मस्त विचार 1884
खुद की तलाश में क्युं दूर भटकता हूं,
खुद के अंदर झांकने में क्युं अटकता हूं,
बाँध के झूले भ्रम के क्युं लटकता हूं,
क्या वजह है जो मैं खुद को यू खटकता हूं..
खुद के अंदर झांकने में क्युं अटकता हूं,
बाँध के झूले भ्रम के क्युं लटकता हूं,
क्या वजह है जो मैं खुद को यू खटकता हूं..
कि हम कैसी ज़मीने और ज़माना छोड़ आए हैं…!!
लेकिन जिनके पास धन नही वो धनी को बुरा बोलते हैं.
इसलिए धन को सही या गलत पर निर्णय देना गलत है …. असली रोग “”जलन”” है.
यही मन की आंखे खोलता है और रास्ता दिखाता है.
वो अल्फ़ाज, जिसे सुकून कहते हैं.
जो कभी ना खत्म होगी, वो ही दिल की बात हूँ मैं !!