सुविचार – पृथ्वी – प्रकृति – कुदरत – अस्तित्व – सृष्टि – नेचर – Nature – पर्यावरण – Environment – 054
Nature reaches out to us with welcoming arms, and bids us enjoy her beauty; but we dread her silence and rush into the crowded cities, there to huddle like sheep fleeing from a ferocious wolf. – Khalil Gibran
अगर हम पृथ्वी के लिए नहीं बोलेंगे तो कौन बोलेगा ? यदि हम अपने अस्तित्व के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं, तो कौन होगा ?
If we ruin the earth, there is no place else to go.
If we do not speak for Earth, who will ? If we are not committed to our own survival, who will be ?- Carl Sagan
People today have forgotten they’re really just a part of nature.
Yet, they destroy the nature on which our lives depend.
They always think they can make something better… They don’t know it, but they’re losing nature.
They don’t see that they’re going to perish. The most important things for human beings are clean air and clean water. – Akira Kurosawa
प्रकृति की छवि में कुछ बनाने का मतलब एक मशीन बनाना है, और प्रकृति की आंतरिक कार्यप्रणाली को सीखकर ही मनुष्य मशीनों का निर्माता बना.
Nature is a self-made machine, more perfectly automated than any automated machine. To create something in the image of nature is to create a machine, and it was by learning the inner working of nature that man became a builder of machines. – Eric Hoffer
—इससे आगे की बात और भी ज़ोरदार है: सैलानियों को देखकर ऐसा लगता है _जैसे वे घर से ‘मार्केटिंग’ करने के लिए निकले हैं _या फिर खाने-पीने;__ प्रकृति का सौंदर्य देखने तो कतई नहीं.”
_ या इंसान सबसे बदतर प्राणी ??
_ संपूर्ण अस्तित्व अत्यंत सहज गति में है ; गति तो निश्चित रूप से है, पर वह पूर्णतः सहज है.
_ वृक्ष बढ़ रहे हैं, पक्षी चहचहा रहे हैं, नदियाँ बह रही हैं, तारे गतिमान हैं : सब कुछ अत्यंत सहजता से चल रहा है.
_ न कोई हड़बड़ी, न कोई चिंता, न कोई अपव्यय..- सिवाय मनुष्य के.
_ मनुष्य अपने मन के वश में हो गया है.!!
_ लेकिन मानसिक शांति आज भी प्रकृति की गोद में ही मिलती है.
_ लेकिन अफ़सोस की हम उसका इस्तेमाल ही नहीं कर रहे.!!
_ यह सभी लोगों का स्थान है.!!
_ हम फ़िज़ुल ज़रूरत हो या देखा देखी में फंस गए हैं.
_ शांति अकेले या अपने भीतर होने में ही मिलती है.!!
इसलिए दिन का क़ुछ समय नेचर के बीच बिताएं.
_ प्रकृति के साथ सामंजस्य की अवस्था में आने के लिए हमें अपनी जटिलताओं को पूरी तरह से समाप्त करना होगा.
-“प्रकृति के संपर्क में रहने से आपको अपने अंदर आशा खोजने में मदद मिल सकती है.”
_ केवल अपने अभावों और दूसरों की समृद्धि पर लगा रहता है.
When we start living unnaturally, we become victims of many mental diseases.
_जहां आकाश अपना बहुमूल्य पानी बरसाता है; यह भूमि तक पहुंचता है और हर चीज में से रिसकर पृथ्वी पर नया जीवन लाता है.
Nature loves courage. You make the commitment and nature will respond to that commitment by removing impossible obstacles. Dream the impossible dream and the world will not grind you under, it will lift you up. – Terence McKenna
– अगर हम प्रकृति में कोई खामी ढूंढ रहे हैं तो इसका सीधा सा मतलब है कि हमने प्रकृति को अभी तक नहीं समझा है..!!
_ बस, यही विडंबना है..!!
..तो हम इस प्रकृति की सुंदरता को कभी नहीं जान पाएंगे.!!
और नेचर द्वारा बनाई चीज़ों के बीच रहने से दिमाग शांत होता है, इसलिए दिन का कुछ समय नेचर के साथ बिताएं.
-“जब आप उदास महसूस कर रहे हों तो _प्रकृति की सुंदरता का आनंद लेने के लिए समय निकालें.”
रुकी हुई जीवन की शुरुआत करने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है… संघर्ष ही एकलौता सत्य है…!!!
_ आस पास एवम आपके भीतर होने वाले गतिविधियों के प्रति सचेत होकर उनका अवलोकन करिये…महसूस करिये की आप कौन हैं …!!!
_ चंद पक्षियों के हुनर से आशियाने हो गए..!!
_ कुछ प्रकृति के और कुछ समय के अधीन होते हैं.!!
शान्ति पाने के लिए स्वयं को प्रकृति प्रेमी बनाइए.
जब इंसान कुदरत की सुंदर व्यवस्था का लाभ लेकर, उसे वरदान बनाने की कला सीख जाएगा,
तब उसके रिश्ते और स्वास्थ्य अच्छे हो जाते हैं.
_क्योंकि ना कुछ लेकर आए थे ना कुछ लेकर जाएंगे.
Nothing is evil which is according to nature.
और शुद्ध प्राणवायु को ग्रहण करें.
हर हालत में, अनकंडीशनल, कोई शर्त नहीं है कि तुम ऐसा करो तो अस्तित्व प्रसन्न होगा, और तुम ऐसा नहीं करोगे तो अस्तित्व नाराज हो जाएगा.
अस्तित्व हर हालत में प्रसन्न है..
हमारे कार्यों की ‘ सहजता ‘ से पता चलता है कि हम सही दिशा में हैं या नहीं ;_
_ गलत दिशा में जाते ही कुदरत का धक्का लगता है ताकि हम सही दिशा की ओर मुड़ जाएँ..
कि आपके आस- पास स्थित प्रकृति को देखने हेतु आपके पास दो छण भी न हों.
इसलिए नहीं की जा सकती किसी चीज़ से इसकी तुलना..
_ पहाड़ की सुंदरता केवल उन्हीं को पता चलती है जो उस पर चढ़े हैं.!!
मनुष्य उसे अपने स्वार्थ के लिए अनमोल का मोल लगा कर बेच देता है.
_ कोशिश ये रहे कि कुछ देर प्रकृति में बिताया जाए…!!!
“प्रकृति के सानिध्य में रहने से हमें जीवन के उपहारों का पता लगाने में मदद मिलती है.”
_इस तरह के साथ को ही Divine Power कहते हैं.!
_ बस इरादे और नियत नेक होनी चाहिए.!!
सिर्फ अनुभव किया जा सकता है.
नीले आसमान को देखो… पूरब की ओर से उगती सूर्य की लालिमा देखो… यह सब हमारे लिए ही हैं…
प्रकृति ने हमें जीने के लिए कितने खूबसूरती वरदान दिए हैं, इसे महसूस करो…
_ वह आपको घर के आरामदायक क्षेत्र में और फोन के डब्बे में कभी नहीं मिल सकती….!!!!
यही हमारी प्रकृति की पहली दुरूह ग्रंथि और विरोधाभास है.
Everything that happens in nature happens inside the individual also, because an individual is only a name for a cross-section of the whole of nature.
We ought to be thankful to nature for having made those things which are necessary easy to be discovered; while other things that are difficult to be known are not necessary.
_ उन्हें बेहतर पता है कि हमें ज़िंदा कैसे रखना है ..!!
_ पर इस पृथ्वी पर फैली हर कुरूपता का यक़ीनन ज़िम्मेदार है.!!
… ऐसे ही जंगल को भी … ऐसे ही मन को भी…
_ गंदगी से जितना दूर रखें ..खुद को तो ..मन और पर्यावरण [ Environment ] दोनों शुद्ध रहेंगे.
क्योंकि मनुष्य ही है जो अपनी खामियों को खूबियों में बदल सकता है.
दिन की सबसे खूबसूरत शक्ल सुबह होती है. सुबहों का मैं हमेशा से दीदार करता रहा हूँ. अब तक जहां- जहां रहा हूँ, वहां की सुबह बहुत अलग- अलग दर्शन देती रही है. कुछ ना कुछ नया हर जगह की सुबह से सीखने को मिलता है. हर सुबह को जीवन की नयी शुरुआत मान सकते हैं.
कल से क्या मतलब. सुबह आपको आज का एहसास कराएगी. अभी आज इसी समय में रहना सुबह होना है. कल के काल में घटी नकारात्मकता से उबारना सुबह होना है. हर दिन एक नये जीवन का एहसास करना. जैसे कि जो है वो आज से ही शुरू है, कल चाहे जैसा भी रहा हो, आज अच्छा ही होगा. इसका एहसास सुबह है.
ऊर्जा का अनंत एकदिशीय प्रवाह जो सिर्फ आपको ताकतवर बनायेगा. आप को कभी कितना भी कमजोर क्यों ना लगे, बस एक बार सुबह में डूब के देखिए. प्रकृति की तेज बहती हवा में परिश्रम का स्नान सुबह करके देखिये, अपने नये होने का एहसास होगा आपको.
१. प्रकृति का पहला नियम : –
यदि खेत में बीज न डालें जाएं तो कुदरत उसे घास- फूस से भर देती है…!!
ठीक उसी तरह से दिमाग में सकारात्मक विचार न भरे जाएँ तो नकारात्मक विचार अपनी जगह बना ही लेता है…!!
२. प्रकृति का दूसरा नियम : –
जिसके पास जो होता है…!! वह वही बांटता है…!!
सुखी सुख बांटता है….दुःखी दुःख बांटता है….!!
ज्ञानी ज्ञान बांटता है…. भ्रमित भ्रम बांटता है….!!
भयभीत भय बांटता है…….!!
३. प्रकृति का तीसरा नियम : –
आपको जीवन से जो कुछ भी मिले, उसे पचाना सीखो, क्योंकि भोजन न पचने पर रोग बढ़ते हैं….!!
पैसा न पचने पर दिखावा बढ़ता है….!!
बात न पचने पर चुगली बढ़ती है….!!
प्रशंसा न पचने पर अहंकार बढ़ता है….!!
निंदा न पचने पर दुश्मनी बढ़ती है….!!
राज न पचने पर खतरा बढ़ता है….!!
दुःख न पचने पर निराशा बढ़ती है….!!
और सुख न पचने पर पाप बढ़ता है.
जब हवा चलती है तो रेत उड़कर आंखों में घुस जाती है और आंखें बंद करने पर मजबूर कर देती है जिससे दिल में एक नृत्य सा पैदा हो जाता है. _जब बारिश हो रही होती है, तो बारिश की बूंदें शरीर को कंपा देती हैं और दिव्य प्रवाह का आह्वान करती हैं.
जब सुबह-सुबह पक्षी चहचहाने लगते हैं और फूल अपनी खुशबू बिखेरते हैं और ओस की बूंद जीवन की तरह चमकती है;
यदि आप इनके प्रति जागरूक हो जाएं तो आपको दुःख नहीं होगा, आप अत्यधिक आभारी, समझदार, पूर्ण महसूस करेंगे.
Nature doesn’t ask your permission; it doesn’t care about your wishes, or whether you like its laws or not.You’re obliged to accept it as it is, and consequently all its results as well.
– Fyodor Dostoevsky
सुविचार – हॉबी – शौक – 053
सुविचार – वक्त – वक़्त – समय – टाइम – 052
सुविचार – *उल्टी यात्रा* *बुढ़ापे से* *बचपन की तरफ़* – 051
*जो 50 को पार कर गये हैं या *करीब हैं उनके लिए यह खास है*
*मेरा मानना है कि, दुनिया में जितना बदलाव हमारी पीढ़ी ने देखा है, हमारे बाद की किसी पीढ़ी को, “शायद ही ” इतने बदलाव देख पाना संभव हो*
*हम_वो आखिरी_पीढ़ी_हैं जिसने बैलगाड़ी से लेकर सुपर सोनिका जेट देखे हैं। बैरंग ख़त से लेकर लाइव चैटिंग तक देखा है, और “वर्चुअल मीटिंग जैसी” असंभव लगने वाली बहुत सी बातों को सम्भव होते हुए देखा है।*
हम_वो_ “पीढ़ी” _हैं *जिन्होंने कई-कई बार मिटटी के, घरों में बैठ कर, परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं हैं। जमीन पर बैठकर खाना खाया है। प्लेट में डाल डाल कर चाय पी है।*
हम वो ” लोग ” हैं ? *जिन्होंने बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ पम्परागत खेल, गिल्ली-डंडा, छुपा-छिपी, खो-खो, कबड्डी, कंचे जैसे खेल, खेले हैं ।*
हम आखरी पीढ़ी के वो लोग हैं ? *जिन्होंने चांदनी रात, डीबली, लालटेन, या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है। और दिन के उजाले में चादर के अंदर छिपा कर नावेल पढ़े हैं।
हम वही पीढ़ी के लोग हैं ? *जिन्होंने अपनों के लिए अपने जज़्बात, खतों में आदान प्रदान किये हैं। और उन ख़तो के पहुंचने और जवाब के वापस आने में महीनों तक इंतजार किया है।*
हम उसी आखरी पीढ़ी के लोग हैं ? *जिन्होंने कूलर, एसी या हीटर के बिना ही बचपन गुज़ारा है। और बिजली के बिना भी गुज़ारा किया है।*
हम वो आखरी लोग हैं ? *जो अक्सर अपने छोटे बालों में, सरसों का ज्यादा तेल लगा कर, स्कूल और शादियों में जाया करते थे।*
हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं ? *जिन्होंने स्याही वाली दावात या पेन से कॉपी, किताबें, कपडे और हाथ काले, नीले किये है। तख़्ती पर सेठे की क़लम से लिखा है और तख़्ती धोई है।*
हम वो आखरी लोग हैं ? *जिन्होंने टीचर्स से मार खाई है। और घर में शिकायत करने पर फिर मार खाई है।*
हम वो आखरी लोग हैं ? *जो मोहल्ले के बुज़ुर्गों को दूर से देख कर, नुक्कड़ से भाग कर, घर आ जाया करते थे। और समाज के बड़े बूढों की इज़्ज़त डरने की हद तक करते थे।*
हम वो आखरी लोग हैं ? *जिन्होंने अपने स्कूल के सफ़ेद केनवास शूज़ पर, खड़िया का पेस्ट लगा कर चमकाया हैं।*
हम वो आखरी लोग हैं ? *जिन्होंने गोदरेज सोप की गोल डिबिया से साबुन लगाकर शेव बनाई है। जिन्होंने गुड़ की चाय पी है। काफी समय तक सुबह काला या लाल दंत मंजन या सफेद टूथ पाउडर इस्तेमाल किया है और कभी कभी तो नमक से या लकड़ी के कोयले से दांत साफ किए हैं।*
*हम निश्चित ही वो लोग हैं ?* *जिन्होंने चांदनी रातों में, रेडियो पर BBC की ख़बरें, विविध भारती, आल इंडिया रेडियो, बिनाका गीत माला और हवा महल जैसे प्रोग्राम पूरी शिद्दत से सुने हैं।*
*हम वो आखरी लोग हैं ? *जब हम सब शाम होते ही छत पर पानी का छिड़काव किया करते थे। उसके बाद सफ़ेद चादरें बिछा कर सोते थे। एक स्टैंड वाला पंखा सब को हवा के लिए हुआ करता था। सुबह सूरज निकलने के बाद भी ढीठ बने सोते रहते थे। वो सब दौर बीत गया। चादरें अब नहीं बिछा करतीं। डब्बों जैसे कमरों में कूलर, एसी के सामने रात होती है, दिन गुज़रते हैं।*
*हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं ? *जिन्होने वो खूबसूरत रिश्ते और उनकी मिठास बांटने वाले लोग देखे हैं, जो लगातार कम होते चले गए। अब तो लोग जितना पढ़ लिख रहे हैं, उतना ही खुद गर्मी, बेमुरव्वती, अनिश्चितता, अकेलेपन, व निराशा में खोते जा रहे हैं।* और *हम वो खुशनसीब लोग हैं ?* *जिन्होंने रिश्तों की मिठास महसूस की है…!!*
*हम आज के भारत की एकमात्र वह पीढी है ?* *जिसने अपने ” माँ-बाप “की बात भी मानी , और ” बच्चों ” की भी मान रहे है।*
*शादी मे (buffet) खाने में वो आनंद नहीं जो पंगत में आता था जैसे….* *सब्जी देने वाले को गाइड करना* *हिला के दे* *या तरी तरी देना!*
*👉 उँगलियों के इशारे से 2* *लड्डू और गुलाब जामुन,* *काजू कतली लेना* *👉 पूडी छाँट छाँट के* *और* *गरम गरम लेना !.* *👉 पीछे वाली पंगत में झांक के देखना क्या क्या आ* *गया !* *अपने इधर और क्या बाकी है।* *जो बाकी है उसके लिए आवाज लगाना*
*👉 पास वाले रिश्तेदार के पत्तल में जबरदस्ती पूडी* *🍪 रखवाना !* *👉 रायते वाले को दूर से आता देखकर फटाफट रायते* *का दोना पीना ।* *👉 पहले वाली पंगत कितनी देर में उठेगी। उसके* *हिसाब से बैठने की पोजीसन बनाना।* *👉 और आखिर में पानी वाले को खोजना।*
………….. *एक बात बोलूँ* *इनकार मत करना* *जो इस मेसेज को पढेगा* *उसको उसका बचपन जरुर याद आयेगा.* *वो आपकी वजह से अपने बचपन में चला जाएगा, चाहे कुछ देर के लिए ही सही।* *और ये आपकी तरफ से उसको सबसे अच्छा गिफ्ट होगा.* ~~~~~~~~~~~~
सुविचार – ज़िन्दगी 50 की उम्र के बाद – 050
_ तब ख्वाहिशें थम जाती हैं और सुकून की तलाश बढ़ जाती है..!!
चाय बनाकर फिर, कोई बात करते हैं !!
उम्र पचास के पार, हो गई हमारी !
जीवन का, इस्तक़बाल करते हैं !!
कौन आएगा अब, हमको देखने यहां !
एक दूसरे की, देखभाल करते हैं !!
बच्चे हमारी पहुंच से, अब दूर हो गए !
आओ फिर से दोस्तों को, कॉल करते हैं !!
जिंदगी जो बीत गई, सो बीत गई !
बाकी बची में फिर से, प्यार करते हैं !!
ऊपरवाले ने जो भी दिया, लाजवाब दिया !
चलो शुक्रिया उसका, बार बार करते हैं !!
कम बोलो, ज़्यादा सुनो, सामने चल कर किसी को शिछा मत दो,
दिल के ज़ख्म सबको न बताएँ, सबके घर मरहम नहीं होते,
लेकिन नमक सब के घर होता है…
सुकी रोटी भी प्रेम से खाएँ, करोड़ों लोगों को वो भी नसीब नहीं होती,
करकसर से जीओ __ करकसर इंसान को मज़बूत बना देती है..
अकेले जीना सीख लो, अब जोड़ी कभी भी टूट सकती है..
किताबें पढ़ने का शौक रखो, वो अंत तक साथ देंगी…
छाती पर पत्थर रखकर जीना सीख लो,
ज़िन्दगी की आपाधापी में, कब निकली उम्र हमारी, यारों
पता ही नहीं चला.
कंधे पर चढ़ने वाले बच्चे, कब कंधे तक आ गए,
पता ही नहीं चला.
किराये के घर से शुरू हुआ था सफर अपना
कब अपने घर तक आ गए,
पता ही नहीं चला.
साइकिल के पैडल मारते हुए, हांफते थे उस वक़्त,
कब से हम, कारों में घूमने लगे हैं,
पता ही नहीं चला.
कभी थे जिम्मेदारी हम माँ बाप की,
कब बच्चों के लिए हुए जिम्मेदार हम,
पता ही नहीं चला.
एक दौर था जब दिन में भी बेखबर सो जाते थे,
कब रातों की उड़ गई नींद,
पता ही नहीं चला.
जिन काले घने बालों पर इतराते थे कभी हम,
कब सफेद होना शुरू कर दिया,
पता ही नहीं चला.
दर दर भटके थे, नौकरी की खातिर,
कब रिटायर होने का समय आ गया,
पता ही नहीं चला.
बच्चों के लिए कमाने, बचाने में
इतने मशगूल हुए हम,
कब बच्चे हमसे हुए दूर,
पता ही नहीं चला.
भरे पूरे परिवार से, सीना चौड़ा रखते थे हम,
अपने भाई बहनों पर गुमान था,
उन सब का साथ छूट गया,
कब परिवार हमीं दो पर सिमट गया,
पता ही नहीं चला.
अब सोच रहे थे, अपने लिए भी कुछ करें,
पर शरीर ने साथ ही देना बंद कर दिया,
पता ही नहीं चला !!!!
समय चला, पर कैसे चला…पता ही नहीं चला…
बिस्तरों पर अब सलवटें नहीं पड़ती
ना ही इधर उधर छितराए हुए कपड़े हैं
रिमोट के लिए भी अब झगड़ा नहीं होता
ना ही खाने की नई नई फरमाइशें हैं
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं.
सुबह जल्दी उठने के लिए भी नहीं होती मारा मारी
घर बहुत बड़ा और सुंदर दिखता है
पर हर कमरा बेजान सा लगता है
अब तो वक़्त काटे भी नहीं कटता
बचपन की यादें कुछ दिवार पर फ़ोटो में सिमट गयी है
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं.
अब मेरे गले से कोई नहीं लटकता
ना ही घोड़ा बनने की ज़िद होती है
खाना खिलाने को अब चिड़िया नहीं उड़ती
खाना खिलाने के बाद की तसल्ली भी अब नहीं मिलती
ना ही रोज की बहसों और तर्कों का संसार है
ना अब झगड़ों को निपटाने का मजा है
ना ही बात बेबात गालों पर मिलता दुलार
बजट की खींच तान भी अब नहीं है
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं.
पलक झपकते ही जीवन का स्वर्ण काल निकल गया
पता ही नहीं चला
इतना ख़ूबसूरत अहसास कब पिघल गया
तोतली सी आवाज़ में हर पल उत्साह था
पल में हँसना पल में रो देना
बेसाख़्ता गालों पर उमड़ता प्यार था
कंधे पर थपकी और गोद में सो जाना
सीने पर लिटाकर वो लोरी सुनाना
बार बार उठ कर रज़ाई को उढ़ाना
अब तो बिस्तर बहुत बड़ा हो गया है
मेरे बच्चों का प्यारा बचपन कहीं खो गया है
अब कोई जुराबे इधर उधर नहीं फेंकता है..
अब fridge भी घर की तरह खाली रहता है
बाथरूम भी सूखा रहता है
Kitchen हर दम सिमटा रहता है
अब हर घंटी पर लगता है कि शायद कोई surprise है
और बच्चों की कोई नयी फरमाईश है
अब तो रोज मेरी सेहत फोन पर पूछते हैं
मुझे अब आराम की हिदायत देते हैं
पहले हम उनके झगड़े निपटाते थे
आज वे हमें समझाते हैं
लगता है अब शायद हम बच्चे हो गए हैं
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और हम अकेले हो गए हैं.
पच्चपन, साठ की उम्र वालो आपको सलाम
सुन लो मेरा ये पैग़ाम ।
बहुत मज़े से कटेगी बाक़ी की ज़िंदगानी,
बहुओं के संग समझौता करना सीख लो।
छोटे – बड़ें सब को मन की करने दो,
मत टोको जो करते है, करने दो।
कम बोलो, ख़ूब सुनो,
कभी सिखाने की कोशिश मत करो,
अपने काम स्वयं करना सीख लो ।
दिल पर पत्थर रखकर, सब नज़ारा देखते रहो ,
मौन रहना सीख लो।
अाप को जानो, आप पहचानो
अपने लिये जीना सीख लो।
नाती पोतो के संग बहुओं के मिज़ाज देखकर प्यार करो,
ज्ञान देने की कोशिश कदापि न करो ।
अपने लिये जीना सीख लो
दिल के ज़ख़्म छुपाकर रखना
कभी बताने की कोशिश मत करना !
मलहम की चाह मे नून छिड़का जायेगा,
पछतावा हो वह काम नही है करना,
रुखी सूखी जो मिल जायें प्रेम से खाकर तृप्त रहो !
बहुतों के नसीब तो घर भी नही,
वृद्धा आश्रम में है रहते, जैसे तैसे समय बीताते,
अपने के संग के लिए हसरतें मन में रख परलोक सिधार जाते,
जो मिला है उस में खुश रहना सीख लो !
अच्छे दोस्तों के साथ समय बिताना सीख लो !
थोड़ा है थोड़े में गुज़ारा करना सीख लो !
अब नही आपके पुराने दिन यह अच्छे से समझ लो !
जीवन साथी आपका है, उसकी क़दर करना सीख लो,
वही अंत तक निभायेगा, प्यार का रिंश्ता सच्चा रिश्ता
बाक़ी रिश्ते मतलब के है यह अच्छे से जान लो !
अपने आप को जानो, अपने को पहचानो, अपने आप मे रहना सींख लो !
कुछ किताबे पढ़ना सीख लो, कुछ लेखन से दिल लगाना सीख लो ।
ख़ाली वक्त के साथी है, ख़ूब प्यार तुम्हें दे जायेंगे,
नया नया ज्ञान भी मिलता रहेगा,
न शिकवा न शिकायत तुम्हें तुम्हारी तरह ही चाहेगी
उनसे दिल लगाना सीख लो।
अंत समय आयेगा कौन किसके पहले जायेगा,
यह बात किसी को नही है पता।
एक दिन अकेले रहने की तैयारी कर लो,
जीवन साथी फुर्र से उड़ जायेगा,
तेरे हाथ कुछ न आयेगा !
जीवन सूना हो जायेगा, कुछ सिमरण रब का कर लो साथ यही जायेगा,
बाक़ी सब मोह माया है, ख़ाली हाथ जाना है ।
पच्चपन, साठ के उम्र वालो अपने लिये जीना सीख लो।
दिल के ज़ख़्मों को, दिल में छिपाना सीख लो,
जिदगीं से समझौता करना सीख लो।
मैं उम्मीद करता हूं कि हम में से बहुत से लोगों की जिंदगी उपरोक्त वर्णन से काफी बेहतर होगी, फिर भी अगर इन बातों को माना जाएगा तो परिणाम अच्छे ही आएंगे.




