सुविचार – पत्नी – 029

एक तुम्हारा होना क्या से क्या कर देता है,

_ बेज़ुबान छत-दीवारों को घर कर देता है.!!
सही मायने में जीवन की सच्ची हमसफर पत्नी ही होती है, बाकि सारे रिश्ते वक्त के साथ खत्म हो जाते हैं, पर पति पत्नी का रिश्ता जीवन के अंत तक चलता रहता है.
पत्नी कभी भी पति के लिए प्रॉब्लम नहीं होती, पत्नी तो पति के लिए सुख- दुख का साथी है, ज़िन्दगी के ऐसे मोड़ पे साथ देती है, जहाँ पर दूर- दूर तक अपना कोई नहीं होता..!!
पत्नी घर की इज़्ज़त होती है और जो व्यक्ति उसी को मजाक बना दे,

_ वो रिश्तों का दर्द कभी नहीं समझ सकता.!!

पत्नी पति की समस्या नहीं, उसका सच्चा साथी है..

_ जो हर मोड़ पर उसके साथ खड़ी रहती है.

जब पति परेशान होता है.. तब पत्नी की नींद उड़ जाती है.

_ पति की लम्बी उम्र के लिए पता नही वह कितने व्रत करती है, प्रार्थनाएं करती है, मन्नत मांगती है.
_ पति बीमार पड़ जाता है तब बेहद घबरा जाती है, सेवा करती है.
_ जब पति की जेब खाली होती है तब अपनी सारी संचित पूंजी उसके हवाले कर देती है.
_ अपनी सबसे प्यारी चीज अपने गहने बेच देती है और आप कहते हो वो पैसों पर मरती है.
*कितनी खूबसूरती से लिखा है पति ने अपनी पत्नी के बारे मे*

_ मैं सोता हूँ घर में शाँति छा जाती है, वो सोती है घर में सूनापन छा जाता है.
_ मैं घर लौटता हूँ घर में शाँति हो जाती है, वो घर लौटती है घर में रौनक हो जाती है.
_ मैं सो कर उठता हूँ घर में फरमाइशें गूँजती हैं, वो सो कर उठती है घर में पूजा की घंटियाँ गूँजती हैं.
_ मेरा घर लौटना उस का आत्मविश्वास बढ़ाता है, उस का घर लौटना घर में लक्ष्मी व अन्नपूर्णा का वास होता है.
_ पत्नि चुटकुलों में उपहास नहीं है, हमसफर है रक्षक है वो परिवार की शक्ति है.!!
*कभी बनाना लिस्ट…क्या क्या बनाया है बीवी ने…*

एक friend ने बनाया लिस्ट जरूर पढ़िए
वो कहती है बनाने में घण्टों लगते है…
और खाने में पल भर …
कभी कुछ बड़े जतन से बनाती है…
सुबह से तैयारी करके…
कभी कुछ धुप में सुखा के…
तो कभी कुछ पानी में भिगो के…
कभी मसालेदार..
तो कभी गुड़ सी मीठी…
सारे स्वाद समेट लेती हैं …
आलू के पराठों में, या गाजर के हलवे में, ऊपर बारीक कटे धनिये के पत्तो में, या पीस कर डाले गए इलाइची के दानों में…
सारे स्वाद समेट देती हैं एक छोटी सी थाली में…
न जाने कहाँ कहाँ से पकड़ के लाती है…
ना जाने कितना कुछ तो होता है …
कभी लिस्ट बनाना …
बीवी ने जो कुछ भी.. कभी भी बनाया है…
तुम बना नही पाओगे…
हमें भी बस खाना ही दिखता है…
पर नही दिखती…
किचन की गर्मी,
उसका पसीना,
हाथ में गरम तेल के छींटे,
कटने के निशान,
कमर का दर्द,
पैरो में सूजन,
सफ़ेद होते बाल..
कभी नहीं दिखते…,,
कभी तो ध्यान से देखो ना,,उस की छोटी से रसोई में… कोई दिखेगा तुम्हे ,,
जो बदल गया है इतने सालो में… दांत हिले होंगे कुछ….
बाल झड़ गए होंगे कुछ…
झुर्रियां आयी होंगी कुछ तुम्हारे मकान को घर बनाने में,,,,,
चश्मा लगाए, हाथ में अपनी करछी, बेलन लिए जुटी होगी…
आज भी वही कर रही है.. जो कर रही है वो पिछले पच्चीस तीस सालों से, और तुम्हे देखते ही पूछेगी
“क्या चाहिए?”…
कभी देखना उसके मन के कुछ अनकहे ज़ज़्बात, दबी हुई इच्छाएं,,
जो दिखती नही..
क्योंकि जो दिखती नही, उन्हें देखना और भी ज़्यादा ज़रूरी होता है…
जब रसोई से दो बिस्किट या रस हाथ में लेकर निकलता हूँ,, कभी उसकी गैर मौजूदगी में…
तब उसकी बात सोचने पे मज़बूर कर देती है… क्योंकि उसने सिर्फ खाना ही नहीं बनाया है इतने सालो में…
तुम्हें भी बनाया है…
खुद को मिटा के…
और याद है न…
बनाने में घण्टों लगते है..ख़तम एक बार में हो जाता है …पूरा घर बनाया है…
दिन रात मेहनत करके…
कभी बनाना लिस्ट और क्या क्या बनाया है बीवी ने…
लिस्ट बन नहीं पाएगी
कोशिश करना ..
कभी बन नहीं पाएगी..

सुविचार – भाभी – 028

पीहर जा रहे हो तो कुछ नियम –

1 -अपनी भाभियों को ज्यादा परेशान नही करें.

2 -अपने आप को जादा smart ना समझो क्यूंकि भाभीया कोई कम smart नई होती.

3 -पीहर मे जाकर अपने आप को महारानी ना समझो… जाे दिनभर भाभी पर हूकूमशाही चलाओ.

4 -दिन भर अपनी भाभी केा किचन मे भिडाये मत रखना. 😃😃😜

भाभी छोटी हो या बडी, काम आती है सभी,

चले है उसी से पीहर, वह है घर की लीडर.

बेटो से न चला हैं घर-संसार, भाभियाँ चलाती है घर – परिवार,

वह भी होती है आधी हकदार.

करो उनकी गलतियों को नजरअंदाज, जैसे हम सब से होती है गलतियाँ आज.

मान – सम्मान से रखो उन्हें,

क्योंकि माँ के बाद भाभी का ही स्थान है.

छोटी हो या बडी, भाभी होती है भाभी.

 

सुविचार – भाई- बहन – 027

—— बड़े होकर भाई- बहन —— कितने दूर हो जाते हैं —

—— इतने व्यस्त हैं सभी —— कि मिलने से भी मजबूर हो जाते हैं ——

—— एक दिन भी जिनके बिना —— नहीं रह सकते थे हम ——

—— सब ज़िन्दगी में अपनी —— मसरूफ हो जाते हैं ——

—— छोटी-छोटी बात बताये बिना —— हम रह नहीं पाते थे ——

—— अब बड़ी-बड़ी मुश्किलों से —— हम अकेले जूझते जाते हैं ——

—— ऐसा भी नहीं —— कि उनकी एहमियत नहीं है कोई ——

—— पर अपनी तकलीफें —— जाने क्यूँ उनसे छिपा जाते हैं ——

—— रिश्ते नए —— ज़िन्दगी से जुड़ते चले जाते हैं ——

—— और बचपन के ये रिश्ते —— कहीं दूर हो जाते हैं ——

—— खेल-खेल में रूठना-मनाना —— रोज़-रोज़ की बात थी ——

—— अब छोटी सी भी गलतफहमी से —— दिलों को दूर कर जाते हैं —-

—— सब अपनी उलझनों में —— उलझ कर रह जाते हैं —–

—— कैसे बताए उन्हें हम —— वो हमें कितना याद आते हैं —–

—— वो जिन्हें एक पल भी —— हम भूल नहीं पाते हैं —–

—— बड़े होकर वो भाई- बहन —— हमसे दूर हो जाते हैं ——

भाई और बहन के प्यार में बस इतना अंतर है कि

रुला कर जो मना ले वो भाई है, और रुला कर जो खुद रो पड़े वो है बहन.

सुविचार – भाई – 026

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भाई का प्यार किसी दुआ से कम नहीं होता, वो चाहे दूर भी हो कोई गम नहीं होता, अक्सर रिश्ते दूरियों से फीके पड़ जाते हैं पर भाई बहन का प्यार कम नहीं होता.
भाई – साइकिल की तरह होते है_ अपने टूटे कल पुर्जे, उतरते हुए चेन से भी आपको मंजिल पर पहुंचाने की हर सम्भव कोशिश करते हैं.
हमें भाईयों की तरह मिलकर रहना अवश्य सीखना होगा अन्यथा मूर्खों की तरह सभी बरबाद हो जाएंगे.

 

सुविचार – बहन – 025

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अच्छे मित्र आयेंगे और चले जायेंगे, लेकिन एक बहन हमेशा मित्र के रूप में साथ देती है.
बहन – नदियों की तरह होती हैं जो सदैव अपने हिस्से का कुछ न कुछ देती रहती हैं .. और फिर भी अपने बहाव में बिन रुके बहतीं रहती हैं.
दुनिया में भाइयों की सबसे शक्तिशाली और ईमानदार रक्षक बहनें ही होती हैं.
बहनें हसीं बांटती हैं और आंसू पोंछती है.
बहनें खुशनसीबी का प्रतीक है.
बहना राखी पर तुम आ जाना,

अटूट बन्धन ये, जीवन भर का,

पड़ेगा तुझको निभाना ।

माना हम बहुत व्यस्त है,

सच कहता हूँ, मगर,

पूरी जिन्दगी अस्त व्यस्त है।

याद आता है बहना, वो पुराना जमाना,

छोटी छोटी बात में रूठना मनाना।

मेरी हर फरमाइशों को पल में पूरा करना,

मम्मी पापा के सो जाने पर,

चाय के साथ कुछ भी बना कर ले आना,

घन्टों घन्टों, रात भर कुछ मेरी सुनना,

कुछ अपनी सुनाना, दीदी बहन के साथ साथ

दोस्त भी बन जाना, दोस्ती निभाना ।

याद आता है वो लड़ना झगड़ना,

लेकिन फिर भी मुझे बचाने के लिये,

झूठ बोलकर मम्मी से पिट जाना।

अपने प्यार को फिर से,

राखी के धागे में सँजो लेना,

चली आना कलाई पर बाँधने,

ये वादा भी ले जाना बहना,

जब भी तुझको जरूरत होगी,

पलक झपकते ही मुझे सामने पायेगी,

सदियों की रीत मुताबिक,

राखी का सम्मान बहना पायेगी।

बहना तुम आ जाना,

ढेरों गिफ्ट साथ ले आना,

नही चलेगा कोई बहाना ।।

।। पीके ।।

नहीं चाहिए हिस्सा भइया,

मेरा मायका सजाए रखना.

राखी भैया दूज पर मेरा,

इंतजार बनाए रखना.

कुछ न देना मुझको चाहे,

बस अपना प्यार बनाए रखना.

पापा के इस घर में,

मेरी याद सजाए रखना.

बच्चों के मन में मेरा,

मान बनाए रखना.

बेटी हूं सदा इस घर की,

यह सम्मान संजोए रखना.

रक्षाबंधन के उपलक्ष्य में प्रसून जोशी की एक रचना:

बहन अक्सर तुम से बड़ी होती है
बहन अक्सर तुम से बड़ी होती है,
उम्र में चाहे छोटी हो,
पर एक बड़ा सा एहसास ले कर खड़ी होती है ।
बहन अक्सर तुम से बड़ी होती है,
उसे मालूम होता है तुम देर रात लौटोगे,
तभी चुपके से दरवाजा खुला छोड़ देती है,
उसे पता होता है तुम झूठ बोल रहे हो,
और बस मुस्कुरा कर उसे ढक लेती है ।
वो तुमसे लड़ती है पर लड़ती नहीं,
वो अक्सर हार कर जीतती रही तुमसे ।
जिसे कभी चोट नहीं लगती ऐसी एक छड़ी होती है,
बहन अक्सर तुम से बड़ी होती है ।
पर राखी के दिन जब एक पतला सा धागा बांधती है कलाई पे,
मैं कोशिश करता हूँ बड़ा होने की,
धागों के इस रार पर ही सही,
कुछ पल के लिए मैं बड़ा होता हूँ,
एक मीठा सा रिश्ता निभाने के लिए खड़ा होता हूँ,
नहीं तो अक्सर बहन ही तुमसे बड़ी होती है,
उम्र में चाहे छोटी हो, पर एक बड़ा सा एहसास ले कर खड़ी होती है ।
बस पढा जाए।

बहन हमारी जिंदगी का वो हिस्सा है जो सबसे खूबसूरत उपहार है दुनिया रचने वाले की ओर से। लेकिन समाज की दकियानूसी बातों की मानें तो वो परिवार की इज्ज़त है, मान-सम्मान है और उसके एक ग़लत कदम उठा लेने भर से दुनिया में हम मुंह दिखाने लायक नही है। ऐसी बातें थोपना यक़ीन मानिए बहनों के लिए किसी अभिशाप से कम नही है। पितृसत्ता यही है असलियत में बहने इससे आजादी चाहती हैं। आपका योगदान क्या है ? इस पर विचार करिए।
आपको सोचना चाहिए कि आपने अपनी बहन की नजर में अपनी इमेज क्या बनाई है एक खुर्राट भाई या एक सहज दोस्त? खुद से सवाल करिए अगर आप खुर्राट भाई हैं तो खुद को बदलिए एक बहन के लिए रक्षाबंधन पर आपके द्वारा दिया गया सबसे खूबसूरत उपहार होगा।
बहन की जिंदगी में भी उसका अपना एक स्पेस है। उसकी निजता है। लेकिन ज्यादातर भाई ख्याल रखने से ज्यादा मॉनिटरिंग करते है। उसका मन सुनने से ज्यादा जासूसी करते हैं। उसकी दिनचर्या पर बात करने से ज्यादा फोन कॉल्स, सोशल मीडिया एकाउंट की एक्टिविटी और उसके दोस्त कौन है? ये जानने की जुगत में रहते हैं। असलियत में बहन इससे सुरक्षा का भाव नही अपना स्पेस खत्म होना फील करती है। इससे भाइयों का थोड़ा बचना चाहिए। ख़्याल रखिए नज़र भी रखिए लेकिन उस हद तक जब तक उसे लगे की उसकी आज़ादी में सेंध ना लग रही हो।
घर का माहौल ऐसा बनाइए कि बहन जब महीने के सबसे मुश्किल चार दिनों में हो तो मां की तरह आप से भी सहज होकर आपसे पैंपर हो सके। ये सब तभी संभव हो सकता है जब आप एक सहज दोस्त की तरह व्यवहार रखेंगे। बहन को सुनाइए नही उसकी सुनिए। डांटने से ज्यादा प्यार से मुद्दे सुलझाइए। उसके पसंद की चीजें अगर आप बना नहीं सकते तो कम-से-कम बाहर ले जाकर क्वालिटी टाइम बिताकर साथ खाइए। वो क्या पहनना चाहती है, वो क्या अपनी जिंदगी में करना चाहती है, उसकी जिंदगी में उसके अपने सपने क्या है ये सब उसके हिस्से छोड़ दीजिए। भाईगिरी से बचिए।
ये सब कर के बहनों को उसके पसंद का उपहार आप दें सकते है। चीजें समान और पैसों से ज्यादा ये अनमोल है बहन के चेहरे पर बेफ़िक्री भरी मुस्कान और उसके हिस्से की आजादी। ये आप कर सकते हैं। कर के देखिए दुनिया का तो पता नही पर बहन खुद को खुशनसीब समझेगी आप जैसा भाई पाकर। इससे बेहतर कुछ और हो सकता है क्या ?
दुनिया की सारी बहनों को उनके हिस्से का जहां मिले आजादी मिले इन्हीं दुवाओं के साथ राखी की शुभकामनाएं और ढेर सारा प्यार।
– पथिक मनीष

सुविचार – बेटी – बेटियां – लड़की – 024

जब आप एक लड़की को शिक्षित करते हैं, तो आप देश का चेहरा बदलना शुरू कर देते हैं.

When you educate a girl, you begin to change the face of a nation. – Oprah Winfrey

बेटियों के हाथों की सुंदरता बढ़ाने के लिए उन्हें चूड़ियां नहीं, किताबें दीजिए..

_ताकि वे अपना भविष्य संवार सकें.!!

पहले बेटियां विवाह के बाद परदेश जाती थीं,

_ अब वे पढ़ाई और जॉब के लिए भी परदेश चली जाती हैं.!!
प्रकृति का नियन्ता जब हमसे बात करना चाहता है, तभी वह हमारे घर एक कन्या शिशु बनकर अवतरित हो जाता है,,, लेकिन हम कहां यह सूक्ष्म बात जान – समझ पाते हैं.

When the controller of nature wants to talk to us, he reincarnated in our house in the form of a girl child, but how are we able to know and understand the subtle thing.

लड़का लोग लड़की से बेहतर है के पीछे कोई साइंस नही बल्कि धूर्तता है. _ चूँकि धूर्त लोगो के शासन का दौर है तो धूर्तता राज कर रही है.
बेटियों को तितली नहीं मधुमक्खी बनाओ, पंख दो मगर डंक भी दो.
अपनी बेटी को और कुछ देने के बजाय उसे एक घर दें.!
लड़की का जॉब करना उसमें भरोसा पैदा करता है कि _वो कुछ कर सकती है.

_ जॉब सर उठाकर जीना और आत्मसम्मान पैदा करता है,
_ जॉब दुनिया की समझ कराती है, इंसानों की पहचान कराती है.
_ जॉब अच्छे बुरे की समझ पैदा करती है और दुनियादारी सिखाती है.
_ जॉब लड़की को खुद की इज़्ज़त करना सिखाती है, वो आर्थिक रूप से स्वतंत्र रहती है, _ उसे वैचारिक रूप से मज़बूत करती है,
_ बहुत कुछ हैं एक लड़की के लिए जॉब के मायने..उसे सिर्फ पैसों से मत तोलिये,
_ अगर आपके पास बहुत पैसा है _तब भी बेटी को जॉब करने दीजिये..
_उसे मज़बूत बनने दीजिये..!!
आपने अगर अपनी लड़की को पढ़ाया लिखाया है और उसको जॉब करनी है तो ऐसा परिवार और लड़का देखें, जो पढ़ाई की वैल्यू समझता हो,

_ जो बहुओं को उनके सपने देखने दे और उनमें रंग भरने दे.
– Nida Rahman
किसी क्षेत्र में अपनी पहचान बनाना और आर्थिक रूप से आत्म निर्भर होना…

_ महिलाओं में इस बात की समझ शिक्षित होने के बाद ही आई.
_ पहले लड़कियां जैसे भी घर में ब्याही गईं, जो भी दुख-सुख मिले, उन्होंने घर में रहने में ही आराम महसूस किया.
_ न उन्होंने कभी स्वयं को उस स्तर से ऊंचा उठाने की बात सोची, न ही कभी घर में आर्थिक मदद करने की बात सोची.
_ न उन्हें अपने ऊपर हो रहे अत्याचार का पता था, न अपने अपमान का ख्याल था.
_ शिक्षा ने उनकी आंखें खोली, उनके सामने एक एक नई दुनिया का विस्तार किया और उन्हें इज़्ज़त से जीने की समझ दी, अपने अधिकारों के प्रति सचेत किया,
_ अन्यथा वे ‘नारी तुम देवी हो’ के भ्रम में ही अनादृत होती रहतीं.!!
– Manika Mohini
पढ़ती हुई, शिक्षा ग्रहण करती हूं लड़कियां खूबसूरत लगती हैं, खूबसूरत होती हैं,

_इधर-उधर घूमती लड़कियां वक्त बर्बाद करती हैं, इसलिए उनमें सोच और अक्ल की सुंदरता नहीं होती.!!
_ धाँसू लड़कियां सामान्यतः किसी को मुँह नहीं लगातीं..  और फुस्स लड़कियां किसी को भी दिल में बैठा लेती हैं.!!
– Manika Mohini
लड़की अपना भला बुरा खुद सोचे.

_ पढ़-लिख कर अपनी बुद्धि से फैसले करने आ जाने चाहिए.
_ दुबारा ज़िन्दगी शुरू करना चाहे तो खुद करे, दूसरों की मदद का इंतज़ार क्यों ?
_ मुझे कमज़ोर लड़कियाँ नहीं पसंद.
_ सिस्टम को भी बदलने के लिए लड़की खुद पहल करे.
_ अपने लिए जो भी रास्ता बनाना है, वह खुद बनाए.
_ दूसरों से सलाह-मश्वरा करे पर निर्णय उसका अपना हो.
– Manika Mohini
सुंदर लड़की आप मत बनो क्योंकि “ताकत” में “वास्तविक सुंदरता” है..

_ बाजुओं में बल और भीतर आत्मबल से परिपूर्ण रहो,
_ आप जिंदगी में इस तरह आगे बढ़ें कि आपको रोकने वाले भी कांपने लगें !!
बस इतना ही फर्क रहा लड़के और लड़कियों में,

_ कि लड़कों ने अपनी आजादी से, किताबें और नौकरी चुनी..
_ और लड़कियों ने अपनी आजादी के लिए, किताबें और नौकरी चुनी..!!
कमाना केवल पेट भरने के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि साहसी और आत्मविश्वासी बनने के लिए भी जरूरी है.

_ आर्थिक आत्मनिर्भरता आपको असली आजादी देती है.
_ इसलिए, प्यारी लड़कियों, हर हाल में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनो.
_ सिर्फ समय बिताने के लिए नहीं, बल्कि अपनी आज़ादी के लिए कमाओ.
_ चाहे पति करोड़पति हो या पिता अरबपति — फिर भी कमाओ.
_ कमाने से आप में पूरी दुनिया अकेले घूमने का आत्मविश्वास और साहस आता है.
_ परिवार और समाज में आप इज्जत पाती हैं, लोग अपने महत्वपूर्ण फैसलों में आपसे सलाह लेने आते हैं.!!
घर आने पर दौड़ कर जो पास आये, उसे कहते हैं बिटिया

थक जाने पर प्यार से जो माथा सहलाए, उसे कहते हैं बिटिया

“कल दिला देंगे” कहने पर जो मान जाये, उसे कहते हैं बिटिया

हर रोज़ समय पर दवा की जो याद दिलाये, उसे कहते हैं बिटिया

घर को मन से फूल सा जो सजाये, उसे कहते हैं बिटिया

सहते हुए भी अपने दुख जो छुपा जाये, उसे कहते हैं बिटिया

दूर जाने पर जो बहुत रुलाये, उसे कहते हैं बिटिया

पति की होकर भी पिता को जो ना भूल पाये, उसे कहते हैं बिटिया

मीलों दूर होकर भी पास होने का जो एहसास दिलाये, उसे कहते हैं बिटिया

“अनमोल हीरा” जो इसीलिए कहलाये, उसे कहते हैं बिटिया.

बहुत “चंचल” बहुत “खुशनुमा ” सी होती है “बेटिया”.

“नाज़ुक” सा “दिल” रखती है “मासूम” सी होती है “बेटिया”.

“बात” बात पर रोती है “नादान” सी होती है “बेटिया”.

“रेहमत” से “भरपूर” “खुदा” की “Nemat” है “बेटिया”.

“घर” महक उठता है जब “मुस्कराती” हैं “बेटिया”.

“अजीब” सी “तकलीफ” होती है, जब “दूसरे” घर जाती है “बेटियां”.

“घर” लगता है सूना सूना “कितना” रुला के “जाती” है “बेटियां”

“ख़ुशी” की “झलक” “बाबुल” की “लाड़ली” होती है “बेटियां”

ये “हम” नहीं “कहते” यह तो “रब ” कहता है.

क़े जब मैं बहुत खुश होता हूँ तो “जनम” लेती है

“प्यारी सी बेटियां”

मैं बिल्कुल ठीक हूँ पापा….

_ रात के नौ बजते ही नजरें आपकी फोन पे होती हैं,
_ मम्मी बार- बार पूछती है पर आपको भूख नहीं होती है
_ हालचाल लेकर हमारा, एक सुकून सा पा जाते हैं
_ बात हो जाने पर ही आप खाने की टेबल पर जाते हैं
_ इतना सोचा मत करो पापा, आप मस्ती में जीया करो
_ मैं बिल्कुल ठीक हूँ पापा, मेरी फ़िकर ना किया करो
_ मेरे रूम की चादरें हर हफ्ते बदलवाते हो
_ मेरे खिलौने आज तक आप बड़े प्यार से सजाते हो
_ मेरे एक मामूली सी शर्ट लाने पर, सारे दोस्तों को बताते हो
_ ये रंग मेरी बिटिया की पसंद का है
_ पूरा घर उसी रंग से रंगवाते हो
_ बस हो गई हमारी पसंद, कभी अपने मन का भी किया करो
_ मैं बिल्कुल ठीक हूँ पापा, मेरी फ़िकर ना किया करो
_ मौसम है अब आम का, पता नहीं उसे वहाँ मिला या नहीं
_ मुझे सब मिल जाता है यहाँ पापा, आप मेरे बिना भी कुछ खाया करो
_ जब याद आये तो बोला करो, अपनी फीलिंग्स न छुपाया करो
_ मैं आ जाया करुँगी मिलने पापा, आप बिलकुल न घबराया करो
_ बिना सोचे जब भी दिल करे, मुझे फ़ोन किया करो
_ मैं बिल्कुल ठीक हूँ पापा, मेरी फ़िकर ना किया करो
_ हर तरह का वक़्त ये जिन्दगी मुझे दिखाती है
_ छोड़ आई वो बचपन ये कह कर मुझे चिढ़ाती है
_ पर सच बोलूँ पापा, आपका साथ है ये सोचकर
_ खुद को बेहद खुशनसीब पाती हूँ
_ कोई कितना भी बड़ा महारथी हो,
_ आपको देख कर मैं खुद को बड़ा अमीर पाती हूँ
_ बहुत जी लिया हमारे लिए, थोड़ा अपने लिए भी जीया करो
_ मैं बिल्कुल ठीक हूँ पापा, मेरी फ़िकर ना किया करो
_ पता है आज भी चोट लगने पर, मैं पापा- पापा चिल्लाती हूँ
_ लड़ाई जिससे भी हो, मैं आज भी सबको आपके नाम से धमकाती हूँ
_ वो हमारे नाम के फिक्स डिपाजिट, कभी अपने लिए भी इस्तेमाल किया करो
_ मैं बिल्कुल ठीक हूँ पापा, मेरी फ़िकर ना किया करो
_ सोचा था फादर्स डे है, कुछ लिखूं, चलो बचपन की यादों को संवारती हूँ
_ फिर लिखने बैठी तब अहसास हुआ, सिर्फ एक दिन_बिलकुल नहीं
_ मैं आप पर पूरी ज़िंदगी वारती हूँ
_ वो गाने जो साथ में गाते थे, उन्हें गुनगुनाते रहा करो
_ मैं बिल्कुल ठीक हूँ पापा, मेरी फ़िकर ना किया करो
— मैं बिल्कुल ठीक हूँ पापा….
पापा मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो ,

.. आँसू छिपाते हो फेर कर नज़रे,
..इतना झूठा मुस्कुराया न करो ..
पापा मुझे छोड़ने आया न करो
… किफ़ायत में घर भर की लाइट्स बुझाते,
… सोच कर भी न कितने सामान खरीदते,
.. . माइलेज चेक करते रिजर्व में स्कूटर हमेशा
… और मुझे ए टी एम थमाया न करो …
पापा मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो ।
…पानी की बॉटल रखी या नही,
टिकट कही मैं भूली तो नही,
…पर्स में खुले पैसे रखे या नही
..इतना नम प्यार जताया न करो ..
..पापा मुझे छोड़ने आया न करो ।
सीट के नीचे खुद बैग जमाते,
ध्यान रखना अकेली जा रही,
साथ की किसी महिला को बताते,
मेरी फिक्र में खुद को जलाया न करो
…पापा मुझे छोड़ने आया न करो ।
पहुँचते ही कर देना फोन,
अब कब होगा आना फिर तुम्हारा ,
रूह तक को कर दे जो तन्हा इस तरह
सर पर मेरे उदास हाथ फिराया न करो.
.आप स्टेशन आया न करो ।
मैं खामोश रीती हो जाती हूँ,
देर तक गले लगाया न करो,
देखती रहती हूँ खिड़की से प्लेटफार्म
ग़मगीन खड़े हाथ हिलाया न कर ,.. …
..आप स्टेशन आया न करो ।
चप्पा चप्पा कर देते हो वीरान,
रुन्धा गला बेमतलब बातो में छिपाया न करो,
मेरा आगा पीछा सोच सोच,
अपना कलेजा इतना दुखाया न करो,……
मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो
लो बात करो कह फ़ोन माँ को थमा,
बाद में पूछते हो उनसे ब्यौरा सारा,
नया मोबाइल किस काम का कहकर
हमारे नाम पाई पाई के कागज़ बनवाया न करो….
पापा मुझे छोड़ने आप स्टेशन आया न करो।
“बेटी” बनकर आई हु माँ-बाप के जीवन में,

बसेरा होगा कल मेरा किसी और के आँगन में,

क्यों ये रीत “रब” ने बनाई होगी,

“कहते” है आज नहीं तो कल तू “पराई” होगी,

“देके” जनम “पाल-पोसकर” जिसने हमें बड़ा किया,

और “वक़्त” आया तो उन्ही हाथो ने हमें “विदा” किया,

“टूट” के बिखर जाती है हमारी “ज़िन्दगी ” वही,

पर फिर भी उस “बंधन” में प्यार मिले “ज़रूरी” तो नहीं,

क्यों “रिश्ता” हमारा इतना “अजीब” होता है,

क्या बस यही “बेटियो” का “नसीब” होता है ??

●~~”बेटियाँ कुछ लेने नहीं आती है पीहर”~~●

~~~~ ..बेटियाँ….पीहर आती है..

..अपनी जड़ों को सींचने के लिए..

..तलाशने आती हैं भाई की खुशियाँ..

..वे ढूँढने आती हैं अपना सलोना बचपन..

..वे रखने आतीं हैं….आँगन में स्नेह का दीपक..

..बेटियाँ कुछ लेने नहीं आती हैं पीहर..

..बेटियाँ….ताबीज बांधने आती हैं दरवाजे पर..

..कि नज़र से बचा रहे घर..

..वे नहाने आती हैं ममता की निर्झरनी में..

..देने आती हैं अपने भीतर से थोड़ा-थोड़ा सबको..

..बेटियाँ कुछ लेने नहीं आती हैं पीहर..

.बेटियाँ….जब भी लौटती हैं ससुराल..

..बहुत सारा वहीं छोड़ जाती हैं..

..तैरती रह जाती हैं….घर भर की नम आँखों में..

..उनकी प्यारी मुस्कान..

..जब भी आती हैं वे, लुटाने ही आती हैं अपना वैभव..

..बेटियाँ कुछ लेने नहीं आती हैं पीहर..

“बिटिया तेरी बहुत याद आयेगी”

बिटिया तेरी बहुत याद आयेगी,

पल पल मुझको रुलायेगी।

घर का कोना कोना तुझे पुकारेगा,

कण कण में तेरा चेहरा मुस्करायेगा।

क्या तूने जादु कर रखा था,

जन जन को मोह रखा था।

तुझे टीका लगाते लगाते, मम्मी की भी,

आँखें डबडबाई थी,

मम्मी की रोके नहीं रुकती रुलाई थी।

तुम माँ बेटी हो या सखी सहेली,

मेंरी समझ में कभी ये बात ना आयी।

किचन का menu तेरा, घर का सबका

Dress code था तुम्हारा,

मम्मी कौन सा पार्लर जायेगी,

पापा कहाँ हेयर कलर करायेंगे,

कौन सी साड़ी, कौन सी बिंदी,

कौन सी क्रीम मम्मी लगायेगी,?

पापा की कैसी ड्रेस आयेगी,

कब कौन सा क्या पहनना है ?

सबमें मर्जी तुम्हारी थी,

मम्मी की सारी जिम्मेदारी,

तेरे ही हवाले थी।

कलेजा मेरा फटता है,

कैसे गुजरेंगे दिन तेरे बिन,

ये सोच कर भी दिल फटता है।

आज है मेहन्दी तुम्हारी,

कल फिर जाने की तैयारी,

परसों तुम्हारा गठबंधन, फिर कन्यादान होगा।

सृष्टि के नियम के मुताबिक,

अपने कलेजे के टुकड़े को फिर,

एक बाप, अपने कलेजे से दूर कर देगा।

अब तेरी यादों का ही सहारा होगा,

हर चीज में अक्स तुम्हारा होगा,

भाई तेरा समय से पहले बड़ा हो गया,

मुझसे गम छुपाता है, मेरे सामने बस,

झूठे ही मुस्कराता है,

मुझे मालूम है उस पर भी पहाड़ टूट रहा है,

ऊपर से हँस रहा अन्दर से वो रो रहा है,

तुझे आशीर्वाद है हमारा,

तेरा जीवन सदा हो उजियारा,

हमेशा हँसती हँसाती रहना,

जिस घर जाओ, मन्दिर कर देना,

बड़ों को आदर, छोटों को प्रेम देना ।।

|| पीके ||

तू क्यों रोती है माँ,

बेटी है पराया धन,

ये तुझे भी पता था, माँ

दूर नहीं, तेरे पास हूँ माँ,

तेरे घर के कण कण में ,

मेरा निवास है माँ,

दूर होती तो कैसे में रोज़,

तुझसे बात कर पाती माँ,

तुम मेरे लिए आँसू ना बहाना,

मना लेना दिल को,

पापा को भी समझाना,

कैसे रो रहे थे लिपट कर,

हम बच्चों से भी

छोटा बच्चा बन कर,

टूट ना जाना, उनको हिम्मत बंधाना,

चिरिया थी तेरे घर की

चहक रही थी कोने कोने में,

मुझको तो उड़ना ही लिखा था,

रब ने मेरी किस्मत में, माँ .

किसने ये रीत बनाई,

प्रीत वही, पर बेटी परायी,

अब ना तुझसे झगड़ा करुँगी,

ना अब रूठी को मनाना, माँ,

स्कूल से लौटने में अब कभी,

देर ना होगी माँ,

कपड़ो के लिए अब ना रूठना ,

अब ना तेरा मनाना होगा माँ,

वो मेरी सारी कास्मेटिक,

जिसके लिए में नीत तुझसे,

लड़ती थी माँ,

अब तुम ही रख लेना,

किसी को न देना, माँ,

अब जब भी मेरी डिश बनाओगी,

तुम खा लेना, पापा और भाई को,

खिला देना माँ,

भाई को देखा माँ,

कैसे भैया बनकर मेरे,

मेरे माथे को चूम लिया,

लगा जैसे मुझको सुखी होने का,

आशीर्वाद दिया,

कितना बड़ा हो गया है,

फिर भी वो बच्चा है,

उसको मना लेना, कलेजे से लगा लेना,

तुमको गम कैसा, माँ,

एक घर से निकल कर,

और एक घर मिल गया,

यहाँ भी पापा का साया,

और माँ का आँचल मिल गया,

वहाँ घर की चिरिया थी,

यहाँ मै बुलबुल हूँ,

सबका आशीर्वाद है माँ,

बहुत ही प्यार करनेवाला,

हमसफ़र साथ है माँ …

..PK

” मै बोझ नहीं हूँ “

शाम हो गई अभी तो घुमने चलो न पापा,

चलते चलते थक गई कंधे पे बिठा लो न पापा,

अंधेरे से डर लगता सीने से लगा लो न पापा,

मम्मी तो सो गई,

आप ही थपकी देकर सुलाओ न पापा,

स्कूल तो पूरी हो गई,

अब कॉलेज जाने दो न पापा,

पाल पोस कर बड़ा किया,

अब जुदा तो मत करो न पापा,

अब डोली में बिठा ही दिया तो,

आंसू तो मत बहाओ न पापा,

आप ने मेरी हर बात मानी,

एक बात और मान जाओ न पापा,

इस धरती पर बोझ नहीं मै,

दुनियाँ को समझाओ न पापा,

” मै बोझ नहीं हूँ “

बेटी के प्यार को कभी आजमाना नहीं

वह फूल है, उसे कभी रुलाना नहीं

पिता का तो गुमान होती है बेटी

जिन्दा होने की पहचान होती है बेटी

उसकी आँखें कभी नम न होने देना

उसकी जिन्दगी से कभी खुशियां कम न होने देना

उंगली पकड़ कर कल जिसको चलाया था तुमने

फ़िर उसको ही डोली में बिठाया था तुमने

बहुत छोटा सा सफर होता है बेटी के साथ

बहुत कम वक्त के लिए वह होती हमारे पास

असीम दुलार पाने की हकदार है बेटी

समझो रब का आशीर्वाद है बेटी

पिता :- कन्यादान नहीं करूंगा जाओ,

मैं नहीं मानता इसे,

क्योंकि मेरी बेटी कोई चीज़ नहीं, जिसको दान में दे दूँ ;

मैं बांधता हूँ बेटी तुम्हें एक पवित्र बंधन में,

पति के साथ मिलकर निभाना तुम,

मैं तुम्हें अलविदा नहीं कह रहा,

आज से तुम्हारे दो घर, जब जी चाहे आना तुम,

जहाँ जा रही हो, खूब प्यार बरसाना तुम,

सब को अपना बनाना तुम, पर कभी भी

न मर मर के जीना, न जी जी के मरना तुम,

तुम अन्नपूर्णा, शक्ति, रति सब तुम,

ज़िंदगी को भरपूर जीना तुम,

न तुम बेचारी, न अबला,

खुद को असहाय कभी न समझना तुम,

मैं दान नहीं कर रहा तुम्हें,

मोहब्बत के एक और बंधन में बाँध रहा हूँ,

उसे बखूबी निभाना तुम ……………..

*एक नयी सोच एक नयी पहल*सभी बेटियां के लिए ;

🌿➖बोये जाते हैं बेटे..

🌿➖पर उग जाती हैं बेटियाँ..

🌿➖खाद पानी बेटों को..

🌿➖पर लहराती हैं बेटियां.

🌿➖स्कूल जाते हैं बेटे..

🌿➖पर पढ़ जाती हैं बेटियां..

🌿➖मेहनत करते हैं बेटे..

🌿➖पर अव्वल आती हैं बेटियां..

🌿➖रुलाते हैं जब खूब बेटे.

🌿➖तब हंसाती हैं बेटियां.

🌿➖नाम करें न करें बेटे..

🌿➖पर नाम कमाती हैं बेटियां..

🌿➖जब दर्द देते हैं बेटे…

🌿➖तब मरहम लगाती हैं बेटियां..

🌿छोड़ जाते हैं जब बेटे..

🌿तो काम आती हैं बेटियां..

🌿आशा रहती है बेटों से.

🌿 पर पूर्ण करती हैं बेटियां..

🌿हजारों फरमाइश से भरे हैं बेटे….

🌿पर समय की नज़ाकत को समझती बेटियां..

🌿बेटी को चांद जैसा मत बनाओ कि हर कोई घूर घूर कर देखे..

📍लेकिन📍 ———————– बेटी को सूरज जैसा बनाओ

ताकि घूरने से पहले सब की नजर झुक जाये..

” बेटियां “

चिड़ियों की झुंड सी चहचहाती हैं ” बेटियां “
पगडंडियों पर नीले पीले आंचल उड़ आती हैं ” बेटियां “
आंगन की तुलसी बनकर घर को महकाती हैं ” बेटियां “
हंसी ठिठोली कर सबका मन बहलाती हैं ” बेटियां “
पायल की रुनझुन सी गुनगुनाती हैं ” बेटियां “
पानी सी निर्मल स्वच्छ नजर आती हैं ” बेटियां “
क्यों देखते हैं दोगली निगाहों से इन्हें जमाने वाले –
किसी भी मकान को घर बनाती हैं ” बेटियां”
कुछ बरस बाद बेटी पराए घर चली जायेगी, _यह सोचकर मातापिता कुछ अधिक दुलार लुटाते हैं बेटी पर..कपड़े खिलौने, खाने पीने की ज़िदें पूरी करते हुए निहाल होते हैं कि _देखो जी हम अपनी बेटी को बहुत प्यार करते हैं,

_यह तो हमारी परी है… पर यह तब तक पापा कि परियां हैं..
_ जबतक उनकी इच्छाएं, आकांक्षाएं कपड़े लत्तों, खिलौनों तक हों..
_करियर हो या विवाह _उसमें इन्होंने ज़िद कि नहीं कि _उनके पर कतर दिए जाते हैं..
— बेटे को सहज स्नेह से पालने वाले माता पिता दया मिश्रित गर्व से बेटियों को पालते हैं कि उनका अहम इससे संतुष्ट होता है,
_ वह कहते हैं कि कल को इसे पराए घर चले जाना है सो इसके लाड़ उठा लो, इसकी ज़िदें पूरी कर दो..
_पर यदि बेटी अपनी ज़िन्दगी का कोई निर्णय स्वयं करना चाहे तो _पल भर में इनका प्यार काफ़ूर हो जाता है..
–इस दुनिया में अपना कहीं घर न होने के दर्द को लड़कियां ताउम्र झेलती हैं,
_मायके में उसकी जाने कितनी इच्छाओं को यह कहकर टाल दिया जाता है कि
_जब अपने घर [ ससुराल ] जाना तब वहां पूरी करना..
_और ससुराल में सुनने को मिलता है कि अपने घर से यही सीखकर आई हो क्या ?
–ज़िन्दगी भर ससुराल में मायके की तारीफ़ और मायके में ससुराल की तारीफ़ करके लड़कियां अपने लिए घर नहीं केवल छत जुटाती हैं…
_वह ससुराल में कभी नहीं बतातीं, _अपने साथ मायके में हुए दुहरे व्यवहार को
_और बरसों बरस ससुराल में हुए अत्याचारों को मायके में छुपाती हैं..
– समय आ गया है कि पापा की परियों को प्यार नहीं अधिकार मांगना चाहिए,
_दिखावे, झूठ और दया भरे जीवन के बजाय खुरदुरा सच स्वीकार करना चाहिए..
_पापा की परी के बजाय एक सामान्य इंसान होने पर ज़ोर देना चाहिए..!!
जब तक पिता जिंदा रहते है, बेटी मायके में हक़ से आती है और घर में भी ज़िद कर लेती है और कोई कुछ कहे तो डट के बोल देती है कि मेरे बाप का घर है.

पर जैसे ही पिता मरता है और बेटी आती है तो वो इतनी चीत्कार करके रोती है कि, सारे रिश्तेदार समझ जाते है कि बेटी आ गई है.

और वो बेटी उस दिन अपनी हिम्मत हार जाती है, क्योंकि उस दिन उसका पिता ही नहीं उसकी वो हिम्मत भी मर जाती हैं.
आपने भी महसूस किया होगा कि पिता की मौत के बाद बेटी कभी अपने भाई- भाभी के घर वो जिद नहीं करती जो अपने पापा के वक्त करती थी,
जो मिला खा लिया, जो दिया पहन लिया _क्योंकि जब तक उसका पिता था _तब तक सब कुछ उसका था _यह बात वो अच्छी तरह से जानती है.
आगे लिखने की हिम्मत नहीं है, बस इतना ही कहना चाहता हूं कि _पिता के लिए बेटी उसकी जिंदगी होती है, पर वो कभी बोलता नहीं, और बेटी के लिए पिता दुनिया की सबसे बड़ी हिम्मत और घमंड होता है, पर बेटी भी यह बात कभी किसी को बोलती नहीं है.
पिता बेटी का प्रेम समुद्र से भी गहरा है.
मैं नहीं सिखा पाऊँगी अपनी बेटी को बर्दाश्त करना एक ऐसे आदमी को जो उसका सम्मान न कर सके.

_ कैसे सिखाए कोई माँ अपनी फूल सी बच्ची को कि पति की मार खाना सौभाग्य की बात है ?
_ मैंने तो सिखाया है कोई एक मारे तो तुम चार मारो.
_ हाँ, मैं बेटी का घर बिगाड़ने वाली बुरी माँ हूँ, …..
….लेकिन नहीं देख पाऊँगी उसको दहेज के लिए बेगुनाह सा लालच की आग में जलते हुए.
_ मैं विदा कर के भूल नहीं पाऊँगी, अक्सर उसका कुशल पूछने आऊँगी.
_ हर अच्छी-बुरी नज़र से, ब्याह के बाद भी उसको बचाऊँगी.
_ बिटिया को मैं विरोध करना सिखाऊँगी..
_ ग़लत मतलब ग़लत होता है, यही बताऊँगी..
_ देवर हो, जेठ हो, या नंदोई, पाक नज़र से देखेगा तभी तक होगा भाई..!!
_ ग़लत नज़र को नोचना सिखाऊँगी, ढाल बनकर उसकी ब्याह के बाद भी खड़ी हो जाऊँगी.“
_ डोली चढ़कर जाना और अर्थी पर आना”, ऐसे कठिन शब्दों के जाल में उसको नहीं फसाऊँगी.
_ बिटिया मेरी पराया धन नहीं, कोई सामान नहीं जिसे गैरों को सौंप कर गंगा नहाऊँगी.
_ अनमोल है वो अनमोल ही रहेगी..
_ रुपए-पैसों से जहाँ इज़्ज़त मिले ऐसे घर में मैं अपनी बेटी नहीं ब्याहुँगी.
_ औरत होना कोई अपराध नहीं, खुल कर साँस लेना मैं अपनी बेटी को सिखाऊँगी.
_ मैं अपनी बेटी को अजनबी नहीं बना पाऊँगी.
_ हर दुःख-दर्द में उसका साथ निभाऊँगी,
_ ज़्यादा से ज़्यादा एक बुरी माँ ही तो कहलाऊँगी.
मां

⚜️⚜️
मां… कितना सिखाया तुमने,
रिश्ते के ताने बाने ,
कैसे बताया तुमने,
घर और जिंदगी को सजाने के सलीके.
क्यों नहीं बताया…
दुनिया तुम्हारी तरह सरल नहीं है.
⚜️
कलम किताबें पकड़ के पढ़ना सिखा दिया,
मुझे अपने कॉलेज का टॉपर बना दिया.
क्यों नहीं बताया लोगों के चेहरे,
फरेबी नजरों को पढ़ने का सलीका.
⚜️
बताना था ना मां..
पलट के जवाब देना भी आना चाहिए.
हमेशा चेहरे पर मुस्कुराहट वाली
संस्कारों की चाबुक क्यों थमा दिया .
⚜️
ये मुझे खुद से भी बगावत नही करने देती.
दुनिया के दोहरे चेहरे नही समझने देती
⚜️
लक्ष्मी सरस्वती बता दिया…
क्यों नहीं बताया??
जिंदगी रण क्षेत्र में कभी-कभी काली भी बनना होगा.
⚜️
बेटी हूं.
बहु हूं.
पत्नी हूं.
सब बहुत अच्छी हूं.
मगर मैं एक इंसान हूं
तकलीफ होती है.
मुझे भी थोड़ा बुरा बना देती.
मुझे भी थोड़ा जीना सिखा देती.
⚜️
संस्कारों की गठरी के साथ..
छोटी सी गठरी बदतमीजी की भी देनी थी ना मां.
तो शायद इतनी आहत ना होती.
तुम्हारी….बेटी.
सुनिए बेटियाँ #स्पेशल नहीं होती हैं।

उनके पास कोई #जादू_की_छड़ी नहीं होती है।
वे #परियाँ नहीं होती हैं।
वे #देवियाँ नहीं होती हैं।
वे रुन-झुन का #संगीत बजाने के लिए नहीं पैदा होती हैं।
वे #घर_छोड़ कर जाने के लिए भी नहीं होती हैं।
वे #दूसरा परिवार #गुलज़ार करने के लिए भी पैदा नहीं होती हैं।
बेटियाँ एकदम #वैसी ही होती हैं जैसे #बेटे
वैसी ही आँखें, वैसे ही हाथ, वैसे ही पैर और वैसा ही मन, वैसी ही #इच्छाएँ
न एक रत्ती कम और न एक रत्ती ज़्यादा।
#ख़ास कहलाने की उनकी कोई इच्छा नहीं होती।
ना ही उन्हें ख़ास बनना है।
उन्हें उतना ही #आम होना है जितना बेटे आपके लिए।
उन्हें उतने ही #अधिकार चाहिए जितना उनका #वाजिबन हक़ है और जितना आप अपने बेटों को हँसते-खेलते दे देते हैं।
बेटियाँ #हीरा नहीं है जिन्हें सहेजे जाने की ज़रूरत है।
वे भी वैसा ही अनगढ़ पत्थर का टुकड़ा हैं जैसे लड़के और जिन्हें अपनी मंज़िल ख़ुद तय करनी है अपने बूते।
बेटियों को ख़ास कहकर उनके हाथ से कमान #छीन लेने की दास्ताँ उतनी ही पुरानी है जितनी औरतों को #देवी कहकर उनकी इच्छाओं को दबा देने की।
इतना कीजिए कि अपना ख़ास वाला प्रेम अपने पास रखिए, बेटियों के लिए बस वही #समान_दृष्टि ले आइये, जिससे बेटों को देखते हैं।
इतना #हासिल हो जाए। बाक़ी दुनिया बराबर #अपने_बूते कर ही लेंगी वे।
पीहर से ससुराल……

पीहर में जन्म से मिल जाता हक़ का प्यार,
ससुराल में हर पल जिसका रहता इंतज़ार।
जहां अपनी पसंद की चीजें ही मिली
अब दूसरों के पसंद का रहता ख्याल
कितना कुछ बदलता है कितना कुछ छूटता है
एक लड़की को शादी कर जब ससुराल जाना होता है।
सुबह जहां मन भर सोने की आदत होती,
वहीं अब थोड़ी देर की न इजाजत होती
जहां आदत थी बात बात पर गुस्साने की ,
आज हो गई बिना बात यूहीं सुनने की
कितना कुछ बदलता है कितना कुछ छूटता है
एक लड़की को शादी कर जब ससुराल जाना होता है।
ख्वाहिशें अपनी सारी धूमिल हो जाती
जब खुद से पहले परिवार की बातें आतीं
अब वहां के इच्छाओं को ही अपना बनाना पड़ता है
उठें न संस्कारों पर खुद को जरा दबाना पड़ता है
कितना कुछ बदलता है कितना कुछ छूटता है
एक लड़की को शादी कर जब ससुराल जाना होता है.
आज बेटी दिवस है :

‘तू क्यों चली गई ?
खिलखिलाता बचपन
मुस्कुराती चितवन
तोड़ नेह का बंधन
तू क्यों चली गई ?’
आँगन की छम-छम
चौके की सिहरन
पूरे घर की धड़कन
तू क्यों चली गई ?’
मेज पर करती पढ़ाई
घर में सबसे लड़ाई
लेकर सबकी बड़ाई
तू क्यों चली गई ?’
सहमी सी मेज
सिसकती कुर्सी
सुबकती किताबें
तू क्यों चली गई ?’
कोने से घूरती
धूल भरी सायकल
भौंचक मोपेड
तू क्यों चली गई ?’
पुरानी चप्पलें
तह लगे कपड़े
चुप आलमारियाँ
तू क्यों चली गई ?’
वो उछलकूद
वो गहमागहमी
वो रूठना मनाना
तू क्यों चली गई ?’
हर बात पे गुस्सा
हर बात से आहत
हर बात की चिन्ता
तू क्यों चली गई ?’
बहना से भिड़ंत
लड़ाई-झगड़े अनंत
इस तरह करके अंत
तू क्यों चली गई ?’
ढूंढती सुबह
बेचैन दोपहर
सवालिया शाम
तू क्यों चली गई ?’
खिड़कियाँ सिसकती
दरवाजे चिहुंकते
परदे फड़कते
तू क्यों चली गई ?’
दरकते फर्श
सूनी दीवारें
उदास गलियारे
तू क्यों चली गई ?’
बेचैन हवाएँ
वीरान सा घर
सिसकता आँगन
तू क्यों चली गई ?’
मुरझाई पत्तियाँ
उदास कलियाँ
हैरान अमियाँ
तू क्यों चली गई ?’
बग़ीचे में बढ़ी तुलसी
मोंगरे की सुगंध सी
फागुन की बयार सी
तू क्यों चली गई ?’
पापा के सखा
मम्मी की सखियाँ
सबकी भीगी अँखियाँ
तू क्यों चली गई ?’
तेरा आना पुरवाई जैसा
तेरा रहना शहनाई जैसा
तेरा जाना रुसवाई जैसा
तू क्यों चली गई ?’
अपने भाई को देख
सूनी कलाई को देख
उसकी रुलाई को देख
तू क्यों चली गई ?’
क्या बस इतना ही साथ
स्वप्न सा छोटा सा साथ
इससे तो न होता साथ
तू क्यों चली गई ?’
अब क्या रह गया इस घर में
मम्मी-पापा के जीवन में
सब कुछ सूना एक पल में
तू क्यों चली गई ?’
– द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल
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