| Dec 1, 2015 | My Favourite Thoughts, सुविचार
सैल्फ एक्चुलाइज्ड व्यक्ति के गुण :–>
वह जीवन की वास्तविकता का ज्ञान रखता है और सूझबूझ के साथ जीवन की जटिल समस्याओं का हल ढूंढ निकालता है. संघर्ष का मुकाबला डट कर करता है.
खुद को और संपर्क में आने वाले लोगों को, वे जैसे हैं, स्वीकार करता है, सहयोग करता है.
अपनी सोच और क्रियाकलापों को संयोजित व नियंत्रित रखता है. उस की सकारात्मक सोच ऐसा करने में उस की मदद करती है.
समस्याओं पर ध्यान केंद्रित कर, उन का समाधान विवेक और व्यवहारिकता के साथ निकालता है.
वह काम से काम रखता है. अपनी निजता में किसी को दखल नहीं देने देता.
पूर्ण स्वतंत्रता से कार्य करता है, अपने माहौल को अपने अनुकूल बनाने की कला में माहिर होता है.
अपने अनुभव और दूसरों के अनुभव से सीखते हुए लगातार अपनी कार्यशैली में निपुणता लाने का प्रयास करता है. इस प्रकार वह अपनी सफलता निश्चित करता है.
वह अपने आत्मसम्मान को ध्यान में रखते हुए हालात से अनावश्यक समझौता नहीं करता.
लोगों के साथ अच्छा व्यवहार बनाए रखता है ताकि उन का सहयोग अपने काम के लिए हासिल कर सके.
लोगों के साथ अच्छे संबंध बनाना उसे रुचिकर लगता है.
तानाशाह न हो कर वह लोकतांत्रिक रवैया बनाए रखता है, लोगों के साथ मिलजुल कर आगे बढ़ता है.
ऐसे लोग रचनात्मक होते हैं. रचनात्मक होने के कारण उन का जीवन नए नए अनुभवों से भरा होता है. वे लकीर के फकीर नहीं होते. परंपरा का निर्वाह करते हुए नित नवीन तरीकों से अपने काम की गुणवत्ता बनाए रखते हैं.
बुद्धिमान लोगों के 5 गुण ~
1. अपना काम गुप्त तरीक़े से करना पसंद करते हैं.
2. दुनिया को तब तक नहीं बताते _ जब तक कि उनका काम शत प्रतिशत पूरा नहीं हो जाता.
3. किसी से भी उलझना पसन्द नहीं करते _ बल्कि किनारे से निकल जाना ज़्यादा पसन्द करते हैं.
4. बोलते कम हैं _ सुनते ज़्यादा हैं.
5. सुनते सबकी हैं _ लेकिन करते अपने मन की हैं.
| Mar 19, 2014 | My Favourite Thoughts, सुविचार
प्रश्न: ध्यान करके क्या हासिल होगा ?
सखा: पहले तो तुमसे मेरा यह प्रश्न हैं कि और सब करके तुम्हें क्या हासिल हुआ ?
इतना कानों से तुमने सुना, कौनसे ऐसे शब्द है, जिसे सुनने के बाद शब्द सुनने की चाह न उठी ?
आंखों से तुमने इतना देखा, तो ऐसा क्या देखा, जिसे देख कर कुछ देखने का भाव न उठे ?
क्या ऐसा तुमने सूंघ लिया, जिसे सूंघने के बाद और कोई खुशबू भाती नहीं ?
इसलिए मिलने की भाषा ही गलत है,
और मिलने की भाषा के साथ यदि ध्यान किया जाए तो ध्यान में भी कुछ नहीं मिलता,
लेकिन फिर भी जानना है और प्रश्न किया है तो जवाब दूंगा।
______ध्यान में मिलती हैं ताजगी,
ध्यान में मिलती हैं इंद्रियों पर पकड़,
ध्यान में मिलती हैं इंद्रियों की वो संवेदनशीलता की आपका भोजन में स्वाद बढ़ जाता हैं, आंखों से देखने का आनंद बढ़ जाता है,
कानों से सुनने की क्षमताएं और संगीतमय स्थिति पैदा हो जाती हैं,
कुल मिलाकर ध्यान में उपलब्ध होती फूलों में खुशबू,
सूरज में तपिश,
चांद में चांदनी,
हवाओं की शीतलता…
ध्यान से तुम्हें हर वो चीज उपलब्ध होती हैं जिन चीजों के बगैर तुम जीवन का आनंद नहीं ले सकते।
जैसे कि आंखे हो और शीशे पर धूल हो तो कुछ साफ दिखता नहीं,
ध्यान हैं धूल का हट जाना
कानों से तुम सुनते हो गाड़ियों के हॉर्न की आवाजें लेकिन तुमने देखा लोगों को हॉर्न मारो फिर भी सुनते ही नहीं,
ध्यानी की सजगता ऐसी है कि वो एक बार में हॉर्न सुन लेगा,
ध्यानी अगर वास्तव में ध्यानी हैं तो उसकी इंद्रियां इतनी संवेदनशील होगी कि जब वो भोजन करेगा तो वो भोजन करेगा उसमें उसे वो स्वाद आएगा जो कि सामान्यतः लोगों को नहीं आता।
तो ध्यान से जो मिलने की बात है वो बहुत कीमती है,
बिस्तर धन से खरीद सकते हो नींद ध्यान से मिलती हैं,
तुम बड़ा पद तो ताकत से ले सकते हो लेकिन उस पद के उपयोग की कला तुम्हें ध्यान से मिलती हैं,
तुम जगत का सारा ऐश्वर्य इक्कट्ठा कर सकते हो लेकिन उस ऐश्वर्य से थकान न हो और तुम उस ऐश्वर्य को भोग के जगत के कल्याण में कुछ कार्य कर सको ये कला ध्यान से आती हैं,
ध्यान तुम्हें युक्ति सिखाता है, और संसार तुम्हें विरक्ति सिखाता हैं।
ध्यानी को वो कला आती हैं कि वो संसार का कैसे उपयोग कर सके।
ध्यान से संसारी को ये खोज आती हैं कि कैसे इस संसार में रहते हुए मजा लिया जा सके,
तो इतना ही अंतर हैं।
यहां ध्यान में कुछ मिलने की बात वैसी नहीं है जैसी तुम बाहर के जगत में देखते हो।
लेकिन फिर भी जो मिलता हैं वो इतना कीमती है कि अगर वो ना हो तो तुम बाहर के जगत का परिपूर्ण आनंद नहीं ले सकते।
यही कारण है कि ध्यान के शिखर पर जो लोग पहुंचे वो पूरी दुनिया के लोगों को अपनी और आकर्षित करते थे।
क्योंकि पूरी दुनिया के पास वो सब कुछ होता हैं लेकिन आनंद नहीं होता,
और ध्यानी के पास कुछ होता हैं तो भी वो आनंदित हैं और कुछ नहीं होता तो भी वो आनंदित हैं।
ध्यानी के पास मालकियत होती हैं स्वतंत्रता होती हैं।
ध्यानी को मिलता हैं पंख के साथ साहस,
और साहस के साथ उड़ने की कला,
ध्यानी के पास सब कुछ हैं।
ध्यानी को कुछ मिल जाए हैं ऐसा भाव भी नहीं आता,
क्योंकि ध्यानी को सब मिला हुआ ही हैं।
मिलने की भाषा उनकी हैं जो अभी संसारी हैं।
लेकिन ध्यानी हो जाओगे तो मिलने की भाषा में बात ही नहीं करोगे, मिलने जैसी कोई बात आएगी ही नहीं क्योंकि सब कुछ मिला हुआ ही है।
-Sakha___
यदि तुम आनंदित हो तो तुम्हें न ध्यान करने की जरूरत है न मेरे पास आने की जरूरत है.
_ ऐसा कहने वाला ओशो के सिवाय कोई नहीं..
– मेरे पर रुक मत जाना, यात्रा अनंत है.
_ ऐसा कहने वाला ओशो के सिवाय कोई नहीं..
– मेरे न रहने पर जीवित सदगुरू को खोज लेना.
_ ऐसा कहने वाला ओशो के सिवाय कोई नहीं..
– मेरे से मुक्त होना होगा, गुरु शिष्य संबंध अंतिम संबंध है पर इससे भी मुक्त होना होगा.
_ ऐसा कहने वाला ओशो के सिवाय कोई नहीं..
_ मुझे क्षमा करना और भूल जाना.
_ ऐसा कहने वाला भी ओशो के सिवाय कोई नहीं..
_ ओशो के प्रवचनों में क्या नहीं मिलता, सब मिल जाता है.. पर सवाल ये है कि गोता लगाता ही कौन है ?
_ ओशो के प्रवचनों का उपयोग कर लोगों ने दुकानें तो खोल ली पर अपनी यात्रा में अटक गए.
_ चेतना के शिखर पर हो सकते थे दुनियावी सफलता में ही खो गए.!!
– Shailendra Sudharana
जब मन बार-बार भटकने के बाद धीरे-धीरे ठहरना सीख लेता है, तब उसके भीतर एक अलग ही स्थिति पैदा होती है.
_ विचार आते तो हैं, पर उनका जोर कम हो जाता है.
_ मन बाहर की बातों से हटकर अंदर की ओर टिकने लगता है.
_ इस तरह जो शांत और जागरूक अवस्था बनती है, वही ध्यान की अवस्था है.
_ इसमें कुछ करने का भाव नहीं रहता, बस मन अपने आप स्थिर होने लगता है.
_ जैसे-जैसे यह ठहराव गहराता जाता है, मन की बेचैनी पूरी तरह शांत होने लगती है.
_ अब स्थिरता टूटती नहीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से बनी रहती है.
_ साधक और ध्यान के बीच का फर्क धीरे-धीरे मिटने लगता है.
_ जब यह स्थिरता पूरी तरह पक्की हो जाती है और मन बिल्कुल निर्मल व एकाग्र हो जाता है, तब वही अवस्था समाधि कहलाती है.
_ समाधि में मन न कुछ चाहता है, न कुछ सोचता है.
_ वहाँ अहंकार की पकड़ ढीली पड़ जाती है और भीतर एक गहरी शांति का अनुभव होता है.
_ यह कोई असाधारण अनुभव पाने की बात नहीं है, बल्कि मन का अपने मूल स्वभाव में लौट आना है.!!
_ ध्यान जहाँ मन को शांत करना सिखाता है, वहीं समाधि उस शांति में पूरी तरह डूब जाने की अवस्था है.!!
– राहुल कुमार झा Rahul Kumar Jha
जब आप किसी काम या पढ़ाई में पूरी तरह से गहराई में डूबते हैं, तो आपका अनुभव अलग होता है.
_ आपको जो लगता है, जो महसूस होता है, वह सामने वाले को तुरंत महसूस नहीं होता. _ वह व्यक्ति अपने अनुभव और समझ के साथ ही चीजों को देखता है.
_ इसलिए कभी-कभी, आप किसी को सही करने या सुझाव देने की कोशिश करते हैं, लेकिन उसका असर उल्टा हो जाता है.
_ असल में, दूसरों को बदलने या सलाह देने से पहले हमें उन्हें उस अनुभव तक पहुंचाना चाहिए.
_ उन्हें जागरूक करना चाहिए कि चीजें क्यों और कैसे काम करती हैं.
_ वरना आप जितनी मेहनत करेंगे, उतना ही थकेंगे और निराश होंगे.
_ आज के समय में मानसिक स्वास्थ्य सबसे बड़ी चुनौती बन गया है.
_ अगर मन ठीक नहीं है, तो हमारा तंत्रिका तंत्र भी सही तरीके से काम नहीं करता.
_ नतीजतन, हम जल्दी चिड़चिड़े हो जाते हैं, मन अशांत रहता है, नकारात्मक भावनाओं का सामना करते हैं, अकेलापन महसूस करते हैं, और दूसरों से तुलना करने लगते हैं.
_ इसलिए, ध्यान और मानसिक स्वास्थ्य पर काम करने वाले लोगों की मांग बढ़ रही है. _ वैज्ञानिक भी लगातार नए-नए तरीके खोज रहे हैं, जिससे लोग अपने मन को शांत रख सकें और मानसिक स्वास्थ्य को सुधार सकें.
_ ध्यान सिर्फ एक तकनीक नहीं है, यह हमारे मन और शरीर के बीच संतुलन बनाने का तरीका है.
_ जो लोग इसे अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी में शामिल करते हैं, वे न केवल खुद मानसिक रूप से स्वस्थ रहते हैं, बल्कि दूसरों के साथ भी बेहतर तालमेल बना पाते हैं.
_ आने वाले समय में, गहरी समझ और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूक लोग समाज में और भी अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.
_ अगर हम अपने अनुभव और दूसरों के अनुभव के बीच की खाई को समझें, तो जीवन और संबंध दोनों में संतुलन और शांति लाना संभव है.
_ राहुल कुमार झा Rahul Kumar Jha
“मैं आपको कोई सिद्धांत सिखाने नहीं आया हूँ.
_ मैं आपको आपसे मिलाने आया हूँ.”
_ आजकल बहुत लोग ऐसी बातें करते हैं जो सुनने में बहुत सुकून देती हैं
“बस देखते रहो”,
“कुछ मत करो”,
“सब अपने-आप हो रहा है”
_ सुनकर मन हल्का लगता है, जैसे कोई बोझ उतर गया हो.
_ लेकिन सच यह है कि सिर्फ देखने से जीवन नहीं चलता.
_ अगर हम किसी को दुख देते हैं, तो उसे सिर्फ “एक घटना” कह देने से वह मिटता नहीं.
_ अगर हम गलती करते हैं, तो उसे “मन की प्रक्रिया” कह देने से जिम्मेदारी खत्म नहीं होती.
_ मैं आपको डराने नहीं आया, मैं आपको सच्चाई से मिलाने आया हूँ.
_ सच्चाई यह है कि
जागरूकता और जिम्मेदारी अलग नहीं हैं.
_ आप अपने मन को देखें, जरूर देखें, लेकिन जो दिखे, उससे भागें नहीं.
_ ध्यान का मतलब यह नहीं कि आप जीवन से दूर हो जाएँ.
_ ध्यान का मतलब है
आप और ज़्यादा साफ़ देख पाएं कि क्या सही है, क्या गलत है,
और फिर हिम्मत के साथ सही का साथ दें.
_ आजकल ध्यान को भी एक इवेंट बना दिया गया है.
_ जहाँ लोग कुछ समय के लिए शांति महसूस करते हैं और फिर वही पुराने तरीके से जीने लगते हैं.
_ लेकिन ध्यान कोई इवेंट नहीं है, यह तो हर इंसान के लिए है, हर पल के लिए है.
_ मैं आपको कोई दिव्य शक्ति नहीं दे सकता,
_ पर अगर आप ईमानदारी से खुद को देखना शुरू करें
तो आपका मन हल्का जरूर हो सकता है.
_ क्योंकि असली शांति तब आती है
जब आप अपने कर्मों को स्वीकार करते हैं,
उन्हें सुधारते हैं,
और अपने जीवन की जिम्मेदारी खुद उठाते हैं.
_ मैं बस इतना कहने आया हूँ
आप भागिए मत.
_ अपने आप से मिलिए, वहीं से सब कुछ बदलना शुरू होता है.
– राहुल कुमार झा
Rahul Kumar Jha
जब तुम बैठ जाते हो, दुनिया हार जाती है.
_ दुनिया तुम्हें लगातार व्यस्त रखना चाहती है.
_ वह तुम्हें डर देती है ताकि तुम भागते रहो.
_ वह तुम्हें इच्छाएँ देती है ताकि तुम खोजते रहो.
_ वह तुम्हें तुलना देती है ताकि तुम असंतुष्ट बने रहो.
_ वह तुम्हें समस्याएँ देती है ताकि तुम स्वयं को भूल जाओ.
_ और इस सबके बीच एक ऐसी चीज़ है जिससे सबसे अधिक भय खाया जाता है
_ तुम्हारा शांत होकर बैठ जाना.
ध्यान केवल आँखें बंद करने का नाम नहीं है.
_ ध्यान संसार के सबसे बड़े विद्रोह का नाम है.
_ क्योंकि जिस क्षण तुम चुपचाप बैठते हो, तुम उस खेल से बाहर निकलना शुरू कर देते हो जो वर्षों से तुम्हारे भीतर चल रहा है.
_ तुम्हें तब पहली बार दिखाई देता है कि तुम्हारे अधिकांश डर भविष्य में रहते हैं.
_ तुम्हारी अधिकांश पीड़ा स्मृतियों में रहती है.
_ तुम्हारा अधिकांश तनाव कल्पनाओं से बना होता है.
_और तुम्हारा अधिकांश संघर्ष तुम्हारे अपने विचारों से जन्म लेता है.
_ ध्यान उन्हें मिटाता नहीं.
_ ध्यान उन्हें प्रकट करता है.
_ जो पहले अंधेरे में था, वह प्रकाश में आ जाता है.
_ जो पहले भाग रहा था, वह दिखाई देने लगता है.
_ जो पहले तुम्हें नियंत्रित कर रहा था, वह तुम्हारे सामने खड़ा हो जाता है.
_ और तभी परिवर्तन संभव होता है.
_ मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि उसकी समस्याएँ बाहर हैं.
_ वह सोचता है कि यदि परिस्थितियाँ बदल जाएँ तो वह शांत हो जाएगा.
_ यदि लोग बदल जाएँ तो वह प्रसन्न हो जाएगा.
_ यदि दुनिया बदल जाए तो उसे शांति मिल जाएगी.
_ लेकिन वर्षों की खोज के बाद भी वह पाता है कि उसके भीतर वही बेचैनी जीवित है.
– क्यों ?
_ क्योंकि शांति परिस्थितियों की उपलब्धि नहीं है.
_ शांति चेतना की अवस्था है
_ ध्यान हमें यह समझाता है कि हम अपने विचार नहीं हैं.
_ हम अपनी भावनाएँ नहीं हैं.
_ हम अपने भय नहीं हैं.
_ हम अपनी कहानी भी नहीं हैं.
_ इन सबके पीछे एक साक्षी है.
_ एक मौन उपस्थिति.
_ एक ऐसा केंद्र जो कभी घायल नहीं हुआ.
_ एक ऐसी जगह जहाँ कोई संघर्ष नहीं पहुँच सकता.
_ अधिकांश लोग पूरी जिंदगी अपने मन की आवाज़ को ही स्वयं समझते रहते हैं.
_ वे हर विचार पर विश्वास कर लेते हैं.
_ हर डर को सत्य मान लेते हैं.
_ हर कल्पना को वास्तविकता समझ लेते हैं.
_ ध्यान पहली बार उनके और उनके विचारों के बीच दूरी पैदा करता है.
_ और यही दूरी स्वतंत्रता है.
_ जब तुम बैठते हो और अपने भीतर उठते विचारों को देखते हो, तब तुम्हें पता चलता है कि तुम्हारा मन एक आकाश है.
_ विचार बादल हैं.
_ भावनाएँ मौसम हैं.
_ स्मृतियाँ हवाएँ हैं.
_ लेकिन तुम इनमें से कुछ भी नहीं हो.
_ तुम वह आकाश हो जिसमें यह सब घटित हो रहा है.
_ यही ध्यान का रहस्य है.
_ यह तुम्हें कुछ नया नहीं देता.
_ यह केवल वह हटाता है जो तुम नहीं हो.
_ एक-एक करके पहचानें गिरने लगती हैं.
_ डर ढीला पड़ने लगता है.
_ अहंकार की पकड़ कम होने लगती है.
_ और भीतर एक ऐसी जगह प्रकट होती है जो हमेशा से मौजूद थी.
_ वहाँ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है.
_ कोई तुलना नहीं है.
_ कोई प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं है.
_ वहाँ केवल होना है.
_ शुद्ध होना.
_ यही वह स्थान है जहाँ रचनात्मकता जन्म लेती है.
_ यहीं से प्रेम बहता है.
_ यहीं से करुणा आती है.
_ यहीं से बुद्धि प्रकट होती है.
_ आज का मनुष्य जानकारी से भरा हुआ है, लेकिन स्वयं से दूर है.
_ उसने दुनिया को जीतना सीख लिया है, लेकिन अपने मन को समझना नहीं सीखा.
_ उसने तकनीक बना ली है, लेकिन मौन खो दिया है.
_ उसने गति पा ली है, लेकिन दिशा खो दी है.
_ ध्यान इस खोई हुई दिशा की वापसी है.
_ यह भागने का मार्ग नहीं है.
_ यह वास्तविकता से सामना करने का साहस है.
_ यह किसी धर्म, विचारधारा या विश्वास की संपत्ति नहीं है.
_ यह मानव चेतना की सबसे प्राचीन और सबसे आधुनिक तकनीक है.
_ हजारों वर्ष पहले भी इसकी आवश्यकता थी.
_ आज शायद पहले से अधिक है.
_ क्योंकि शोर बढ़ गया है.
_ विकर्षण बढ़ गए हैं.
_ लेकिन मनुष्य का हृदय अब भी उसी शांति की तलाश में है.
_ और वह शांति किसी पर्वत की चोटी पर नहीं है.
_ किसी पुस्तक में नहीं है.
_ किसी गुरु के शब्दों में नहीं है.
_ वह तुम्हारे भीतर उस स्थान पर है, जहाँ तुमने बहुत समय से जाना बंद कर दिया है.
_ इसलिए प्रतिदिन कुछ समय बैठो.
_ कुछ मत करो.
_ कुछ मत बनो.
_ कुछ मत खोजो.
_ सिर्फ देखो.
_ सिर्फ उपस्थित रहो.
_ सिर्फ श्वास को महसूस करो.
– राहुल कुमार झा

Rahul Kumar Jha
– जब हम ध्यान में होते हैं, उसी क्षण हम एक दूसरे ही व्यक्ति हो जाते हैं । । यदि हम गृहस्थ हैं, तो हम फिर से दोबारा वही गृहस्थ कभी नहीं हो सकते., ध्यान से एक गुणात्मक फरक आ जाता है.
हमारा पूरा भीतरी गुण बदल जाता है । संसार की तरफ हमारा देखने का नजरिया बदल जाता है, यह पहले जैसा ही नहीं बना रहता है ।
- दूसरा, जैसे ही हम जागृत होते हैं, हमारे में से सभी प्रकार के नकारात्मक संवेदनाएं _ जैसे कि विषाद, संघर्ष, तनाव, ईर्ष्या, धोखा, क्रोध, द्वेष सब समाप्त हो जाते हैं । जिससे हम हल्कापन अनुभव करते हैं , हम बिना किसी बोझ के अनुभव करते हैं,
तीसरा हम जो भी कार्य करते हैं, वह एकदम अलग तरीके से होने लगता है । हमारी चाल बदल जाती है, हमारी ढाल बदल जाती है ।
अभी भी हम फिल्मे देखते हैं, संगीत सुनते हैं, नृत्य करते हैं, लेकिन अब हम फिल्मों को अलग नजरिये से देखते हैं, संगीत में एक अलग मज़ा आने लगता है, और नृत्य करते थकते ही नहीं , क्यूँकी अब सब होश पूर्वक हो रहा है.
– – अब हम सब कुछ बहुत ही ध्यानपूर्वक या होश पूर्वक सुनना आरंभ करते हैं ।
कई बार कुछ समय के लिए हमारे में एक डर पैदा हो सकता है की हम कहीं पागल तो नहीं हो गए हैं. और डर के मारे, हम पहले की तरह ही फिर से बनना चाहते हैं, यानि फिर से सो जाना चाहते है ।
काम करने की अपनी गति कम हो जाती है, हम इसी संसार के लिए अयोग्य हो जाते हैं,
एक तरह का मजा और साथ में एक तरह का ऊब (Bordam ) दोनों साथ में अनुभव करते हैं ।
– – हम बहुत उर्जा से भर जाते हैं ।
एक और बहुत महत्त्वपूर्ण संकेत है कि हम औरों के लिए कभी कभी परेशानी बन जाते हैं ।
लोग हमें असामान्य व्यक्ति की तरह अपने परिवार में या मित्रों में देखने लगते है… ।
– पहले हम कुछ ऐसा सोचते थे, की ध्यान या जागरूकता से मन को शांति मिलेगी या जीवन में शांति छा जाएगी और हम, फिर स्वयं को, समाज और परिवार के साथ बेहतर तरीके से समायोजित कर सकेंगे, लेकिन तथ्य इसके विपरीत हुआ,
_ अब हमे पुराने मित्रों के साथ ऊब आने लगती है । अब जब हम ध्यान में रहने लगे तो हम पाते हैं कि, हमारे आस – पास के लोग _ वही – वही चीजों के बारे में, बार – बार वही बातें करते रहते हैं, और हम एक ऊब से भर जाते हैं ।
– – इस लिये ध्यान हमारे लिये कोई सांत्वना नहीं बना –
हाँ एक दिन निश्चित रूप से, शांति मिलती है, लेकिन बाद में, _
_ और ये शांति से ऐसा नहीं हुआ कि समाज और संसार के साथ समाधान हो गया,
_ लेकिन यह शांति संसार के साथ एक वास्तविक सामंजस्य से मिलती है ।
सदा ध्यानस्थ रहने के लिए ध्यान में जाओ,
_ अगर आप खुद को ध्यान से अलग कर लेंगे तो ..वही पुराना जीवन हावी हो जाएगा.
_ मैं ऐसे कई लोगों से मिलता हूं जो कहते हैं,
_ “जब भी मैं शुष्क, थका हुआ, आदि महसूस करता हूं तो; मैं ध्यान में डुबकी लगाता हूं और नए जन्म की तरह तरोताजा होकर वापस आता हूं.”
— हममें से अधिकांश लोग शांतिपूर्ण, आसान जीवन जीना चाहते हैं.
_ हम वास्तविक परिवर्तन से नहीं गुजरना चाहते.
_ इसलिए, हम कुछ अवसरों पर पवित्र कार्य करते हैं और शेष समय में, हम वही पुराना झूठ जीते हैं ..जो अंततः हमें दोषी बनाता है.!!
— ध्यान का निश्चित रूप से हमारे अस्तित्व पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है,
_ लेकिन जैसे ही हम ध्यान से बाहर आएंगे, यह प्रभाव ख़त्म हो जाएगा.
_ तो, अगली बार, जब आप ध्यान में डुबकी लगाएं, तो उस स्थिति को याद रखें..
_ जिसमें आप तब थे ..जब आप गहरे ध्यान में थे, और हमेशा वही बने रहें – यही परिवर्तन का वास्तविक बीज है.
_ जब आप गहरे ध्यान के साथ एक हो जाएंगे – आपकी पुरानी आदतों का चक्र गहराई में डूब जाएगा और आप एक नवजात शिशु की तरह महसूस करने लगेंगे.
| Mar 17, 2014 | My Favourite Thoughts, सुविचार
1. जब आप दूसरों को बदलने के प्रयास छोड़ के स्वयं को बदलना प्रारम्भ करें,
तब आप आध्यात्मिक कहलाते हो.
2. जब आप दुसरे जैसे हैं, वैसा उन्हें स्वीकारते हो तो आप आध्यात्मिक हो.
3. जब आप समझते हैं कि हर किसी का दृष्टिकोण उनके लिए सही है, तो आप आध्यात्मिक हो.
4. जब आप घटनाओं और हो रहे वक्त का स्वीकार करते हो, तो आप आध्यात्मिक हो.
5. जब आप आपके सारे संबंधों से अपेक्षाओं को समाप्त करके सिर्फ सेवा के भाव से संबंधों का ध्यान रखते हो, तो आप आध्यात्मिक हो.
6. जब आप यह जानकर के सारे कर्म करते हो की आप जो भी कर रहे हो वो दुसरो के लिए न होकर के स्वयं के लिए कर रहे हो, तो आप आध्यात्मिक हो.
7. जब आप दुनिया को स्वयं के महत्त्व के बारे में जानकारी देने की चेष्टा नहीं करते, तो आप आध्यात्मिक हो.
8. अगर आपको स्वयं पर भरोसा रखने के लिए और आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए दुनियां के लोगों के वचनों की या तारीफों की ज़रूरत न हो तो आप आध्यात्मिक हो.
एक परिपक्व व्यक्ति वह है जो केवल निरपेक्षता में नहीं सोचता है, जो भावनात्मक रूप से गहराई से उत्तेजित होने पर भी वस्तुनिष्ठ होने में सक्षम होता है, _ जिसने सीखा है कि सभी लोगों में और सभी चीजों में अच्छाई और बुराई दोनों होती है, और जो विनम्रता से चलता है और परोपकार से व्यवहार करता है _जीवन की परिस्थितियों के साथ, यह जानते हुए कि_ इस दुनिया में कोई भी सब कुछ नहीं जानता है और इसलिए हम सभी को प्रेम की आवश्यकता है.
9. अगर आपने भेदभाव करना बंद कर दिया है, तो आप आध्यात्मिक हो.
10. अगर आपकी प्रसन्नता के लिए आप सिर्फ स्वयं पर निर्भर हैं, दुनिया पर नहीं, तो आप आध्यात्मिक हो.
11. जब आप आपकी निजी ज़रूरतों और इच्छाओं के बीच अंतर समझ के अपने सारे इच्छाओं का त्याग कर पातें हैं, तो आप आध्यात्मिक हो.
12. अगर आपकी ” खुशियां ” या ” आनंद” भौतिक, पारिवारिक और सामाजिकता पर निर्भर नहीं होता, तो आप आध्यात्मिक हो.
| Mar 16, 2014 | My Favourite Thoughts, सुविचार
आध्यात्मिक प्रगति पूरी तरह से जीवन को सरल बनाने और ज़रूरी बातों पर केन्द्रित होने के बारे में है.
जिसको ये दिख गया कि भीतर की बेचैनी का इलाज बाहर की ओर ज़ोर-आज़माइश करके नहीं होना है ;
_ उसकी आध्यात्मिक यात्रा शुरू हो गई.
“भटकाव तब होता है जब हम खुद से दूर हो जाते हैं.
_ आध्यात्मिक प्यास का जवाब बाहर नहीं—अपने भीतर ही मिलता है.
_ जब प्यास सच्ची होगी, रास्ता खुद मिल जाएगा.”
शिछा हमें खाने कमाने योग्य बना सकती है, मगर हमारे जीवन को आनंदमय अध्यात्म बनाता है.!!
कुछ लोग भौतिकता [materialism] को सब कुछ मानते हैं,
_ मगर सोचिए जन्म से पहले भौतिकता कहां थी और मृत्यु के बाद कहां चली जाएगी.!!
” तन को रोटी और मन को शांति चाहिए “
जो तन को रोटी और मन को शांति देने के इच्छुक होते हैं, _ अध्यात्म उनके लिए है.
आध्यात्मिक कोई कार्य नहीं है, जो कल कर लेंगे ;
यह हर छण जीवन जीने की परम कला है, जो जीवन को सुंदर और प्रेममय बनाता है.!!
आध्यात्मिकता में आप ही प्रयोग हैं, आप ही प्रयोगकर्ता हैं और आप ही परिणाम हैं.
आध्यात्मिकता, अनावश्यक को खत्म करने का अनुशासन है.
अध्यात्म ….. शनै शनै __ आनंद की ओर प्रस्थान..
खरा आध्यात्मिक जीवन दूसरों को सुख बांटने में होता है, उसमें आनंद और खुलेपन का अनुभव होता है.
आध्यात्मिकता का मतलब जीवन से सन्यास लेना नहीं है; यह पूरी तरह से जीवन जीने की कला है.
जो भाव हमें अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जाता है, वह भाव अध्यात्म है.
एक आध्यात्मिक प्रक्रिया में सभी स्तरों पर प्रयासों की ज़रूरत पड़ती है.
संसार दूसरे के प्रेम में पड़ने की यात्रा है, अध्यात्म अपने प्रेम में पड़ने की.
आध्यात्मिकता की राह निर्भीक और साहसी लोगों के लिए है.
आध्यात्मिक विकास के लिए परिवर्तन नितान्त आवश्यक है.
अपने रवैये में अड़ियलपन को छोड़कर लचीलापन लाएँ,
फिर देखें, आपकी आध्यात्मिक प्रगति कितनी तेज़ी से होती है.
_ आध्यात्मिक व्यक्ति किसी की भी निंदा, स्तुति, शिकायत और आलोचना नहीं करता.!!
आध्यात्मिक और व्यावहारिक इंसान में मात्र इतना ही भेद है.
_ आध्यात्मिक इंसान व्यावहारिक नहीं होता
_ व्यावहारिक इंसान आध्यात्मिक नहीं होता !
_ कभी दोनों साथ दिखे तो समझ लेना अभिनय होगा..
अभिनय :- ( बात गहरी है , समझ न आये तो बुरा न मानना)
जीवन निस्सार है, निरर्थक है, यह सोच किसी निराशा का नतीजा नहीं है..
_ बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा से गुज़रने का प्रतिफल है.
कोई बड़ी नही _ बस _ इत्तू सी ही तो बात है,
_ जैसे हो वैसा दिखना ही तो … अध्यात्म है..
आध्यात्मिक व्यक्ति सहज- शांत, उसके भीतर का मौसम मस्त सुहाना मस्तमौला सा रहता है.!!
भीतर से घुट कर जो मौन हो रहा है, मौन उसके लिए अभिशाप है..
_ जबकि आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले के लिए ‘मौन एक वरदान है’.
अध्यात्म मात्र जागरण की यात्रा है, कुछ पाना नहीं है, बस स्वयं को उघाड़ना मात्र है.
जैसे अंगारा राख में ढक जाता है, और अपनी चमक खो देता है, बस उसकी राख को झाड़ना है, तांकि उसका प्रकाश उपलब्ध हो जाये.
ज्ञान….
यदि आप अधिक सांसारिक ज्ञान एकत्रित करते है तो आप में अहंकार-घमण्ड भी आ सकता है
किन्तु आध्यात्मिक ज्ञान जितना ज्यादा अर्जित करते है उतनी नम्रता -सहजता और सरलता आती है !!!
आध्यात्मिकता की खोज में जुटे व्यक्ति के लिए ज़रूरी चीजों में से एक है – समभाव.
इसका अर्थ है सभी इन्द्रियों व प्रणालियों में संतुलन.
जीवन के सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों पछ, आध्यात्मिक लछ्य तक पहुँचने में हमारी मदद करते हैं इसलिए दोनों ही जरुरी है. हम जितना ज्यादा उन्हें सहज और संतुलित कर पायेंगे, उतनी ही ज्यादा सफलता प्राप्त कर सकेंगे.
अध्यात्म तो उनके लिए है, जिन्हें कुछ ऐसा मिल गया है, जिसके उपरांत उन्हें सुखी होने की आवश्यकता नहीं महसूस होती और दुखी होने से डर नहीं लगता।
दुःख के लिए तैयार रहो। सुख की अपेक्षा मत कर लेना। सत्य ने कोई दायित्व नहीं ले रखा है तुम्हें सुख देने का,
और सुख और आनंद में कोई रिश्ता नहीं। सत्य में आनंद ज़रूर है। सुख नहीं।
जो व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन पर चलता है, वह हमेशा प्रसन्न रहता है ; ऐसा व्यक्ति, न तो कभी किसी बात पर ‘शोक’ करता है, और न कभी किसी प्रकार की, कामना ही करता है.
” अपने अंतस में, प्रत्येक जीव के प्रति, समान व्यवहार का भाव जागृत होना …….. आध्यात्मिकता की प्रमुख पहचान है “
जब मैं इस दुनिया की ओर देखता हूँ तो मुझे मेरा जीवन उबाऊ, नीरस, बोझिल और अशांत-सा लगता है,
_ लेकिन जब मैं आध्यात्मिक जीवन को देखता हूँ तो मुझे मेरा जीवन खूबसूरत, जीवंत सुकून, शांति और आनंद से भरपूर लगता है.!!
दूर, बहुत दूर, और दूर देखो..
_गहरे, बहुत गहरे, और गहरे सोचो..
_सोचते जाओ, सोचते जाओ, सोचते जाओ..
_ एक सत्य प्रकाशित होता है… सब कुछ मिथ्या है, सब कुछ व्यर्थ है.
_ जीने का क्या अर्थ है ?
_यह सच है कि जब बहुत गहरे सोचने बैठो तो जीवन निस्सार, निरर्थक लगता है.
_जीवन निस्सार है, निरर्थक है, इस आध्यात्मिक ऊर्जा से गुज़रने का मौका कभी न कभी हरेक को मिलता है.
— आध्यात्मिक पथ के अलावा, सांसारिक जीवन की चीज़ों में भी,
_ जैसे नया व्यवसाय शुरू करना [such as starting a new business], नए पेशे में जाना [ going into a new profession], अपना करियर बनाना [making one’s career], प्यार और दोस्ती के रास्ते पर चलना [treading the path of love and friendship], नाम और प्रसिद्धि के लिए काम करना [working for name and fame], चाहे स्वभाव या चरित्र कुछ भी हो जिस वस्तु को कोई प्राप्त करना चाहता है [whatever be the nature or character of the object one wishes to attain] – वह आरंभ से अंत तक त्याग ही मांगता है. [what it asks is sacrifice from beginning to end.]
_हम इसे भूल जाते हैं, और इसलिए हममें से प्रत्येक सोचता है, “हमारा जीवन कितने बलिदान मांगता है !”
[We are apt to forget this, and therefore each of us thinks, ” Our life asks for so many sacrifices !]
_देखो वो प्रोफेशनल आदमी कितना खुश है, वो आदमी जो सरकार में अपना करियर बना रहा है उसकी जिंदगी कैसी चल रही है.”
[Look how that professional man is happy, how that man who is making a career in government is going on in his life.”]
_परंतु हम उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, जिसे वे प्राप्त करना चाहते हैं, उनमें से प्रत्येक को जो बलिदान देना पड़ता है, वह नहीं देख पाते.
[But we do not see the sacrifice that each one of them has to make in order to arrive at that object which they wish to attain.]
एक आध्यात्मिक व्यक्ति उस व्यक्ति से बेहतर है जो बलिदान देने के लिए तैयार नहीं है.
[A spiritual man is preferable to a man who is unwilling to make sacrifices.]
इससे पता चलता है कि उसे कुछ हासिल करने की उतनी परवाह नहीं है.
[By this shows that he does not care enough to attain something.]
_वह अपने आराम, अपनी सुविधा का आनंद लेता है – वह “अपने जीवन” से काफी संतुष्ट है.
[He enjoys his comfort, his convenience – he is quite content in “his life.]
प्राप्ति का उद्देश्य जितना बड़ा होता है, उसके लिए मांगा गया बलिदान भी उतना ही बड़ा होता है.
[The greater the object of attainment, the greater is the sacrifice asked for it.]
हमारा आध्यात्मिक प्रशिछण तभी प्रभावी कहलाता है जब उसके अभ्यास से हमारे अंदर स्वाभाविक रूप से आंतरिक शांति और हल्कापन पैदा हो.
आध्यात्म “आध्यात्मिक दृष्टिकोण” से देखें तो ये जीवन केवल ‘अपनी यात्रा’ है.
_ इस यात्रा में आप ‘किसे’ अपने जीवन में रखना चाहते है और किसे नहीं, ये केवल आपका ‘चुनाव’ हैं..
_ आप अपने जीवन को ‘कैसा’ जीना चाहते हैं, ये भी केवल आपका ही ‘चुनाव’ है
_ इस जीवन को आप जैसा जीना चाहते हैँ, इसे उस रूप में जीने के लिए इस दुनिया में आपकी कोई भी सहायता नहीं करने वाला..
_ आपका जीवन केवल आपकी ‘अपनी जिम्मेदारी’ है, आपके सपने भी केवल आपके ‘अपने’ हैँ..
_ इसलिए ‘स्वयं को केंद्र’ में रखकर अपने जीवन को खुल कर जीएं..
_ अपनी ज़िन्दगी को वैसा जीकर जरूर जाएं, जिसकी आपको तमन्ना थी..!!
अपने खुद के खर्चे के लिए कमाना संसार है या अध्यात्म ?
संसार में रहो या आश्रम में, आपका खाना, कपड़ा, रहना
ये सब का खर्च कौन देगा ?
क्या आप बिना खाने के, बिना कपड़े के और बिना घर के रह सकते हैं ?
क्या आप जैसा भगवान बुद्ध ने बताया, _ ऐसे भिक्षा माँग कर खा सकते हैं ?
और फिर भिक्षा में जो मिलेगा, उसके लिए भी तो किसी को ना किसी को, कमाई करनी पड़ेगी.
तो अपना खर्चा खुद कमाने में क्या समस्या है ?
किसी का बोझ ढोना समझदारी नहीं है, _पर क्या स्वयं किसी पर बोझ बन जाना उचित है ?
आप शांति पाने चलें और आपके खर्चे के लिए कोई और कमाई करें,
ये कैसी आध्यात्मिकता ?
| Mar 15, 2014 | MAHAK, सुविचार
” सुबह की ताकत “
_ दिन की सबसे खूबसूरत शक्ल सुबह होती है. सुबहों का मैं हमेशा से दीदार करता रहा हूँ.
_ अब तक जहां- जहां रहा हूँ, वहां की सुबह बहुत अलग- अलग दर्शन देती रही है.
_कुछ ना कुछ नया हर जगह की सुबह से सीखने को मिलता है.
_हर सुबह को जीवन की नयी शुरुआत मान सकते हैं.
_कल से क्या मतलब. सुबह आपको आज का एहसास कराएगी.
_ अभी आज इसी समय में रहना सुबह होना है.
_ कल के काल में घटी नकारात्मकता से उबारना सुबह होना है.
_हर दिन एक नये जीवन का एहसास करना.
_ जैसे कि जो है वो आज से ही शुरू है, कल चाहे जैसा भी रहा हो, आज अच्छा ही होगा. इसका एहसास सुबह है.
_ऊर्जा का अनंत एकदिशीय प्रवाह जो सिर्फ आपको ताकतवर बनायेगा.
_ आप को कभी कितना भी कमजोर क्यों ना लगे, बस एक बार सुबह में डूब के देखिए
._प्रकृति की तेज बहती हवा में परिश्रम का स्नान सुबह करके देखिये,
_अपने नये होने का एहसास होगा आपको.
सुबह की ताज़गी महसूस करो.. क्योंकि ज़िन्दगी तो है.. हर लम्हा वासी हो ही रहा है.!
सुबह हो चुकी है, हवा में ताजगी है.. जैसे दिन मुझे भी ताज़ा रहने को कह रहा हो.!
अगली सुबह क्या होने वाला है और क्या नहीं _ यह सोने वाला भी जानता है क्या ?
_ शायद नहीं..!!
हर अंधेरा एक सवेरा लेकर आता है.. बस उस सवेरे तक ठहरने का साहस चाहिए.
**सुबह पार्क में बैठा सोच रहा हूँ —
कहाँ चूक गया मैं ?
_ ज़िंदगी ने जो दिया, उससे ज़्यादा शायद उम्मीदें थीं.
_ मेहनत और नतीजे के बीच एक ऐसी खाई है, जहाँ सपने गिरकर टूट जाते हैं.
_ अंत में —
_ ना जीत सुकून देती है, ना हार कोई मायने रखती है…
_ बस अधूरी ख्वाहिशें ही थका देती हैं.!!
**आज सुबह ठण्ड है, चाय पीते हुए सोच रहा हूँ..
_ एक कप चाय, और इस भीड़-भरे शहर से विदाई…
_ कैसे सब कुछ धीरे-धीरे टूट जाता है, बिना शोर किए, बिना बताये.
_ यह सिर्फ देह या दूरी की विदाई नहीं है,
बल्कि हर उस रिश्ते, हर जिम्मेदारी से भी विदाई है.
_ जो कभी आत्मा के ताने-बाने में गुँथी थी.
_ अब यह शहर बस एक स्मृति है.. – और स्मृतियाँ, भले चुभती रहें,
वे हैं.. – जिन्हें कोई समय, कोई कारण, कोई दूरी मिटा नहीं सकती.!!
आज सुबह कुछ नहीं किया, थोड़ा सा अपना सामान साफ किया, खाया पिया, आराम किया और कुछ देर एक किताब पढ़ी,
_ और सबसे बढ़िया.. कोई मैसेज- मेल नहीं देखी, ना जवाब दिया किसी का, सिस्टम को हाथ भी नहीं लगाया,
_ बस खुद में ही हूँ, दिमाग के मैन गेट पर ताला लगा लिया है ताकि कोई सरदर्दी ना हो, ना मिलना – किसी से ना बात करना, ना फोन ना कुछ, ना ज्ञान – ना विज्ञान
_ अभी शाम और रात बाकी है, यही जीवन ठीक है अब रोज इसे ही अपनाना होगा,
_ जिसे बात करना हो या कुछ काम हो टेक्स्ट कर दें, मन होगा तो जवाब दूंगा.. नहीं तो अपनी धुन में रहूंगा,
_ धीरे – धीरे मोबाइल और सब बंद, यही श्रेष्ठ है..
_ कभी – कभी ऐसा दिन भी होना चाहिए.!!
मेरी ज़िन्दगी का ..मेरा निजी पसंदीदा हिस्सा इसकी “सुबह” है.
_ “सुबह” के समय भी आपको बहुत सारे लोग दिखेंगे ..लेकिन सुबह के लोगों में एक अनोखी शांति का माहौल होता है.
_ न मोटर का शोर और न तेज़ आवाज़.
– हर ‘सुबह’ प्रकृति के उपहारों की याद दिलाती है, चाहे आप इसे कोई भी नाम दें’
_ हर सुबह यह सोचकर दुख होता है कि ..अगर एक दिन प्रकृति अपने प्राकृतिक तरीकों से काम करना बंद कर दे, ..तो हमारा जीवन कुछ ही क्षणों में लुप्त हो जाएगा.
_सुबह की रोशनी और हवा इतनी जीवंत और जीवन शक्ति से भरी होती है कि यह हजारों शानदार भोजन के बराबर होती है.
[The morning light and air is so alive and full of vitality that it equals the thousand splendid meals.]
_ जब भी आपको शांति की आवश्यकता होगी तो यह आपकी थेरेपी होगी.
[It will be your therapy whenever you need a calm.]
“सुबह और शांति”
___ ‘शांति ऐसी चीज़ है’ जिसे मैं खोना नहीं चाहता,
_ जो शांति मुझे ‘सुबह’ का साथ पाकर मिली..
_ सुबह की रोशनी और हवा जीवंत और जीवन शक्ति से भरपूर होती है.
_ ‘शांति’ जिसे मैं वर्षों से गलत लोगों से दूर रह कर..
_ और सही लोगों का साथ लेकर हासिल कर पाया हूं.
_ मैं अपनी पसंद को खोना नहीं चाहता,
_ मैंने लंबा समय लगा कर इसे हासिल किया है.
_ यही कारण है कि मुझे मेरी पसंद पर.. विश्वास इतना दृढ़ है.
— मैं अब अपनी शांति को खोना नहीं चाहता,
_ क्योंकि इसने मुझे एक उद्देश्य और जिम्मेदारी की भावना के साथ..
_ फिर से जीवन जीने की दिशा दी है.
_ ऐसा नहीं है कि मैं उसके बिना अपना जीवन नहीं जी रहा होता, लेकिन यह दिशाहीन होता,
_ मैं बस उन चीज़ों की तलाश में इधर-उधर भटकता रहता, जो अनावश्यक है.
_ मैं औरों की भांति अपना जीवन खोना नहीं चाहता, जिन्हें सही भी गलत लगता है.!!
– मैं कुछ न कुछ लिखता- पढ़ता रहता हूँ, किसी का ध्यान आकर्षित करने के लिए नहीं..
_ क्योंकि इससे मैं खुश महसूस करता हूँ..
_ बल्कि यह बताने के लिए कि.. मैं वह काम कर रहा हूं,
_ जो किसी ने मेरे लिए नहीं किया.!!
_ मैं अपने लिखने- पढ़ने की भावना को खोना नहीं चाहता;
_ यह एक ऐसी चीज है.. जिस पर मैं हमेशा विश्वास करता हूं..!!
_ शायद इसलिए कि.. मुझे मेरा जीवन इसी में मिलता है.!!
_ मैं अपनी मौलिकता [ originality] के साथ जीना चाहता हूँ..
_ और इसके अलावा, मैं खुद को खोना नहीं चाहता..
_ क्योंकि केवल.. मैं ही खुद को संभाल सकता हूं,
_ और मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहता, कम से कम अब और नहीं..!!
सुबह-सुबह यूँ मन करता कि वक्त यहीं रुक जाए.
_इस सुबह की दोपहर कभी न हो.
_शामें जहां थकान, उलझनों, नींद, ज्यादा खा लेने का सबब है,
_ वहीं सुबहें… ताजगी, उमंग, नए विचार, भूख का प्रतिबिंब है.
_ पसंद है शाम, पर सुबह की चाह हमेशा रही..
_उम्मीद की एक छोटी सी किरण शाम रात के स्याह अंधेरे को छांट देती है.
_ सुबह सकारात्मक है… यह जीवन जीने के लिए बनी है.
आज झील किनारे टहलते हुए आसमान में पतंगें, हवाईजहाज, चील दिखाई दे रहीं थी,
_ ठण्ड के साथ खिली हुई धूप है, जिसे बस निहारते रहने को मन करता है, वही आंखों का सूकून है.
_ पहाड़, नदियों, झरनों से बातें करने की इच्छा हो रही थी,
_ लग रहा था मुझे भी कोई यूँ उड़ा कर उन तक पहुंचा दे !
_ यक़ीन मानिए.. मैं वह बिलकुल वह नहीं हूँ.. जिसे आप जानते हैं.!!
सुबह के 6:00 बजे हैं.
_ जो मुझे दिख रहा है, मुझे महसूस हो रहा है, बताऊं..
_ बस लिखूंगा… मुझे खुद नहीं मालूम कि क्यों और क्या लिखूंगा..
_ मौसम में हरा और सलेटी रंग का ..कॉम्बिनेशन..
_ यह जीवन के कई रंगों को जन्म देता है.
_ यह उत्साह को जन्म देता है,
_ यह मन की उमंग को जन्म देता है,
_ यह प्रसन्नता, वैभव, खुशहाली को जन्म देता है.
_ यह सिंबल है आने वाले दिनों की संपन्नता का..!!
_ अभी बालकनी में हूँ, सामने कुछ पछी नजर आ रहे हैं.
_ उछल कर कभी इस डाल पर तो कभी उस डाल पर चले जाते हैं..
_ और ऊपर आकाश में बादल इधर से उधर आ- जा रहे हैं..
– शीतल, मंद हवा चल रही है.. घनघोर घटा छायी है,
_इस छटा का आनंद वही ले सकता है, जो जल्दी उठता हो,
_जिसमें प्रकृति को ग्रहण करने की क्षमता हो.
__ अभी अभी कोई पछी की आवाज आई.
_ कोई बनावटी आवाज सुनाई नहीं दे रही.
_ सिर्फ कुछ पंछियों की आवाज है.
_ किसी ट्रैफिक या रसोई से बर्तन खड़कने की आवाज नहीं.
_ कानों में एक सीटी सी बज रही है, इतनी शांति की आदत नहीं इन कानों को..
_ मै भाग्यशाली हूं ..जो अक्सर ऐसी सुबह ..किसी ऐसी जगह होता हूं..!!
सुबह होने ही वाली है,
_ पेड़ों से चिड़ियों के कलरव की ध्वनि मेरे कानों को गुदगुदा रही है,
_ मेरे चारों और शांति है और मैं अकेला बैठा विचारमग्न हूँ,
_ कभी-कभार अव्यवस्थित मन घबरा उठता है,
_ ऐसे में मेरी डायरी के कोई पन्ने को पढ़ कर मुझे शांति की आश्वस्ति होती है,
_ विचलित मन को आराम सा मिलता है,
_ पढ़ते हुए ऐसा लग रहा है ..
_ जैसे मेरी आवाज़ को सुंदर शब्दों से बुन दिया गया हो..!!
**आज सुबह थोड़ी ठंड है, तिसपर आज बारिश भी मेहरबान है ..
_ बालकनी में लगे गमलों में से फूलों कि मिलीजुली गंध मन को मदहोश करने को काफ़ी है,
_ इनके पास जाते ही अतींद्रिय [extrasensory] अनुभव होता है …
_ दवाओं और ध्यान के असर से अब सुख और दुख दोनों में मन थिर रहने लगा है,
_ साथ में अतिव्यस्तता कुछ सोचने का अवसर ही नहीं देती,
_ सुख, दुःख, सदभाव, लाभ, आनंद, उल्लास जैसी अनुभूति होती है.
_ अब न शिकवा, न गिला, न इंतज़ार न उम्मीद ..किसी चीज़ की जरूरत ही नहीं महसूस होती है..
_ अक्टूबर से फरवरी मेरा मौसम होता है,
_ तन के करीब, मन के करीब और जीवन के करीब ..
_ जब मैं अधिक जीवंत और अधिक खुश रहता हूं..
_ हर चीज़ के प्रति कृतज्ञ, हर चीज़ के प्रति प्रेम से भरा..
_ गर्मी मुझे नापसंद, इस मौसम में ..मैं जीवित नहीं रहता हूं, बस जीने का अभिनय करता हूं..
सुबह-सुबह खिले हुए फूल मुझे तेरी याद याद दिलाते हैं..
– सूर्य की चमक की पहली किरण के साथ तुम कितने सुंदर दिखते हो ;
_ मुझे आश्चर्य होता है कि ..मैंने कभी तुम्हारे सुबह के लुक की प्रशंसा कैसे नहीं की,
_ जबकि तुम बिल्कुल स्वाभाविक थे, सुंदर बनने की कोशिश नहीं कर रहे थे..
_ इस अनभिज्ञ दृष्टि ने मुझे झकझोर कर रख दिया कि.. भले ही मुझे पता नहीं हो कि अपना दिन कैसे बिताऊंगा,
_ फिर भी तू मुझे अपने साथ चाहता है.
_ ‘अपने दिन में एकमात्र चीज’ मैं इन पलों को बार-बार जीने में भाग्यशाली महसूस करता हूँ.
_ और मैं उन्हें फिर से जीने के लिए कुछ भी करूंगा, भले ही इसके लिए मुझे ऐसा व्यक्ति बनना पड़े..
_जो दुनिया की पहुंच से बाहर हो ..लेकिन हमेशा तेरे पास हो.
_ क्योंकि मुझे पता है ..तुम चाहोगे कि मैं तुमसे ऊपर रहूँ, जैसा कि तुमने हमेशा किया है.
— इसीलिए फूल मुझे तुम्हारी याद दिलाता है;
_ उन्हें कभी इसकी परवाह नहीं होती कि.. उनकी पत्तियाँ उनके ऊपर हैं,
_ क्योंकि अंदर से वे नहीं जानते थे कि.. यह उनके अपने भले के लिए है.
_ यह उन्हें सूरज की तेज़ किरणों से बचाने के लिए है;
यह सब उनके लिए ढाल बनने के बारे में है.
_ ठीक वैसे ही जैसे मैं तुम्हारे लिए था !!
आज सुबह 5:30 बजे पछियों की आवाज से मेरी आंख खुली..
_ मुझे लगा की ये मुझे बुला रहे हैं, बुला क्या चिढ़ा रहे हैं.
_ और उठकर देखा तो वे इस डाल से उस डाल डोल रहे थे,
_ यूँ लगा जैसे मुझसे कह रहे हों.. ठंड लग रही है क्या ? चाय बनवाऊं.? साथ में बिस्किट भी खा लेना..
_ यही तो है आप इंसानों का…
_ हमे देखो, न कफ़ न बलगम, न जोड़ों का दर्द न सांस फूलने की बीमारी, न पकाने का झमेला न स्वाद की चाहत…
— जाओ.. दिवाली आने वाली है,
_ फिर दिखावे करना..
_ हमारी न ईद न दिवाली… हमारे सिर्फ मौसम त्यौहार हैं,
_ जो असल में ईश्वर ने बनाए हैं.
_ जीवन आपसे कम है पर सुकून है.
_ हमने न सड़क बनाई न मशीनें, न जहाज.
_ शायद हमें जरूरत ही नहीं.
_ हमारे पास पासपोर्ट भी नहीं.
_ हमे किसी की इजाजत भी नहीं चाहिए.
—- वास्तव में उनकी की बातों में सच्चाई है.
_ इंसान ने विकास कर सब बर्बाद कर दिया.
_ परिंदों को न गठिया है न इन्हें स्ट्रोक आता है, और आता भी होगा तो इल्म नहीं.
_ हमने जान कर क्या उखाड़ लिया.
_ लालच बढ़ा, बीमारी बड़ी, समस्या बढ़ी, ईगो बढ़ी, प्रभुत्व बढ़ा… पर हमने अपनी स्वच्छंदता खो दी.
_ हमने अपना मूल खो दिया.
_ अब हम केवल जो सामान बनाया था, उसी को निभा रहे हैं.
_ पहले बीमारी बनाई, फिर उसका इलाज बनाया.
_ अब उस इलाज को अपना विकास बता रहे हैं..!!
आज सुबह उठा तो बाहर अँधेरा है ..पर बिल्कुल अंधेरा भी नहीं है.
_ लग रहा था हवा शीत और पारदर्शी है ..एकदम हल्की फूल जैसी..
_ बॉलकनी में खड़ा हूँ तो ठंडी हवा देह को छूती है और ऐसी मीठी सी सिहरन होती है..
_ जिसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता..
_ बिना चिंता, बिना किसी तनाव के बॉलकनी से ठंड को महसूस करते हुए आसमान में धुंधले से दिखते तारों को देखते हुए सोचता हूं कि ..आख़िर सुख क्या है !!
_ इस मीठी, शीतल, निर्भार हवा में चुपचाप आकाश ताकना …क्या सुख नहीं है !
_ ..याकि अलग अलग फूलों की गंध को पहचानने की कोशिश करना सुख नहीं है !!
_ गंध की लिपि को आँखें बंद करके ही पढ़ा जा सकता है,
_ क्योंकि खुली आँखें तो रंग की लिपि में उलझ जाती हैं..
_ आस-पास लगे हजारों पेड़ों की गंध, उसके फूल पत्तों की गंध..
_ सारी गंध एकसाथ गड्ड मड़्ड होकर ..मन को सुख में डुबा देती हैं…,
— मन खुश है, संतुष्ट है, निहाल है,,,
_ क्योंकि यह उसके मन को भाने वाला मौसम है..
_ यह सर्दी का मौसम है…
ये सुबह होते ही नींद का खुल जाना,
_ कई ख्याल मंडराने लगे हैं दिल में,
_ वो ख्याल जो मुझे हर रात सपनों में जगाते रहते हैं…
_ ये घड़ी की टिक-टिक…जो सिर्फ रात को ही सुनाई देती है..
_ ये अँधेरा मुझे वक़्त का एहसास कराता है,
_ और मेरे और आपके बीच की दूरियां..
_ जहाँ मुझे सब कुछ सामान्य दिखता है,
_ जैसे सब आसपास ही घटित हो रहा है,
_ और वो बाहर खिड़की, जहां मेरी नजर अभी अभी गई है,
_ वहां से बहती हुई हवा ..कुछ समझा रही है मुझे..
_ कि किसी को जीवित रखना ..सिर्फ मेरा काम नहीं…
_ तुम्हारा भी योगदान होना चाहिए…
सुबह का जादू हकीक़त है, छलावा नहीं है..
_ ये खूबसूरत और मनमोहक है..
_ मैंने देखा है और महसूस किया है..
_ कि वाक़ई सुबह बेहद हसीन होती है,
_ मैंने महसूस किया है सुबह का स्वाद..
_ सब से आला और निराला होता है,
_ सुबह की हलचल एक अलग दुनियां का एहसास कराता है,
_ मैंने देखा है कि सुबह अपनी जेब में ज्यादा ही ताज़गी रखता है..
_ ये जो प्रकृति है ..ये हर पल जादू कर रही है,
_ ये हर पल अपनी खूबसूरती को और निखार रही है,
_ आपको हर पल बदलते हुए नजारे मिलते हैं,
_ हर जगह अपने आप में खूबसूरत है.. ये जादू है,
_ मैं हर वक्त इस जादुई दुनियां से घिरा रहना चाहता हूं,
_ इसमें जीना चाहता हूं.!!
” सुबह का जादू”
_ अब सुबह हो गई है, मगर यह सुबह धुंध लिपटी हुई है,
_ उजाला फैला तो सही, मगर उसकी ठंडक में सुकून है,
_ हवा कितनी सुंदर, कितनी शीतल है एकदम पारदर्शी और निर्भार..
_ दुआर पर सूखे पत्तों की कालीन बिछी है,
_ हवा के एक झोंके ने.. उन्हें उस डाल से बिलगा दिया.. जहां उनका जन्म हुआ था..
_ और चिड़ियों का इतना बोलना, लगता है ये आपस में बातें करती होंगी..
_ घासों की नोक पर ओस की बूंदे ऐसी ठिठकी हैं.. जैसे आंखों की कोर में ठहरे आँसू.. चमकती हुई, झिलमिलाती हुई..
_ अभी बस सूरज की किरणें निकलेंगी और इन बूंदों को अपने आंचल से पोंछ देंगी..
आज फिर सुबह हो गई..
_ हर रात यही सोचते बीत जाती है कि आखिर ‘मैं यहां क्यों हूं’
_ ज़िंदगी जैसे एक पुरानी, घिसी हुई फिल्म बन गई है,
_ जिसे देखने का मन नहीं करता, लेकिन रुक भी नहीं सकता !!
_ सुबह हो चुकी है..
_ बाहर लोग अपने-अपने काम में लग गए हैं,
_ लेकिन मैं अंदर ही अंदर कहीं अटका हुआ हूँ.
_ शायद खुद से, या शायद उस सवाल से जो हर सुबह मुझे घूरता है..
_ “आगे क्या ?”
सुबह हो गई है,
_ मैं एकांत में शांत बैठा हूँ और हर तरफ बस सन्नाटा है,
_ तभी दिमाग में कोई अनचाहा विचार आ गया, मैंने उसे पूरी शक्ति से भगाना चाहा और वो दोगुनी ताकत से मुझ पर हावी होता है,
_ मैं जब ऐसी बुरी स्मृति को भुलाना चाहता हूँ, और वो सब सामने ऐसे नाचता है..
_ जैसे आज की ही बात हो..
_ अंदर भावनाओं का भूचाल आ जाता है.. हृदय कचोटने लगता है..
_ उस बुरी स्मृति से निकलने की कई सालो की कोशिश क्षण भर में व्यर्थ हो जाती है, खैर !!
मैंने आज सुबह को महसूस किया, आरामदायक लेकिन ठंडा..!!
_ मैं कामना करता हूं कि यह हमेशा ऐसा ही बना रहे, क्योंकि मुझे इसी की जरूरत है.
_ मुझे एक शांतिपूर्ण जगह की जरूरत है,
_ जहां मैं अपना दिमाग बंद कर सकूं और जब चाहूं सो सकूं..
_ मैं जागकर.. लोगों में शांति की तलाश नहीं करना चाहता.
_ बहुत हो गया; मैंने यह किया है; यह मेरे लिए अच्छा नहीं है.
_ तो चलिए.. बस मैं तुम्हारी इतनी प्रशंसा करूंगा, जितनी पहले कभी किसी ने नहीं की.
_ लोग कहेंगे या तो मैं पागल हूँ या सुबह से प्यार करता है.
_ कोई भी सच हो सकता है.
_ आइए एक-दूसरे का ख्याल रखने और एक-दूसरे की शांति बनने के बारे में एक समझौता करें..!!
सुबह की पहली किरण जब आंखों में पड़ती है, तो सबसे पहले मैं सांस लेता हूं…फिर मुस्कुराता हूं.!
_ कारण ? बस इतना कि मैं हूं… मैं ज़िंदा हूं.
_ रात और सुबह के बीच एक पतली-सी डोर होती है, जो सबको पार नहीं करने देती.
_और मैं… खुली आंखों से यह नया दिन देख पा रहा हूँ.
_ क्या यह किसी चमत्कार से कम है ? “नहीं”
_ यह तो रोज़ मिलने वाला एक अनमोल तोहफ़ा है, जिसे हम अक्सर खोलना ही भूल जाते हैं
_ मैं चारों तरफ देखता हूं – कोई अपना दिख जाए तो उसकी तरफ मुस्कुराहट भेज देता हूं.
_ क्योंकि पता है, एक दिन आएगा जब या तो मैं नहीं रहूंगा, या वो नहीं रहेंगे.
_ उस दिन की उदासी से बचने का एक ही तरीका है, आज के साथ को पूरे दिल से जीना.
_ बाहर पेड़ों पर ओस टपक रही होती है,पत्तों पर हल्की धूप खेल रही होती है.
_ ये भी कल रात सोए थे, और आज मेरे साथ उठे हैं.
_ जीवन हर सुबह हमें चुपचाप यह कहता है, तुम्हारे पास एक और दिन है.
_ प्यार करने का, गले लगाने का, धन्यवाद कहने का, और हां… मुस्कुराने का..
_ कुछ नया सीखने का, अपने काम को कल से थोड़ा और बेहतर करने का,
_ और अपने सपनों को हकीकत के एक कदम और करीब लाने का।
_ क्योंकि एक दिन ऐसा भी आएगा,
_ जब सुबह तो होगी… लेकिन हम नहीं होंगे.
_ इसलिए आज का दिन पूरे दिल से जी लो, जैसे यही तुम्हारी आख़िरी सुबह हो.!!
“सुबह खूबसूरत है” उठो, खिलो, चहचहाओ, जीवन एक भोर है.!
_ आसमान से खुशनुमा हवा आ रही है और इसे महसूस करते हुए..
_ मुझे फिर से बचकाना होने की याद आती है.
_ जब तुम नहीं होते तो.. मैं नहीं हंसता.
_ ऐसा नहीं है कि मेरे आसपास लोग नहीं हैं; वे हैं.
_ लेकिन मुझे उनके साथ अच्छा नहीं लगता;
_ शायद मैं उनके साथ जीवित महसूस नहीं करता.
_ मुझे तुम्हारे आसपास रहने की याद आती है,
_ जहां हम बिना घड़ी या विषय पर ध्यान दिए.. घंटों तक लगातार बात करते हैं.
_ हमारी बातें अनावश्यक हैं, लेकिन वे जीवन से भरपूर हैं.
_ तुम्हारी मौजूदगी में “मैं अकेले अपने साथ का आनंद भी उठाता हूँ,”
_ इस एहसास के साथ कि तुम यहां हो.!!
_ अब, मैं सब कुछ सिर्फ इसलिए करता हूं.. क्योंकि यह आवश्यक है;
_ कुछ भी करने में कोई मज़ा नहीं है. हर चीज़ समय की बर्बादी लगती है.
“मुझे नहीं पता कि यह कैसे काम करता है,
_ लेकिन मुझे लगता है कि मैं खुद से ज्यादा ‘सुबह’ और ‘आकाश’ से जुड़ा हुआ हूं.”
मैं आज सुबह ऐसी जगह बैठा हूं:
_ जो हर सुबह और शाम पक्षियों के गायन को सुनने के लिए बहुत शांत है.
_ एक ऐसी जगह जो मौसमों से भरी है, और मैं उनमें से हर एक के साथ खुद रह सकता हूं.
_ मैं बहुत ठंडी हवा के साथ अपनी सर्दियों का आनंद ले सकता हूं और फिर भी हर दोपहर सूरज देख सकता हूं.
_ एक ऐसी जगह.. जहां मैं कभी भी, हर समय आकाश देख सकता हूं, और यह हमेशा की तरह सुंदर है.
_ एक ऐसी जगह.. जहां मुझे रोजाना चंद्रमा देखने को मिलता है,
_ यह एक ऐसी जगह है, जहां मुझे ख़ुशी ढूंढने के लिए भागना नहीं पड़ता;
_ वरना हर जगह हर कोई आता है और पूछता है कि.. मैं जीवन में क्या कर रहा हूं.
_ एक ऐसी जगह.. जहां मैं अपनी सुबह का उतना ही आनंद ले सकता हूं,
_ जितना मैं अपने दिन या रात का आनंद ले सकता हूं.
_ एक ऐसी जगह.. जहां मुझे हर शाम खूबसूरत सूर्यास्त देखने को मिलता है.
_ एक ऐसी जगह.. जहां मुझे भागदौड़ या कुछ न कुछ करना नहीं पड़ता.
_ बस बैठ सकता हूं, कुछ नहीं कर सकता और जीना चुन सकता हूं.
_ एक ऐसी जगह.. जो मेरे द्वारा देखी गई दुनिया से भी अधिक जीवंत है.!!
अभी सुबह होने वाली है, हुई नहीं है..!!
_ बालकनी के बाहर बल्ब की रोशनी में आस-पास का धुंधला दिख रहा है..
_ लेकिन मन में उजाला है.!
_ इस समय घरों में सब गहरी नींद सो रहे हैं, रब उनकी सुबह सुंदर करे.
_ अभी थोड़ी देर बाद सूरज दिखेगा.. और आंखें चमक जाएंगी,
_ अभी मन शांत है, बालकनी से आने वाली रोशनी और अंधेरे का खेल देख रहा हूँ.
_ पीठ हजार करवट सोते जागते थक चुकी है..
_ अब आँखों को ठंडक चाहिए.!!
_ आसमान से ओस झर रही है, हवा में ठंडक है..
_ आस-पास के दीखते पेड़ आश्वस्त कर रहे हैं.
_ अब मैं हूँ जमीन पर और मन आसमान पर..!!
सुबह-सुबह धरती पर सूर्य की किरणें बिखर रही हैं,
_ प्यासे पेड़-पौधों पर ओस की बूंदें टपक रही हैं,
_ पत्तियों पर ओस थिरक रही है..
_ चहुं ओर हरियाली महक रही है..
_ बहती हवा में रुनझुन सुनाई दे रही है..
_ डगमगाते मन में उम्मीद भर रही है..
_ याद दिला रही है ‘जीओ मस्ताना जीवन’
_ जी लो अपने आज को, अपने हासिल को..
_ अपना जीवन समझ, जी भरकर जी लो..
_ क्योंकि यह पल, हर पल न रहेगा..!!
**आज सुबह ठंड बहुत है..
_ मैं बालकनी में गया तो लगता है.. हवा जमा देगी मुझे,
_ लेकिन मेरे अन्दर का अलाव अचानक से दहक उठता है..
_ और मन करता है.. कोई जीवन भर की चुप्पी मुझमें उतर जाए..
_ बस किसी से कुछ भी न कहूं, कोई शिकायत न करूं, न किसी बात का रोना मुझे छूकर गुजरे..
_ तो मैं इस भाव से चुप बैठा रहूँ, कोरा और भावना शून्य हो जाऊं.!
_ अपनी नसों में उबलते हुए खून को, मस्तिष्क में दौड़ते हुए सवालों को और पैर में पड़ी जंजीरों को महसूस कर ही न पाऊँ.!!
_ अपने ज्ञान का पूरा भंडार खाली कर दूं,
_ बन जाऊं एक प्राण रहित-भाव रहित पत्थर का टुकड़ा..!!
आज सुबह हल्की-हल्की बारिश हो रही है,
_ सामने बादलों का झुंड दिख रहा है तो धुंधलका और बढ़ गया, कुछ साफ नहीं दिख रहा..
_ बारिश की बूंदों से मुझे परहेज नहीं, गालों पर बूंद के छींटे का अहसास हो रहा है..
_ बादलों की गड़गड़ाहट से मौसम में संगीत का एहसास हो रहा है..
_ मुझे भीगना पसंद है, ठंडे हाथों से चेहरे को पोंछने में अच्छा लगता है..
_ गीले पैरों से सामने न दिखते पहाड़ पर जाने को जी करता है..
_सर्द हवा, वो मसाला चाय… मेरे पास कुछ और वक्त होता तो यहीं रुक जाता..!!
“सुबह के गतिशील रंगों का संयोजन”
[“Combination of dynamic colors of the morning”]
… मानो रब आसमान के कैनवास पर हर रोज़ नया चित्र बनाता है.. हमको विस्मित करने के लिए !;
_ आसपास का सन्नाटा ऐसा लगता.. मानो सब कुछ थम गया हो और सिर्फ फुसफुसाहट सुनाई दे रही है..
_ मैं इतना हल्का महसूस कर रहा हूँ कि.. फुसफुसाहट धीमे स्वर में सुनाई दे रही है.. और बहती हवा में जैसे एक मिठास हो..!
_ ऐसा लगता है.. जैसे धरती और आकाश ने दूरियां मिटाकर एक-दूसरे को समेट लिया हो..
_ जब हम अच्छा महसूस करते हैं, तो शब्द कम पड़ जाते हैं ; आंखें भाषा बन जाती हैं.!!
मैं जब सुबह – सुबह नींद से जागता हूँ तो.. जो पहली याद जेहन में उभरती है वो ‘सुबह’ ही होती है.
_ वक्त बदल गया, हालात बदल गए, इंसान बदल गए, पर सुबह अब भी नहीं बदली.
_ ‘सुबह’ अब भी पहले की ही तरह हर सुबह आती है.
_ मैं बालकॉनी के बाहर पेड़- पौधों पर फुदकती -चहचहाती चिड़ियों को निहारता रहता हूँ.. एक ख़ालीपन लिए.!!!
_ ‘सुबह’ मेरे पूरे जेहन में उतरकर खुशियाँ बिखेर देती है और एक मधुर एहसास से भर देती है..
_ ‘सुबह’ एक तुम्हीं तो हो.. जो हर हालात में हर जज्बात में और हर खयालात में साथ बनी रहती हो..!
_ मैं आगे बढ़ता रहा और कितना कुछ जिंदगी से गुजरता चला गया,
_ लेकिन तुम आज भी पूरी शिद्दत से मेरे साथ चल रही हो..
_ सुबह ने मेरी कितनी ही यादों को तह लगाकर मेरे अंदर समेट रखा है..
_ ना जाने कितनी मुलाकातें तुमने मुझमें दर्ज की हैं.
_ कैसे भूल सकता हूँ उन पलों को.. जब अपने एकांत से मैं थक जाता हूँ या परेशान हो जाता हूँ,
_ तब ‘सुबह’ मुस्कुराती हुई आती है और हौले से मेरे कानों में कहती है – पगले, परेशान क्यूँ होते हो ,मैं हूँ ना..!!!
_ “सुबह’ जिंदगी के अनगिनत पलों के ना जाने कितने एहसासों को मैंने तेरे संग जिया है.
_ कहने को तो बहुत कुछ है तुम्हारे बारे में.. लेकिन बस इतना कहूँगा सुःख हो या दुःख तुम हमेशा साथ रहना,
_ चुपके से सच्चे साथी की तरह एहसासों को समेटती रहती हो !!
बीते साल की उदासी आज नए साल की सुबह में उतर आई है,
_ मानों वह गुजरना ही नहीं चाह रहा हो.!
_ मन बीते साल की उदासी में खो कर ना जाने कहां भटक जाता है.
_ आज नए साल के आने पर लगता है कि..
_ जिन्दगी ने जो एकमुश्त एक साल दिया था, वह खत्म हो गया है।
_ बाहर कोहरा अपनी बाहें फैलाकर दिन के उजाले को ढ़क लेना चाहता है,
_ बाहर सबकुछ बदल रहा है, हवाएँ सर्द होती जा रही हैं और धूप नर्म..
_ मौसम की सर्द रातें लम्बी हो चली हैं..
_ ये लम्बी राते उस बुढ़ापे की तरह होती हैं, जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेता..
_ दिन जवानी के दिनों की तरह सिमटता जा रहा है..
_ जिन्दगी मे उतार पर तो रिश्ते की गर्माहट भी कमजोर होने लगती है और भावनाएं जम कर ठहर सी जाती हैं.
_ प्रकृति बदल रही है, लेकिन मन ठहरा है.
_ ऐसा लगता है जैसे.. मुझे नया या पुराना जो भी साल हो.. इस से कोई लेना देना नहीं है.
_ जिसने जीवन की नश्वरता को स्वीकार कर लिया हो..
_ बीतता साल प्रतीक है उतरान का, ढ़लान का, अवसान का..
_ जीवन के पड़ाव पर ठहर कर आगे बढ़ने का संकेत है..!!
—- कुछ भी नया नहीं लगता..!!!
_ और ना ही लगता है कि अरे ये क्या हुआ कैसे हुआ,
_ मन पीड़ाओं और तमाम सुखों की अनुभूतियों से ऊपर उठकर उपेक्षा के गर्त में इस कदर डूब चुका होता है कि..
…. ना ही यह चौंकता है ना ही आतंकित और ना ही अचंभित, बस जो भी है अच्छा है.!!
मुझे ढलता हुआ सूरज बहुत पसंद है,
_ आसमाँ में दूर तक फैली हुई लालिमा आँखों को सुकूँ से भर देती है,
– इसे देख कर ऐसा लगता है जैसे शाम ने दिन भर की थकान से खामोशी की चादर ओढ़ ली हो
— ताकि.. फिर सुबह किसी सूरजमुखी के फूल जैसे खिल सके…!!
देर से उठकर सुबह को छोटा मत करो, या उसे अयोग्य कामों या बातों में बर्बाद मत करो; _ इसे जीवन की सर्वोत्कृष्टता के रूप में, कुछ हद तक पवित्र के रूप में देखें.
_शाम बुढ़ापे की तरह है: हम सुस्त, बातूनी, मूर्ख हैं. _ हर दिन एक छोटा सा जीवन है: हर जागता और उठता हुआ एक छोटा सा जन्म, हर ताज़ा सुबह एक छोटी सी जवानी, हर आराम और नींद के लिए जाता हुआ एक छोटी सी मौत.- Arthur Schopenhauer
Do not shorten the morning by getting up late, or waste it in unworthy occupations or in talk; look upon it as the quintessence of life, as to a certain extent sacred. Evening is like old age: we are languid, talkative, silly. Each day is a little life: every waking and rising a little birth, every fresh morning a little youth, every going to rest and sleep a little death. – Arthur Schopenhauer
पक्षियों की चहचहाहट और हवा की फुसफुसाहट के साथ जागना हमेशा सुखदायक होता है, जब आप जागते हैं तो आप कैसे जागते हैं ? क्या आप मौन में जागते हैं, या क्या आप प्रश्नों और करने वाली चीजों की एक सूची के साथ जागते हैं ?
जागने के बारे में मुझे जो सबसे खूबसूरत चीज पसंद है, वह है इससे निकलने वाली खामोशी ; सुबह में, मेरे पास कोई प्रश्न या कोई खोज नहीं है; इसलिए, मैं हमेशा इस क्षण में हूं.
सुबह हमेशा इस बात की याद दिलाती है कि मैं अपनी प्राकृतिक अवस्था में कैसा हूं ; _ अक्सर जब मुझे नहीं पता कि क्या करना है, तो मैं सुबह के क्षण में खुद के बारे में सोचता हूं, और उस शांति की स्थिति से, मुझे हमेशा एक प्रतिक्रिया मिलती है जो सांस लेने या हवा के रूप में स्वाभाविक होती है ;
सुबह हमेशा एक गहरी, अधिक वास्तविक स्वयं की भावना में प्रवेश करने का अवसर बनाती है ; _ तो, इस तरह सुबह की शुरुआत हुई..
जिनको गहरी नींद नहीं आती वो समझ पाते हैं कि दुनिया में सुबह से अच्छा कुछ होता ही नहीं.!!
आप जिस तरह से अपने दिन की शुरुआत करते हैं, उससे आपके बाकी दिन पर बहुत फर्क पड़ता है.
_सुबह जल्दी उठने और सुबह अच्छा मूड रखने से आप पूरे दिन खुश महसूस करेंगे ;
_ भोर की शांति आपके दृष्टिकोण में अद्भुत आकर्षण का भाव ला सकती है.
_ भोर दिन का सबसे सुंदर और शांत समय होता है ; जैसे ही सुबह की हवा आपके चेहरे पर आती है, पक्षियों की गुनगुनाहट सुनने की शांति और दुनिया को रोशनी से भरते देखना आत्मा में एक अकथनीय आशा और शांति लाता है.
_ “सुबह की रोशनी दिन भर के काम के लिए आपकी भावना और उत्साह को नवीनीकृत कर देती है.”
_ “भोर एक नए और आशापूर्ण दिन को जन्म देते हुए चमकती है.”
_ “भोर सभी के लिए एक ताजगी लेकर आती है.”
रात चाहे कितनी भी लंबी क्यों न हो,
_ सवेरा एक वादा निभाता है.. फिर से लौट आने का.!!
चटख सुबहों के बाद मटमैली दोपहरें भी देखने की आदत डाल लेनी चाहिए दिल को.!!
| Mar 14, 2014 | My Favourite Thoughts, सुविचार
प्रकृति स्वागत करते हुए हमारी ओर बढ़ती है, और हमें उसकी सुंदरता का आनंद लेने के लिए कहती है; लेकिन हम उसकी चुप्पी से डरते हैं और भीड़ भरे शहरों में भाग जाते हैं, _वहां एक क्रूर भेड़िये से भागती भेड़ों की तरह छिपने के लिए.!!
Nature reaches out to us with welcoming arms, and bids us enjoy her beauty; but we dread her silence and rush into the crowded cities, there to huddle like sheep fleeing from a ferocious wolf. – Khalil Gibran
यदि हम पृथ्वी को बर्बाद कर देंगे तो जाने के लिए कोई जगह नहीं बचेगी.
अगर हम पृथ्वी के लिए नहीं बोलेंगे तो कौन बोलेगा ? यदि हम अपने अस्तित्व के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं, तो कौन होगा ?
If we ruin the earth, there is no place else to go.
If we do not speak for Earth, who will ? If we are not committed to our own survival, who will be ?- Carl Sagan
आज लोग भूल गए हैं कि वे वास्तव में प्रकृति का ही एक हिस्सा हैं.
_ फिर भी, वे उस प्रकृति को नष्ट कर देते हैं, जिस पर हमारा जीवन निर्भर है.
_ वे हमेशा सोचते हैं कि वे कुछ बेहतर बना सकते हैं… वे यह नहीं जानते, लेकिन वे प्रकृति को खो रहे हैं.
_ वे यह नहीं देखते कि वे नष्ट होने वाले हैं.
_ इंसान के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है साफ़ हवा और साफ़ पानी.!!
People today have forgotten they’re really just a part of nature.
Yet, they destroy the nature on which our lives depend.
They always think they can make something better… They don’t know it, but they’re losing nature.
They don’t see that they’re going to perish. The most important things for human beings are clean air and clean water. – Akira Kurosawa
प्रकृति एक स्व-निर्मित मशीन है, जो किसी भी स्वचालित मशीन से भी अधिक पूर्णतः स्वचालित है.
प्रकृति की छवि में कुछ बनाने का मतलब एक मशीन बनाना है, और प्रकृति की आंतरिक कार्यप्रणाली को सीखकर ही मनुष्य मशीनों का निर्माता बना.
Nature is a self-made machine, more perfectly automated than any automated machine.
To create something in the image of nature is to create a machine, and it was by learning the inner working of nature that man became a builder of machines. – Eric Hoffer
“पूरी पृथ्वी एक है – और मैं उससे अलग नहीं हूँ.
_ शब्द सीमित हो सकते हैं, पर यह जुड़ाव असीम है.”
– मुझे दुनिया से जुड़ने के लिए भाषा नहीं चाहिए, मैं पहले से ही उसका हिस्सा हूँ.
_ मैं कोई विदेशी भाषा नहीं बोल पाता, फिर भी मेरे भीतर यह गहरी अनुभूति है
कि पूरी पृथ्वी एक है – और मैं उससे अलग नहीं हूँ.
_ यह धरती मेरी है, और मैं इस धरती का हूँ.
_ शब्द सीमित हो सकते हैं, पर यह जुड़ाव असीम है.!!
ख़ुद को बचाना है तो प्रकृति के क़रीब रहिए वर्ना एक दिन इंसान पत्थर बन जाएगा.
_ आप कहीं भी कुछ भी कर रहे हों स्वयं को प्रकृति से जोड़े रखिए.
_ पौधों से बातें कीजिए, फूलों की सुगंध लीजिए, हरी पत्तियों की मुस्कुराहट देखिए, तितलियों की चंचलता निहारिए, हवाओं का स्पर्श महसूस कीजिए,
_ जो अच्छा लगे कीजिए किन्तु दिनचर्या के एक हिस्से में प्रकृति के सान्निध्य को स्थान दीजिए.
_ आने वाले समय में सुकून का एक मात्र यही एहसास आपको जीवंत रखेगा.
नोट -मेरे कमरे के बाहर मौजूद फूल, पत्तियां, तितली, गिलहरी, चिड़ियाँ सुबह – सुबह मुझे देख मुस्कुराते हैं और मैं आनंद में डूब जाता हूं। मेरे कमरे में झाँकती प्रकृति रोज सुबह आवाज़ लगाती है – अरे उठो यार, देर हो रही……….
– Anand Sharma
प्रकृति अपने रिक्त स्थान स्वयं भरना जानती है.
_ पिछले तीन साल से मैं अपने गाँव में देखता आ रहा हूँ कि भारी बारिश आते ही हालात किस तरह बदल जाते हैं.
_ इसलिए गाँव में भी यह समझने की जरूरत है कि प्रकृति के प्राकृतिक रास्तों और बहाव क्षेत्रों से छेड़छाड़ हमेशा सही नहीं होती.
_ प्रकृति जब अपना रास्ता चुनती है, तो उसे रोकना आसान नहीं होता.!!
– Nirarthak Nirarthak
”पर्यटन स्थलों के व्यापारीकरण और वहां बढ़ती भीड़ ने सब जगह _ऐसी बदसूरती फैला दी है कि _अब प्राकृतिक सौंदर्य कहीं नहीं बचा, केवल प्रसिद्धि बच गई है _जिसे देखने के लिए लोग उमड़ पड़ते हैं.”
—इससे आगे की बात और भी ज़ोरदार है: सैलानियों को देखकर ऐसा लगता है _जैसे वे घर से ‘मार्केटिंग’ करने के लिए निकले हैं _या फिर खाने-पीने;__ प्रकृति का सौंदर्य देखने तो कतई नहीं.”
हम अपने घरों में कभी कचरा नहीं डालते या जोर से कुछ नहीं करते, लेकिन जैसे ही हम सड़कों पर निकलते हैं,
_ ऐसा लगता है _ जैसे हमारे पास हर खूबसूरत चीज को बर्बाद करने का लाइसेंस है !!
_ हमें चार दीवार वाले घरों के विचार से विकसित होना चाहिए, जहां हम रहते हैं _ और जिसे हम साफ़ और खूबसूरत रखते हैं..!!
_ जब तक हमें यह पृथ्वी अपना घर नहीं लगता _ तब तक हम इसे प्रदूषित करना बंद नहीं करेंगे.!!!
प्रकृति के द्वारा बनाए गए संतुलन को बिगाड़ने की कोशिश की जाने पर प्रकृति की प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है,
_ दूसरी तरफ इंसान खुद की जिम्मेदारियों को भूलता जा रहा है कि उसे क्या करना चाहिए,
_ असंतुलित निर्णय केवल समस्याओं का द्वार खोलते हैं, खुशहाली और भलाई का नहीं.!!
इंसान ने कभी सोचा भी नहीं था कि पहाड़ों और मैदानों में नदियों- नालों के लिए जगह न छोड़ना इतना महंगा साबित होगा.
_ सबसे पहले, प्रकृति को रास्ता देना चाहिए था.. लेकिन हम खुद ही उसके रास्ते में आ गए और जम कर बैठ गये हैं.
_ प्रकृति बचाओ, खुद को बचाओ.!!
बुद्धिमान व्यक्ति अस्तित्व या किसी से भी महत्व की माँग नहीं करता.
_ वह बस उसका हिस्सा बन जाता है..!!
“प्रकृति के बीच बिताया गया समय कभी व्यर्थ नहीं जाता, वह चुपचाप हमें वापस हमसे मिला देता है.”
सृष्टि अजीब है बहुत, इंसान सबसे बेहतर प्राणी ! क्या सच में !
_ या इंसान सबसे बदतर प्राणी ??
मनुष्य को छोड़कर संपूर्ण अस्तित्व नृत्य कर रहा है.
_ संपूर्ण अस्तित्व अत्यंत सहज गति में है ; गति तो निश्चित रूप से है, पर वह पूर्णतः सहज है.
_ वृक्ष बढ़ रहे हैं, पक्षी चहचहा रहे हैं, नदियाँ बह रही हैं, तारे गतिमान हैं : सब कुछ अत्यंत सहजता से चल रहा है.
_ न कोई हड़बड़ी, न कोई चिंता, न कोई अपव्यय..- सिवाय मनुष्य के.
_ मनुष्य अपने मन के वश में हो गया है.!!
प्रकृति जो बहुत सुंदर है, पर हम सब अपने दुःख अपनी उदासी में इतने खो गए हैं कि कुछ देख ही नहीं पाए,
_ उगता सूरज, ढलती शाम, आसमाँ में खिलता चाँद, कल-कल करती नदियाँ, कुछ नहीं,
_ बस अपने दुःखों में दब गए और उनके साथ ही यहां से विदा हो जाएँगे..!!
दुनिया को विज्ञान कितना भी विकसित और सुखद बना दे,
_ लेकिन मानसिक शांति आज भी प्रकृति की गोद में ही मिलती है.
प्रकृति ने सबसे ज्यादा सोचने समझने की शक्ति मनुष्यों को दी है,
_ लेकिन अफ़सोस की हम उसका इस्तेमाल ही नहीं कर रहे.!!
धरती का अर्थ है साधारण होना ; यहाँ कोई विशेष नहीं है.
_ यह सभी लोगों का स्थान है.!!
हमारी नजरों से परे इस बोझिल सी दुनियां में हमारे आसपास कितना कुछ खूबसूरत सा घटित होता रहता हैं… बस ज़रूरत है हमारे ऑब्जर्वेशन की ..!;
हमें शांति कहीं न कहीं कुदरत की आयमो में ही मिलती है,
_ हम फ़िज़ुल ज़रूरत हो या देखा देखी में फंस गए हैं.
_ शांति अकेले या अपने भीतर होने में ही मिलती है.!!
पहाड़ पर रहने का मन, समंदर किनारे टहलने की चाहत,नदी किनारे पांव डालकर बैठने की इच्छा..
_ दुनिया में इतना सब बनाने के बावजूद इंसान को सबसे ज़्यादा खुशी उन्हीं चीज़ों से, मिलती है जो
प्रकृति ने पहले से दे रखी हैं.!!
नेचर के बीच समय बिताने से सिर्फ तनाव ही दूर नहीं होता बल्कि आपके दिमाग का भी विकास होता है,
इसलिए दिन का क़ुछ समय नेचर के बीच बिताएं.
प्रकृति की तरह सरल और सादे बने रहने का लछ्य रखें ; सादगी ही उसका जीवन है, _
_ प्रकृति के साथ सामंजस्य की अवस्था में आने के लिए हमें अपनी जटिलताओं को पूरी तरह से समाप्त करना होगा.
यदि आप नेचर के करीब रहेंगे, तो इसकी सादगी के लिए, छोटी-छोटी चीजों के लिए जो शायद ध्यान देने योग्य हैं, तो वे चीजें अप्रत्याशित रूप से महान और अथाह बन सकती हैं.
-“प्रकृति के संपर्क में रहने से आपको अपने अंदर आशा खोजने में मदद मिल सकती है.”
प्रकृति में हर ओर आनन्द ही आनन्द फैला पड़ा है, लेकिन हमारा ध्यान..
_ केवल अपने अभावों और दूसरों की समृद्धि पर लगा रहता है.
एक इंसान के अलावा बाकी सारी चीजें वैसी ही हैं.. जैसी वे दिखती हैं..!!
प्रकृति ने सिर्फ दो ही विकल्प दिए हैं या तो देकर जाऐं या फिर छोड़कर जाऐं, साथ ले जाने की कोई व्यवस्था नही है.!!
जब हम अप्राकृतिक जीवन जीने लगते हैं तो कई मानसिक रोगों के शिकार हो जाते हैं.
When we start living unnaturally, we become victims of many mental diseases.
जब प्रकृति अपने सबसे अच्छे रूप में होती है, तो यह एक मंत्रमुग्ध कर देने वाली घटना प्रदर्शित करती है ;
_जहां आकाश अपना बहुमूल्य पानी बरसाता है; यह भूमि तक पहुंचता है और हर चीज में से रिसकर पृथ्वी पर नया जीवन लाता है.
” प्रकृति न्यायप्रिय है,” हर व्यक्ति को उसके जीवन में एक मौक़ा ज़रूर देती है _ यह हम पर निर्भर है कि उस मौक़े का क्या करते हैं ?
प्रकृति को साहस प्रिय है. _आप प्रतिबद्धता बनाते हैं और प्रकृति असंभव बाधाओं को दूर करके उस प्रतिबद्धता का जवाब देगी.
असंभव सपना देखो और दुनिया तुम्हें कुचल नहीं देगी, बल्कि ऊपर उठा देगी.
Nature loves courage. You make the commitment and nature will respond to that commitment by removing impossible obstacles. Dream the impossible dream and the world will not grind you under, it will lift you up. – Terence McKenna
यदि हम नेचर की बुद्धिमत्ता के सामने आत्मसमर्पण कर दें तो हम पेड़ों की तरह जड़ पकड़ कर ऊपर उठ सकते हैं.
प्रकृति से जुड़ जाओ…_ फ़िर किसी व्यक्ति विशेष से जुड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी !!!
– अगर हम प्रकृति में कोई खामी ढूंढ रहे हैं तो इसका सीधा सा मतलब है कि हमने प्रकृति को अभी तक नहीं समझा है..!!
प्रकृति सब को साथ ले कर चलती है, लोग प्रकृति के साथ नहीं चलते ;
_ बस, यही विडंबना है..!!
यदि हम पर्याप्त रूप से जागरूक नहीं हैं,
..तो हम इस प्रकृति की सुंदरता को कभी नहीं जान पाएंगे.!!
दुनिया कितनी भी तरक्की कर ले, _ लेकिन कुदरत का मुकाबला नहीं कर सकती..
प्रकृति सुंदर अजूबों से भरी हुई है लेकिन जब हमारे पास उन्हें देखने के लिए क्षण हों..
प्रकृति और पशु पक्षियों से निकटता आपको और अधिक मानव बनाती है.!!
इंसानों द्वारा बनाई चीज़ों से 24 घंटे घिरे रहने की वजह से आपको चिंता, तनाव, डिप्रेसन होता है ;
और नेचर द्वारा बनाई चीज़ों के बीच रहने से दिमाग शांत होता है, इसलिए दिन का कुछ समय नेचर के साथ बिताएं.
-“जब आप उदास महसूस कर रहे हों तो _प्रकृति की सुंदरता का आनंद लेने के लिए समय निकालें.”
सुबह उठो, प्रकृति से कुछ पल के लिए रूबरू हो..ओस के टपकते बूंदों को महसूस करो… व्यायाम करो.. ध्यान लगाओ.. प्रार्थना करो…
रुकी हुई जीवन की शुरुआत करने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है… संघर्ष ही एकलौता सत्य है…!!!
सुबह उठकर पेड़ पौधों के बीच बिना फोन के जाईये… बिल्कुल सचेतन मन से हवाओं, पक्षियों की चहचाहट एवम प्रकृति के ठंढ़ेपन को महसूस करिये…
_ आस पास एवम आपके भीतर होने वाले गतिविधियों के प्रति सचेत होकर उनका अवलोकन करिये…महसूस करिये की आप कौन हैं …!!!
घास के तिनके जो थे बेकार कूड़े में शुमार,
_ चंद पक्षियों के हुनर से आशियाने हो गए..!!
जीवन के सारे निर्णय हमारे नही होते..
_ कुछ प्रकृति के और कुछ समय के अधीन होते हैं.!!
हरियाली हो, पानी बहता हो, फूल हो, पछी चहचहाते हों — ऎसे स्थान पर बैठने से तनाव दूर होता है.
शान्ति पाने के लिए स्वयं को प्रकृति प्रेमी बनाइए.
” कुदरत के साथ तालमेल क्यों बढ़ाएँ “
जब इंसान कुदरत की सुंदर व्यवस्था का लाभ लेकर, उसे वरदान बनाने की कला सीख जाएगा,
तब उसके रिश्ते और स्वास्थ्य अच्छे हो जाते हैं.
प्रकृति में सब कुछ हमारा होते हुए भी कुछ नहीं है हमारा..
_क्योंकि ना कुछ लेकर आए थे ना कुछ लेकर जाएंगे.
कुछ भी बुरा नहीं है जो प्रकृति के अनुसार हो.!!
Nothing is evil which is according to nature.
अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रकृति के सुन्दर दृश्य, चाँद- तारों, नदियां, पेड़- पौधे तथा पछियों के सानिध्य में रहें
और शुद्ध प्राणवायु को ग्रहण करें.
यह बहुत अदभुत बात है, _ लाओत्से यह कह रहा है कि इस जगत में तुम कुछ भी करो, यह जगत हर हालत में तुमसे प्रसन्न है.
हर हालत में, अनकंडीशनल, कोई शर्त नहीं है कि तुम ऐसा करो तो अस्तित्व प्रसन्न होगा, और तुम ऐसा नहीं करोगे तो अस्तित्व नाराज हो जाएगा.
अस्तित्व हर हालत में प्रसन्न है..
आपके कार्य का स्वरूप कैसा है ?
हमारे कार्यों की ‘ सहजता ‘ से पता चलता है कि हम सही दिशा में हैं या नहीं ;_
_ गलत दिशा में जाते ही कुदरत का धक्का लगता है ताकि हम सही दिशा की ओर मुड़ जाएँ..
विभिन्न कार्यों में स्वयं को आप इतना भी व्यस्त न कर लें
कि आपके आस- पास स्थित प्रकृति को देखने हेतु आपके पास दो छण भी न हों.
प्रकृति का सौन्दर्ये सरल है, पर फिर भी खूबसूरती उसकी सबसे अलग है,
इसलिए नहीं की जा सकती किसी चीज़ से इसकी तुलना..
पहाड़ की सुंदरता उन लोगों के लिए नहीं है जो इसे ऊपर से देखते हैं,
_ पहाड़ की सुंदरता केवल उन्हीं को पता चलती है जो उस पर चढ़े हैं.!!
प्रकृति की प्रत्येक वस्तु अनमोल और अमूल्य है,
मनुष्य उसे अपने स्वार्थ के लिए अनमोल का मोल लगा कर बेच देता है.
सुबह जल्दी उठ जाने मात्र से ही ज़िन्दगी के कई मसले सुलझ सकते हैं…
_ कोशिश ये रहे कि कुछ देर प्रकृति में बिताया जाए…!!!
“प्रकृति के सानिध्य में रहने से हमें जीवन के उपहारों का पता लगाने में मदद मिलती है.”
कुछ लोगों को हम नहीं चुनते.. बल्कि ये सृष्टि ही उन्हें चुनकर हमारे लिए भेजती है..
_इस तरह के साथ को ही Divine Power कहते हैं.!
जब कोई सहारा नहीं होता तब… कुदरत सहारा बन जाती है..
_ बस इरादे और नियत नेक होनी चाहिए.!!
प्रकृति को दिखावे की आवश्यकता नहीं,,, जो सुंदर है वो स्वयं प्रत्यछ है.
प्रकृति, समय और धीरज _ ये तीनों ही महान चिकित्सक हैं.
” प्रकृति हमें कभी धोखा नहीं देती, यह हम हैं जो खुद को धोखा देते हैं. “
प्रकृति एक बात सिखाती है..- उसे जगह दी जाए या नहीं, वो अपनी जगह खुद बना लेती है.!!
जो प्रकृति का आनंन्द है इसे कोई नाम नही दिया जा सकता,
सिर्फ अनुभव किया जा सकता है.
प्रकृति अपरिमित ज्ञान का भंडार है, परंतु उससे लाभ उठाने के लिए अनुभव आवश्यक है.
प्रकृति के नियम के अनुसार प्रत्येक चीज़ वापस अपने स्त्रोत की ओर चली जाती है..
प्रकृति के नियमों को कोई नहीं बदल सकता.. एक ही मार्ग है _ खुद को बदलो..
हम जो खो देते हैं कुदरत उससे पहले ही बेहतरीन चुनकर हमारे लिए रखती है..
सुबह उठकर प्रकृति की ताजग़ी को महसूस करो…चहचहाती पक्षियों की आवाज़ सुनो..बसंत में बहती ठंढी हवाओं को समेट लो ..
नीले आसमान को देखो… पूरब की ओर से उगती सूर्य की लालिमा देखो… यह सब हमारे लिए ही हैं…
प्रकृति ने हमें जीने के लिए कितने खूबसूरती वरदान दिए हैं, इसे महसूस करो…
जो सकारात्मकता सुबह-सुबह प्रकृति में मिलती है…
_ वह आपको घर के आरामदायक क्षेत्र में और फोन के डब्बे में कभी नहीं मिल सकती….!!!!
सारा जगत स्वतंत्रता के लिए लालायित रहता है फिर भी प्रत्येक जीव अपने बंधनों को प्यार करता है.
यही हमारी प्रकृति की पहली दुरूह ग्रंथि और विरोधाभास है.
कोई भी मनुष्य छण भर भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता, सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है.
प्रकृति में जो कुछ भी होता है वह व्यक्ति के भीतर भी होता है, क्योंकि एक व्यक्ति पूरी प्रकृति के एक खंड का नाम मात्र है.
Everything that happens in nature happens inside the individual also, because an individual is only a name for a cross-section of the whole of nature.
हमें प्रकृति का आभारी होना चाहिए कि _उसने उन चीज़ों को खोजना आसान बना दिया है _जो आवश्यक हैं; _जबकि अन्य बातें _जिन्हें जानना कठिन है, _आवश्यक नहीं हैं.
We ought to be thankful to nature for having made those things which are necessary easy to be discovered; while other things that are difficult to be known are not necessary.
कभी – कभी जीवन में कुछ भी समझ में न आ रहा हो तो सब कुछ अस्तित्व एवम प्रकृति पर छोड़ देना चाहिए _
_ उन्हें बेहतर पता है कि हमें ज़िंदा कैसे रखना है ..!!
प्रकृति जब अपने बदले पर आती है तो बेहद क्रूर हो जाती है,
_ प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने वाले नहीं बख्शे जाएंगे.
इंसान ऐसी नायाब कृति है जो पूरी पृथ्वी की सुंदरता का ज़िम्मेदार हो न हो,
_ पर इस पृथ्वी पर फैली हर कुरूपता का यक़ीनन ज़िम्मेदार है.!!
प्रकृति किसी को भी बर्दाश्त नहीं करती है, यदि हम उसका दोहन करेंगे तो वो अपने अनुकूल वातावरण बना ही लेगी..!!
नदियों को कोई साफ न कर पाए तो कोई बात नहीं, बस गंदा न करें तो वो खुद से ही साफ हो जाएंगी.
… ऐसे ही जंगल को भी … ऐसे ही मन को भी…
_ गंदगी से जितना दूर रखें ..खुद को तो ..मन और पर्यावरण [ Environment ] दोनों शुद्ध रहेंगे.
मनुष्य के रूप में आप प्रकृति की सर्वश्रेस्ठ रचना हैं,
क्योंकि मनुष्य ही है जो अपनी खामियों को खूबियों में बदल सकता है.
आत्म बल से बड़ी कोई शक्ति नहीं है..
_लेकिन इस बल को जागृत करना केवल वही जानता है,
_जिसने प्रकृति के साथ जीवन जिया है और उसका सम्मान किया है.
_ सारा अस्तित्व आपके साथ चल रहा है,
_आप अकेले होते हुए भी पूरे अस्तित्व के हो.!!
“हमें किसी व्यक्ति के बुरे, गंदे और घृणित व्यवहार से चिढ़कर..
_ अच्छाई और प्रेम पर से विश्वास नहीं खोना चाहिए..
_ और न ही जल्दबाजी में अपना व्यवहार बिगाड़ना चाहिए..
_ प्रकृति पर यकीन क़ायम रखा जाए,
_ वो हमारा ख़्याल रखने में कोई कसर नहीं छोड़ती..!!”
मकान कच्चे थे, धूल मिट्टी रहती थी और बरसात में कीचड़ भी.!
_ लोग घर के बर्तनों में भोजन करते थे, यात्रा में घर का बना भोजन ले जाते थे, पानी मुफ्त मिलता था.
_ समारोहों में कुल्हड़ और पत्तल में भोजन परोसा जाता था.
_ विचित्र बात यह है, इतना सब होकर भी कूड़ा प्रकृति में ही विलीन हो जाता था..!!
” सुबह की ताकत “
दिन की सबसे खूबसूरत शक्ल सुबह होती है. सुबहों का मैं हमेशा से दीदार करता रहा हूँ. अब तक जहां- जहां रहा हूँ, वहां की सुबह बहुत अलग- अलग दर्शन देती रही है. कुछ ना कुछ नया हर जगह की सुबह से सीखने को मिलता है. हर सुबह को जीवन की नयी शुरुआत मान सकते हैं.
कल से क्या मतलब. सुबह आपको आज का एहसास कराएगी. अभी आज इसी समय में रहना सुबह होना है. कल के काल में घटी नकारात्मकता से उबारना सुबह होना है. हर दिन एक नये जीवन का एहसास करना. जैसे कि जो है वो आज से ही शुरू है, कल चाहे जैसा भी रहा हो, आज अच्छा ही होगा. इसका एहसास सुबह है.
ऊर्जा का अनंत एकदिशीय प्रवाह जो सिर्फ आपको ताकतवर बनायेगा. आप को कभी कितना भी कमजोर क्यों ना लगे, बस एक बार सुबह में डूब के देखिए. प्रकृति की तेज बहती हवा में परिश्रम का स्नान सुबह करके देखिये, अपने नये होने का एहसास होगा आपको.
प्रकृति के तीन कड़वे नियम जो सत्य है.
१. प्रकृति का पहला नियम : –
यदि खेत में बीज न डालें जाएं तो कुदरत उसे घास- फूस से भर देती है…!!
ठीक उसी तरह से दिमाग में सकारात्मक विचार न भरे जाएँ तो नकारात्मक विचार अपनी जगह बना ही लेता है…!!
२. प्रकृति का दूसरा नियम : –
जिसके पास जो होता है…!! वह वही बांटता है…!!
सुखी सुख बांटता है….दुःखी दुःख बांटता है….!!
ज्ञानी ज्ञान बांटता है…. भ्रमित भ्रम बांटता है….!!
भयभीत भय बांटता है…….!!
३. प्रकृति का तीसरा नियम : –
आपको जीवन से जो कुछ भी मिले, उसे पचाना सीखो, क्योंकि भोजन न पचने पर रोग बढ़ते हैं….!!
पैसा न पचने पर दिखावा बढ़ता है….!!
बात न पचने पर चुगली बढ़ती है….!!
प्रशंसा न पचने पर अहंकार बढ़ता है….!!
निंदा न पचने पर दुश्मनी बढ़ती है….!!
राज न पचने पर खतरा बढ़ता है….!!
दुःख न पचने पर निराशा बढ़ती है….!!
और सुख न पचने पर पाप बढ़ता है.
जीवन मे एक बार तो सबकुछ ट्राय करना चाहिए, क्या मालूम किसी अविस्मरणीय अनुभव से आप वंचित रह जाए..
बात पैसो की नहीं हैं बल्कि अनुभव की हैं जिसका कोई मूल्य नहीं
बहुत बार मेरे साथ ऐसा हुआ हैं जब मैंने कोई नई चीज ट्राय की ओर तब मैंने जाना कि अगर ये अनुभव छूट जाता तो मैं वो नहीं जान, महसूस कर पाता जो आज किया..
जीवन के आयाम हज़ारों-लाखों हैं ओर हर एक छोटी से छोटी चीज़ भी अपने अंदर अनगिनत रहस्यो को छुपाए हुए हैं.
इंसान के 1000 जन्म भी कम है इस अस्तित्व को जानने-समझने के लिए
हज़ारों वर्षो की लगातार खोजों के बाद भी आज इंसानी सभ्यता सिर्फ थोड़ा बहुत ही जान सकी हैं इस अस्तित्व के बारे में..
नदी से – पानी नहीं, रेत चाहिए
पहाड़ से – औषधि नहीं, पत्थर चाहिए
पेड़ से – छाया नहीं, लकड़ी चाहिए
खेत से – अन्न नहीं, नकद फसल चाहिए
उलीच ली रेत, खोद लिए पत्थर,
काट लिए पेड़, तोड़ दी मेड़
रेत से पक्की सड़क, पत्थर से मकान बनाकर लकड़ी के नक्काशीदार दरवाजे सजाकर,
सूखे कुओं में झाँकते,
रीती नदियाँ ताकते,
झाड़ियां खोजते लू के थपेड़ों में,
बिना छाया के ही हो जाती है
सुबह से शाम….!!!
और गली-गली ढूंढ़ रहे हैं –
आक्सीजन
फिर भी सब बर्तन खाली l
सोने के अंडे के लालच में, मानव ने मुर्गी मार डाली !!!,
विचार अवश्य कीजिए…!
हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए
प्रकृति का संरक्षण कितना आवश्यक है !
प्रकृति की स्थिति जो है वह बेचैन करने वाली है, और बेहतर है कि अभी भी जो कुछ बचा है, उसे सम्हाल लें.. वरना कुछ भी नहीं बचेगा.!!
हमारे पुराने लोग हम से वास्तविकता में वैज्ञानिक रूप से बहुत आगे थे.
_थक हार कर हमें भी वापिस उनकी ही राह पर वापिस आना पड़ रहा है…
1. मिट्टी के बर्तनों से स्टील और प्लास्टिक के बर्तनों तक और फिर से दोबारा मिट्टी के बर्तनों तक आ जाना..
2. अंगूठाछाप से दस्तखतों (Signatures) पर और फिर अंगूठाछाप (Thumb Scanning) पर आ जाना..
3. फटे हुए सादा कपड़ों से साफ सुथरे और प्रेस किए कपड़ों पर और फिर फैशन के नाम पर अपनी पैंटें फाड़ लेना..
4. सूती से टैरीलीन, टैरीकॉट और फिर वापस सूती पर आ जाना..
5. ज़्यादा मशक़्क़त वाली ज़िंदगी से घबरा कर पढ़ना लिखना और फिर IIM व MBA करके आर्गेनिक खेती पर पसीने बहाना..
6. क़ुदरती से प्रोसेस फ़ूड (Canned Food & packed juices) पर और फिर बीमारियों से बचने के लिए दोबारा क़ुदरती खानों पर आ जाना..
7. पुरानी और सादा चीज़ें इस्तेमाल ना करके ब्रांडेड (Branded) पर और फिर आखिरकार जी भर जाने पर पुरानी (Antiques) पर उतरना..
8. बच्चों को Infection से डराकर मिट्टी में खेलने से रोकना और फिर घर में बंद करके फिसड्डी बनाना और होंश आने पर दोबारा Immunity बढ़ाने के नाम पर मिट्टी से खिलाना..
9. गाँव, जंगल से डिस्को पब और चकाचौंध की और भागती हुई दुनिया की और से फिर मन की शाँति एवं स्वास्थ (Health) के लिये शहर से जँगल गाँव की ओर आना..
इससे ये निष्कर्ष (Conclusion) निकलता है कि Technology ने जो दिया _उससे बेहतर तो प्रकृति ने पहले से दे रखा था..!!

अस्तित्व बनाम इंसान
कौन-से नियम सच में आपके हैं ?
सोचिए, क्या आपने कभी सूरज को उगने से रोका है ? या बारिश को सिर्फ इसलिए रोका हो क्योंकि आपके पास छाता नहीं था ?
अस्तित्व के नियम वो हैं जो हमेशा से थे, और हमेशा रहेंगे।
• हवा हर किसी के लिए बहती है।
• गुरुत्वाकर्षण राजा-रंक सबको एक जैसा खींचता है।
• जीवन और मृत्यु का चक्र कभी नहीं रुकता।
अब सोचिए, इंसानों के बनाए नियम:
• “यह पहनना है,” “यह खाना है,” “यह सही और यह गलत है।”
ये नियम समाज ने बनाए ताकि व्यवस्था बनी रहे। लेकिन क्या ये नियम हर समय, हर जगह सही हैं ?
अंतर समझिए:
• अस्तित्व के नियम शाश्वत हैं।
• इंसानों के नियम बदलते रहते हैं।
जो नियम आपको आजादी दे, सहज बनाए और जीवन से जोड़ दे, वो अस्तित्व के हैं।
जो आपको जकड़े और बांधे, वो इंसानों के बनाए हैं।
तो आप किसके साथ चलना चाहेंगे ?

अस्तित्व के साथ बहिए, जिंदगी आसान हो जाएगी।

शास्त्रों में धर्म का एक अर्थ “ नियम “ भी बोला गया
अस्तित्व के बनाये नियमों के साथ मैत्री स्थापित कर जीना ही धार्मिक इंसान का लक्षण है.
दुनिया में किसी खूबसूरत चीज़ को भौतिक आंखों से नहीं देखा जा सकता ना उन्हें भौतिक रूप से छुआ जा सकता है,
_ ना ही उन्हें किसी विशेष भौतिक स्थान पर पाया जा सकता है, वह हमारी बाहरी इंद्रियों से परे होती हैं.
_ प्यार, खुशी, करुणा, रंगों का जिनमें पूर्ण समावेश होता है.. जिन्हें हम सिर्फ़ महसूस कर सकते हैं..
_ और जो इंसान ऐसी खूबसूरत चीजों को महसूस नहीं कर पाता..
_ उसका उन चीजों को देखना या भौतिक रूप से छूना भी कोई मायने नहीं रखता..
– Rhythm Raahi
जितना अधिक आप किसी चीज़ को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं, उतना ही अधिक वह आपको नियंत्रित करती है.
अपने आप को मुक्त करें और चीजों को अपना प्राकृतिक मार्ग अपनाने दें.
The more you try to control something, the more it controls you.
Free yourself and let things take their own natural course.
यह पूरी पृथ्वी पवित्र है, और हर चीज़ हमें कई तरीकों से छूने की कोशिश कर रही है – धूल के माध्यम से, पेड़ों के माध्यम से, पक्षियों, बारिश, जानवरों के माध्यम से – वे सभी हमें जीवन का संकेत दे रहे हैं…
जब हवा चलती है तो रेत उड़कर आंखों में घुस जाती है और आंखें बंद करने पर मजबूर कर देती है जिससे दिल में एक नृत्य सा पैदा हो जाता है. _जब बारिश हो रही होती है, तो बारिश की बूंदें शरीर को कंपा देती हैं और दिव्य प्रवाह का आह्वान करती हैं.
जब सुबह-सुबह पक्षी चहचहाने लगते हैं और फूल अपनी खुशबू बिखेरते हैं और ओस की बूंद जीवन की तरह चमकती है;
_जब नए दिन के स्वागत में क्षितिज पर इतने सारे रंग फैले होते हैं – ये सभी जीवन के प्रतीक हैं.
यदि आप इनके प्रति जागरूक हो जाएं तो आपको दुःख नहीं होगा, आप अत्यधिक आभारी, समझदार, पूर्ण महसूस करेंगे.
आप घर जैसा महसूस करेंगे, आपको शांति महसूस होगी.
प्रकृति आपकी अनुमति नहीं मांगती; इसे आपकी इच्छाओं की परवाह नहीं है, या आपको इसके कानून पसंद हैं या नहीं._आप इसे वैसे ही स्वीकार करने के लिए बाध्य हैं जैसे यह है, और परिणामस्वरूप इसके सभी परिणामों को भी.
Nature doesn’t ask your permission; it doesn’t care about your wishes, or whether you like its laws or not.You’re obliged to accept it as it is, and consequently all its results as well.
– Fyodor Dostoevsky