मस्त विचार – दूर निकलना छोड़ दिया है – 1815

थोड़ा थक सा जाता हूँ अब मैं…

इसलिए, दूर निकलना छोड़ दिया है,

पर ऐसा भी नही हैं कि अब…मैंने चलना ही छोड़ दिया है.

फासलें अक्सर रिश्तों में…अजीब सी दूरियां बढ़ा देते हैं,

पर ऐसा भी नही हैं कि अब मैंने…अपनों से मिलना ही छोड़ दिया है.

हाँ जरा सा अकेला महसूस करता हूँ …खुद को अपनों की ही भीड़ में,

पर ऐसा भी नहीं है कि अब मैंने….अपनापन ही छोड़ दिया है.

याद तो करता हूँ मैं सभी को…और परवाह भी करता हूँ सब की,

पर कितनी करता हूँ…बस बताना छोड़ दिया है.

थोड़ा थक सा जाता हूँ अब मैं…

इसलिए, दूर निकलना छोड़ दिया है,

 

मस्त विचार 1814

*”नादान” इंसान ही जिंदगी का* *’आनंद’ लेता है…*

*ज्यादा “होशियार” तो हमेशा* *’उलझा’ हुआ रहता है…!*

मस्त विचार 1813

दिल से ज्यादा उपजाऊ जगह और कोई नहीं हो सकती,

_ निर्भर आप पर करता है कि आप प्यार बोते हैं या नफरत.!!

“हम जो बोते हैं, वही काटते हैं” और ज़िंदगी, अपने अनगिनत रास्तों से गुज़रते हुए, हमें हमेशा वही लौटाती है.. जो हमने दूसरों को दिया था.

मस्त विचार 1812

कहीं होकर भी नही हूँ और कहीं ना होकर भी हूँ..

बड़ी कशमकश मे हूँ ऐ जिंदगी कहाँ हूं और कहाँ नही हूँ…!!!

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