए भी जोड़ जाना है, किसने कहा था कि सबके लिए जीना है पर खुद के आनंद मस्ती सुकून के लिए बिल्कुल ध्यान न देना ?
_ जितनी जल्दी ये बात समझ में आ जाए उतना अच्छा है.
_ हम इस दुनिया में रहने नहीं आए बल्कि यहां से बस गुज़र रहे हैं, और एक दिन गुज़र जाएंगे.
_ आप ने किसके लिए कितना कुछ किया, कितना दूसरों के लिए संघर्ष किया, दर्द झेला तनाव लिया, एक समय बाद इन सब बातों का कोई मतलब नहीं रह जाता है.
_ मतलब रह जाता है तो बस ये कि आप इस दुनिया में मौज में रह पाए या नहीं ?
_ आप अपने तरीके, अपने ढंग से जिंदगी जी पाए या नहीं ?
_ या बस इस धरती पर आकर बिना आनंद के ही वापस लौट गए ?
– Sunita

सुविचार – धोख़ा – धोखा – छल – 055

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कुदरत जब किसी के साथ किये गए धोखे की सजा देती है तो, _

_ याद रखना, बोलने लायक तो दूर, इंसान को रोने के काबिल भी नहीं छोड़ती.

जो इंसान खुद बोलकर अपने ही कहे हुए शब्दों से मुकरता है, _ उस इंसान पर कभी विश्वास ना करना ;

_ वो इंसान वक्त पर आपको धोखा देगा..

लोगों के मंसूबे और उनकी चाल उनके शब्द में ही छिपे होते हैँ,

_ अपने जीवन में ईमानदारी और सात्विकता को सर्वोच्च स्थान दें, तो आप उन लोगों को आसानी से पहचान लेंगे.. जो आपकी पीठ पीछे आपको छल-कपट-धोखा देते हैं.!!

अगर कोई आपको धोख़ा दे रहा है तो देने दो, धोख़ा दे चुका है तो शांत रहो ;

_ क्योंकि अगर आप को समय और खुद पर भरोसा है तो..
_ अफ़सोस कीजिए उस के लिए ..जिसने आपको धोख़ा दिया है,
_ क्योंकि वो मूर्ख ये नहीं जानता कि.. उसने एक अच्छे इंसान को खो दिया है.!!
अगर आप किसी को धोखा देने में कामयाब हो जाओ तो वो व्यक्ति को मूर्ख मत समझो…

… महसूस करो कि उस व्यक्ति ने आप पर आपकी योग्यता से कहीं अधिक भरोसा किया.

धोखा कोई कितना भी दे दे अपनो को _ एक दिन दुख ही पायेगा, _

_ चैन किसी का छीन कर _ कोई कितना जश्न मनाएगा.

धोखा खाने वाला उतना नहीं खोता,_जितना धोखा देने वाला खोता है.!!
जीवन में कोई मनुष्य किसी से इतना धोखा नहीं खाता, जितना कि अपने आप से.
दिल दुखता है जब एहसास होता है कि जमाने में सब चीज़ों में मिलावट है..

_ सिर्फ़ धोखा ही बिना मिलावट का मिलता है.!!

धोखा देने से धोखा खाना बेहतर होता है.

_ धोखा खाने में कुछ आर्थिक नुकसान ही होता है, धोखा देने से आत्मा का पतन होता है.

जो धोखा दे गया उसकी यादों में मरने से हज़ार गुना अच्छा है, _

_ जो साथ है उसके साथ सुकून से जी लिया जाये.

धोखा उन्हीं को मिलता है, जो अपनी कमजोरियों को _

_ हर किसी के सामने तुरन्त उजागर कर देते हैं !!!

धोखा देने की परंपरा सदियों से चली आ रही है… और ऐसे ही चलती रहेगी,

_बस तरीके और नजरिए बदलते रहते हैं.

धोखा देने वाले को शायद कोई अफ़सोस न हो,

_ लेकिन कुदरत उसके लिए अफ़सोस लिख देती है.!!

जो औरों को धोखा देता है..

_ उसकी अपनी कहानी ही ख़त्म हो जाती है.!!

जिसने ये पाठ पढ़ लिया हो कि धोखा खा लूंगा,

_धोखा दूंगा नहीं उसे किसी परिस्थिति से घबराने की ज़रूरत नहीं.

अगर आप वफ़ादारी की क़ीमत ही नहीं जानते हो तो..

_ आपको धोखे से होने वाले नुक़सान का अंदाज़ा कभी नहीं हो सकता.!!

अगर किसी को तकलीफ़-धोखा देने की नीयत है, तो दीजिए कोई बात नहीं.

_ किसी से कोई वादा करके उसे तोड़ दिया ?और आपको फर्क भी नहीं पड़ रहा ? ठीक है, जो कर रहे हैं करते रहिए.
_ लेकिन एक बात याद रखिए ये सब कुछ आपकी ज़िंदगी में कई गुना होकर वापस आएगा.!!
झूठ, धोखा और बहाने आप को कुछ पल की ख़ुशी तो दे सकते हैं..
_ लेकिन इसकी क़ीमत आप को भविष्य में चुकानी पड़ेगी.!!!
धोखा खाने से मत डरो, क्योंकि इंसान की असली पहचान मीठी बातों से नहीं ;
_ बल्कि बुरे वक्त में उसके व्यवहार से होती है.!!
धोखे से कभी सच्चा सुख नहीं मिलता..

_क्योंकि वक्त आने पर तकदीर की चोट सबसे ज्यादा अंदर तक लगती है.!!
किसी अपने से मिला धोखा सिर्फ दिल नहीं तोड़ता, बल्कि भरोसे की जड़ें भी उखाड़ देता है और ऐसी जड़ें दोबारा नहीं जमतीं.
धोखा किसी एक ने दिया था.. पर अब तो हर मुस्कान में चाल नज़र आती है..!
सबसे बड़ा धोखा वही देते हैं, जिन पर आप सबसे ज़्यादा भरोसा करते हैं.
_ इसलिए “ना” कहना सीखें और अपनी सीमाओं को तय करें.!!
कुछ लोग इतने गरीब होते हैं की…_ देने के लिए कुछ नहीं होता तो धोखा दे देते हैं…
छल और धोखा आज नहीं तो कल रंग लाएगा और आपको बर्बाद कर जायेगा.!!
आदमी में अपने आप को धोखा देने कि शक्ति, दूसरों को धोखा देने से अधिक होती है.
धोखे से और धोखे में जीने से अच्छा है, अकेले जिओ ; सकून से जिओ.
धोखा कभी मरता नहीं _ आज आप दोगे _ कल आपको भी मिलेगा…!!
ज़िंदगी में कुछ चीज़ें बर्दाश्त नहीं होतीं, और धोखा उनमें से सबसे बड़ी चीज़ है.!!
अच्छे लोगों को धोखा देने वाले, _अपने साथ बहुत बुरा करते हैं..!!
धोखे का दाग नहीं मिटता, भूल का दाग मिट जाता है..!!
धोखा देना वाला हमेशा खुद को ही छलता है.
धोखा बहुत भारी होता है, ये भरोसे को उठा देता है !!

सुविचार – पृथ्वी – प्रकृति – कुदरत – अस्तित्व – सृष्टि – नेचर – Nature – पर्यावरण – Environment – 054

प्रकृति स्वागत करते हुए हमारी ओर बढ़ती है, और हमें उसकी सुंदरता का आनंद लेने के लिए कहती है; लेकिन हम उसकी चुप्पी से डरते हैं और भीड़ भरे शहरों में भाग जाते हैं, _वहां एक क्रूर भेड़िये से भागती भेड़ों की तरह छिपने के लिए.!!

Nature reaches out to us with welcoming arms, and bids us enjoy her beauty; but we dread her silence and rush into the crowded cities, there to huddle like sheep fleeing from a ferocious wolf. – Khalil Gibran

यदि हम पृथ्वी को बर्बाद कर देंगे तो जाने के लिए कोई जगह नहीं बचेगी.

अगर हम पृथ्वी के लिए नहीं बोलेंगे तो कौन बोलेगा ? यदि हम अपने अस्तित्व के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं, तो कौन होगा ?

If we ruin the earth, there is no place else to go.

If we do not speak for Earth, who will ? If we are not committed to our own survival, who will be ?- Carl Sagan

आज लोग भूल गए हैं कि वे वास्तव में प्रकृति का ही एक हिस्सा हैं.

_ फिर भी, वे उस प्रकृति को नष्ट कर देते हैं, जिस पर हमारा जीवन निर्भर है.
_ वे हमेशा सोचते हैं कि वे कुछ बेहतर बना सकते हैं… वे यह नहीं जानते, लेकिन वे प्रकृति को खो रहे हैं.
_ वे यह नहीं देखते कि वे नष्ट होने वाले हैं.
_ इंसान के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है साफ़ हवा और साफ़ पानी.!!

People today have forgotten they’re really just a part of nature.

Yet, they destroy the nature on which our lives depend.

They always think they can make something better… They don’t know it, but they’re losing nature.

They don’t see that they’re going to perish. The most important things for human beings are clean air and clean water. – Akira Kurosawa

प्रकृति एक स्व-निर्मित मशीन है, जो किसी भी स्वचालित मशीन से भी अधिक पूर्णतः स्वचालित है.

प्रकृति की छवि में कुछ बनाने का मतलब एक मशीन बनाना है, और प्रकृति की आंतरिक कार्यप्रणाली को सीखकर ही मनुष्य मशीनों का निर्माता बना.

Nature is a self-made machine, more perfectly automated than any automated machine. To create something in the image of nature is to create a machine, and it was by learning the inner working of nature that man became a builder of machines. – Eric Hoffer

“पूरी पृथ्वी एक है – और मैं उससे अलग नहीं हूँ. _ शब्द सीमित हो सकते हैं, पर यह जुड़ाव असीम है.”

– मुझे दुनिया से जुड़ने के लिए भाषा नहीं चाहिए, मैं पहले से ही उसका हिस्सा हूँ.
_ मैं कोई विदेशी भाषा नहीं बोल पाता, फिर भी मेरे भीतर यह गहरी अनुभूति है
कि पूरी पृथ्वी एक है – और मैं उससे अलग नहीं हूँ.
_ यह धरती मेरी है, और मैं इस धरती का हूँ.
_ शब्द सीमित हो सकते हैं, पर यह जुड़ाव असीम है.!!
ख़ुद को बचाना है तो प्रकृति के क़रीब रहिए वर्ना एक दिन इंसान पत्थर बन जाएगा.

_ आप कहीं भी कुछ भी कर रहे हों स्वयं को प्रकृति से जोड़े रखिए.
_ पौधों से बातें कीजिए, फूलों की सुगंध लीजिए, हरी पत्तियों की मुस्कुराहट देखिए, तितलियों की चंचलता निहारिए, हवाओं का स्पर्श महसूस कीजिए,
_ जो अच्छा लगे कीजिए किन्तु दिनचर्या के एक हिस्से में प्रकृति के सान्निध्य को स्थान दीजिए.
_ आने वाले समय में सुकून का एक मात्र यही एहसास आपको जीवंत रखेगा.
नोट -मेरे कमरे के बाहर मौजूद फूल, पत्तियां, तितली, गिलहरी, चिड़ियाँ सुबह – सुबह मुझे देख मुस्कुराते हैं और मैं आनंद में डूब जाता हूं। मेरे कमरे में झाँकती प्रकृति रोज सुबह आवाज़ लगाती है – अरे उठो यार, देर हो रही……….
– Anand Sharma
”पर्यटन स्थलों के व्यापारीकरण और वहां बढ़ती भीड़ ने सब जगह _ऐसी बदसूरती फैला दी है कि _अब प्राकृतिक सौंदर्य कहीं नहीं बचा, केवल प्रसिद्धि बच गई है _जिसे देखने के लिए लोग उमड़ पड़ते हैं.”

—इससे आगे की बात और भी ज़ोरदार है: सैलानियों को देखकर ऐसा लगता है _जैसे वे घर से ‘मार्केटिंग’ करने के लिए निकले हैं _या फिर खाने-पीने;__ प्रकृति का सौंदर्य देखने तो कतई नहीं.”

हम अपने घरों में कभी कचरा नहीं डालते या जोर से कुछ नहीं करते, लेकिन जैसे ही हम सड़कों पर निकलते हैं,

_ ऐसा लगता है _ जैसे हमारे पास हर खूबसूरत चीज को बर्बाद करने का लाइसेंस है !!
_ हमें चार दीवार वाले घरों के विचार से विकसित होना चाहिए, जहां हम रहते हैं _ और जिसे हम साफ़ और खूबसूरत रखते हैं..!!
_ जब तक हमें यह पृथ्वी अपना घर नहीं लगता _ तब तक हम इसे प्रदूषित करना बंद नहीं करेंगे.!!!
प्रकृति के द्वारा बनाए गए संतुलन को बिगाड़ने की कोशिश की जाने पर प्रकृति की प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है,

_ दूसरी तरफ इंसान खुद की जिम्मेदारियों को भूलता जा रहा है कि उसे क्या करना चाहिए,
_ असंतुलित निर्णय केवल समस्याओं का द्वार खोलते हैं, खुशहाली और भलाई का नहीं.!!
इंसान ने कभी सोचा भी नहीं था कि पहाड़ों और मैदानों में नदियों- नालों के लिए जगह न छोड़ना इतना महंगा साबित होगा.

_ सबसे पहले, प्रकृति को रास्ता देना चाहिए था.. लेकिन हम खुद ही उसके रास्ते में आ गए और जम कर बैठ गये हैं.
_ प्रकृति बचाओ, खुद को बचाओ.!!
बुद्धिमान व्यक्ति अस्तित्व या किसी से भी महत्व की माँग नहीं करता.

_ वह बस उसका हिस्सा बन जाता है..!!
“प्रकृति के बीच बिताया गया समय कभी व्यर्थ नहीं जाता, वह चुपचाप हमें वापस हमसे मिला देता है.”
सृष्टि अजीब है बहुत, इंसान सबसे बेहतर प्राणी ! क्या सच में !
_ या इंसान सबसे बदतर प्राणी ??
मनुष्य को छोड़कर संपूर्ण अस्तित्व नृत्य कर रहा है.
_ संपूर्ण अस्तित्व अत्यंत सहज गति में है ; गति तो निश्चित रूप से है, पर वह पूर्णतः सहज है.
_ वृक्ष बढ़ रहे हैं, पक्षी चहचहा रहे हैं, नदियाँ बह रही हैं, तारे गतिमान हैं : सब कुछ अत्यंत सहजता से चल रहा है.
_ न कोई हड़बड़ी, न कोई चिंता, न कोई अपव्यय..- सिवाय मनुष्य के.
_ मनुष्य अपने मन के वश में हो गया है.!!
प्रकृति जो बहुत सुंदर है, पर हम सब अपने दुःख अपनी उदासी में इतने खो गए हैं कि कुछ देख ही नहीं पाए,

_ उगता सूरज, ढलती शाम, आसमाँ में खिलता चाँद, कल-कल करती नदियाँ, कुछ नहीं,
_ बस अपने दुःखों में दब गए और उनके साथ ही यहां से विदा हो जाएँगे..!!
दुनिया को विज्ञान कितना भी विकसित और सुखद बना दे,

_ लेकिन मानसिक शांति आज भी प्रकृति की गोद में ही मिलती है.

प्रकृति ने सबसे ज्यादा सोचने समझने की शक्ति मनुष्यों को दी है,

_ लेकिन अफ़सोस की हम उसका इस्तेमाल ही नहीं कर रहे.!!

धरती का अर्थ है साधारण होना ; यहाँ कोई विशेष नहीं है.

_ यह सभी लोगों का स्थान है.!!

हमारी नजरों से परे इस बोझिल सी दुनियां में हमारे आसपास कितना कुछ खूबसूरत सा घटित होता रहता हैं… बस ज़रूरत है हमारे ऑब्जर्वेशन की ..!;
हमें शांति कहीं न कहीं कुदरत की आयमो में ही मिलती है,

_ हम फ़िज़ुल ज़रूरत हो या देखा देखी में फंस गए हैं.

_ शांति अकेले या अपने भीतर होने में ही मिलती है.!!

पहाड़ पर रहने का मन, समंदर किनारे टहलने की चाहत,नदी किनारे पांव डालकर बैठने की इच्छा..

_ दुनिया में इतना सब बनाने के बावजूद इंसान को सबसे ज़्यादा खुशी उन्हीं चीज़ों से, मिलती है जो
प्रकृति ने पहले से दे रखी हैं.!!
नेचर के बीच समय बिताने से सिर्फ तनाव ही दूर नहीं होता बल्कि आपके दिमाग का भी विकास होता है,

इसलिए दिन का क़ुछ समय नेचर के बीच बिताएं.

प्रकृति की तरह सरल और सादे बने रहने का लछ्य रखें ; सादगी ही उसका जीवन है, _

_ प्रकृति के साथ सामंजस्य की अवस्था में आने के लिए हमें अपनी जटिलताओं को पूरी तरह से समाप्त करना होगा.

यदि आप नेचर के करीब रहेंगे, तो इसकी सादगी के लिए, छोटी-छोटी चीजों के लिए जो शायद ध्यान देने योग्य हैं, तो वे चीजें अप्रत्याशित रूप से महान और अथाह बन सकती हैं.

-“प्रकृति के संपर्क में रहने से आपको अपने अंदर आशा खोजने में मदद मिल सकती है.”

प्रकृति में हर ओर आनन्द ही आनन्द फैला पड़ा है, लेकिन हमारा ध्यान..

_ केवल अपने अभावों और दूसरों की समृद्धि पर लगा रहता है.

एक इंसान के अलावा बाकी सारी चीजें वैसी ही हैं.. जैसी वे दिखती हैं..!!
प्रकृति ने सिर्फ दो ही विकल्प दिए हैं या तो देकर जाऐं या फिर छोड़कर जाऐं, साथ ले जाने की कोई व्यवस्था नही है.!!
जब हम अप्राकृतिक जीवन जीने लगते हैं तो कई मानसिक रोगों के शिकार हो जाते हैं.

When we start living unnaturally, we become victims of many mental diseases.

जब प्रकृति अपने सबसे अच्छे रूप में होती है, तो यह एक मंत्रमुग्ध कर देने वाली घटना प्रदर्शित करती है ;

_जहां आकाश अपना बहुमूल्य पानी बरसाता है; यह भूमि तक पहुंचता है और हर चीज में से रिसकर पृथ्वी पर नया जीवन लाता है.

” प्रकृति न्यायप्रिय है,” हर व्यक्ति को उसके जीवन में एक मौक़ा ज़रूर देती है _ यह हम पर निर्भर है कि उस मौक़े का क्या करते हैं ?
प्रकृति को साहस प्रिय है. _आप प्रतिबद्धता बनाते हैं और प्रकृति असंभव बाधाओं को दूर करके उस प्रतिबद्धता का जवाब देगी. असंभव सपना देखो और दुनिया तुम्हें कुचल नहीं देगी, बल्कि ऊपर उठा देगी.

Nature loves courage. You make the commitment and nature will respond to that commitment by removing impossible obstacles. Dream the impossible dream and the world will not grind you under, it will lift you up. – Terence McKenna

यदि हम नेचर की बुद्धिमत्ता के सामने आत्मसमर्पण कर दें तो हम पेड़ों की तरह जड़ पकड़ कर ऊपर उठ सकते हैं.
प्रकृति से जुड़ जाओ…_  फ़िर किसी व्यक्ति विशेष से जुड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी !!!

– अगर हम प्रकृति में कोई खामी ढूंढ रहे हैं तो इसका सीधा सा मतलब है कि हमने प्रकृति को अभी तक नहीं समझा है..!!

प्रकृति सब को साथ ले कर चलती है, लोग प्रकृति के साथ नहीं चलते ;

_ बस, यही विडंबना है..!!

यदि हम पर्याप्त रूप से जागरूक नहीं हैं,

..तो हम इस प्रकृति की सुंदरता को कभी नहीं जान पाएंगे.!!

दुनिया कितनी भी तरक्की कर ले, _ लेकिन कुदरत का मुकाबला नहीं कर सकती..
प्रकृति सुंदर अजूबों से भरी हुई है लेकिन जब हमारे पास उन्हें देखने के लिए क्षण हों..
प्रकृति और पशु पक्षियों से निकटता आपको और अधिक मानव बनाती है.!!
इंसानों द्वारा बनाई चीज़ों से 24 घंटे घिरे रहने की वजह से आपको चिंता, तनाव, डिप्रेसन होता है ;

और नेचर द्वारा बनाई चीज़ों के बीच रहने से दिमाग शांत होता है, इसलिए दिन का कुछ समय नेचर के साथ बिताएं.

-“जब आप उदास महसूस कर रहे हों तो _प्रकृति की सुंदरता का आनंद लेने के लिए समय निकालें.”

सुबह उठो, प्रकृति से कुछ पल के लिए रूबरू हो..ओस के टपकते बूंदों को महसूस करो… व्यायाम करो.. ध्यान लगाओ.. प्रार्थना करो…

रुकी हुई जीवन की शुरुआत करने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है… संघर्ष ही एकलौता सत्य है…!!!

सुबह उठकर पेड़ पौधों के बीच बिना फोन के जाईये… बिल्कुल सचेतन मन से हवाओं, पक्षियों की चहचाहट एवम प्रकृति के ठंढ़ेपन को महसूस करिये…

_ आस पास एवम आपके भीतर होने वाले गतिविधियों के प्रति सचेत होकर उनका अवलोकन करिये…महसूस करिये की आप कौन हैं …!!!

घास के तिनके जो थे बेकार कूड़े में शुमार,

_ चंद पक्षियों के हुनर से आशियाने हो गए..!!

जीवन के सारे निर्णय हमारे नही होते..

_ कुछ प्रकृति के और कुछ समय के अधीन होते हैं.!!

हरियाली हो, पानी बहता हो, फूल हो, पछी चहचहाते हों — ऎसे स्थान पर बैठने से तनाव दूर होता है.

शान्ति पाने के लिए स्वयं को प्रकृति प्रेमी बनाइए.

” कुदरत के साथ तालमेल क्यों बढ़ाएँ “

जब इंसान कुदरत की सुंदर व्यवस्था का लाभ लेकर, उसे वरदान बनाने की कला सीख जाएगा,

तब उसके रिश्ते और स्वास्थ्य अच्छे हो जाते हैं.

प्रकृति में सब कुछ हमारा होते हुए भी कुछ नहीं है हमारा..

_क्योंकि ना कुछ लेकर आए थे ना कुछ लेकर जाएंगे.

कुछ भी बुरा नहीं है जो प्रकृति के अनुसार हो.!!

Nothing is evil which is according to nature.

अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रकृति के सुन्दर दृश्य, चाँद- तारों, नदियां, पेड़- पौधे तथा पछियों के सानिध्य में रहें

और शुद्ध प्राणवायु को ग्रहण करें.

यह बहुत अदभुत बात है, _ लाओत्से यह कह रहा है कि इस जगत में तुम कुछ भी करो, यह जगत हर हालत में तुमसे प्रसन्न है.

हर हालत में, अनकंडीशनल, कोई शर्त नहीं है कि तुम ऐसा करो तो अस्तित्व प्रसन्न होगा, और तुम ऐसा नहीं करोगे तो अस्तित्व नाराज हो जाएगा.

अस्तित्व हर हालत में प्रसन्न है..

आपके कार्य का स्वरूप कैसा है ?

हमारे कार्यों की ‘ सहजता ‘ से पता चलता है कि हम सही दिशा में हैं या नहीं ;_

_ गलत दिशा में जाते ही कुदरत का धक्का लगता है ताकि हम सही दिशा की ओर मुड़ जाएँ..

विभिन्न कार्यों में स्वयं को आप इतना भी व्यस्त न कर लें

कि आपके आस- पास स्थित प्रकृति को देखने हेतु आपके पास दो छण भी न हों.

प्रकृति का सौन्दर्ये सरल है, पर फिर भी खूबसूरती उसकी सबसे अलग है,

इसलिए नहीं की जा सकती किसी चीज़ से इसकी तुलना..

पहाड़ की सुंदरता उन लोगों के लिए नहीं है जो इसे ऊपर से देखते हैं,

_ पहाड़ की सुंदरता केवल उन्हीं को पता चलती है जो उस पर चढ़े हैं.!!

प्रकृति की प्रत्येक वस्तु अनमोल और अमूल्य है,

मनुष्य उसे अपने स्वार्थ के लिए अनमोल का मोल लगा कर बेच देता है.

सुबह जल्दी उठ जाने मात्र से ही ज़िन्दगी के कई मसले सुलझ सकते हैं…

_ कोशिश ये रहे कि कुछ देर प्रकृति में बिताया जाए…!!!

“प्रकृति के सानिध्य में रहने से हमें जीवन के उपहारों का पता लगाने में मदद मिलती है.”

कुछ लोगों को हम नहीं चुनते.. बल्कि ये सृष्टि ही उन्हें चुनकर हमारे लिए भेजती है..

_इस तरह के साथ को ही Divine Power कहते हैं.!

जब कोई सहारा नहीं होता तब… कुदरत सहारा बन जाती है..

_ बस इरादे और नियत नेक होनी चाहिए.!!

प्रकृति को दिखावे की आवश्यकता नहीं,,, जो सुंदर है वो स्वयं प्रत्यछ है.
प्रकृति, समय और धीरज _ ये तीनों ही महान चिकित्सक हैं.
” प्रकृति हमें कभी धोखा नहीं देती, यह हम हैं जो खुद को धोखा देते हैं. “
प्रकृति एक बात सिखाती है..- उसे जगह दी जाए या नहीं, वो अपनी जगह खुद बना लेती है.!!
जो प्रकृति का आनंन्द है इसे कोई नाम नही दिया जा सकता,

सिर्फ अनुभव किया जा सकता है.

प्रकृति अपरिमित ज्ञान का भंडार है, परंतु उससे लाभ उठाने के लिए अनुभव आवश्यक है.
प्रकृति के नियम के अनुसार प्रत्येक चीज़ वापस अपने स्त्रोत की ओर चली जाती है..
प्रकृति के नियमों को कोई नहीं बदल सकता.. एक ही मार्ग है _ खुद को बदलो..
हम जो खो देते हैं कुदरत उससे पहले ही बेहतरीन चुनकर हमारे लिए रखती है..
सुबह उठकर प्रकृति की ताजग़ी को महसूस करो…चहचहाती पक्षियों की आवाज़ सुनो..बसंत में बहती ठंढी हवाओं को समेट लो ..

नीले आसमान को देखो… पूरब की ओर से उगती सूर्य की लालिमा देखो… यह सब हमारे लिए ही हैं…

प्रकृति ने हमें जीने के लिए कितने खूबसूरती वरदान दिए हैं, इसे महसूस करो…

जो सकारात्मकता सुबह-सुबह प्रकृति में मिलती है…

_ वह आपको घर के आरामदायक क्षेत्र में और फोन के डब्बे में कभी नहीं मिल सकती….!!!!

सारा जगत स्वतंत्रता के लिए लालायित रहता है फिर भी प्रत्येक जीव अपने बंधनों को प्यार करता है.

यही हमारी प्रकृति की पहली दुरूह ग्रंथि और विरोधाभास है.

कोई भी मनुष्य छण भर भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता, सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और  प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है.
प्रकृति में जो कुछ भी होता है वह व्यक्ति के भीतर भी होता है, क्योंकि एक व्यक्ति पूरी प्रकृति के एक खंड का नाम मात्र है.

Everything that happens in nature happens inside the individual also, because an individual is only a name for a cross-section of the whole of nature.

हमें प्रकृति का आभारी होना चाहिए कि _उसने उन चीज़ों को खोजना आसान बना दिया है _जो आवश्यक हैं; _जबकि अन्य बातें _जिन्हें जानना कठिन है, _आवश्यक नहीं हैं.

We ought to be thankful to nature for having made those things which are necessary easy to be discovered; while other things that are difficult to be known are not necessary.

कभी – कभी जीवन में कुछ भी समझ में न आ रहा हो तो सब कुछ अस्तित्व एवम प्रकृति पर छोड़ देना चाहिए _

_ उन्हें बेहतर पता है कि हमें ज़िंदा कैसे रखना है ..!!

प्रकृति जब अपने बदले पर आती है तो बेहद क्रूर हो जाती है,

_ प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने वाले नहीं बख्शे जाएंगे.
इंसान ऐसी नायाब कृति है जो पूरी पृथ्वी की सुंदरता का ज़िम्मेदार हो न हो,

_ पर इस पृथ्वी पर फैली हर कुरूपता का यक़ीनन ज़िम्मेदार है.!!
प्रकृति किसी को भी बर्दाश्त नहीं करती है, यदि हम उसका दोहन करेंगे तो वो अपने अनुकूल वातावरण बना ही लेगी..!!
नदियों को कोई साफ न कर पाए तो कोई बात नहीं, बस गंदा न करें तो वो खुद से ही साफ हो जाएंगी.

… ऐसे ही जंगल को भी … ऐसे ही मन को भी…

_ गंदगी से जितना दूर रखें ..खुद को तो ..मन और पर्यावरण [ Environment ] दोनों शुद्ध रहेंगे.

मनुष्य के रूप में आप प्रकृति की सर्वश्रेस्ठ रचना हैं,

क्योंकि मनुष्य ही है जो अपनी खामियों को खूबियों में बदल सकता है.

आत्म बल से बड़ी कोई शक्ति नहीं है..

_लेकिन इस बल को जागृत करना केवल वही जानता है,
_जिसने प्रकृति के साथ जीवन जिया है और उसका सम्मान किया है.
_ सारा अस्तित्व आपके साथ चल रहा है,
_आप अकेले होते हुए भी पूरे अस्तित्व के हो.!!
“हमें किसी व्यक्ति के बुरे, गंदे और घृणित व्यवहार से चिढ़कर..

_ अच्छाई और प्रेम पर से विश्वास नहीं खोना चाहिए..
_ और न ही जल्दबाजी में अपना व्यवहार बिगाड़ना चाहिए..
_ प्रकृति पर यकीन क़ायम रखा जाए,
_ वो हमारा ख़्याल रखने में कोई कसर नहीं छोड़ती..!!”
मकान कच्चे थे, धूल मिट्टी रहती थी और बरसात में कीचड़ भी.!

_ लोग घर के बर्तनों में भोजन करते थे, यात्रा में घर का बना भोजन ले जाते थे, पानी मुफ्त मिलता था.
_ समारोहों में कुल्हड़ और पत्तल में भोजन परोसा जाता था.
_ विचित्र बात यह है, इतना सब होकर भी कूड़ा प्रकृति में ही विलीन हो जाता था..!!
” सुबह की ताकत “

दिन की सबसे खूबसूरत शक्ल सुबह होती है. सुबहों का मैं हमेशा से दीदार करता रहा हूँ. अब तक जहां- जहां रहा हूँ, वहां की सुबह बहुत अलग- अलग दर्शन देती रही है. कुछ ना कुछ नया हर जगह की सुबह से सीखने को मिलता है. हर सुबह को जीवन की नयी शुरुआत मान सकते हैं.

कल से क्या मतलब. सुबह आपको आज का एहसास कराएगी. अभी आज इसी समय में रहना सुबह होना है. कल के काल में घटी नकारात्मकता से उबारना सुबह होना है. हर दिन एक नये जीवन का एहसास करना. जैसे कि जो है वो आज से ही शुरू है, कल चाहे जैसा भी रहा हो, आज अच्छा ही होगा. इसका एहसास सुबह है.

ऊर्जा का अनंत एकदिशीय प्रवाह जो सिर्फ आपको ताकतवर बनायेगा. आप को कभी कितना भी कमजोर क्यों ना लगे, बस एक बार सुबह में डूब के देखिए. प्रकृति की तेज बहती हवा में परिश्रम का स्नान सुबह करके देखिये, अपने नये होने का एहसास होगा आपको.

प्रकृति के तीन कड़वे नियम जो सत्य है.

१. प्रकृति का पहला नियम : –

यदि खेत में बीज न डालें जाएं तो कुदरत उसे घास- फूस से भर देती है…!!

ठीक उसी तरह से दिमाग में सकारात्मक विचार न भरे जाएँ तो नकारात्मक विचार अपनी जगह बना ही लेता है…!!

२. प्रकृति का दूसरा नियम : –

जिसके पास जो होता है…!! वह वही बांटता है…!!

सुखी सुख बांटता है….दुःखी दुःख बांटता है….!!

ज्ञानी ज्ञान बांटता है…. भ्रमित भ्रम बांटता है….!!

भयभीत भय बांटता है…….!!

३. प्रकृति का तीसरा नियम : –

आपको जीवन से जो कुछ भी मिले, उसे पचाना सीखो, क्योंकि भोजन न पचने पर रोग बढ़ते हैं….!!

पैसा न पचने पर दिखावा बढ़ता है….!!

बात न पचने पर चुगली बढ़ती है….!!

प्रशंसा न पचने पर अहंकार बढ़ता है….!!

निंदा न पचने पर दुश्मनी बढ़ती है….!!

राज न पचने पर खतरा बढ़ता है….!!

दुःख न पचने पर निराशा बढ़ती है….!!

और सुख न पचने पर पाप बढ़ता है.

जीवन मे एक बार तो सबकुछ ट्राय करना चाहिए, क्या मालूम किसी अविस्मरणीय अनुभव से आप वंचित रह जाए..

बात पैसो की नहीं हैं बल्कि अनुभव की हैं जिसका कोई मूल्य नहीं
बहुत बार मेरे साथ ऐसा हुआ हैं जब मैंने कोई नई चीज ट्राय की ओर तब मैंने जाना कि अगर ये अनुभव छूट जाता तो मैं वो नहीं जान, महसूस कर पाता जो आज किया..
जीवन के आयाम हज़ारों-लाखों हैं ओर हर एक छोटी से छोटी चीज़ भी अपने अंदर अनगिनत रहस्यो को छुपाए हुए हैं.
इंसान के 1000 जन्म भी कम है इस अस्तित्व को जानने-समझने के लिए
हज़ारों वर्षो की लगातार खोजों के बाद भी आज इंसानी सभ्यता सिर्फ थोड़ा बहुत ही जान सकी हैं इस अस्तित्व के बारे में..
नदी से – पानी नहीं, रेत चाहिए

पहाड़ से – औषधि नहीं, पत्थर चाहिए
पेड़ से – छाया नहीं, लकड़ी चाहिए
खेत से – अन्न नहीं, नकद फसल चाहिए
उलीच ली रेत, खोद लिए पत्थर,
काट लिए पेड़, तोड़ दी मेड़
रेत से पक्की सड़क, पत्थर से मकान बनाकर लकड़ी के नक्काशीदार दरवाजे सजाकर,
अब भटक रहे हैं…..!!
सूखे कुओं में झाँकते,
रीती नदियाँ ताकते,
झाड़ियां खोजते लू के थपेड़ों में,
बिना छाया के ही हो जाती है
सुबह से शाम….!!!
और गली-गली ढूंढ़ रहे हैं –
आक्सीजन
फिर भी सब बर्तन खाली l
सोने के अंडे के लालच में, मानव ने मुर्गी मार डाली !!!,
विचार अवश्य कीजिए…!
हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए
प्रकृति का संरक्षण कितना आवश्यक है !
प्रकृति की स्थिति जो है वह बेचैन करने वाली है, और बेहतर है कि अभी भी जो कुछ बचा है, उसे सम्हाल लें.. वरना कुछ भी नहीं बचेगा.!!
हमारे पुराने लोग हम से वास्तविकता में वैज्ञानिक रूप से बहुत आगे थे.
_थक हार कर हमें भी वापिस उनकी ही राह पर वापिस आना पड़ रहा है…
1. मिट्टी के बर्तनों से स्टील और प्लास्टिक के बर्तनों तक और फिर से दोबारा मिट्टी के बर्तनों तक आ जाना..
2. अंगूठाछाप से दस्तखतों (Signatures) पर और फिर अंगूठाछाप (Thumb Scanning) पर आ जाना..
3. फटे हुए सादा कपड़ों से साफ सुथरे और प्रेस किए कपड़ों पर और फिर फैशन के नाम पर अपनी पैंटें फाड़ लेना..
4. सूती से टैरीलीन, टैरीकॉट और फिर वापस सूती पर आ जाना..
5. ज़्यादा मशक़्क़त वाली ज़िंदगी से घबरा कर पढ़ना लिखना और फिर IIM व MBA करके आर्गेनिक खेती पर पसीने बहाना..
6. क़ुदरती से प्रोसेस फ़ूड (Canned Food & packed juices) पर और फिर बीमारियों से बचने के लिए दोबारा क़ुदरती खानों पर आ जाना..
7. पुरानी और सादा चीज़ें इस्तेमाल ना करके ब्रांडेड (Branded) पर और फिर आखिरकार जी भर जाने पर पुरानी (Antiques) पर उतरना..
8. बच्चों को Infection से डराकर मिट्टी में खेलने से रोकना और फिर घर में बंद करके फिसड्डी बनाना और होंश आने पर दोबारा Immunity बढ़ाने के नाम पर मिट्टी से खिलाना..
9. गाँव, जंगल से डिस्को पब और चकाचौंध की और भागती हुई दुनिया की और से फिर मन की शाँति एवं स्वास्थ (Health) के लिये शहर से जँगल गाँव की ओर आना..
इससे ये निष्कर्ष (Conclusion) निकलता है कि Technology ने जो दिया _उससे बेहतर तो प्रकृति ने पहले से दे रखा था..!!
🟥 अस्तित्व बनाम इंसान 🟥

कौन-से नियम सच में आपके हैं ?
सोचिए, क्या आपने कभी सूरज को उगने से रोका है ? या बारिश को सिर्फ इसलिए रोका हो क्योंकि आपके पास छाता नहीं था ?
अस्तित्व के नियम वो हैं जो हमेशा से थे, और हमेशा रहेंगे।
• हवा हर किसी के लिए बहती है।
• गुरुत्वाकर्षण राजा-रंक सबको एक जैसा खींचता है।
• जीवन और मृत्यु का चक्र कभी नहीं रुकता।
अब सोचिए, इंसानों के बनाए नियम:
• “यह पहनना है,” “यह खाना है,” “यह सही और यह गलत है।”
ये नियम समाज ने बनाए ताकि व्यवस्था बनी रहे। लेकिन क्या ये नियम हर समय, हर जगह सही हैं ?
अंतर समझिए:
• अस्तित्व के नियम शाश्वत हैं।
• इंसानों के नियम बदलते रहते हैं।
जो नियम आपको आजादी दे, सहज बनाए और जीवन से जोड़ दे, वो अस्तित्व के हैं।
जो आपको जकड़े और बांधे, वो इंसानों के बनाए हैं।
तो आप किसके साथ चलना चाहेंगे ?
✨ अस्तित्व के साथ बहिए, जिंदगी आसान हो जाएगी। 🌿
शास्त्रों में धर्म का एक अर्थ “ नियम “ भी बोला गया
अस्तित्व के बनाये नियमों के साथ मैत्री स्थापित कर जीना ही धार्मिक इंसान का लक्षण है.
Sakha
दुनिया में किसी खूबसूरत चीज़ को भौतिक आंखों से नहीं देखा जा सकता ना उन्हें भौतिक रूप से छुआ जा सकता है,

_ ना ही उन्हें किसी विशेष भौतिक स्थान पर पाया जा सकता है, वह हमारी बाहरी इंद्रियों से परे होती हैं.
_ प्यार, खुशी, करुणा, रंगों का जिनमें पूर्ण समावेश होता है.. जिन्हें हम सिर्फ़ महसूस कर सकते हैं..
_ और जो इंसान ऐसी खूबसूरत चीजों को महसूस नहीं कर पाता..
_ उसका उन चीजों को देखना या भौतिक रूप से छूना भी कोई मायने नहीं रखता..
– Rhythm Raahi
जितना अधिक आप किसी चीज़ को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं, उतना ही अधिक वह आपको नियंत्रित करती है.
अपने आप को मुक्त करें और चीजों को अपना प्राकृतिक मार्ग अपनाने दें.
The more you try to control something, the more it controls you.
Free yourself and let things take their own natural course.
यह पूरी पृथ्वी पवित्र है, और हर चीज़ हमें कई तरीकों से छूने की कोशिश कर रही है – धूल के माध्यम से, पेड़ों के माध्यम से, पक्षियों, बारिश, जानवरों के माध्यम से – वे सभी हमें जीवन का संकेत दे रहे हैं…

जब हवा चलती है तो रेत उड़कर आंखों में घुस जाती है और आंखें बंद करने पर मजबूर कर देती है जिससे दिल में एक नृत्य सा पैदा हो जाता है. _जब बारिश हो रही होती है, तो बारिश की बूंदें शरीर को कंपा देती हैं और दिव्य प्रवाह का आह्वान करती हैं.

जब सुबह-सुबह पक्षी चहचहाने लगते हैं और फूल अपनी खुशबू बिखेरते हैं और ओस की बूंद जीवन की तरह चमकती है;

_जब नए दिन के स्वागत में क्षितिज पर इतने सारे रंग फैले होते हैं – ये सभी जीवन के प्रतीक हैं.

यदि आप इनके प्रति जागरूक हो जाएं तो आपको दुःख नहीं होगा, आप अत्यधिक आभारी, समझदार, पूर्ण महसूस करेंगे.

आप घर जैसा महसूस करेंगे, आपको शांति महसूस होगी.
प्रकृति आपकी अनुमति नहीं मांगती; इसे आपकी इच्छाओं की परवाह नहीं है, या आपको इसके कानून पसंद हैं या नहीं._आप इसे वैसे ही स्वीकार करने के लिए बाध्य हैं जैसे यह है, और परिणामस्वरूप इसके सभी परिणामों को भी.

Nature doesn’t ask your permission; it doesn’t care about your wishes, or whether you like its laws or not.You’re obliged to accept it as it is, and consequently all its results as well.

– Fyodor Dostoevsky

सुविचार – हॉबी – शौक – 053

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अपने दिन भर के कामों से थोड़ी फुर्सत निकाल कर कुछ वक्त अपने हॉबी को भी दें.

_ इससे आत्मसंतुष्टि और खुशी मिलेगी.

हॉबी का मतलब है ऐसा काम, जिसे करने में आपको मजा आए, _ जिसके बारे में आप और जानना – सीखना चाहो.

आप नृत्य, गायन, संगीत, पेंटिंग, स्पोर्ट्स, राइटिंग आदि में से किसी को भी चुन सकते हैं.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने आप के लिए समय निकालें ..*

… *अपने दोस्तों के साथ संपर्क में रहें … बात करें, हंसें और आनंद लें*

*अपने शौक़ पूरे करो, अपने जुनून को जियो, अपनी जिंदगी को जियो*

*कभी कभार वो उन चीजों को करें जो करने में हमें मज़ा आता है …*

  • दूसरों में अपनी ख़ुशी मत देखो, *आप भी कुछ खुशियों के हकदार हो* क्योंकि अगर आप खुश नहीं हो तो आप दूसरों को खुश नहीं कर सकते, _

    _ हर किसी को आपकी ज़रूरत है, लेकिन आपको भी अपनी देखभाल और प्यार की ज़रूरत है ;

    _ *हम सभी के पास जीने के लिए केवल एक ही जीवन है* _ “* ज़िन्दगी बहुत ख़ूबसूरत है *”

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