मस्त विचार 286
मैं खुद को नहीं देखता……………..औरों की नजर से……
मैं खुद को नहीं देखता……………..औरों की नजर से……
ना जाने देखते देखते कब तुम लत बन गये….
लेकिन
‘कान’ में कोई ‘ज़हर’ घोल दे तो, उस का कोई ‘इलाज’ नहीं है.
मुस्कुराने की आदत भी कितनी मंहगी पड़ेगी हमको.
छोड़ दिया सब ने ये सोच कर
हम तो अकेले भी खुश रह लेंगे.
तूने कब कर दी ये शीतल छाया.
अब मुझको बस तू ही संभाले.
अब तो जीऊँगा तेरे ज्ञान के सहारे.
कमरे की दीवार पर
लगे कलैंडर से मिलती जुलती होती है…
जिस पर हर दिन नयी तारीख आती है.
नया हफ्ता आता है. साल बदल जाता है.
ज़िंदगी में भी हर दिन, एक नयी समस्या से
झूझना पड़ता है..
हर हफ्ते सोच बदलती है..
हर साल कोई साथ छोड़ता है.
कोई नया साथ बनता है..
कलैंडर को तो देख कर पता चल जाता है
कल नयी तारीख आयेगी..
पर ज़िंदगी में पता नहीं चल पाता
कल कौन सी समस्या सर उठाएगी…