सुविचार 469
शिष्टता की कोई कीमत नहीं देनी पड़ती किंतु वह खरीद सबकुछ सकती है.
वीरानों में भटकना ही मेरी ज़िन्दगी है,
लगता है जैसे किसी को मेरी जरुरत नहीं,
मंज़िलें तो बहुत है पर कोई साथ नहीं.
महीनों तपती जमीन और कांटों से _ बचाया था जिसने…
मेरा वजूद जैसे किनारा नदी का था…….
गुलशन में हमीं, लेकिन खुशबू को तरसते है…….
_ और दुख का कोई खरीदार नहीं होता !!