सुविचार – खर्च – बचत – 035

अगर बदल न सकूं अपने पुराने कपड़े.. तो रफू करने की काबिलियत जरुर देना मेरे मालिक..
_ सुना है बाजार में मंहगाई बहुत हो गयी है.!!

– Tejbeer Singh sadher

घर खर्च की जरूरतें उतनी ही रखो, जितना कमा रहे हो.

_ यहाँ उधार माँग कर पैसे किसी से, क्यूँ काम चला रहे हो॥
_ घर खर्च की जरूरतें उतनी ही रखो, जितना कमा रहे हो.
_ किसी के आगे रोना धोना, किसी के आगे हाथ फैलाना,
_ माँगे गए उधार के पैसों से, अपने घर का खर्च चलाना,
_ समझ में नहीं आता खुद को, क्यूँ भिखारी बना रहे हो॥
_ यहाँ उधार माँग कर पैसे किसी से, क्यूँ काम चला रहे हो॥
_ घर खर्च की जरूरतें उतनी ही रखो, जितना कमा रहे हो.
_ कम कर लो जरूरतें अपनी, अगर पूरी नहीं ये होती,
_ जरूरतों के आगे हो कर बेबस, क्यूँ जिन्दगी है रोती,
_ क्यूँ जरूरतें रुला रही है तुम्हें, और तुम रोए जा रहे हो॥
_ यहाँ उधार माँग कर पैसे किसी से, क्यूँ काम चला रहे हो॥
_ घर खर्च की जरूरतें उतनी ही रखो, जितना कमा रहे हो.
_ मेहनत करो मजदूरी करो, जिसम की खिचवा दो खाल,
& देकर धोखा मगर किसी को, यहाँ चलो न टेडी चाल,
_ सब वापिस लौट कर आऐगा यहाँ, क्यूँ पाप कमा रहे हो॥
_ यहाँ उधार माँग कर पैसे किसी से, क्यूँ काम चला रहे हो॥
_ घर खर्च की जरूरतें उतनी ही रखो, जितना कमा रहे हो.
Lekhak :- MAHESH KUMAR CHALIA.
दुनिया का सबसे बेहतरीन लाइफ स्टाइल ये है के..

_ इंसान अपनी आमदनी में गुज़ारा करना सीख ले.!!

खर्च के साथ अपनी खुशी को जोड़ना बंद करो; _

_ इसके बजाय, बचत के साथ खुशी को जोड़ें.

हमें अपने आने वाले कल के लिए संचय करना पड़ता है..
_ जिससे जरूरत पड़ने पर दूसरों से मांगने की आवश्यकता न हो.!!
ऐसी चीज़ें खरीदिए जो पैसा कमा कर दे या बचाए.

_ ऐसी चीज़ों से भरसक बचें जो खर्च बढ़ाएं.!!
व्यर्थ का खर्चा**जीवन की व्यवस्था को*

*तथा**व्यर्थ की चर्चा**मन की अवस्था को**प्रभावित करते हैं*

या तो खर्च घटाओ..या कमाई बढ़ाओ,

_वरना लाइफस्टाइल नहीं.. लाइफ बिगड़ जाएगी.!!
खुद कमाकर खर्च करना सीखो..
_ शौक भी सीमित हो जाएंगे और सोच भी मजबूत.!!
हमारी ज़रूरतें कम हैं, लेकिन चाहतें ज़्यादा हैं..

_ जरूरतें पूरी की जा सकती हैं, लेकिन चाहतों का इस दुनिया में कोई अंत नहीं..!!

कमाई कि तुलना में खर्च कुछ ज्यादा ही बढ़ गए हैं,

_हमारी निगाह इतनी पैनी नहीं है कि सच्चाई को ठीक से देख सकें..

खरीदारी हमें कभी भी वो चीज़ें नहीं देती जो हम सबसे ज़्यादा चाहते हैं;

_हमें कहीं और देखना होगा.. केवल वही खरीदें, _जो हमें चाहिए.!!

हम वह खरीदना बंद कर दें.. जो कुछ लोग चाहते हैं कि हम खरीदें.

_ भीड़ भरा रास्ता हमें अपने रास्ते पर नहीं ले जा सकता.!!

बढ़ती महंगाई के इस दौर में सबसे बुद्धिमान व्यक्ति वही है,

जिसने समय रहते बचत की जरुरत को समझा हो.

जितना कमाने कि ताकत है, उतना ही खर्च करो…

_या फिर जितना खर्च करने कि इच्छा हो, _उतना कमाने की ताकत रखो..

आपको _उन चीजों पर खर्च करना चाहिए _जो आपके लिए सबसे ज्यादा मायने रखती हैं..

_और उन चीजों पर जमकर कटौती करनी चाहिए _जो आपके लिए मायने नहीं रखती हैं.!!
_कुछ चीजें हैं _जो पैसे से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं !!
अपने खर्चों पर ध्यान रखें. अच्छा हो कि अपने खर्चों को लिखें ताकि अनावश्यक खर्च पर रोक लग सके.
खर्चे कम कीजिए — बेकार की चीजें छोड़ने पर अपने आप खर्च कम हो जाएगा.
दिखावे में घर का बजट बिगड़ता है, वरना खाने पीने और दैनिक जीवन के इतने खर्चे नहीं है !
अगर आपकी आमदनी रुपया है तो खर्चा अठन्नी ही करें. शेष पैसे को बचा कर निवेश करें.

आपके द्वारा निवेश किया गया पैसा आने वाले सालों में बढ़ता जायेगा और आकस्मिक समय आपके ही काम आएगा.

सिर्फ टाइमपास के लिए शौपिंग करने न जाएं, साथ ही, बोर हो रहे हैं या स्ट्रैस में हैं तो चलो शौपिंग कर लेते हैं, वाली आदत भी ठीक नहीं.

ऐसे में बेकार की चीजों पर पैसे खर्च हो जाते हैं.

खर्च के विषय में बेखबर रहने से मनुष्य की पूरी आयु नष्ट हो जाती है.

इसी के सदुपयोग से जीवन सरस बनता है, समाज में आदर और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है.

जरुरत पड़ने पर ही शॉपिंग करें. इसे अपनी हौबी या प्रेस्टीज इश्यू न बनने दें.
अपनी बार्डरोब हलकी रखें, क्योंकि पहनेंगे वही जो आप को बहुत पसंद है.
जिन चीज़ों की हमें ज़रूरत नहीं होती, वो भी हम खरीद लेते हैं. जिससे हमारे हाथ में एक रुपया नहीं टिकता !

यह तब एक समस्या बन जाता है, जब हमें कोई बड़ा खर्च उठाना पड़ता है.

कमाई और आमदनी से नहीं, आपकी आर्थिक स्थिति आपके खर्च से नापी जाती है.

यदि खर्च आमदनी से अधिक हुआ तो बड़ी आय से क्या लाभ?

ज्यादातर लोग भविष्य के भौतिक सुखों की आस में हाथों में मौजूद वर्तमान का आनन्द खो देते है.

_ बचत एक अच्छी आदत है पर जीवन के अत्यावश्यक सुखों की तिलांजलि की शर्त पर नही होनी चाहिए.!!
दूरदर्शी व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं और खर्चों का पहले से ही बजट तैयार करता है. उसकी आय वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति में ही व्यय नहीं होती प्रत्युत वह भविष्य के लिए, बच्चों की शिक्षा, विवाह, बुढ़ापे के लिए धन एकत्रित रखता है. अपनी परिस्थिति के अनुसार कुछ न कुछ अवश्य बचाता है.
जब आप अपनी कमाई घर लाते हैं, तो पहले से तय कर लीजिए कि किस चीज़ के लिए आप कितना पैसा खर्च करेंगे और उसके हिसाब से पैसे को अलग-अलग हिस्सों में बाँट दीजिए, ताकि आपकी आज की और भविष्य की ज़रूरतें पूरी हो सकें। जब आप तय हिसाब से पैसे खर्च करते हैं तो आप देख पाते हैं कि पैसा किन चीज़ों में खर्च हो रहा है और कितना पैसा गैर-ज़रूरी चीज़ों में जा रहा है। इससे आपको यह पता करने में मदद मिलेगी कि आप कहाँ बचत कर सकते हैं।
आप यह उद्देश्य सामने रखिये कि परिवार के प्रत्येक सदस्य को जीवनरक्षक पदार्थ और निपुणता दायक वस्तुएँ पर्याप्त परिणाम में प्राप्त होती रहें. जब तक ये चीजें न आ जावें, तब तक किसी प्रकार की आराम या विलासिता की वस्तुओं से बचे रहिये. यदि किसी का स्वास्थ्य खराब है, तो पहले उसकी चिकित्सा होनी चाहिए. यदि किसी विद्यार्थी का अध्ययन चल रहा है, तो उसके लिए सभी को थोड़ा बहुत त्याग करना चाहिए.
आप अपनी बचत से कितना खर्च करते है यह Important नहीं होता बल्कि आप अपने खर्चो में से कितनी बचत करते है यह ज्यादा important है. इसलिए बचत करने के सिद्धांत को समझे और बचत को हल्के में न ले. बचत का पैसा वह पैसा होता है जो आपके इमरजेंसी में आपका साथ निभाता है और आपको कई समस्याओ से बचाता है.
ऐसी जगहों से सामान खरीदिए जहाँ वे सस्ते मिलते हैं,

मगर ध्यान रखिए कि जितनी बचत होगी उससे ज़्यादा खर्चा आने-जाने में न हो जाए.

खरीदने से पहले सोचिए

खुद से ये सवाल पूछने की आदत डालिए: ‘क्या मुझे सचमुच इसकी ज़रूरत है? क्या पुराना सामान वाकई खराब हो गया है या मैं बस नयी चीज़ चाहता हूँ?’ अगर आप किसी चीज़ को बहुत कम इस्तेमाल करेंगे तो क्या उसे किराए पर लेना काफी होगा? या फिर अगर आपको लगता है कि आपको उसकी अकसर ज़रूरत पड़ेगी तो क्या पुराने (सेकंड हैंड) सामान से आपका काम चल सकता है?

दरअसल बात यह है कि अगर आप छोटी-छोटी चीज़ों में बचत करने की आदत डालें, तो आप बड़े-बड़े खर्चों में भी बचत करने की सोचेंगे।

कितना गुस्सा आता है, जब वास्तव में पैसों की ज़रूरत हो लेकिन बटुआ ख़ाली मिले. इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आपके पास कितने ज्यादा या कितने कम पैसे हैं, बल्कि उन पैसों को समझदारी के साथ खर्च करना ही एक अच्छा उपाय है जिससे आप बहुत से पैसे बचा भी सकते हैं.
अगर सही जांच ना की जाए तो फालतू खर्च करना एक आदत बन जाता है. अपने खर्चों को नियंत्रित करने के लिए आप चुनें कि आपको किन चीजों की जरूरत है और किन चीजों की चाहत है. इसमें अंतर रखें और अपने बजट के मुताबिक अच्छी तरह खर्च करें.
“जो इंसान अपनी कमाई और खर्च को बेहतर तरीके से संभाल ले और हिसाब से फैंसले ले_ तो वह खेल जीत ही जाता है”

_ अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए किसी तरह के लोन पर निर्भर न रहें..!
_हम ऐसी चीजें खरीदते हैं ..जिनकी हमें जरूरत नहीं है लेकिन हम जीवन में चाहते हैं !
_ हम ऐसी चीजें इसलिए खरीदते हैं ..क्योंकि उससे हमारा भावनात्मक जुड़ाव होता है.
_ कुछ भी खरीदना एक भावनात्मक निर्णय है, तार्किक निर्णय नहीं !!
पुरानी और नई पीढ़ी की सोच में ये बड़ा अंतर है.

_ हम बचत पर जोर देते हैं और वे खर्च पर..
_ हम कर्ज लेने से डरते हैं और वे क्रेडिट कार्ड सबसे पहले बनवाते हैं.
_ हम बुढ़ापे में घर और वाहन ले पाते थे..
_ और वे जॉब लगते ही बैंक लोन लेकर घर और कार खरीदना चाहते हैं.
हर बीस वर्ष के बाद cost of living, ten times बढ़ जाती है.

_ यह एक चुनौती होती है, हर वक़्त आय के स्रोत को उस स्तर पर बनाए रखना,
_ जिस स्तर पर हम जीवन जीते हैं, इसके अतिरिक्त बीमारियों का ख़र्च, सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वाह.
_ मैं यह सुझाव दूंगा कि कुछ इसकी भी तैयारी पहले से ही करते हुए चलें..
_ जैसे :- घर अपना हो, कुछ मासिक आमदनी आती रहे इसकी व्यवस्था हो, सिर पर कोई क़र्ज़ न हो, इमरजेंसी फण्ड हो, हेल्थ इन्स्योरेन्स हो.!!
The cost of living increases ten times after every twenty years.
It is a challenge, at all times to maintain the source of income at that level, the level at which we live, in addition to the cost of diseases, social responsibility.
I would suggest that some should go on preparing for it in advance..
For example:- The house should be its own, some monthly income should be maintained, there should be no debt on the head, there should be emergency fund, there should be health insurance.!!
सदा अपनी आमदनी पर दृष्टि रखिये, आमदनी से अधिक व्यय करना नितान्त मूर्खता और दिवालियापन की निशानी है.
उतना ही खर्चा करें, जितना आप में सामर्थ्य हो. दिखावे के चक्कर में या किसी होड़ में न पड़ें, यह न तो आपकी आर्थिक सेहत के लिए अच्छा है और न ही आपकी मानसिक सेहत के लिए,

क्रेडिट कार्ड या पर्सनल लोन लेकर केवल दिखावे के लिए खर्चा करना बेवकूफी है.

उधार एक ऐसी बला है, जो मनुष्य की सब शक्तियों को क्षीण कर डालती है. उसे सबके सामने नीचा देखना पड़ता है, हाथ तंग रहता है. इसलिए निश्चय करना चाहिए कि कभी कोई चीज या रुपया उधार नहीं लेंगे.
आमदनी और खर्च के ऊपर तीखी दृष्टि रखिये. व्यय से पूर्व आमदनी खर्च का एक चिट्ठा-बजट-तैयार कर लीजिये. जो बुद्धिमान व्यक्ति अपने रुपये से अधिकतम लाभ और उपयोगिता प्राप्त करना चाहता है, कर्ज से बच कर सज्जन नागरिक का प्रतिष्ठित जीवन व्यतीत करना चाहता है, उसे बजट बनाना आवश्यक है. बजट हमें फिजूलखर्ची से सावधान करता है. सब व्यय तथा आमदनी नक्शे की तरह हमारे समाने रहती है. टिकाऊ वस्तुओं पर खर्च होता है, विलासिता से मुक्ति होती है.
बजट कैसे बनाएँ

(1) महीने के ज़रूरी खर्चों को लिख लीजिए। एक महीने में खाने, मकान (किराया या किश्‍त), बिजली, पानी, गैस, गाड़ी और ऐसी ही दूसरी ज़रूरी चीज़ों पर कितना खर्चा होता है, उसका पूरा हिसाब रखिए। जो पैसे आपको साल में एक बार चुकाने पड़ते हैं, उन्हें 12 से भाग कीजिए ताकि यह पता चले कि हर महीने उनके लिए कितना पैसा अलग रखना चाहिए।

(2) खर्च को अलग-अलग वर्गों में बाँटिए। जैसे कि खाने, घर, गाड़ी, आने-जाने और बाकी चीज़ों का खर्च।

(3) देखिए कि आपकी जमा-पूँजी में से हर महीने, हर वर्ग में कितने पैसे खर्च होंगे। “हिसाब” लगाइए कि जिन बिलों का भुगतान साल में एक बार किया जाता है, उनके लिए आपको हर महीने कितने पैसे अलग रखने चाहिए।

(4) घर के सभी सदस्यों की कुल आमदनी लिख लीजिए। उसमें से टैक्स वगैरह के पैसे घटा दीजिए, फिर उसकी तुलना कुल खर्च से कीजिए।

(5) एक महीने में हर वर्ग में कितना खर्चा होगा उसके पैसे अलग रखिए। अगर आप नकद रुपए इस्तेमाल करते हैं, तो एक आसान तरीका है कि आप हर वर्ग के लिए एक अलग लिफाफा बनाएँ। फिर समय-समय पर लिफाफे में तय खर्च के हिसाब से पैसे रख दीजिए।

सावधानी: अगर आप क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं, तो इसके इस्तेमाल में एहतियात बरतिए! कई लोगों का बजट गड़बड़ा जाता है, क्योंकि उनके सामने ‘अभी खरीदो, बाद में चुकाओ’ का लालच रहता है।

मैं प्रमाणित कर सकता हूं कि हममें से अधिकांश लोग जितना सोचते हैं _उससे अधिक पैसा अनावश्यक खरीदारी पर बर्बाद करते हैं..!!

कोई भी खरीदारी मनमाने ढंग से न करें,_कई लोगों के लिए, खरीदारी महज़ एक आदत है – _ और आदत हमेशा _असावधानी पर हावी हो जाती है.

_ और बचत करना सीखना _ कोई बलिदान नहीं है, _यह हमारे लिए एक उपहार है.
हम 80% समय अपने 20% कपड़े पहनते हैं, यह स्पष्ट है कि हम बहुत कम कपड़ों में काम चला सकते हैं..
_ हमेशा बदलते फैशन के साथ बने रहना कीमत के लायक नहीं है.
__ अक्सर, हम ऐसी चीजों के लिए भुगतान कर रहे हैं _जिनका हम शायद ही कभी उपयोग करते हैं.
पैसा बचाने का उद्देश्य _ इसके लिए जीवन का बलिदान देना नहीं है, बल्कि इसके कारण स्वतंत्रता प्राप्त करना है.
इन खर्चों को अपने जीवन से हटाकर, हम न केवल पैसे बचाते हैं, हम तनाव भी दूर करते हैं, और अधिक आनंद पाते हैं ;
_ और क्या वास्तव में जीवन इसी बारे में नहीं है ?
हमारे पास कपड़ों की इतनी अलग-अलग वस्तुएं और हमारी ज़रूरत से कहीं ज़्यादा चीज़ें क्यों हैं ?

_ क्या ऐसा इसलिए है _क्योंकि हम उन सभी से प्यार करते हैं _ या हमें इतनी सारी शर्ट या जूते की ज़रूरत है ?
_ नहीं, हम उन्हें खरीदते हैं _क्योंकि हम बदलते फैशन के साथ बने रहने की कोशिश कर रहे हैं,
– वही बदलती शैलियाँ जिनके बारे में फैशन उद्योग ने हमें बताया था कि _हमें स्टाइल में बने रहने की जरूरत है.
_ हर बार, हम अपने आप को उस चीज़ की चाहत में पाते हैं _जो वर्तमान में हमारे पास नहीं है ;
_ हम उस पर केंद्रित हो जाते हैं जो हमारे पास नहीं है, और जो अच्छाई हम में पहले से ही है, __ उस पर से अपना ध्यान खो देते हैं.
_ यदि, मनुष्य के रूप में, हम मानते हैं कि केवल कुछ नया प्राप्त करके उच्च स्तर की खुशी पाई जा सकती है, तो हम हमेशा निराश होंगे.
_ हमारी आंतरिक आवाज़ इस तरह कभी संतुष्ट नहीं होगी.
_ कोई भी चीज़ कभी भी पर्याप्त अच्छी नहीं होती…. क्योंकि हमारे अंदर लगातार असंतोष भड़कता रहता है.
_ इस प्रकार आंतरिक और बाह्य दोनों ही दृष्टियों से हमारे हृदय, मन और आत्मा में निरन्तर असन्तोष भड़कता रहता है।
_ इस असंतोष के परिणामस्वरूप क्या होता है कि _ हम जल्दी ही अपने आस-पास की और अपनी अच्छाइयों को नज़रअंदाज कर देते हैं.
क्यूँ जीते हो आप ऐसी ज़िन्दगी, जिस से हो जाये लोन- क़र्ज़.!

_ जितनी कमाई उतना खर्च, ये हुनर सीख लो ना..,
_ लेकर लोन, अन्जाने में घोट रहा, अपना गला तो नहीं..,
_ बेवजह दुनियाँ को दिखाने के लिए, क्यूँ जरूरतें बढाता है..,
_ जितना कुछ है तेरे पास, क्यूँ उसी में खुश नहीं रह पाता है..,
_ क्यूँ जरूरतें हो जाती है, जिन्दगी पर फिर सवार॥
_ अगर नहीं है सब्जी तेरे घर में, तो नमक से रोटी खा ले..,
_ अगर जरूरतें पूरी करनी है तुझे, तो मेहनत कर कर कमा ले..,
_ क्यूँ जीते हो आप ऐसी ज़िन्दगी, जिस से हो जाये लोन- क़र्ज़..!!
मैं तो हर किसी समारोह में नहीं जाता,

_ क्योंकि अगर जाऊं तो ..उस खर्च को जोड़ें तो..
_ सबसे पहले अपने काम से छुट्टी लेनी पड़ेगी ..जिस पर पैसा कटेगा,
_ यात्रा के टिकट का पैसा लगेगा, अपने घर से रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट व वहां से समारोह वेन्यू तक का भाड़ा,
_ लौटने पर यही खर्च और रास्ते में खाना पीना अलग,
_ घर में जिसको छोड़ कर जाएं ..तो उसकी देखभाल के लिए किसी को छोड़ना होगा.
_ जिसके लिए शायद पैसा भी खर्च करना पड़े.
_ दो दिन में पहनने को चार जोड़ी कपड़े चाहिए ..जो शायद नये लेना पड़ें,
_ वहां देने के लिए कोई सौजन्य भेंट खरीदनी होगी, ना ना करते 8 से 10 हजार रूपया,
_ जो पति-पत्नी दोनों जा रहे हैं ..उनका खर्च दुगना हो जाएगा..
_ कहीं ऐसा ना हो कि भावनाओं से जुड़ कर खर्च करके..
_ चादर से ज्यादा पैर पसारने की कीमत ..अगले साल भर तक जरूरी खर्चों में कटौती करके करते रहें..!!
ये पांच नियम खर्च-बचत के फॉलो करें : –

1. पहले बचत फिर खर्च करें, – थोड़ी बचत भी बहोत होती है !
2. पहले चर्चा फिर खर्चा – घर में आपस में सलाह करें की इस खर्च की जरुरत है भी या नहीं !
3. खुद के पैसे गिनो दुनिया की मत सुनो – दुनिया सलाह देती है कि ये खरीद लो वो खरीद लो !
4. लिख कर बजट बनाना और निभाना – कहीं से भी लोन नहीं लेना !
5. कार्ड से नहीं नकद खर्च करें !!
___________________________________________________
“यह सब लिखो ! यदि आप सोच रहे हैं कि आपका पैसा हर हफ्ते या महीने कहां जाता है, तो अपने खर्च पर नज़र रखना महत्वपूर्ण है ;_
_ हर महीने की शुरुआत में एक ही जगह पर अपने खर्चों, बचत, और ‘पैसे खर्च’ का नक्शा तैयार करें.; महीने के अंत में, अपने खर्च की समीक्षा करें और उसी अनुसार प्लानिंग करें !!
“अपना बजट बनाते समय, यह महत्वपूर्ण है कि आप ज़रूरतों और इच्छाओं के बीच के अंतर को जानें ;_ जरूरतें ऐसी चीजें हैं जो आपको जीवन जीने के लिए बिल्कुल जरूरी हैं !!
ये भोजन, पानी, घर, परिवहन, उपयोगिताओं आदि जैसी चीजें हैं ‘ जैसे बाहर खाना, खरीदारी, जिम की सदस्यता, छुट्टियां, केबल, आदि !!
“सेल का लाभ उठाने में कुछ भी गलत नहीं है – लेकिन अगर आपको ज़रूरत नहीं है तो पैसा खर्च न करना ही बेहतर है !”
“आपको जो चाहिए _वह खरीदें, न कि वह _जिसका आप लालच करते हैं.”
_ कंपनियों द्वारा चालाकी से खरीदारी करने के लिए बनाया हुआ जाल है,
_ जो हमें हमारी मेहनत की कमाई से अलग करने के लिए डिज़ाइन किया गया है.!!
“–इस तरह से बजट बनाएं और आपको कभी भी पैसों की समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा”
जरूरतों पर 50%, इच्छाओं पर 20%, बचत के लिए 30% –“

सुविचार – जीवनसाथी – 034

ज़िंदगी में ऐसा कभी-कभी हो जाता है.. जब हम कुछ रिश्तों में गलतफहमी के शिकार हो जाते हैं.

_ कई बार कोई झूठ हमारी ज़िंदगी में इस कदर सच बन कर समाहित हो जाता है कि हम सच का चेहरा ही नहीं देख पाते.
_ हम मन ही मन अपनी ही गलतफहमी की आग में झुलस कर रह जाते हैं.
_ हम कई बार मान लेते हैं कि सामने वाला आदमी ऐसा होगा, उसने ऐसा किया होगा और हम उसी आधार पर अपने रिश्तों की कड़ियों को तौलते चले जाते हैं.
_ गलतफहमी किसी भी रिश्ते में हो सकती है.
_ लेकिन यह गलतफहमी अगर जीवन साथी के साथ रिश्तों में हो, तो ज़िंदगी दुखों से भर जाती है.
– Sanjay Sinha
आप का जीवन साथी, आपके जीवन में हर चीज को प्रभावित करता है ; _ आपका मानसिक स्वास्थ्य, आपके मन की शांति, आपकी खुशी, आपकी सफलता, आप त्रासदियों से कैसे बाहर निकलते हैं और भी बहुत कुछ..!
जीवन में हर चीज़ मेहनत से हासिल की जा सकती है, पर एक सच्चा और समझदार जीवनसाथी मिलना किस्मत की बात होती है.

_ अगर आपको ऐसा साथी मिला है, तो उसे सिर्फ अपना मानकर नहीं, बल्कि उसकी भावनाओं, उसके भरोसे और उसके साथ को सहेजकर रखना चाहिए,
_ क्योंकि ऐसे रिश्ते बार-बार नहीं मिलते.!!
दुनिया में सबसे बड़ा कोई क़ैदख़ाना है तो वह है बिना सुकून का घर.!

_ इसलिए अपना जीवनसाथी चुनते वक्त.. उसकी ख़ूबसूरती से ज़्यादा वो इंसान कैसा है इस पर ध्यान देना.!!
जीवनसाथी वही होता है,

_जो अपने साथी के जीवन को जीवंत बनाता है.

जीवन साथी ऐसा चुनो कि जो प्रेरणा दे,

_ ना कि चिंता, दबाव और तनाव दे !!

अपना जीवनसाथी बहुत सोच समझ कर चुनना.. क्योंकि सुकून के बिना घर का होना..

_इससे बड़ा दुनिया में कोई दूसरा क़ैदख़ाना नहीं है.

जिंदगी आसान हो जाती है ; जब जीवनसाथी समझदार होने के साथ- साथ ;

समझने वाला भी मिल जाता है.

_ हमसफ़र विनम्र चुनो, ज़िन्दगी ख़ूबसूरत बन जाएगी.!!

जीवन साथी अच्छा या बुरा नहीं होता, वह सिर्फ साथी होता है.

_ आपने कैसा निभाया- वह अच्छा या बुरा होता है.

जीवन साथी की मौजूदगी को महसूस कर उसके रहते जीवन में उसको समझने की जिम्मेदारी निभाईये..

_ याद रखिए उन बिछड़े हुए रिश्तों को.. वो रिश्ते नहीं.. आपके शरीर के हिस्से होते थे.!!

चाहे कितना भी मजाक बना लो, जीवन साथी पर ; लेकिन एक बात याद रखना,

जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर दुनिया साथ नहीं देगी, आपका हमसफर ही काम आएगा…

जीवन साथी ऐसा होना चाहिए जो आपके जीवन में मूल्य जोड़ता है ; _ जो आपको बढ़ने में मदद करे.
जीवनसाथी वक्त को बदलने वाला होना चाहिए, _ वक्त के साथ बदलने वाला नहीं..
जब हम किसी को बस यूं ही उसकी ऊपरी खूबियों से चाहने लगते हैं तो ..कोई ज़रूरी नहीं कि.. वो जीवन साथी के रूप में भी वैसा ही हो..!!
जीवनसाथी के चुनाव में जल्दबाजी ना करें, अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखें ;

लड़कियां यहां ध्यान दें, पहले खुद के लिए कुछ करें ;

दूसरे के घर रोटी बेलने और बर्तन धोने से बेहतर है कि

जिसने आपको पढ़ाया – लिखाया, पालन – पोषण किया,

नाज – नखरे उठाकर परवरिश दी, उनके लिए कुछ करें ..

कोई स्त्री सर्वगुणसम्पन्न नहीं होती।

1 यदि मैं एक सीधी-सादी स्त्री का चुनाव करता हूँ तो मुझे यह मानना पड़ेगा कि वह मुझ पर निर्भर रहेगी।
2 यदि मैं खूबसूरत लड़की चुनता हूँ तो मेरे खर्चे भी बढ़ेंगे |
3 यदि मैं एक कामकाजी स्त्री को प्राथमिकता देता हूँ तो यह भी तय है कि घर के सारे काम वह नहीं कर पाएगी।
4 यदि वह गृहिणी होगी तो स्वाभाविक है कि वह धनार्जन नहीं करेगी ।
5 यदि मैं महान स्त्री चुनता हूँ तो उसकी दृढ़ता और कठोरता के साथ भी मुझे निर्वाह करना होगा।
6 यदि मैं वीर स्त्री का चुनाव करता हूँ तो यह मानना पड़ेगा कि उसके अपने भी कुछ विचार होंगे। एक स्त्री की कुछ अच्छी विशेषताएं जाहिर करतीं हैं कि वह कौन है और उसे क्या सबसे हटकर मौलिक बनाता है।
अनुवादक : किसी ने सही कहा है कि “सर्वगुणसम्पन्न स्त्री एक ही nation में मिलती .., …वह है imagination.😃
वास्तव में “कभी किसी को मुकम्मल जीवनसाथी नहीं मिलता, दोनों एक दूसरे की कमियों को अपनी खूबियों से पूरा करके मुकम्मल बनते हैं।”
यह बात उम्र बढ़ने के साथ जिनको समझ में नहीं आती, वे सारी जिन्दगी एक दूसरे से उलझते रहते हैं।

सुविचार – नारी – स्त्री – महिला – औरत – 033

किसी दिन ऐसी लड़कियां और महिलाएं होंगी जिनके नाम का मतलब केवल पुरुष के विपरीत नहीं होगा,

_ बल्कि अपने आप में कुछ ऐसा होगा, जो किसी पूरक और सीमा के बारे में नहीं, बल्कि केवल जीवन और वास्तविकता के बारे में सोचता है: “महिला इंसान” ~ Rainer Maria Rilke

एक स्त्री जो अपने लिए कुछ नहीं मांगती, वह सब कुछ पाने की हकदार है.
समर्थ स्त्री ‘वो’ के ज़िक्र में अपना वक्त बरबाद नहीं करती.!!
स्त्री अपने जीवन का निर्णय खुद से करे, ये तभी संभव है जब वो आर्थिक रूप से सक्षम हो..- खुद की कमाई से एक खुद का घर ख़रीदे, खुद का घर यानी एक श्रेष्ठ ज़िन्दगी.!!

_तुम एक दिन अपना घर ज़रूर बनाना, फ़िर कोई कह नहीं पाएगा.. यहां से निकल जा.!!

ये दुनिया चतुर-चालाकों-ठगों-धूर्तों से और चालबाजों भरी पड़ी है,

_इसलिए लड़की और महिला को भी आत्मनिर्भर होना जरुरी है..!!

कुटिलता को लिंग आधारित नहीं किया जा सकता, स्त्री को भी सामान्य इंसान माना जाना चाहिए

_ जिस दिन उन्हें स्त्री नहीं इंसान मात्र मानकर वही पॉवर, वही माहौल, वही समाज मिलेगा ..जो पुरुषों को मिला हुआ है..
_ तो वह भी वीरता/कायरता..प्रेम/घृणा…क्रूरता/संवेदनशीलता ..बुद्धिमत्ता/मूर्खता सबमें पुरुषों जैसी ही होंगी, उनसे अलग नहीं..
_ उन्हें मनुष्य मात्र समझो तो उनके किसी भी कदम पर हैरानी नहीं होगी.!!
कोई भी लड़की ये नही चाहेगी की बड़ी होकर वो लोगो के झूठे बर्तन धोए सारी उम्र और किचन में लगी रहे दिन रात.. _ ऐसा बोरिंग जीवन कोई क्यों चुनेगा ,भविष्य का ??

जो काम मा करती है सारी उम्र ,वो एक कूक भी कर सकता है, _ न जाने कितनी पढ़ी लिखी ओरतो का जीवन किचन में ही घिस जाता है.
_अन्याय होता है उन स्त्रयों के साथ जो इतनी तपस्या करके पढ़ाई करती है ओर फिर विवाह के बाद दोयम दर्जे की रह जाती है.
_ पूरी संभावना तो यही है कि वो पुरुष से ज्यादा कमा सकती है.
_ पितृसत्ता बचपन से ही मासूम ह्रदय में बैठा दी जाती है कि पैसे सिर्फ पुरूष कमाएगा और ओरत सिर्फ घर की चार दिवारी में सीमित है ,त्याग की मूर्ति है ,संस्कार ,इज्जत है घर की और पुरुष आजीवन आवारा बैल !
बाप वहां तो रोटी बना सकता है जहां पैसे मिले ; बड़े बड़े होटल में कुक बन जाएगा, पर घर पर अनपेड रोटी नही बनाएगा.
ये दोहरी मानसिकता तभी बदलेगी जब बच्चो का बचपन मे ब्रेनवाश करना बंद होगा.
ऐसी कविता ,कहानी बन्द होनी चाहिए, जो लिंग के आधार पर कार्यों का बंटवारा करे !
कार्य का निर्धारण क्षमता और योग्यता पर होना चाहिए, न कि स्त्री और पुरुष देखकर !!
आदमी औरत को नहीं छोड़ता क्योंकि उसे घर संभालने वाली, रोटी बनाने वाली चाहिए.
_ औरत अब अपमानित होने की बजाय आदमी को छोड़ना बेहतर समझती है,
_ क्योंकि अब उसे पैसा कमाना आ गया है.
_ अब वो अपमान क्यों बर्दाश्त करे ?
_ इज़्ज़त से साथ रहना है तो रह, वरना चलता बन._साफ़ कहना, सुखी रहना..!!
एक दिन ज़रूर महिलाएं रोने धोने,गंडा ताबीज धागा मन्नत की जगह पति को छोड़ देंगी.
_ अपने मज़बूत निर्णय लेंगी, आत्मनिर्भर बनेंगी, संघर्ष करेंगी..
_ मगर दो रोटी, एक छत, दो वस्त्रों के लिए पति का ज़ुल्म ग़ैरबराबरी बेवफाई हिंसा गाली बर्दाश्त नहीं करेंगी.
एक बुद्धिमान [intelligent], बौद्धिक [intellectual] महिला प्यार में नहीं डूबती.
_ उसकी प्राथमिकता उसकी महत्वाकांक्षाएं हैं, पुरुष नहीं.
हर स्त्री का हाथ हवा में तना हुआ होना चाहिए… चाहे खेल हो या कोई क्षेत्र . बाँहें खोलो और आकाश भर लो ….
_ उठो लड़कियों उठो… फैल जाओ दसो दिशाओं में. ज़मीन अपनी है… डटी रहो और आकाश फ़तह कर लो..!!
गुलामी ऐसी ही होती है. इससे निकलने का साहस तभी आ सकता है ..जब महिलाये अपने पैरों पर खड़ी हों और अपने विचारों में सुदृढ़ हों.
जो समझदार पुरुष होते हैं, वह अपनी माँ, बहन, बेटी और पत्नी को आज़ादी देने के साथ उन्हें मजबूत और सशक्त बनाने की दिशा में कार्य करते हैं,
_ ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर वह किसी के आगे भीख न मांगे, अपने दम पर वह अपने जीवन को जी सके, अपनी सुरक्षा स्वयं कर सके.!!
“सिर्फ सौन्दर्य के लिए इतनी जागरूकता..”

_लड़कियों- महिलाओं की दूसरी कई योग्यता को कम कर रही है..!!
_ वे चेहरे पर इतना मोटा मोटा मेकअप थोप कर सेल्फी डालने के चक्कर में क्यों रहती हैं.
_ कितना ही अच्छा हो कि वह अपने स्किल को संवारने पर समय लगाएं.!!
महिलाओं की आधी सी ज्यादा बीमारी का कारण “उनकी अधूरी नींद है”,

_ यदि वो अपनी नींद की खुराक को पूरा कर ले तो वो बिल्कुल स्वस्थ रहेंगी,
_ पर उनके जीवन में सुकून की नींद गायब सी होती है, क्योंकि उनके लिए घर के काम हद से ज्यादा होते हैं, जिससे वो ख़ुद को मानसिक रूप से रिलैक्स नहीं कर पाती.!!
मायका साथ न दे तो कोई बेचारी नही होती.

पति तलाक दे तो व्यक्तित्व में कोई कमी नही होती.
सब साथ छोड़ दे, तो भी अनाथ नही होती स्त्री.
खुद कमाओ, खुद की शक्तियों को जगाओ, अपने अस्तित्व को चुनोती दो और शेरनी की तरह दहाड़ो..
ये घिसे पिटे डायलॉग बाजी बन्द हो जानी चाहिए अब, जबकि आज इतने अवसर है खुद के पैरों पर खड़े होने के.!!
अपनी कमजोरी और आलस को अपने दिन-हीन होकर sympathy मत बटोरो.
समाज को और सिस्टम को अक्सर कमजोर लोग कोसते रहते हैं.
बहादुर तो अक्सर सिस्टम को चुनोती देकर उसे बदलने का साहस दिखाते है.
मुझे पर्सनली बहुत बकवास लगती है किसी हारे हुए व्यक्ति की पोस्ट !!
मैं चुनोती दे सकता हूं, अकेले होकर भी तुम बहोत कुछ कर सकती हो ; बस शर्त की ईमानदार हो अपनी इच्छा के प्रति..!
जो स्वतन्त्रता मांगकर ली जाए, उसका मूल्य ही कितना होगा ?
“स्वतन्त्र होना हर व्यक्ति का जन्म सिद्ध अधिकार है.”
मजबूर नही हो तुम सब कुछ सहने को, बस स्वयम की खुशियों और आजादी को लेकर ईमानदार नहीं हो.
नदियों में और स्त्रियों में इतनी समानता देखी है ;

_ पत्थर किसी के भी जीवन में हों __ साथ देना उनका… कभी नहीं छोड़ती..

कमाई कितनी भी बड़ी हो,
_ फिर भी घर की नींव, घर की औरत के अच्छे बर्ताव से ही मजबूत होती है.
“माहौल के हिसाब से ख़ुद को ढाल लेने की जैसी खूबी महिलाओं में होती है..
..वो पुरुष को हासिल नहीं है.”
मैं नारी… हर वक्त अपने रिश्तों के लिए झुक जाती हुं,

गलती हो हमारी या न… हो _ बस सभी को मनाने के लिए झुक… जाती हुं..

चिड़ियां होती हैं लड़कियां _इनके पर नहीं होते..

_ ससुराल होते हैं ..मायके होते हैं ..घर नहीं होते..!!

मायका केवल मौसम नहीं होता स्त्री के लिए..
“वह एक पुल होता है”
_ बचपन से बुढ़ापे तक के सारे अधूरे रिश्तों को जोड़ने वाला.!!
” नारी के बिना घर बिना मवेशियों के खलिहान के समान है “
एक शब्द हैं… पितृसत्ता… इसका अर्थ कतई वह नहीं जिस अर्थ में इसे प्रयुक्त किया जाता है.

_ पितृसत्ता स्त्री पर ज़ुल्म ढा रही है, स्त्री पितृसत्ता का दंश भोग रही है, पितृसत्ता के कारण स्त्री गुलाम है,
_ पितृसत्ता अपनी हुकूमत, संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण स्त्री को उसके अधिकारों से वंचित किए है, आदि आदि..
_ पितृसत्ता यानी पिता की सत्ता, पिता का वर्चस्व, पिता द्वारा प्रदत्त संरक्षण, पिता के साये में सुरक्षित रहते हम…
_ हममें से कितने लोग हैं जो यह चाहेंगे कि हमारे पिता की सत्ता खत्म हो जाए ?
_ कोई नहीं..
_ इसलिए मेरा सोचना है कि हम पितृसत्ता शब्द का गलत प्रयोग करते हैं.
_ जिस नफ़रत ने पितृसत्ता शब्द को गढ़ा है, उसका प्रयोजन पितृसत्ता से न होकर पुरुषसत्ता से है,
_ अतः शब्द के गलत प्रयोग से बचा जाए और सही शब्द पुरुषसत्ता का प्रयोग प्रचलन में लाया जाए.
क्या कभी आपने अपने घर की औरतों से सुबह शाम सलाम दुआ की है, क्या आपने कभी उनसे पूछा है कि कैसी हो आप.

_ वे हम लोगों की परवाह में अपनी आंखों, दिल गुर्दा सब घिस देती हैं..

_ क्या कभी आपने अपने घर की औरत से पूछा है कि वो परेशान तो नहीं, अगर परेशान हैं तो क्यों हैं.

_ अरे प्यारे प्यारे भाईयो, दोस्तों और शुभचिंतकों आप सब हमारी चिंता में अपने दिल और दिमाग पर बोझ ना डालें.

_ आजकर वैसे भी दिल का कोई भरोसा है नहीं कि कब रुक जाए.

_ तो ऐसे में मेहरबान, कदरदान, साहिबाना, पानदान अपने घर की औरतों पर ध्यान दें,

_ उनकी परवाह करें और खुद खुश रहेंगे और वो भी खुश रहेंगी..!!

नारी, तुम किसी से कम नहीं हो,

ईश्वर की किसी अद्भुत रचना से कम नहीं हो।
अलग अलग किरदारों को जी पाना,
हर किसी के बस का खेल नहीं है।
समय की जरूरत के अनुसार,
हर माहौल, हर परिस्थिति में ढल जाना,
तुम्हारी इस खूबी का कोई मेल नहीं है।
कभी बहन, कभी भाभी, कभी अर्धांगिनी, कभी मां,
नारी के हर रूप को इतनी बखूबी निभाना,
किसी करिश्माई चमत्कार से कम नहीं है।
हमारे अंतर्मन का आधार, घर की जान हो तुम ,
श्रद्धा हो, आदर्श हो, हमारा सम्मान हो तुम,
हर बुरे वक्त को तुमने बखूबी झेला है,
परिवार की हर बड़ी मुसीबत को पीछे धकेला है।
हर मुश्किल का समाधान हो तुम,
चट्टान हो तुम, हमारा सत सत प्रणाम हो तुम ।।
।। पीके ।।
स्त्री, माननीय है :-

जब वो मांग में सिंदूर आते ही लड़की से औरत बन जाती है।
जब वो शादी के तुरंत बाद दीदी से आंटी बन जाती है जबकि उसका पति दो बच्चों के बाद भी भैया ही बना रहता है
जब शादी की अगली सुबह बेटे को आराम करने दिया जाता है और उसे रसोई में प्रवेश मिल जाता है ;
सबकी पसंद का खाना बना के खिलाओ, अपनी पसंद का कोई पूछेने वाला नही.
जब उसकी हर ग़लती भी उसकी और उसके पति की हर ग़लती भी उसी की ग़लती कहलाती है.
जब उसका शादी से बाहर का आकर्षण उसको धोखे बाज़ बना देता है और उसके पति का आकर्षण उसके प्यार की कमी कहलाता है.
जब मायके आने के लिए किसी की इजाजत जरूरी हो जाती है.
जब मायके की यादों की उदासी को उसके काम ना करने का बहाना करार दिया जाता है.
जब जरूरत पड़ने पर ना वो पति से पैसे मांग पाती है और ना ही पिता से.
जब उसकी माँ उसे समझौता करने को कहती रहती है और अपनी सफल शादी की दुहाई देती रहती है.
जब ऑफिस से थक कर आने के बाद कोई पानी तक नहीं पूछता है.
जब रात को पति के बाद सोती है और सुबह पति से पहले उठती है.
जब अपने सपने/ख्वाहिशें भूल जाती है और कोई पुरानी सहेली उसको याद दिलाती है.
शादी सभी के लिए उतनी मीठी नहीं होती जितनी नज़र आती है, महिलाओं के लिए आज भी जीवन मुश्किल है.
वो जो महिला को आप रोज़ देखते है और उससे उसकी आँखों के नीचे काले घेरे होने का कारण पूछते है, मत पूछिए, _ वो कभी नहीं बताएगी और अगर बताती भी है तो आप कभी नहीं समझेंगे.
अरे भई ! जिसे उसकी माँ ने नहीं समझा, आप क्या खाक समझेंगे ?
और भी जाने क्या-क्या बकवास दलीलों के रूप में सुनने को मिलती है.
महिलाओं के शांत चेहरों और फूल से हँसी के पीछे कौन-कौन से तूफ़ान गुज़र रहे होते है, आप कभी नहीं समझोगे। स्त्री को समझने के लिए सात जन्म कम पड़ जायेंगे.
एक दिन स्त्री की जगह लेकर तो देखो दिन में तारे नज़र आयेंगे.
समस्त स्त्री जाति को समर्पित
काम करने वाली महिला को चुनते समय आपको यह स्वीकार करना होगा कि वह घर नहीं संभाल सकती.

_ यदि आपने एक गृहिणी को चुना है, जो आपकी देखभाल कर सकती है और आपके घर का पूरा प्रबंधन कर सकती है,
तो आपको यह स्वीकार करना होगा कि वह पैसा नहीं कमा रही.
_ यदि आप एक आज्ञाकारी महिला चुनते हैं, तो आपको यह स्वीकार करना चाहिए कि वह आप पर निर्भर है और आपको उसका जीवन सुनिश्चित करना है.
_ यदि आप एक मजबूत महिला के साथ रहने का फैसला करते हैं, तो आपको यह स्वीकार करना होगा कि उसकी अपनी राय है.
_ यदि आप सुंदर स्त्री को चुनते हो तो आपको बड़े खर्चे उठाने पड़ेंगे.
_ यदि आप एक सफल महिला के साथ रहने का फैसला करते हैं, तो आपको यह समझना चाहिए कि उसके पास अपनी अलग जीवन शैली है और उसके अपने लक्ष्य और महत्वाकांक्षाएं हैं.
_ परफेक्ट जैसी कोई चीज नहीं होती, हर किसी की अपनी अपनी ढब होती है, जो उसे अनोखा बनाती है !
_ हर स्त्री परिपूर्ण है… हर बेटी अनोखी…
स्त्री पिता के घर से पति के घर आती है.

_ पति से दुखी होती है तो वापस पिता के घर आ जाती है.
_ पिता का घर और पति का घर, इन दोनों घरों के बीच डगमगाती रहती है,
_ लेकिन यह कोई भी उसका अपना घर नहीं कहलाता.
_ स्त्री अपना घर खुद क्यों नहीं बनाती ?
_ कमाने वाली स्त्रियां अपना मकान खरीद सकती हैं.
_ यह क्या कि कभी पति, कभी पिता के आगे भीख मांगती रहें.
_ आधुनिक स्त्रियों, सोचो.
” महिलाएं तब सशक्त होंगी जब उनके नाम से उनका मकान होगा, उनके नाम की तख्ती (नेमप्लेट) उस मकान पर लगी होगी”
“वो महिलाएं जो अपना वाहन भी खुद चलाती है, वो किसी पर आश्रित नहीं, वो आत्मनिर्भर हैं”
_ आत्मनिर्भरता आखिर पैसे और सुविधा संपन्न संसाधनों से ही आती है.
औरत उस घर में ज़्यादा खुश रहेगी…

_ जिस दिन उसका अपना घर होगा, जो कि उसके नाम पर होगा.
_ वह अपने घर को अपनी मर्ज़ी से सजाएगी
_ एक औरत के लिए उसका अपना घर होना बहुत ज़रूरी है,
_ क्योंकि बाकी जगह वो केवल पराई होती है.!!
*” स्त्रियाँ “*, *कुछ भी बर्बाद* *नही होने देतीं*

*वो सहेजती हैं* *संभालती हैं* *ढकती हैं * *बाँधती हैं*
*उम्मीद के आख़िरी छोर तक*
*कभी तुरपाई कर के*
*कभी टाँका लगा के*
*कभी धूप दिखा के*
*कभी हवा झला के*
*कभी छाँटकर*
*कभी बीनकर*
*कभी तोड़कर*
*कभी जोड़कर*
*देखा होगा ना आपने ?*👱‍♀
*अपने ही घर में उन्हें*
*खाली डब्बे जोड़ते हुए*
*बची थैलियाँ मोड़ते हुए *बची रोटी शाम को खाते हुए*
*दोपहर की थोड़ी सी सब्जी में* *तड़का लगाते हुए*
*दीवारों की सीलन तस्वीरों से छुपाते हुए*
*बचे हुए खाने से अपनी थाली सजाते हुए*
*फ़टे हुए कपड़े हों*
*टूटा हुआ बटन हो*
*पुराना अचार हो*
*सीलन लगे बिस्किट,*
*चाहे पापड़ हों*
*डिब्बे मे पुरानी दाल हो*
*गला हुआ फल हो*
*मुरझाई हुई सब्जी हो*
*या फिर*
*तकलीफ़ देता ” रिश्ता “*
*वो सहेजती हैं*
*संभालती हैं*
*ढकती हैं*
*बाँधती हैं*
*उम्मीद के आख़िरी छोर तक…*
*इसलिए ,*
*आप अहमियत रखिये*👱‍♀!
*वो जिस दिन मुँह मोड़ेंगी*
*आप उसे ढूंढ ही नहीं पाओगे…।*
” *मकान” को “घर” बनाने वाली रिक्तता उनसे पूछो जिन घर मे नारी नहीं वो घर नहीं मकान कहे जाते हैं*
*सभी नारियों को सर्मापित* 💐💐☺️
बहुत सी चीजों के प्रति हम आकर्षित होते हैं – लेकिन हर आकर्षित करने वाली चीज़ को हम अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाना पसंद नहीं करते.

_ पुरुष पर निर्भर रहने वाली स्त्री से अधिक वह स्त्री पुरुष को आकर्षित करती है, जो किसी पुरुष पर आश्रित नहीं होती और अपनी दुनिया का निर्माण खुद करती है.
_ अपनी दुनिया का निर्माण खुद करने वाली स्त्री के पास दिमाग़ के साथ ज़ुबान भी होती है.
_ समर्थ स्त्री के लिए प्रेम उसकी प्राथमिकता नहीं होता. मन, भावना, शरीर-सुख, बस गुज़ारे लायक काफ़ी होता है, सर्वोपरि होती हैं, उसकी महत्वाकांक्षाएं.
_ इसलिए ऐसी स्त्री पुरुष के केवल आकर्षण का केंद्र होती है, वह उसे दूर से लुभाती है.
_ चुनते समय पुरुष उस पर निर्भर रहने वाली स्त्री को ही चुनना पसंद करता है.
_ बहुत समर्थ स्त्री को चुनना ज़्यादातर पुरुषों के बस की बात नहीं.
– Manika Mohini
समर्थ स्त्री हार नहीं मानती, उसे पराजय स्वीकार नहीं.

_ वह न खुद को बेचारा (असहाय) दिखाती है, न दूसरों को दोषी ठहराती है.
_ वह मज़बूती से विपरीत स्थितियों का मुकाबला करती है और अंततः विजय प्राप्त करती है.!!
– Manika Mohini
सुबह की चाय से लेकर रात के भोजन तैयार करने और अलग अलग समय पर आने वालों को भोजन परोसने की तपस्या, वह भी रोज की तपस्या, ओह, कितनी सहनशील थी उस युग की घरेलू महिलाएं…

_ अब भी बहुतेरे घरों में यही स्थिति है.
_ मैंने संयुक्त परिवार में अपनी अम्मा, भाभी और पत्नी की रसोईघर में संलग्नता को अपनी आंखों से देखा है,
_ वे महीनों तक घर के बाहर की सड़क तक को नहीं देख पाती थी.
_ ऊपर से रोज दो-चार अतिथियों का अचानक आगमन,
_ भोजन बनाने वाले इंसान के लिए दाल और सब्जी तक नहीं बचती थी, अचार का सहारा था.
_ पुरुषों को इन बातों की आहट तक नहीं होती थी.
_ वे खाए-पिए-डकार लिए, मुंह पोछे और चले गए और हां, ‘दाल या सब्जी में स्वाद नहीं आया’- यह बताने में नहीं चूकते थे.
– Mamta Singh
ये सब स्त्रियाँ ही हैं – जो अपनी जिंदगी दाँव पर लगा देती हैं कि उनके परिवार, पति और बच्चें स्वस्थ रहें, सुखी रहें और उन्हें कोई कष्ट ना हो,

पर पतिदेवगण यानी पुरुष कभी नहीं कर सकते इतना – यह मेरा अनुभव है,
_ स्त्रियाँ जीवन में वरदान है, वे किसी भी रूप में हो.. अपना सर्वस्व दे देती हैं..
_ पर अफ़सोस समाज, रूढ़ियाँ, परम्पराएं, अंध विश्वास और हमारे उजबक पूर्वाग्रह उन्हें सम्मान और गरिमा से जीने लायक जीवन भी नहीं दे पातें,
_ धिक्कार है ऐसी मान्यताओं और चलन पर.. जो स्त्रियों को एक पल भी बराबरी, सम्मान और मनुष्य होने का दर्जा ना दे सकें.!!
– Sandip Naik

सुविचार – पुरुष – मर्द – 032

पुरुषों का जीवन परिवार और काम-धंधे में संतुलन बनाये रखने में ही बीत जाता है…
पुरुषों का जीवन भी उतना संघर्ष से भरा होता हैं जितना की एक स्त्री का,

आप शायद समझ इसलिए नहीं पाते कि वो कभी गिनवाते नही…

स्त्री होना कठिन है तो पुरुष होना भी कहाँ आसान है, सच्चाई यही है कि

_ जिसको दर्द होता है वही मर्द होता है..

पुरुष का सम्मान करना सीखा नहीं समाज ने,

_ जबकि पुरूष बहुत कुछ करके परिवार को सहेजता है..

ये सोच कर ही पुरुषों ने पूरी उम्र गुजार दी,

_ मैं कैसे भी रहूं पर मेरा परिवार सुकून से रहे !!

तुम मर्द की मोहब्बत की बात करते हो…

मर्द परिवार, बीवी, बच्चों की रोटी की खातिर, दर दर भटकता रहता है..!

पुरुषों का जीवन भी उतना संघर्ष से भरा होता हैं जितना की एक स्त्री का,
_ हम शायद समझ इसलिए नहीं पाते कि वो कभी गिनवाते नही..!!
दुनियां के बीच मर्द पीसता है, तब जा के घर की दाल रोटी का जुगाड़ होता है.!!
पुरुष के लिए घर भी एक होटल ही है, जहां पैसा दीजिए तो आपको ज्यादा मान- सम्मान- इज्जत मिलेगी,

_ और अगर आप बेरोजगार हैं तो परिवार वाले कोई कसर नहीं छोड़ते ताना मारने में.!!

पुरुष की पीठ सर्वसम्मत पहाड़ है..

_ जिस पर सारी दुनिया की जिम्मेदारियां रेंग कर ही सही, चढ़ ही जाती हैं..!!

पुरुष होना कोई विशेषाधिकार नहीं,बल्कि एक अदृश्य सज़ा है.

_ घर में अपनों के बीच रहकर भी अक्सर अकेला पड़ जाता है,
_ उसकी सहनशीलता को अक्सर कमजोरी समझ लिया जाता है,
_ और उसकी चुप्पी को ऐसा अपराध, जिसकी सज़ा उसे बार-बार मिलती रहती है.!!
पुरुषों के पास मायका नहीं होता, ना कोई ऐसा आँगन, जहाँ वे निःसंकोच लौट सकें,

_ जहाँ कोई कहे- “थक गए हो न ? थोड़ा आराम कर लो…”
_ वे चलते रहते है निरंतर, एक पुत्र, एक पति, एक पिता बनकर,
_ अपने कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ लिए, पर कभी खुद के लिए ठहर नहीं पाते..!!
— पुरुष के लिए यह स्वाभाविक हो जाता है कि वह रोते वक्त अपनी आँखों से बहने वाली आँसुओ का कतरा-कतरा हिसाब रखे…
_ यह ‘मोती’ समाज या गैरों के लिए मोल हो या न हो…. यह स्वयं के लिए विशिष्ट ऊर्जा का ताप है..
_ जो जीवन को एक राजा के भाँति जीने को प्रेरित करता है….!!!!
जब जवान हुआ होगा तो पहले मां-बाप का सहारा बना होगा,

_फिर बहन-भाइयों के लिए दर्द बर्दाश्त करता रहा होगा,
_फिर जवानी भर बीवी की जरूरियात पूरी करने के लिए ज़माने के सितम बरदाश्त करता रहा होगा….और अब बच्चों के लिए अपनी हड्डियां गला रहा है..!!
_बहन-भाई अब कहते होंगे कि, उसने हमारे लिए किया ही क्या है.
_बीवी कहती होगी, मेरी तो किस्मत ही खराब थी, जो इनसे शादी हो गई,
_और बच्चे कहते होंगे, पापा जी आप कोई ढंग का काम कर लेते तो, आज हम भी मजे में होते..
_यही है मर्द की ज़िंदगी है..उफ़ ये जिन्दगी..!!
” पुरुष “

तुम इतने सहनशील कैसे हो सकते हो…
क्या तुमको स्वयं को खो देने का डर नहीं होता..
तुम कठोर बन जाते हो..
और वही कठोरता तुम्हारी पहचान..
कितना लिखा जाता है तुमपर,
कभी तुम्हारे प्रेम से भरे हृदय के बारे में कोई क्यों नहीं लिखता..
एक पिता, एक बेटा, एक पति, एक भाई और भी रिश्ते …
जिनको तुम संभालते फिरते हो..
हर किसी की इच्छा पूरी करते हो..
क्या तुम्हारा मन नहीं होता कि कभी तुम भी नए कपड़े खरीद लो..
हर बार क्यों ये कह के निकल जाते हो की तुम लोग ले लो मेरे पास है
एक जोड़ी मोजे लेने के लिए दस दिन जोड़ घटाना करते हो
क्या हो तुम पुरुष…
हमेशा दूसरो को…आगे रखते हो
और खुद दब जाते हो
तुम्हारा संयम कभी विचलित नहीं होता..
तुम्हारी इच्छाएं हर बार सबसे अंत में आती है, कभी कभी तो आती ही नहीं
तुम्हारे दुःख कोई समझ नहीं पाता
या कहो की कभी तुम जताते ही नहीं की कोई दुःख भी है तुमको
बस…परिवार परिवार परिवार..
पुरुष क्या हो तुम…
हाथ उठाये तो -> बेशर्म
चुप रहे तो –> डरपोक
घर से बाहर रहे तो –> आवारा
घर में रहे तो –> घर कूकड़ा
बच्चों को डाँटे तो –> ज़ालिम
ना डाँटे तो –> लापरवाह
माँ की माने तो –> मावडियो
बीवी की माने तो –> जोरु का गुलाम
बीवी को
नौकरी करने से रोके तो –> शक्की
बीवी को नौकरी करने दे तो –>
बीवी की कमाई खाने वाला
पूरी ज़िंदगी समझौता, त्याग और
संघर्ष में बिताने के बावजूद
वह अपने लिये कुछ नहीं चाहता.
इसलिये … हर एक पुरुष की
हमेशा इज़्ज़त करें , क्योंकि
❗ हर एक पुरुष में ❗
बेटा, भाई, पति, दामाद और
पिता हो सकता है,
जिसका जीवन
हमेशा मुश्किलों से भरा हुआ है.
मजाक नहीं पुरुष बनना…

पूरा जीवन तुम्हारे मुस्कराहट के लिए लड़ता रहता है वो बाप हो भाई हो या पति हो ….

उम्र से छोटा हूं महोदय, पर 22 की आयु में ही समझ गया हूं इतनी आसान नहीं है…

छोटी सी नौकरी खर्चा इतना सारा…

पापा के अरमान मां की मुस्कान घर के छोटे मोटे समान,

दूसरे महीने का बिजली का बिल पहले महीने सिलेंडर का रोना …

मां की साड़ी बाप की दवाई … चार दिन की महफिल सैलरी आने पर फिर वही उलटी गिनती…

सपने हजारों हकीकत कुछ और ही कहती है … सब खुश रहे बस इसी लिए लड़ना पड़ता है..

नहीं तो मजाल कोई आंख उठा के भी देख सके… बस खुद की एक आवाज खुद का शोर खुद की लड़ाई..

बेटा हूं भाई हूं धीरे धीरे समझ रहा हूं इतनी आसान तो नहीं ये जिन्दगी … 

कौन है पुरुष who is a male

¤ रब की ऐसी रचना जो बचपन से ही त्याग
और समझौता करना सीखता है ।
¤ वह अपने चॉकलेटस का त्याग करता है बहन के
लिये ।
¤ वह अपने सपनो का त्याग कर माता-
पिता की खुशी के लिये उनके अनुसार कैरियर
चुनता है।
¤ वह अपनी पूरी पॉकेट मनी गर्ल फ़्रेंड के लिये
गिफ़्ट खरीदने में लगाता है ।
¤ वह अपनी पूरी जवानी बीवी-बच्चों के लिये
कमाने में लगाता है ।
¤ वह अपना भविष्य बनाने के लिये लोन लेता है
और बाकी की ज़िंदगी उस लोन को चुकाने में
लगाता है ।
¤ इन सबके बावजुद वह पूरी ज़िंदगी पत्नी,
माँ और बॉस से डांट सुनने में लगाता है ।
¤ पूरी ज़िंदगी पत्नी, माँ, बॉस और सास उस पर
कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं ।
¤ उसकी पूरी ज़िंदगी दुसरो के लिये ही बीतती है
और बेचारा पुरुष
~~~~~~~~~~
¤ बीवी पर हाथ उठाये तो “बेशर्म” ।
¤ बीवी से मार खाये तो “बुजदिल” ।
¤ बीवी को किसी और के साथ देख कर कुछ कहे
तो “शक्की” ।
¤ चुप रहे तो “डरपोक” ।
¤ घर से बाहर रहे तो “आवारा” ।
¤ घर में रहे तो “नाकारा” ।
¤ बच्चों को डांटे तो “ज़ालिम” ।
¤ ना डांटे तो “लापरवाह” ।
¤ बीवी को नौकरी करने से रोके तो “शक्की” ।
¤ बीवी को नौकरी करने दे तो बिवी की “कमाई
खाने वाला” ।
¤ माँ की माने तो “चम्मचा” ।
¤ बीवी की माने तो “जोरु का गुलाम”।
पूरी ज़िंदगी समझौता, त्याग और संघर्ष में
बिताने के बावजुद वह अपने लिये कुछ
नहीं चाहता ।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
इसलिये पुरुष की हमेशा इज़्ज़त करें ।
पुरुष, बेटा, भाई, बॉय फ़्रैंड, पति, दामाद,
पिता हो सकता है, जिसका जीवन
हमेशा मुश्किलों से भरा हुआ है ।
” हाँ ये पुरुष है “

माना ,,,,माना की इनकी आँखों में नमी नहीं होती
पर इनके दिल में भी जज्बातों की कमी नहीं होती
हाँ ये पुरुष है,, प्यार जताने का इनका अलग ही तरीका होता है
कभी डाँटते हैं, कभी गुस्सा करते हैं, कभी हुक्म चालते हैं, कभी कभी रौब भी जमाते हैं
सीधे सीधे कोई बात ये बताते नहीं, फ़िक्र हमारी सबसे ज्यादा करते हैं
पर प्यार से कभी जताते नहीं,,,,हाँ ये पुरुष है
दफ्तर और घर को लम्बी उम्र तक बैलेंस करते हैं
हालातों से ये भी लड़ते हैं, कभी माँ को कह नहीं पाते, कभी बीवी को कहना नहीं चाहते
और नाराजगी दोनों से ही सहते रहते हैं,
वैसे तो ये निडर है, पर रिश्तों को खोने के डर से अक्सर ये डरते हैं,,, हाँ ये पुरुष है
बातों में सख्ती, कांधों में मजबूती, और सीना फौलादी रखते हैं
पर आँगन से जब उठती है डोली, सबसे ज्यादा यही रोते हैं,,, हाँ ये पुरुष है
बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक की जिम्मेदारियां ये उठाते हैं
ख्वाहिसों को खुद की ये कफ़न उढ़ाकर, पूरी जवानी ये जलाते हैं,,,हाँ ये पुरुष है
जब भी कोई मुसीबत आती है, परिवार से पहले इनसे टकराती है
अरे कुछ नहीं होगा, चिंता छोड़ो, सो जाओ , मैं हूँ ना, कह कर सबको सुलाते हैं
और फिर वही चिंता में खुद को पूरी रात जगाते हैं,,,हाँ ये पुरुष है
जिंदगी भर परिवार के लिए जीते हैं, आधी से ज्यादा जिंदगी घर के बाहर ये जीते हैं
लोन के कर्ज और सामजिक फ़र्ज़ में, एक उम्र गुजर जाती है
खुद के लिए ये भी कहाँ लगातार जीते हैं
पिता पति भाई या दोस्त, इसका हर रूप निराला है
कभी ना कभी किसी ना किसी ने हमें हर वक़्त हरदम संभाला
हाँ ये सच है की इंसान को जन्म देती है औरत
पर इनके बिना क्या वजूद हमारा है
” हाँ ये पुरुष है “
मर्दों के जन्म पे खुशियां तो बहुत मनाई जाती है,

लेकिन ज़िन्दगी औरतों की खुशामदी में ही गुजरती है,
बहनों की पढ़ाई तो कभी उनकी शादी का भार,
कभी बीबी की जरूरतें तो कभी बच्चों की बात,
फिर ममता भरी मां के आदेशों का भी सम्मान,
सभी का ख्याल रखते-रखते खुद टूट जाता है,
घर से दूर जिन्दगी बनवास में गुज़ार देता है,
दिनभर मेहनत मजदूरी रात में चिंता में सोता है,
कमाते-कमाते जवानी में ही उम्र ढल जाती है,
फिर भी जरूरतें कहां सबकी पूरी हो पाती है,
मर्दों की जिंदगी यूंही खुशामदी में गुज़र जाती है,
संघर्षों से भरी ये दुनिया में वह चैन कहां पाता है,
गमों के बादल ओढ़ आह् तक नहीं भरता है,
लाखों दर्द छुपा सीने में चुपचाप रह जाता है,
शिकस्त चेहरे पे कभी भी नहीं आने देता है,
मुश्किलों में भी सबके सामने मुस्कुरा लेता है,
मर्दों की जिंदगी यूंही खुशामदी में गुज़र जाती है !
मर्दों की जिंदगी यूंही खुशामदी में गुज़र जाती है !
कहना जितना आसान तुम पुरुष हो,

मगर पुरुष होना कहाँ आसान है !
पुरुष के सिर पर है ज़िम्मेदारी सारी,
पत्नी मेरा हक़ है तुम पर,
माँ कहती मेरे दुध का क़र्ज़ है तुम पर !
बच्चे रोज़ नई नई फ़रमाइश करते हैं !
पत्नी, बच्चों, माँ को खुश करने में गुज़री ज़िंदगी सारी !!
कहना जितना आसान तुम पुरुष हो,
मगर पुरुष होना कहाँ आसान हैं !
हम औरते बात बात मे रो देती हैं,
कहती है तुम क्या जानो दर्द क्या होते है !
पुरुष भी प्रेम का सागर है कठोर नही होते !
बस अपनी भावनाओं को हर किसी के आगे व्यक्त नहीं करते !!
कहना जितना आसान तुम पुरुष हो,
मगर पुरुष होना कहाँ आसान है !
नारी तुम्हारे चहरे पर जो मेकअप है,
ये तुम्हारी पति की दिन भर की मेहनत हैं !
घर के चूल्हे जलाने से लेकर बच्चों की कॉपी किताब,
माता पिता की दवा तक सिर्फ़ पुरुष के सिर पर भार है !!
कहना जितना आसान तुम पुरुष हो,
मगर पुरुष होना कहाँ आसान है !
पुरुष कभी बता नहीं सकते भीतर का शोर

वो क्या हैं लोग तमाशा बनाने में देर नहीं लगाएँगे
रो नहीं सकते
कमजोर और कायर बता दिये जाएँगे
क्रोध नहीं कर सकते
निष्ठुर साबित हो जाएँगे
शांत नहीं बैठ सकते
अभिमानी साबित हो जाएँगे
बस मुस्कुरा सकते हैं क्युकी यही उनको बचपन से बताया और सिखाया गया हैं परिवार और समाज द्वारा
क्या हो रहा हैं उनके साथ या उनके जीवन में इससे किसी को
शायद ही फर्क पड़े या पड़ता हो…
भावनाओ का क्या करना हैं शायद..
……जब मर्द टूटते हैं न तो वो अपने दर्द को समेट कर मौन हो जाते हैं..

…सारी पीड़ा सारी घुटन, सारी चुभन महसूस होती है.. केवल और केवल उनके अंतर्मन में…
_ जिंदा लाश बन जाते हैं वो.. किसी से नहीं कहते वो अपने मन का दुख…
_ रो भी नहीं सकते वो.. क्यूंकि लोग हंसेंगे उन पर क्यूंकि मर्द को दर्द नहीं होता न..
..पर उनकी घुटन.. उनकी बेबसी.. उनकी पीड़ा ..उनके आंसू.. वो खुद रोकर खुद को खुद ही चुप कराते हैं…
_ जब एक पुरुष रोता है न तो उसका विलाप प्रकृति भी नहीं सह पाती.!!
पुरुष के आँसू देख पाना कोई साधारण बात नहीं होती,

_ क्योंकि वो अपनी तकलीफ़ों को शब्दों में नहीं, मुस्कानों में छिपा लेना जानते हैं
_ वो दुनिया के सामने मज़बूत बने रहते हैं,
_ पर जब किसी अपने के सामने टूट जाते हैं, तो समझ लेना उस इंसान की जगह उसके दिल में बहुत गहरी है
_ अगर किसी के सामने उनके आँसू बह निकले हैं, तो वो व्यक्ति उसके लिए सिर्फ महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि सुकून होता है,
_ जिसके सामने वो बिना डर, बिना दिखावे के खुद जो वो है वो बन पाता है.!!
पुरुष ख़ुद को ख़र्च करता है उन तमाम जगहों पर

जहाँ कोई सेल नहीं लगती
बॉस की फटकार, इंक्रिमेंट की पुकार
घर के ख़र्चे, दवाओं के पर्चे
उसके कुछ सपने बेच देते हैं
नींद का वक्त वो सपनों को देता है
और सपनों में नींद पूरी करता पुरुष
चाहकर भी कल्पनाओं में नहीं भटक पाता
तो छोड़ आता है कल्पनाओं को बचपन में लिखी डायरी के पास
माँ के पुराने बक्से में उसकी कल्पनाओं के चित्र
आख़िरी साँस ले रहे हैं
उसका कुछ हिस्सा उन खंडहरों में रह गया है
जहाँ उसे चुपके से चूम लिया था उसने
कुछ उस पेड़ के पास, जिसकी छाँव में
आख़िरी बार उसकी हथेली थामी थी
उसके पैंट के दाहिनी जेब में एक सूची पड़ी है
जिसने बताया कि दस का किलो मिलने वाला आटा
अब तीस में मिलने लगा है
शर्ट की जेब में लगी क़लम मुस्कुराते हुए कहती है
उसका कुछ हिस्सा मेरे पास गिरवी पड़ा है
हर महीने का बढ़ता सूद उसे कभी मेरे क़र्ज़ से मुक्त नहीं होने देगा
पुरुष का बिकना कहीं नहीं लिखा जाता
कभी नहीं कहा गया कि पसीने में भीगा
उसका कुर्ता दुनिया का सबसे कीमती ज़ेवर है
फिर भी हर रिश्ते में मौजूद उसकी बाहें
सुकून और सुरक्षा का पर्याय हैं।
हाँ नहीं होते कुछ पुरुष, पुरुष की तरह
तो कहाँ होती हैं सारी स्त्रियाँ, स्त्री की तरह
✍🏻 • पल्लवी विनोद 💮 ( @pallavivinod )

सुविचार – पति – पत्नी – 031

“पति–पत्नी के बीच का रिश्ता _ पक्के दोस्तों के समान होना चाहिए”
आपस मेँ निभ जाए तो _ इस संसार मेँ सर्वश्रेष्ठ रिश्ता पति -पत्नी का होता है..
जीवन भर साथ निभाने वाले भी एक-दूसरे को ठीक से समझ नहीं पाते, बहुत कुछ अबूझा रह जाता है, खास तौर से पति-पत्नी का रिश्ता..!!
अपनी पत्नी के साथ परिवार के फैसलों में भाग लें. उसकी सलाह को नजरअंदाज न करें, क्योंकि वह आपकी मजबूत सहायक हो सकती है.
पति पत्नी को एक दुसरे की छोटी छोटी खुशियों का ख्याल रखना चाहिए.
पति – पत्नी तभी सुखी रह सकते हैं जब वे अपने साथी का ख्याल रखें.
पति-पत्नी का लक्ष्य आदर्श बनना नहीं, बल्कि हर सुख-दुख में साथ रहना है.!!
यह रिश्ता ऐसा रिश्ता है जिसमे खुद की हार भी जीत के समान है.
पति – पत्नी होने से ज़्यादा ज़रूरी इस समाज के लिए पति – पत्नी दिखना ज़रूरी है.
बुराई किसी एक के सिर नहीं मढ़ सकते.
_ कहीं स्त्री (पत्नी) बुरी होती है, कही पुरुष (पति).!!
पति-पत्नी सुख-दुःख दोनों के साथी होते हैं.

_ एक-दूसरे का कांधा..जीवन के हर बोझ को हल्का कर देता है..!!

जीजा के रूप में पुरुष और साली के रूप में स्त्री सदैव मृदुभाषी ही मिलेंगे,

_ बवाल तो पति-पत्नी के रूप में ही करते हैं.!!

पत्नी बनने का अधिकार उसे है जो लड़के के संघर्ष में भी साथ रहे ना कि सरकारी नौकरी की वजह से साथ रहे..,

_ और पति बनने का अधिकार उसे है जो कभी किसी लड़की के करियर में बाधा न बने और उसे केवल चूल्हे-चौके तक ही सीमित न रखे.

स्त्री सरल होती है, सरलता उसका सौंदर्य है.

_ पुरुष ताकतवर होता है, ताकत उसका सद्गुण है.
_स्त्री के भीतर सरलता के साथ पुरुष जैसी ताकत भी हो,
_ पुरुष के भीतर ताकत के साथ स्त्री जैसी सरलता भी हो,
_ फिर देखिए, संसार कितना सुंदर बनता है.
जब पति-पत्नी दो लोग साथ में होते हैं..

…ये कतई नहीं होता कि 50-50 की पार्टनरशिप हो…
_ यहां पर कोई लेनदेन नहीं होता ..कोई व्यापार नहीं है.
_ जीवन एक वृत्त है ..जिसे दो लोग मिलकर पूरा करते हैं..
_ किसने कितना दिया ..यह मायने नहीं रखता.
_ मगर जरूरी है कि दोनों समझे ..और सच्चाई से समझे..
पति- पत्नी का रिश्ता खून का नहीं होता है, परस्पर सामञ्जस्य और हम खयाली का होता है.

__ छोटी- छोटी बातें परस्पर प्रेम में महत्वपूर्ण कार्य अदा करती हैं..!

कोई जरुरी नहीं कि पति पत्नी के विचार मिलते हों…

_ जरुरी यह है कि दोनों को बेमेल विचारों के साथ रहना आता हो.

पति- पत्नी को समझना चाहिए कि हर इंसान अलग होता है, सोच अलग, विचार अलग..

_ पर साथ तो चाहिए, अकेलापन नहीं _ फिर समझौता बेस्ट है..!!

“शादीशुदा ज़िन्दगी को खुशहाल बनाने के लिए,

_ दोनों को एक दुसरे का साथ देना चाहिए”

स्त्री हो या पुरुष पैसे कमाना दोनो के लिए आवश्यक है.

_ कोई किसी को जरूरत भर ही पैसे दे सकता है..- शौक तो अपने ही पैसे से पूरे होंगे.!!

पति – पत्नी का रिश्ता कुछ ऐसा होना चाहिए, _

_ कि लड़ाई जब दो में हो तो तीसरे को पता नहीं चलना चाहिए..!

विवाह के बाद पति पत्नी का आपस में गलती तलाशना व बहस करना मूर्खता होती है ;

बुद्धिमानी तो गलतियां सुधार कर गृहस्थी चलाने में होती है, _ बहस से मात्र समस्याएं उत्पन्न होती हैं.

जो पति मिला है, वह जैसा भी है, उसे उसी रूप में ग्रहण करो.

_ जो पत्नी मिली है, वह जैसी भी है, उसे उसी रूप में ग्रहण करो.
_ किसी भी रिश्ते में ज़्यादा अपेक्षा करना उस रिश्ते को कमज़ोर बनाता है.
_ जीवन में सफ़ल होना मायने रखता है.
_ तोड़ने का क्या, तोड़ना आसान है, बनाना बहुत मुश्किल.
_ रिश्तों के सफ़ल होने में ही इंसान की सफ़लता है.!!
हर व्यक्ति में कुछ गुण कुछ दोष होते हैं ; _ यदि पति- पत्नी एक दूसरे के गुणों को प्रोत्साहित करें और कमियों को नजरअंदाज करें, तो जीवन बेहतर ढंग से जिया जा सकता है !!

_ बार बार कमियों को इंगित करने से परस्पर मनमुटाव बढता है, _और फिर जीवन जिया नहीं गुजारना पङता है.

पति – पत्नी जब समझदार हों तो विचार ना मिलते हुए भी एक दूसरे के विचारों की कद्र करते हैं ना ही कोई हस्तक्षेप करते हैं, _

_ नज़रअन्दाज़ भी ऐसे करते हैं की दूसरे को बुरा ना लगे और इन्ही विचारों के साथ अपनी जिंदगी का पूरा समय हंसी ख़ुशी व्यतीत कर जाते हैं !

कौन कहता है कि हर पुरुष खोजते हैं रूपवती स्त्री…

  • वो भी एक सामान्य स्त्री के तलाश में हैं, जो विषम परिस्थितियों में साथ रहे और…उसे सहारा दे, _ गर रोए तो उसे कायर न समझ कर…श्रद्धा और प्रेमभाव से हर ले _उसके दिल के तमाम दुखों और पीड़ाओं को..
पति के लिए पत्नी से बढ़कर… और पत्नी के लिए पति से बढ़कर कोई दोस्त नहीं हो सकता..!

अगर आपस में मशवरा करके जिंदगी के फैसले मिल कर लिए जाएं तो पूरी जिंदगी सकून से गुजरेगी ..!!

पति-पत्नी दोनों का बौद्धिक स्तर [intellectual level] एक जैसा होना असंभव जैसा है.
_ हां, समझदारी एक जैसी हो सकती है.!!
मनुष्य जीवन का एक आश्चर्य यह भी है कि जीवन भर साथ निभाने वाले भी एक-दूसरे को ठीक से समझ नहीं पाते, बहुत कुछ अबूझा रह जाता है,

_खास तौर से पति-पत्नी का रिश्ता ;

_ यह रिश्ता शरीर से होते हुए मन और मन से होते हुए आत्मा से जुड़ता है ;

_ इस जुड़ाव के लिए दोनों का शरीर किसी पुल की तरह काम करता है जो दो छोरों को मिलाता है और मन से आत्मा तक की यात्रा सम्पन्न करवाता है.

जिंदगी के सफर में बगल सीट पर एक ईमानदार इंसान की बहुत जरूरत होती है.

_ वो व्यक्ति जो आपके बारे में बहुत सम्माननीय है..
_ आप उस के साथ बहुत खुश हैं.
_ जिसके साथ आप खुश हो हर पल का आनंद लें सकें,
_ जो आपके साथ वैसा व्यवहार करता है जैसा आप हैं,
_जो आपके पास जो कुछ है उसे मुस्कान के साथ स्वीकार करता है,
_ जिंदगी बहुत छोटी है,
_ अपनों के साथ जिंदगी का एक खूबसूरत पल..
_ हजारों दिन गैरों के साथ बिताने से कहीं बेहतर है.
पत्नी क्या होती है।

मुझसे अच्छा कोई नही जान पाएगा
एक बार जरूर पढ़ें..
“मै डरता नही उसकी कद्र करता हूँ
उसका सम्मान करता हूँ।
-” कोई फरक नही पडता कि वो कैसी है
पर मुझे सबसे प्यारा रिश्ता उसी का लगता है”
माँ बाप रिश्तेदार नही होते’
वो भगवान होते हैं ; उनसे रिश्ता नही निभाते उनकी पूजा करते हैं’
भाई बहन के रिश्ते जन्मजात होते हैं,
दोस्ती का रिश्ता भी मतलब का ही होता है’
आपका मेरा रिश्ता भी जरूरत और पैसे का है’
पर,
पत्नी बिना किसी करीबी रिश्ते के होते हुए भी हमेशा के लिये हमारी हो जाती है
अपने सारे रिश्ते को पीछे छोडकर”
और हमारे हर सुख दुख की सहभागी बन जाती है
आखिरी साँसो तक”
पत्नी अकेला रिश्ता नही है, बल्कि वो पूरा रिश्तों की भण्डार है,
जब वो हमारी सेवा करती है हमारी देख भाल करती है,
हमसे दुलार करती है तो एक माँ जैसी होती है.
जब वो हमे जमाने के उतार चढाव से आगाह करती है,और मैं अपनी सारी कमाई उसके हाथ पर रख देता हूँ क्योकि जानता हूँ वह हर हाल मे मेरे घर का भला करेगी तब पिता जैसी होती है.
जब हमारा ख्याल रखती है हमसे लाड़ करती है, हमारी गलती पर डाँटती है, हमारे लिये खरीदारी करती है तब बहन जैसी होती है.
जब हमसे नयी नयी फरमाईश करती है, नखरे करती है, रूठती है , अपनी बात मनवाने की जिद करती है तब बेटी जैसी होती है.
जब हमसे सलाह करती है मशवरा देती है ,परिवार चलाने के लिये नसीहतें देती है, झगड़े करती है तब एक दोस्त जैसी होती है.
जब वह सारे घर का लेन देन, खरीददारी, घर चलाने की जिम्मेदारी उठाती है तो एक मालकिन जैसी होती है.
और जब वही सारी दुनिया को यहाँ तक कि अपने बच्चों को भी छोडकर हमारे बाहों मे आती है,
तब वह पत्नी, प्रेमिका, अर्धांगिनी , हमारी प्राण और आत्मा होती है जो अपना सब कुछ सिर्फ हम पर न्योछावर करती है”
मैं उसकी इज्जत करता हूँ तो क्या गलत करता हूँ.
चढ़ती उम्र के साथ पतियों को बदलते देखा है
बुढ़ापे की तरफ जब राह हो जाती,
अपनी औलाद ही जब आंखे दिखाती,
तब पतियों को बदलते देखा है,
पत्नियों की कदर करते देखा है.
सारी दुनिया घूम लीं जब, कोई रिश्ता सगा ना दिखा,
भाई बहन सब रुठ गएं _ मां, बाप के हाथ छूट गए,
तब जीवनसाथी का हाथ, सड़क पे पकड़े देखा है,
हां, पत्नियों की कदर करते देखा है.
जवानी जब बीत गई, कमाने की इच्छा भी ना रही,
भागने का जब दम ना बचा, घुटनों का दर्द जब बढ़ गया,
तब पत्नी के घुटनों में, बाम लगातें देखा है,
हां, हम पत्नियों की कदर करते देखा है,
हां, पतियों को बदलते देखा है.
पार्क में जब किसी का दर्द सुन लिया,
साथी किसी का गुजर गया,
उसकी आंख का आंसू देख, घर आकर,
जीवन साथी को हिलते हाथों से गजरा लगाते देखा है
हां, पतियों को बदलते देखा है,
पत्नियों की कदर करते देखा है,
चढ़ती उम्र के साथ, प्यार को भी चढ़ते देखा है..!!
एक बार अवश्य पढ़ें….

🌹👉 *स्वयं का महत्व*👈🌹
इस महिला की सोच सभी के लिये प्रेरकः
प्रसन्नता का गेयर हमेशा अपने हाथ में रखें….✍
वैवाहिक जीवन पर आधारित एक लाइफ स्किल सेशन में स्पीकर ने दर्शकों में उपस्थित एक महिला से पूछा….
“क्या आपके पति आपको खुश रखते हैं ?”
इस प्रश्न पर उस महिला का पति बड़ा ही आश्वस्त था,
क्योंकि उनका वैवाहिक जीवन काफी सफल था। उसे पता था उसकी पत्नी क्या बोलेगी….
क्योंकि पूरी शादी शुदा जिंदगी में उसकी पत्नी ने कभी भी किसी भी बात के लिए कोई शिकायत नहीं की थी।
महिला ने बड़ी ही गंभीर आवाज में जवाब दिया – “नहीं मेरे पति मुझे प्रसन्न नहीं रखते।”
पति बहुत ही चकित था और वहां मौजूद बहुत से दूसरे लोग भी !
परन्तु उसकी पत्नी ने बोलना जारी रखा –
“मेरे पति ने कभी मेरी खुशी का ध्यान नहीं रखा…. और ना ही वे रख सकते हैं, क्योंकि वे बहुत व्यस्त रहते हैं
पर फिर भी मैं खुश हूँ ।
मैं खुश हूँ या नहीं यह मेरे पति पर नहीं बल्कि मुझ पर निर्भर है।
मैं ही एकमात्र व्यक्ति हूँ जिस पर मेरी खुशी निर्भर करती है।
मैं जिन्दगी की हर परिस्थिति और हर पल में खुश रहना पसंद करती हूँ, क्योंकि अगर मेरी खुशी….
किसी दूसरे व्यक्ति, किसी वस्तु या हालात पर निर्भर करती है तो यह मुझे पसंद नहीं और इससे मुझे बहुत तकलीफ होती है।
जीवन में जो कुछ भी है वह हर पल बदलता रहता है।
व्यक्ति, समृद्धि, पैसा, शरीर, मौसम,आपके ऑफिस में बाॅस, सुख-दुख, दोस्त और मेरी शारीरिक व मानसिक अवस्था भी। यह अन्तहीन सूची है और यही हमें प्रभावित करना चाहती है।
मुझे खुश रहने का फैसला करना होगा, चाहे जीवन में कुछ भी हो।
मेरे पास साडियाँ ज्यादा हैं या कम पर मैं खुश हूँ।
चाहे मैं घर में अकेली रहूँ या बाहर घूमने जाऊँ, मैं खुश हूँ।
चाहे मेरे पास बहुत पैसा हो या नहीं पर मैं खुश हूँ। चाहे टीवी पर मेरा पसन्दीदा सीरियल आ रहा है या क्रिकेट मैच, पर मैं सदा खुश हूँ।
मैं शादी-शुदा हूँ पर मैं तब भी खुश थी… जब मैं सिंगल थी।
मैं अपने स्वयं के लिए खुश हूँ।
मैं अपने जीवन को इसलिए प्यार नहीं करती कि वह दूसरों से आसान है, बल्कि इसलिए कि मैने स्वयं खुश रहने का फैसला किया है।
जब प्रसन्न रहने का दायित्व मैं अपने आप पर लेती हूँ तब मैं अपने पति के कंधों से अपनी देखभाल करने का बोझ हल्का करती हूँ।
यह सोच मेरे जीवन को बहुत आसान बनाती है और यह हर किसी को भी बना सकती है, और यही एक मात्र कारण है कि हम बहुत सालों से सफल और प्रसन्न वैवाहिक जीवन का आनन्द ले रहे हैं।
आप भी अपनी प्रसन्नता का गेयर किसी और के हाथ में मत दीजिए।
प्रसन्न रहिए, चाहे जीवन में बहुत गर्मी हो या बरसात, चाहे आपके पास बहुत पैसा न हो, कोई आपको हर्ट करे तब भी…!!
पति चाहे स्टेयरिंग सीट पर बैठे हों और गाड़ी सपाट रोड पर दौड़ रही हो या ऊबड़खाबड़ सड़क पर हिचकोले खा रही हो,
गियर हमेशा प्रसन्नता मोड में ही रखें।
आपको कोई प्यार भी नहीं करेगा …. कोई भी सम्मान नहीं देगा … जब तक आप स्वयं अपने आप को महत्व नहीं देंगी। इसलिये आपको स्वयं को जानना बहुत जरूरी है ।
स्वयं के महत्व की जानकारी बेहद जरूरी है ।
रिश्ते इस संसार में बनते हैं, बिगड़ते हैं. बने हुए रिश्तों को संभालना मुश्किल काम है.
रिश्ते लम्बे समय तक चलें इसके लिए समझदारी के साथ-साथ सद्भावना और धीरज की ज़रूरत होती है.
कई बार कुछ ऊंचा-नीचा हो जाता है, उस वक्त दोनों की समझदारी से संतुलन बनता है.
कई बार उनमें से एक ज़िद में आ जाता है, तब दूसरे का संयत होना आवश्यक होता है.
बात-बिनाबात मनमुटाव हो जाता है, बातचीत बंद हो जाती है, एक-दूसरे की ओर देखना छूट जाता है. ऐसी हालत में क्या किया जाए, यह ऐसी समस्या है जो अब तक अनसुलझी है.
रिश्ते बनाने और निभाने के लिए सकारात्मक सोच जरूरी होता है.
जब दोनों पक्ष एक जैसा सोच रहे हों तब तो सहज रूप से बात बन जाती है लेकिन जब विपरीत विचारधारा से सामना होता है, उस समय बने हुए रिश्ते को निभाना मजबूरी जैसा हो जाता है, जैसा कि पति-पत्नी सम्बंधों में दिखाई पड़ता है.
इन दोनों का पारिवारिक और समाजिक परिवेश अलग-अलग होता है, एक समाजिक अनुष्ठान के अंतर्गत दोनों एक साथ रहने के लिए सहमत हो जाते हैं किंतु दोनों की सोच में विरोधाभास होता है जो धीरे-धीरे उभर कर सामने आता है.
ऐसे में तालमेल बना कर चलना स्वाभाविक नहीं रहता, मजबूरी हो जाता है. इस मजबूरी के चलते आपसी बहस और विवाद भी होते हैं फिर भी रिश्ते आजीवन बने रहते हैं.
( उपन्यास ‘परदेसी…जाना नहीं’ का एक अंश – द्वारिका प्रसाद अग्रवाल)
फेसबुक पर हर समय पति पत्नी के बीच खराब संबंधों की चर्चा होती रहती है,

_ जिसमें अधिकतर पति अत्याचारी, खलनायक के रूप में पेश किया जाता है.
_ ज़्यादा से ज़्यादा हुई तो खलनायिका सास की चर्चा हो गई.
_ मित्रों, मुख्यत: महिला मित्रों, क्या आपको जीवन के कोई अन्य दुख दिखाई नहीं देते ? या आपके जीवन में हैं ही नहीं?
_ पैसे का दुख, पैसा कमाने की राह में आई मुश्किलों का दुख, बच्चों के हज़ार दुख, बच्चों की शिक्षा में आई दिक्कतों का दुख, बीमारी-शिमारी का दुख…
_ अनेक प्रकार के दुख हैं ..पर आप रोज़ पति को पकड़ कर बैठी मातम मनाती रहती हो कि हाय, पति ऐसे, हाय, पति वैसे..!!
_ हर समय पति की ऐसी की तैसी करती रहती हो और उसी नकारे पति के साथ रहती भी रहती हो.
_ क्या आपको नहीं पता कि हर घड़ी रिश्तों का छिद्रानवेषण करने से संबंधों की मधुरता खत्म होती है ?
_ अपनी हैसियत को पहचानो और अपनी औकात में रहो.
_ हिम्मत है तो पति के दिए हुए सुख-सुविधाएं-इज़्ज़त छोड़ो और खुद कमाने का झंडा फहराओ.
– Manika Mohini
पुरुष पैसा इसलिए कमाता है ताकि वह अपनी पत्नी को साथ लेकर चल सके.

_ स्त्री पैसा इसलिए कमाती है ताकि वह पति के बिना भी रह सके.
_ पत्नी सहयोग करती है, पूर्ण ज़िम्मेदारी पति उठाता है.
– Manika Mohini
चाहे स्त्री पुरुष को छोड़े या पुरुष स्त्री को छोड़े,
_ तमाशा तभी होता है.. जब दोनों में से एक न छोड़ने की ज़िद पर अड़ा रहता है.
_ अरे भाई, तमाशा करने में कुछ नहीं रखा.. छोड़ो और आगे बढ़ो.!!
‘जिओ और जीने दो’
– Manika Mohini

सुविचार – पति – 030

पति लड़ते – झगड़ते हैं और नाराजगी भी रखते हैं,

पर पत्नी के बिना जीने का ख्याल नहीं रखते हैं.

Husband  सिर्फ प्यार करने वाला खिलौना नहीं है, जिम्मेदारियों से उलझा एक Guardian भी है,

इसलिए उससे बहस करके उसका दिल ना दुखाएं, उसके निर्णय करने में सहयोगी बनें अवरोधक नहीं.

” पति वो होता है ” – जो पत्नी और बच्चों के लिए जवानी कुर्बान कर देता है, ये वो हस्ती है जो अपने बच्चों के भविष्य को खूबसूरत और उज्जवल बनाने कि पूरी कोशिश करता है, जो अथक परिश्रम करता है और अपनी इच्छाओं का त्याग करता है.

वह अपनी पत्नी को कभी पता नहीं चलने देता कि वह उसकी कितनी परवाह करता है ;

वो अपनी बीवी को खुद से ज्यादा खूबसूरत देखना चाहता है ;

इस बलिदान के बदले उसे हमेशा अयोग्य और आलसी माना जाता है ;

घर से निकले तो भी सवाल होते हैं, घर में रहो तो भी सवाल होते हैं ;

अपने लिए कुछ ना ख़रीदे तो कंजूस कहलाता है ;

बहुत कुछ करने और और बहुत कुछ कहने के बाद भी _ ये वो है जो अपने बच्चों को हर तरह से अपने से बेहतर देखना चाहता है,_ अपने बच्चों को अपने से ज्यादा कामयाब देखना चाहता है और हमेशा उनके कल्याण के लिए प्रार्थना करता है ;

ये वो है जो अपने बच्चों के लिए दुःख सहता है और अपनी दौलत उन्हें सौंप देता है ;

माँ नौ महीने गर्भ में बच्चे को रखती है तो पिता पूरी जिंदगी अपने बच्चों के भविष्य कि चिंता में गुजार देता है ;

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