सुविचार – ये अंग्रेजी वर्ण हमें सिखाते हैं – 150

ये अंग्रेजी वर्ण हमें सिखाते हैं :-

A B C….?
Avoid Boring Company​
_​मायूस संगत से दूरी​_
_D E F…?_
Dont Entertain Fools​
_​मूर्खो पर समय व्यर्थ मत करों_
_G H I…?_
Go For High Ideas​
_​ऊँचे विचार रखो​_
_J K L M…?_
Just Keep A Friend Like Me​
_*मेरे जैसा मित्र रखों*
_N O P…?_
Never Overlook The Poor n Suffering​
_​गरीब व पीड़ित को कभी अनदेखा मत करों_
_Q R S…?_
Quit Reacting To Silly Tales​_
_​मूर्खो को प्रतिक्रिया मत दो​_
_T U V…?_
Tune Urself For Ur Victory​
_​खुद की जीत सुनिश्चित करों_
_W X Y Z…?_
We Xpect You To Zoom Ahead In Life​
————————————-

सुविचार – Climate change – क्लाइमेट चेंज – जलवायु परिवर्तन – 149

13878553534_2de9d2b63b

हमें ये समझना होगा कि दुनिया की बर्बादी होगी तो हम भी बिल्कुल सुरक्षित नहीं रहेंगे.!! 
बढ़ती गर्मी के मद्देनजर अब समय आ गया है कि ..हमें अपनी धार्मिक, सामाजिक, पारिवारिक और जहां तक संभव हो.. आर्थिक गतिविधियों को नियंत्रित करने, बदलने या खत्म करने की जरूरत है..!!

_ 49 डिग्री में जन्मदिन, शादी भोज तथा अन्य प्रकार के भोज करना बंद करना होगा..
_ घर में लोगों (खासकर पुरुषों ) को दोनों समय छप्पन व्यंजन खाने की आदत बदलकर पुराने समय की तरह चना चबैना, सत्तू, शर्बत पर आना होगा..
..या भट्ठी जैसे धधकते किचेन में जाकर खुद पकाने की आदत डालनी होगी..
_ आर्थिक गतिविधियों में भी जो संभव हो ..उन्हें अब रात्रि कालीन करना चाहिए..!!
_ पेड़ लगाने और पानी बचाने की बात को पोस्टर, बैनर और फेसबुक से आगे निकलकर धरातल पर उतरना होगा..
_ प्लास्टिक और डिस्पोजेबल का उपयोग बंद नहीं तो कम ज़रूर करना होगा..
_ गर्मी से बचने,लड़ने के लिए नए ढंग से सोचने,करने की जरूरत है..
_पुराने ढंग में तो इंसान जिंदा ही नहीं बचेगा..
_ अगर शारीरिक रूप से जिंदा बचा भी तो मानसिक रूप से वह असंतुलित होकर जिएगा..
_ अनिद्रा, थकान सब उसे चिड़चिड़ा बना रहे हैं ..!!
_ जरूरी नहीं कि मेरी बात से आप सहमत हों..!!
_ क्योंकि प्रथाओं, परंपराओं, जीवनशैली, आर्थिक/सामाजिक गतिविधियों को बदलना आसान नहीं होता..
_ ..पर जब सरवाइव करने की लडाई हो तो ..बदलाव अपने आप आ जाते हैं..!!
– Mamta Singh

Quotes by जयशंकर प्रसाद

मौज बहार की एक घडी एक लम्बे एवं दुःखपूर्ण जीवन से अच्छी है. उस की खुमारी में रूखे दिन काटे जा सकते हैं.
कष्ट ह्रदय की कसौटी है.

सुविचार – दर्द – पीड़ा – वेदना – 148

13871777424_5e38c6100b

आप 2 लोगों से पूछते हैं कि क्या उन्हें दर्द पसंद है और आपको 2 अलग-अलग जवाब मिलते हैं… सच में ?!?!

_ हाँ “दर्द किसे पसंद है ?” आप पूछ सकते हैं ?
_ हममें से ज्यादातर लोग दर्द से नफरत करते हैं.
_ और यह बहुत स्पष्ट है कि क्यों: – यह हमारे मन की शांति और हमारे आनंद को छीन लेता है.
_ इसलिए जब आप टेबल पर अपनी छोटी उंगली 🤞 मारते हैं और दर्द होता है 🤣 तो आपको निश्चित रूप से यह पसंद नहीं है.
_ दर्द को देखने का यह तरीका हम सभी पहले से ही जानते हैं.
_ “तो आप दर्द से अलग तरीके से कैसे निपट सकते हैं ?”
_ जब आप GYM में ट्रेनिंग के लिए जाते हैं तो आप पूरे शरीर की मांसपेशियों में दर्द के साथ बाहर निकलते हैं.
_ लेकिन इस बार – आप इसे पसंद करते हैं, क्यों ?
_ क्योंकि आप सोचते हैं कि यह दर्द आपके शरीर को मजबूत बनाने में मदद करता है 💪
_ आपको समझ आया ?
_ अगर आपके दिमाग में दर्द आपको मानसिक और भावनात्मक विकास की ओर ले जाता है, तो बिल्कुल जिम की तरह – आप महसूस करेंगे कि दर्द आपको बढ़ने में मदद कर रहा है.!!
ज़िंदगी में हमारे पास दो ही रास्ते होते हैं..

_ या तो हम ज़ख्म पर ध्यान देकर दर्द झेलते रहें,
या तो सबक़ पर ध्यान देकर ज़िंदगी में आगे बढ़ते जाएं.!!
कुछ बातें ऐसी होती हैं.. जिनका जिक्र किसी से नहीं होता,

_ कुछ दर्द ऐसे होते हैं.. जिनका कोई मरहम नहीं होता
_ कुछ गलतियां ऐसी होती हैं.. जिनका कोई पश्चताप नहीं होता
_ कुछ वक्त ऐसा होता है.. जो काटे नहीं कटता,
_ इन्हीं कुछ का मिला-जुला स्वरूप होती है हमारी जिंदगियां…!
“वो दर्द जो मेरे अपने नहीं, फिर भी मुझे छेड़ जाते हैं”

_कुछ दर्द हम कमाते नहीं, बल्कि औरों से ले आते हैं ताकि उनका बोझ हल्का हो सके”
हर कोई सलाह देता है, पर असली समझ तब आती है जब दर्द अपने
दरवाज़े पर दस्तक देता है.!!
जिनके लिए हम दर्द बन जाएं या जो हमारे लिए दर्द बन जाए,,

_ उनके लिए खुद की जिंदगी को कष्टदायी क्यों बनाया जाए,,
_ क्यों न छोटी छोटी बातों से खुश होकर दर्द को ही जलाया जाए.!!
उस वक्त वाक़ई बहुत दर्द होता है, जब लोग आपकी बड़े से बड़ी कोशिश को नज़रअंदाज़ करके..

_ आपकी छोटी से छोटी गलती के लिए आप पर उंगली उठाते हैं.!!
आप अपने दुःख- दर्द – तकलीफें मत बताओ, ये तो सबके साथ हैं ;

_ आपने इससे अलग और क्या हासिल किया, वो बताओ.!!
कुछ उदासियाँ और दर्द,  किसी के साथ… बाँटें नही जा सकते…

_ उन्हें खुद के अंदर ही… रखने में सुकून मिलता है..!!
दर्द महसूस करें, लेकिन वहीं न रुकें – रोइए, चिल्लाइए, सब कुछ लिख डालिए—
_ जो भी आपको दर्द को स्वीकार करने में मदद करे, लेकिन इसे अपने ऊपर हावी न होने दें.
खामोशियाँ कर दें बयान तो अलग बात है,
_कुछ दर्द हैं,, जो लफ़्ज़ों में उतारे नहीं जाते.!!
“हम दर्द में भी सामान्य दिखने की कोशिश करते हैं, टूटते हुए भी मुस्कुराते रहते हैं,

_ सिर्फ इसलिए कि लोग “अच्छा दिखने” को “ठीक होने” से ज़्यादा महत्व देते हैं.”
वक़्त दर्द को कम कर देता है, लेकिन जिन लोगों ने जानबूझकर वो दर्द दिया हो, उन्हें भूलना आसान नहीं होता.!!
कुछ दर्द साझा करने के लिए नहीं होते, – वे तो बस, हमें गहरा बनाते हैं.
कोई इंसान आपको तब तक दर्द पहुँचा सकता है,
_ जब तक आप समझ नहीं जाते कि वो इंसान आपके लिए बना ही नहीं है.
आपके दर्द को सुनने वाला हर शख़्स आपका अपना नहीं होता है,
_ कुछ लोग तो आपको बस इसलिए सुनते है ताकि वो दूसरों में आपकी बातें उछाल सकें.!!
अचानक लगी चोट कभी मौका नहीं देती कि ठहरकर सोच सकें या उसके दर्द को शब्दों में बयां कर सकें,

_ वो तो सीधे दिल और जिस्म पर एक साथ वार कर जाती है.!!
अक्सर चीज़ें हमारी मर्ज़ी के मुताबिक़ नहीं होतीं..

_ और आँखों के सामने बिखरती उम्मीदों की किरचन..
_ अक्सर अकेले में हमारी आँखों और दिल में चुभती हैं.
_ किसी को कैसे कहोगे कि वो उसे महसूस करके देखे,
_ क्योंकि उस दर्द का अंदाज़ा कोई कैसे लगा सकता है.!!
जब दर्द अपना नहीं होता, तो सिर्फ शब्द बनकर रह जाता है, ना वो चीख सुनाई देती है, ना वो खालीपन महसूस होता है, बस कहानी बनकर बीत जाता है.!!
अपने घाव भरने के लिए आपको उन चीज़ों और उन लोगों से दूर होना ही पड़ेगा.. जो आपको दर्द देते हैं.!!
जब दर्द बहुत होता है, तो इंसान को सबसे ज़्यादा साथ का एहसास चाहिए होता है – सलाह नहीं.!!
दर्द को ज़ाहिर करने के लिए हर बार आंसुओं की ज़रूरत नहीं होती,

_ कभी-कभी मुस्कुराहट भी बहुत कुछ कह जाती है.!!
किन लफ़्ज़ों में बयान करूँ मैं अपने दर्द को,
_ सुनने वाले तो बहुत हैं.. मगर समझने वाला कोई नहीं.!!
“दर्द की लिपि [Script] किसी भी भाषा से अनुवाद की जाए वह एक सी ही होती है.”
दर्द भुलाया जा सकता है, मगर जान बूझकर तकलीफ़ देने वालों को नहीं.!!
किसी के दर्द को महसूस करना हो तो थोड़ी देर के लिए उसके किरदार में उतर कर देख लो..!!
अब तो ग़म में भी कॉम्पटीशन है.. आपका दर्द सुनने से पहले सामने वाला अपना दर्द सुना देता है.!!
हम अक्सर अपने दर्द से भागना चाहते हैं, उसे भूलना चाहते हैं,

_ पर जितना भागते हैं, वो उतना ही भीतर उतरता जाता है.
_ और फिर एक दिन समझ आता है कि दर्द को मिटाया नहीं जा सकता, केवल स्वीकार किया जा सकता है.
_ उसी स्वीकार में एक अजीब-सी शांति मिलती है, जैसे तूफ़ान के बीच कोई ठंडी सांस उतर आए.!!
अपनी उलझन किसी से इसलिए भी नहीं कही जाती कि लोग समझाने चले आते हैं.

_ और इंसान हर वक़्त समझने, ज्ञान लेने के लिए तैयार नहीं होता है.
_ कभी कभी प्यार से सुन लिया जाता है, समझ लिया जाता है, किसी की तकलीफ़ को मेहसूस किया जाता है,
_ उसके सामने सही गलत, अच्छा, बुरा लेके नहीं बैठा जाता है..
_ और हमारे आसपास के लोगों को इतनी समझ भी नहीं शायद या वो इतने हस्सास नहीं हैं.
_ दर्द में ख़ामोशी से किसी अपने को थाम लिया जाता है..
_ क्योंकि वो आपसे बस थोड़ी सी मोहब्बत अपनेपन की दरकार से आए होंगे.!!
– Nida Rahman

Quotes by मार्क जोंस

अक्सर लोग इसलिए आप की खुशियां बर्बाद करेंगे क्योंकि उनके पास कुछ अच्छा करने के लिए नहीं है या वह अपनी जिन्दगी से नाखुश है. इसलिए अपने रुख पर अडिग रहो.

सुविचार – पछतावा – 147

h

क्या पछताने का कोई मतलब है ? पछतावे से मुक्त जीवन कैसे जीयें ?

Is there a point in having regrets ?How to live a regret free life ?
_ बिल्कुल कोई मतलब नहीं.
_ ऐसी चीजें हैं जो हम चाहते हैं कि हमने जीवन में नहीं की हैं और ऐसी चीजें हैं जो हम चाहते हैं कि हमने की है.
_ किसी भी कीमत पर, कोई भी पछतावा इसके लायक नहीं है.
_ जीवन पछतावे से मुक्त होना चाहिए.
_ रोजमर्रा की जिंदगी में अक्सर हम समझौता कर लेते हैं.
_ हम बिना वजह झूठ बोलते हैं.
_ दिन में कई बार, हम सूक्ष्म लाभों के लिए नकली चीजें बनाते हैं.
_ मैंने कई बार ऐसा किया है और मुझे इसका एहसास भी नहीं हुआ.
— हम रोज़ की ज़िंदगी में इस बात का ख़्याल नहीं रखते कि..
..हमारी वजह से उन्हे तकलीफ़ तो नहीं हो रही, जिनके साथ हम हैं.
— मैंने अपने जीवन में जो सीखा है वह यह है:
_ जो हो गया, उसे आप बदल नहीं सकते.
_ लेकिन अगर ऐसी स्थिति दोबारा आती है, और मुझे इसकी जानकारी है, तो मैं आदत से इसे दोहराऊंगा नहीं.
_ यदि मैं कुछ ऐसा करता हूं जो मैं नहीं करना चाहता और मुझे लगता है कि यह किसी भी तरह से गलत है, तो मुझे वह नहीं करना चाहिए.
— लोग मुझसे पूछते हैं कि मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है:
_ यह सरल है.
_ पछतावे से मुक्त, ईमानदार जीवन जीने के लिए.
_ मैं इसमें हर दिन असफल होता हूं लेकिन यह असफलता भी मुझे आज फिर से जीवंत प्रयास करने के लिए और अधिक प्रेरणा देती है.
_ अगर मैं स्वीकार करता हूं कि मैं असफल रहा हूं, तो मुझे थोड़ी अधिक जागरूकता मिलती है और आज, एक नया व्यक्ति निर्णय ले रहा है.
— हमारे पास जो कुछ है वह आज है – या तो हम इसे जी सकते हैं,
_ हम कल के बारे में खेद महसूस कर सकते हैं, या उसके बारे में दिवास्वप्न देख सकते हैं.
_ चुनाव पूरी तरह हमारा है.
_ तो, आइए आज पछतावा न करें और इसे जीएं.
“आपको अपने आप पर काम करने का कभी पछतावा नहीं होगा ;

_ आपको अपने भविष्य में निवेश करने का कभी पछतावा नहीं होगा ;
_ साधन संपन्न होने, व्यायाम करने, ध्यान करने पर आपको कभी पछतावा नहीं होगा ;
_ उन चीजों को करने में अधिक समय व्यतीत करें..
जिन्हें आप जानते हैं कि आपको पछतावा नहीं होगा.”

सुविचार – पराधीन, पराधीनता, अधीन, मातहत, आश्रित, पराश्रित, परवश, परतंत्र, निर्भर, अधीनस्थ – 146

y

पराधीन – दूसरों के रहमो करम पर जीवन यापन करना कितना कष्टप्रद होता है,

_ यह तो कोई भुगतभोगी ही बता सकता है.

पराधीन व्यक्ति परायी और बासी ज़िंदगी जीता है,

_ वह सदा जिस पर आश्रित है कि ओर टुकर-टुकर निहारता है.

पराधीनता का आशय है – दुसरे के अधीन. “अधीनता बहुत बड़ा दुःख है”

_ हर आदमी स्वतंत्र रहना चाहता है,

_ यहाँ तक कि सोने के पिंजरे में बंद पक्षी भी राजमहल के सुखों और स्वादिष्ट भोगों को छोड़कर खुले आकाश में उड़ जाना चाहता है.

सुविचार – पानी, जल, नीर, वाटर, Water – 145

13822343693_c3e1a3295f

पानी, दूध, अनाज, विद्युत ऊर्जा [ इलेक्ट्रिक ] या पेट्रोल- डीज़ल की बर्बादी और पर्यावरण की अशुद्धता- ऐसी समस्या है,

__जिस पर हम यदि गंभीर नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ी हमारी लापरवाही को भुगतेगी. _हमें अपने ‘साक्षर’ नहीं, सुशिक्षित होने का व्यवहार करना चाहिए.
_एक कहावत है- `बचाया हुआ यानी कमाया हुआ.’
How long until we run out of fresh water ?

Unless water use is drastically reduced,severe water shortage will affect the entire planet by 2040.
“There will be no water 2040 if we keep doing what we’re doing today.” – Professor Bejamin Sovacool, Aarhus University, Denmark.
कब तक हमारा ताज़ा पानी ख़त्म हो जाएगा ?
जब तक पानी का उपयोग बहुत कम नहीं किया जाता, 2040 तक पानी की गंभीर कमी पूरे ग्रह को प्रभावित करेगी.
“यदि हम वही करते रहे जो हम आज कर रहे हैं तो 2040 तक पानी नहीं होगा.”
– Professor Bejamin Sovacool, Aarhus University, Denmark.
जल की एक्सपायरी डेट क्या है ?

● जहाँ नल में जल हर दिन आता है. वहीं जल हर दिन बासी हो जाता है और हर दिन बहा दिया जाता हैं। उसकी एक्सपायरी डेट सिर्फ़ १ दिन की होती है.
● जहाँ २ दिन में जल आता है, वहाँ २ दिन में जल बासी हो जाता है और बहा दिया जाता है.
● जहाँ आठ दिन बाद जल आता है। वहाँ वह आठ दिन बाद बासी हो जाता है.
● शादी समारोह में अगली बिसलरी का सामना होते ही हाथ में रखी जल की आधी बोतल खत्म हो जाती है और उसे फेंक दिया जाता है.
● रेगिस्तान में यात्रा करते समय निकटतम जल तब तक ताजा रहता है, जब तक जल का दूसरा स्थान दिखाई न दे.
● बाँध का जल अगले मानसून तक ताजा माना जाता है.
● यदि सूखे की स्थिति बनती है तो यही जल दो से तीन वर्ष तक ताजा माना जाता है.
● जहाँ ५० फीट के बोरवेल से जल निकाला जाता है. वह जमीन के नीचे सैकड़ों साल पुराना है. यानी सैकड़ों साल पुराना जल पीने के लिए सुरक्षित है. एक्सपायरी डेट सैकड़ों साल..
● जहाँ ४०० से ५०० फीट पर बोरवेल से जल निकाला जाता है, वह हजारों साल तक ज़मीन के अंदर जमा रहता है. फिर भी चलता रहता है.
● कुल मिलाकर जल की समाप्ति हमारी कमज़ोर बुद्धि पर तय होती है.
जल का संयम से उपयोग करें, नहीं तो आपके विचार आपको मार डालेंगे.
जल है तो कल है.
पानी के कितने सारे नाम है..

आकाश से गिरे तो बारिश
आकाश की और उठे तो भाप
अगर जम कर गिरे तो ओले
अगर गिर कर जमे तो बर्फ
फूल पर गिरे तो ओस
फूल से निकले तो इत्र
जमा हो जाए तो झील
बहने लगे तो नदी
सीमाओं में रहे तो जीवन
सीमाएं तोड़ दे तो प्रलय
आंख से निकले तो आंसू
शरीर से निकले तो पसीना
हरि के चरणों को छूकर निकले तो चरणामृत.!!

सुविचार – अन्न – अनाज – 144

13777696663_688c6ec9a7

“अन्न जिस धन से खरीदा जाए _ वह धन _ ईमानदारी एवं श्रम का होना चाहिए “

…तथा याद रखें _ जैसा अन्न वैसा मन..!!

जो खेतों पर मेहनत करते हैं, जो दिन रात डटे रहते हैं, भूखे प्यासे यहां तक की अपनी नींदें भी गवां देते हैं,

– उनसे पूछो अन्न का एक-एक दाना का कीमत क्या होता है..
_ कद्र करो उनकी जिनकी वजह से हम पेट भर खाना खा पाते हैं,
_ अनाज को कूड़ेदान में ना फेंको.!!
ये जितने लोग अन्न 🌾 का अपमान करते हैं, उन्हें इस वक्त गेहूं की कटाई के लिए तपती दोपहर में खेतों में भेज देना चाहिए,

इन्हें भी पता होना चाहिए जिस रोटी का ये अपमान करते हैं, वो रोटी धूप में बहाए पसीने और कलेजे पर बल और जान की परवाह किए बिना, किसी किसान के द्वारा काटे गए गेहूं से उपजी होती है,
जिसे आराम से छत के नीचे बैठकर तुम खाते हो.. और जितना जी चाहे अपने धन के रौब में उसे बर्बाद करते हो..
– रिदम राही

सुविचार – मन – Mann – 143

मन सीमित नहीं रहना चाहता, वह स्वभाव से ही अनंत को छूना चाहता है.!!
मन…

कभी कभी समझ ही नही आता कि ‘मन क्या चाहता है’,
_ कभी भीड़ में खुश है, तो कभी तन्हाई पसंद ,
_ कभी किताबों में खोया, तो कभी दर्द भरे गीतों में गुम,
_ कभी करता हैं चीखें जोर जोर से, और कभी मन है कि जरा सी आहट भी न हो,
_ कभी मीठा सा झरना, मन ही मन मुस्कुराता सा,
_ कभी इतना खिन्न जैसे, नीम की कड़वाहट लपेटा हुआ सा,
_ कभी खामोश सर्द रात के सन्नाटों जैसा, तो कभी जून की गर्मी लिए चकाचौंध सा,
_ कभी बंद आंखो की सिलवट सा सहज, तो कभी छन छन बजती पाजेब सा उद्दंडी,
_ कभी बच्चा सा कोई हठ ले बैठा हो जैसे,
_ कभी प्रौढ़ जैसा कि इशारे तक समझ जाए..!!
_ ख़ैर…
“दुनिया वही है, उसमें रंग मन भरता है”

_ ज़िंदगी के ज़्यादातर रंग मन से ही पैदा होते हैं.
_ बाहरी दुनिया वही रहती है, लेकिन मन की अवस्था बदलने पर.. वही चीज़ें बिल्कुल अलग महसूस होती हैं.
_ ज़िन्दगी के बाहर जो कुछ भी होता है, वो तो परिस्थितियाँ हैं.
_ पर परिस्थितियों का रंग कैसा दिखेगा..- वो हमारा मन तय करता है.
_ वही परिस्थिति किसी को तोड़ देती है, और किसी को मजबूत बना देती है.
_ रंग बाहर नहीं बदलते, उन्हें देखने का एंगल बदलता है.
_जब माइंड शांत हो → दुनिया ज़्यादा कोमल लगती है.
_जब माइंड परेशान हो → वही दुनिया ब्लैक & व्हाइट लगती है.
_ उदाहरण :
मन शांत हो → छोटी चीज़ें भी सुंदर लगती हैं.
मन भारी हो → बड़ी से बड़ी खुशियाँ भी फीकी लगती हैं.
मन स्पष्ट हो → निर्णय आसान लगते हैं.
मन उलझा हो → छोटी बात भी पहाड़ लगती है.
ये 4 बातें दिखाती हैं कि रंग मन से ही बनते हैं:
1. सोच बदलो, अनुभव बदल जाता है.
2. Acceptance हो तो बुरी चीज़ें भी सिखाने लगती हैं.
3. Mind clear हो तो decisions simple हो जाते हैं.
4. दृष्टि बदलने से ज़िन्दगी का ‘texture’ बदल जाता है.
एक अशांत मन दुखी होने और शिकायत करने के कारण ढूँढ़ता रहेगा..
_ एक शांत मन वैसे भी खुश ही रहता है.!!
जहां मन को समझाना पड़े… वहां कुछ न कुछ गलत जरूर है.!!
जब हम बुरे लोगों के साथ रहते हैं तो हमारा मन खराब हो जाता है.
_ अपने मन से बुरे लोगों को निकाल दीजिए, आराम मिलेगा.!!
“सच्चा जुड़ाव मन भरता नहीं — मन बदलता है.

_ जो हमें किसी के करीब लाकर — खुद से भी मिलवा दे, वही जुड़ाव नहीं… एक जीवन-संवाद होता है.”
एक भटकता मन दुखी मन है और दुखी मन से आपको गलत सुझाव ही मिल सकते हैं.

_ इसीलिए सबसे पहले आपको अपने मन को शांत करना होगा..
_ क्योंकि यही आपको शांति दिलाएगा.!!
दिनचर्या में अचानक बदलाव आते ही मन का संतुलन डगमगा जाता है.

_ जो परिचित था, जो रोज़ का सहारा था, वह एकदम अनजान-सा लगने लगता है.
_ समय वही रहता है, लोग वही होते हैं, पर भीतर कुछ ऐसा बदल जाता है कि दुनिया सच में अलग-सी महसूस होने लगती है..- जैसे अपनी ही ज़िंदगी को थोड़ा दूर से देख रहे हों.
_ असल में बदली होती है हमारी आदतों की ज़मीन, और उसी के हिलते ही पूरी दुनिया हिलती हुई प्रतीत होती है.!!
क्या है ? “मन का स्थिर होना”

स्थिरता का अर्थ यह नहीं कि मन हमेशा सोचना बंद कर दे, बल्कि ये है कि ये अब :
_ क्षोभ [irritation] से परे हो जाता है, तुरन्त प्रभावित नहीं होता..
_ बिना कारण के चंचल रहने की आदत छोड़ देता है और जो भी आए-जाए –उसे सिर्फ दिखता है, चिपकता नहीं..
> “स्थिर मन” एक झील जैसा होता है – जिसमें कोई पत्थर डाले तो हलचल तो होती है, पर वो तुरत शांत हो जाता है.
————————————————–
क्या मन एक बार स्थिर [stable] हो जाए तो कभी अस्थिर [Unstable] नहीं होता ?
नहीं – मन की प्रकृति ही चंचल है.
_ लेकिन जब एक साधक उसे समझ जाता है, तो मन के अस्थिर होने पर भी वो स्वयं अस्थिर नहीं होता.
_ यानी, मन कभी कभी अस्थिर तो हो सकता है, लेकिन आप उस अस्थिरता के साथी नहीं, साक्षी बन जाते हो.
> स्थिर होना एक अवस्था नहीं – एक स्थिर दृष्टि का नाम है.
✅ मन के स्थिर होने की एक सूक्ष्म चेक-लिस्ट [check-list] :(अंतर से पहचान)
🔹 संकेत क्या आप महसूस करते हैं ?
1. मन अपने आप शांत हो जाता है आपको मन को रोकने की कोशिश नहीं करनी पड़ती.
2. बिना वजह चिंता नहीं होती अचानक बेचैनी या कल्पना की भरमार नहीं होती.
3. बुरा बोलने वाले प्रभावित नहीं करते आप प्रतिक्रिया [reaction] के बजाय सिर्फ निरीक्षण [observe] करते हैं.
4. आप हर दिन कुछ देर मौन में रह सकते हैं और बिना मन-बहलान [entertainment] के कुछ देर बैठना सुखद लगता है.
5. विचार आते हैं, पर चिपकते नहीं.. सोच आई और चली गई – जैसे बादल आसमान में.
6. आप तुरंट नहीं टूटते या भटकते.. इमोशनल [Emotional] हलचल में भी आप स्वयं को संभाल लेते हैं.
7. आपका मन स्नेह, दया और आभार से भरा रहता है – रंजिश से ज्यादा संवेदना रहने लगती है.
> “मन के स्थिर होने की पहचान ये नहीं कि विचार नहीं आते,
– बल्कि ये है कि अब उन विचारों के आने से मैं हिलता नहीं हूं”
“” ना मन को रोका, ना डांटा, _ सिर्फ उसे देखा – जैसे जल में चंद्रमा.
_ और धीरे-धीरे वो स्वयं शांत हो गया, – जैसे कोई अपने घर लौट आया हो””
“मन का रुख”

“दिमाग बोला – सोच ले पहले,”
“दिल बोला – महसूस कर ले…”
_ मन खड़ा था दो राहों पर, एक थी शांति – एक थी उलझन से भरी..
_ जब मन ने दिल की धड़कन सुनी, चुप सा हो गया..
_ ना सोच, ना डर, ना कोई बात थी, सिर्फ एक गहरा, मौन का साथ था.
तब समझा– मन वही है, जिसका रुख जैसा हो जाये,
_ या तो साथी बन जाए, या तो भटकता ही जाए.!!
_ एक ही मन होता है, पर उसका रुख बदलता है ;
_ जब वो दिमाग के नीचे होता है, तो अशांत रहता है ;
_ जब वो दिल के साथ होता है, तो शांत हो जाता है ;
_ और जब वो आत्मा के साथ हो जाता है, तब सब कुछ प्राकृतिक रूप से सही हो जाता है __बिना प्रयास के..!!
””दिल की बात सुनने के बाद मन चुप हो जाता है – दिमाग की बात सुनने के बाद मन और बोलने लगता है””
“मन का वापसी-पत्र”

_ मन बार-बार उसी अवस्था में लौट जाना चाहता है, जहाँ सब कुछ सरल, सुंदर और अपना जैसा लगता है.
_ काश, जीवन वैसा ही रह पाता—जैसा उन अनुभवों में महसूस होता है—
_ मन बार-बार उस द्वार पर जाता है..
_ जहां कोई प्रश्न नहीं होता, सिर्फ एक शांत उपस्थिति होती है.
_ वो एक अवस्था होती है – जहां जीवन को जीने की जरूरत नहीं पड़ती, वो स्वयं ही बहता है, खिलता है.
_ शायद वही अंतर-का घर है, जहां कोई भाव कुछ मांगता नहीं – बस सब कुछ स्वयं ही पूर्ण होता है.
— क्यों मन उसी अवस्था में लौटना चाहता है ?
_ क्योंकि वहां असली “मैं” छुपा होता है – जो दुनिया के शब्द, रूप, दांव-पेच से परे है.
_ जो अवस्था “सरल, सुंदर और अपनी” लगती है – वो आपका असली स्वरूप है.
_ जीवन व्यवहारिक है, पर आत्मा अनुभवी होती है.
“जीवन भटकता है बाहर, पर मन को घर अंदर ही मिलता है”
शरीर की शुद्धता = भीतर की शांति कैसे समझ में आती है ?

अगर शरीर हल्का लगे और मन में अनावश्यक शोर कम हो जाए- यही शुद्धता का सबसे स्पष्ट अनुभव है.
1) मन हल्का लगे – अगर आप किसी भी वजह के बिना हल्का, साफ-साफ सा महसूस करते हैं – जैसा कोई बोझ नहीं – तो ये अंदरूनी शुद्धता का पहला संकेत है.
2) बिना वजह गुस्सा, जलन कम हो – जब मन शुद्ध होता है तो छोटी-छोटी बातें डिस्टर्ब नहीं करतीं.
_ आप रिएक्ट कम, ऑब्जर्व ज्यादा करते हो.
3) बातें, सोच और व्यवहार में एक “सफाई” हो – कुछ झूठ, ड्रामा, हेरफेर करने का मन ही नहीं करता.
_ जो है, वो सीधा दिखने लगता है.
4) अकेलेपन में सुकून मिले – आपको खुद से भागने की जरूरत नहीं पड़ती.
_ अकेले बैठे हो तो मन भागता नहीं – शांत हो जाता है.
5) बुरा करने की इच्छा हो ही नहीं – शुद्ध मन किसी को दुख देने का सोचता नहीं..
_ चाहे सामने कोई गलत ही क्यों न हो.
6) दिल में एक कोमलता, दयालुता टिक जाए – आपका व्यवहार नरम पड़ने लगता है.. _ ज्यादा जजमेंट नहीं होती, सिर्फ समझ होती है.
7) शरीर में हल्का-पन, सुकून, गर्माहट [warmness] महसूस हो – शुद्ध मन का असर शरीर पर पड़ता है..
_ सांस गहरी हो जाती है, सीने में जकड़न कम हो जाती है.
अगर आप अपने अंदर “सुकून + हल्का-पन + दयालुता” बढ़ती हुई महसूस करते हैं, तो वही अंदरुनी शुद्धता का सबसे असली संकेत [sign] है.!!
मन को कैसे मारते हैं ?

_ कोई मन को मारने का तरीका बताए.
_ मुझे अपने मन को मारना है.
_ यह हर पल स्वयं को सुखी समझ कर उछलता-फुदकता रहता है.
_ इस मूरख को यही नहीं पता कि सुख क्या होता है ?
_ यह समझता है कि जो ‘अपने’ होते हैं, वही सुख होता है, पर अपना तो कोई होता ही नहीं.
_ तो जो हमारे साथ रहते हैं, रोज़ मिलते-जुलते हैं, कहते हैं, हम तुम्हारे हैं, वो कौन हैं ?
_ अरे मूरख, वो सिर्फ संयोग से साथ हैं.
_ कहने का क्या है ? कुछ भी कह लो.
_ कहने में झूठ, सच एक ही अंदाज़ से बोला जाता है.
_ यह झूठ क्या होता है? मुझे लगता है, जो होता है, सब सच होता है.
_ ओफ़, तुझे यदि सब सच लगता है तो तू वाकई अपने मन को मार.
_ पर मन को मारते कैसे हैं ?
_ कोई मन को मारने का तरीका तो बताए.
_ तू सबसे मुँह फेर ले.. आगे बढ़, पीछे मुड़ कर मत देखना, आगे बढ़, और बढ़.
_ पर आगे भी लोग हैं जो कहते हैं, वो मेरे अपने हैं.
_ आँखें बंद कर, कान बंद कर, किसी की न सुन कुछ, किसी से न कह कुछ.
_ फिर भी, मन है कि मर ही नहीं रहा.
_ क्या करूँ ? क्या करूँ ?
– Manika Mohini
error: Content is protected