सुविचार – न्यूनतमवादी बनना – मिनिमिलिस्ट – Becoming minimalist – खरीदना – Purchase – 076

13421436503_f10c51ba27

धीमी गति से खरीदें, ऊंचे स्तर पर रहें..

Buy slow, stay high.

“सुंदरता जोड़ने से नहीं, अनावश्यक हटाने से उभरती है.”
सबसे जरुरी है अपने घर का चूल्हा जलाए रखना,
_ इनकम के वो सोर्स बनाना.. जिनसे ज़िंदगी चल सके.. बाकी चीजें उतनी जरुरी नहीं.!!
कोई कितना खरीदे और क्या क्या खरीदे ? इतना पैसा भी कहां से लाओ ? और खरीद लाओ तो काम आए न आए ?

_ क्या उसे इस्तेमाल करने का समय होगा या नहीं ?
_ और अगर खरीदा भी जाए, तो क्या वह काम आएगा या नहीं ?
_ समय का तो अभाव ही अभाव है आधुनिक जिंदगी में.!!
मिनिमिलिस्ट होने के अपने सुख और दुख हैं.!

_ सुख कि आपको सामानों के ढेर को सहेजना नहीं पड़ता, न चुनाव की समस्या होती है.!!
हम ख़ालीपन की वजह से नहीं, अनचाही चीज़ों के भराव से ख़ाली हैं.!!
अब समय है अपनी सही समझ के अनुसार जीने का..

_ क्योंकि आज सब कुछ बाजार है और बाजार में हर कोई अपना फायदा देखता है.!!

ये हमारा दोष है कि चीजें तो हर कोई चाहता है,

_लेकिन उन्हें मेन्टेन [ रख-रखाव ] कोई नहीं करना चाहता.!!

यदि आप अपने घर में जिस सामान का उपयोग नहीं कर रहे हैं, तो उससे छुटकारा पाएं.

आप इसे किसी कोठरी में रखकर इसका अधिक उपयोग शुरू नहीं करेंगे.

बाजार द्वारा जो कुछ भी हमें बेचा जाता है, हम उसका उपभोग [ consumption ] कर रहे हैं.

_हमने यह निर्णय लेने की जागरूकता खो दी है कि वास्तव में क्या आवश्यक है और क्या नहीं !!
चीजों से हो रही है पहचान आदमी की, औकात अब हमारी बाजार लिख रहे हैं !!
जब ज़िंदगी से ज्यादा कीमत सामान की हो, तो समझो इंसान बाज़ार का गुलाम बन चुका है.!!
चीजें तब तक ही आकर्षित करती हैं, जब तक वो हमारी नहीं हो जातीं..!!
कोई ऐसा प्रोडक्ट न खरीदें, जो खरीदते समय सस्ता/अच्छा लगता है ;

_परन्तु उसका मूल्य चुकाते चुकाते सदियां निकल जाती हैं..!!

जरूरतों [needs] को देखने के लिए अपनी आंखों का उपयोग करें..

..और उन्हें पूरा करने के लिए अपनी प्रतिभा [talents] का उपयोग करें.

जब कुछ खरीदने की जल्दी नहीं होती, तब दिमाग ज़्यादा साफ़ सोचता है.
_ “देखो सब, खरीदो वही.. जो कुछ दिनों बाद भी उतना ही अच्छा लगे”
घर में हर वस्तु या तो उपयोग में हो, या आनंद दे.
_जो न उपयोग में है, न आनंद दे रही है, वह केवल जगह घेरती है.
हर चीज़ को तुरंत खरीदना जरूरी नहीं है ;
_ खरीदने से पहले कुछ समय लेना बेहतर है.!!
“इस महीने कुछ मत खरीदिए-

_ पहले देखिए कि आपके पास पहले से क्या-क्या है”

इच्छाओं और जरूरतों के बीच अंतर को समझने से..

_हम अनावश्यक बोझ से मुक्त हो जाते हैं.!!

कर्ज में विलासितापूर्ण ढंग से रहने की तुलना में बजट के तहत सस्ते में जीवन जीना बेहतर है.

It’s better to live cheap under budget than luxuriously in debt.

जिंदगी में हम अपने ऊपर बहुत सारा बोझ लेकर चलते हैं, जो हमें बहुत जरूरी लगता है..

..लेकिन असल में वो जरा सा भी जरूरी नहीं होता..!!

जितनी अधिक हम चीजों की कदर करते हैं, उतनी ही कम हम खुद की कदर करते हैं.
The more we value things, the less we value ourselves.
कर्ज में मज़े लेने का कोई फायदा नहीं, जितना है उतने में आनंद करें.
हम सभी गहराई से जानते हैं, कि डिपार्टमेंटल स्टोर या मॉल में खुशी नहीं खरीदी जा सकती है ;
_ हमें सिर्फ इतनी बार झूठ कहा गया है कि _ हम उस पर विश्वास करने लगते हैं.
—— लेकिन क्या होगा अगर, वास्तव में, न्यूनतम जीवन जीने और जानबूझकर कम में जीने में _वास्तव में अधिक आनंद है ?
_ दूसरे शब्दों में, न्यूनतम जीवन _जीवन को बदलने वाला और जीवन देने वाला _अहसास होगा.
“आप अपना घर उन चीजों से नहीं भरें, जिनकी आपको आवश्यकता नहीं है..”

— क्या कम सामन होने से घर खाली या उबाऊ लगने लगेगा ???
–सरल का मतलब ..उबाऊ नहीं है ; सामने है सच..
_ _ कम गंदगी के साथ, आपका घर अधिक शांतिपूर्ण बन सकता है.
_ ये व्यवस्था आपकी समस्या को हमेशा के लिए हल कर देगी.
_ आप का घर आपके लिए तनाव के स्रोत के बजाय _ आराम का स्थान होगा..!!
यदि आप अच्छी क्वालिटी वाली वस्तुएँ खरीदते हैं, तो वे एक ही काफी हैं,

_क्योंकि उनमें शायद ही कुछ सुधार करना होता है.!!
_अच्छी क्वालिटी वाली वस्तुएँ की सावधानी से देखभाल की जाए, तो अपग्रेड करने की आवश्यकता के बिना वर्षों तक अच्छी तरह से काम चला सकते हैं.
_ हमारे रहने की जगह में ‘कम चीज़ें’ रखने से _हमें अधिक महत्वपूर्ण चीज़ों पर खर्च करने के लिए अधिक समय मिलता है.
हमारे पास कपड़ों से भरी अलमारी और हमारी ज़रूरत से ज़्यादा क्यों है ? क्या यह इसलिए है _ क्योंकि हम उन सभी से प्यार करते हैं या इसलिए कि हमें इतने सारे शर्ट या जूते चाहिए ? नही बिल्कुल नही..
_हम उन्हें खरीदते हैं _क्योंकि हम बदलते फैशन के साथ बने रहने की कोशिश कर रहे हैं – वही बदलती शैली जो फैशन उद्योग हमें बताता है कि हमें शैली में बने रहने की आवश्यकता है.
इसी तरह, जब हम अपने बाकी सामन को देखते हैं, तो जो हमारे अलमारियों को अस्त-व्यस्त कर देते हैं ; _ हमारे पास क्यों है ?
क्योंकि हम उनसे प्यार करते हैं और वे हमारे जीवन की कहानी कहते हैं ?
इसके बजाय, क्योंकि वे बिक रहे थे और हमनें उन्हें ख़रीदा, वे सोफे से मेल खाते थे, या अंतर्मन को कुछ चाहिए था.!!
प्रत्येक मामले में, हम चीजें खरीदते हैं और उन्हें रखते हैं, इसलिए नहीं कि वे हमारे जीवन को लाभ पहुंचाते हैं, बल्कि किसी अन्य उद्देश्य के लिए..
उन चीजों को न खरीदें, जिनकी आपको आवश्यकता नहीं है…ताकि आप वह जीवन जीना शुरू कर सकें जो आप चाहते हैं.!!
ऐसा लगता है कि हमारी पूरी व्यवस्था लोगों को, उनके पास जो कुछ है _उससे असंतुष्ट महसूस कराने पर तुली हुई है ;
_ और कोई भी सावधानीपूर्वक और समझदारीपूर्वक जीवन जीने को तैयार नहीं है.!!
मैं अक्सर अपने आप से एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछता हूं, “अधिक लोग सरल और न्यूनतम जीवन की ओर आकर्षित क्यों नहीं होते ?”

_हमारी ज़रूरत की चीज़ों के मालिक होने के सभी फ़ायदों को देखते हुए, कोई भी उन चीज़ों का पूरा मालिक होना क्यों चाहेगा _ जिनकी उन्हें ज़रूरत नहीं है ?
_ मैं श्रेष्ठता, घमंड या नैतिकता के भाव से प्रश्न नहीं पूछता। मेरे लिए, यह एक व्यक्तिगत प्रश्न है _ जिससे मैं जूझता रहता हूँ।
_वह चीजें जिसकी मुझे आवश्यकता नहीं थी ? मैंने यह सब क्यों खरीदा ?”
हम सबसे पहले वह चीज़ें क्यों खरीदते हैं, _ जिनकी हमें ज़रूरत नहीं है ? लेकिन हम पूरी तरह दोषी नहीं हैं. बाहरी दुनिया हमारे खिलाफ साजिश रचती है।
प्रत्येक मामले में, हमें “अपनी आवश्यकता से अधिक की इच्छा करने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है” _क्योंकि इससे उन्हें पैसा मिलता है.
_ हम यह उम्मीद करने लगे हैं कि जीवन का यह तरीका सामान्य है और जीवन कैसे जीना चाहिए ?
बस यही तो जिंदगी है… जरूरत से ज्यादा चाहना और खरीदना… सही है ?
लेकिन कोई गलती न करें. हमें धोखा दिया जा रहा है. _ हमें ऐसे वादे बेचे जा रहे हैं _ जिन्हें खुदरा विक्रेता और निर्माता कभी पूरा नहीं कर सकते।
_ उनका बाहरी हेरफेर हमारी आंतरिक असुरक्षा को आकर्षित करता है _और हमें ज़रूरत से ज़्यादा पीछा करने, खरीदने और संचय करने के लिए मजबूर करता है।
तो हम इस हेरफेर पर कैसे काबू पाएं ?
काश यह एक आसान उत्तर होता, लेकिन मैंने पाया कि ऐसा नहीं है।
हेरफेर पर काबू पाने के लिए निरंतर सतर्कता की आवश्यकता होती है। लेकिन इसे पूरा करने के लिए हम यहां कुछ महत्वपूर्ण कदम उठा सकते हैं:–>
1. पहचानें कि हमारे चारों ओर स्वार्थी प्रेरणाएँ हैं.
हर कंपनी और हर विज्ञापन हमारे भले के लिए नहीं है। वे सिर्फ अपने लाभ के लिए हैं।
2. कंपनियों के हेरफेर को देखने के लिए काम करें.
अधिकांश विज्ञापन हमारी अवचेतन इच्छाओं (स्थिति, लिंग, प्रतिष्ठा, खुशी, उपस्थिति, आत्म-सम्मान, पहचान, या प्रतिष्ठा) और भय (अकेलापन, सुरक्षा, कमजोरियां, अनिश्चितता) को आकर्षित करते हैं।
_उनकी रणनीति से अवगत रहें _ताकि आप इससे मूर्ख न बनें.
_ याद रखें कि खुशियाँ खरीदी नहीं जा सकतीं.
3. हमारे जीवन की सीमित प्रकृति का सम्मान करें।
सारा जीवन सीमित है – हमारा समय, हमारा पैसा, हमारी ऊर्जा। इस वजह से, यह सीखना अविश्वसनीय रूप से महत्वपूर्ण है कि _हमें अपना ध्यान कहाँ रखना है.
4. चीजें उनकी उपयोगिता के लिए खरीदें, हैसियत के लिए नहीं।
वस्तुएं आपकी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता के आधार पर खरीदें, न कि लोगों को प्रभावित करने के लिए ;
इस सिद्धांत को हर जगह लागू करें- आपका घर, आपकी कार और आपके कपड़े सभी शुरुआत करने के लिए बेहतरीन जगह हैं।
आपको हर किसी की तरह जीने की ज़रूरत नहीं है। वास्तव में, यदि आप ऐसा नहीं करेंगे _तो संभवतः आप अधिक खुश रहेंगे।
5. खुद को याद दिलाएं कि जीवन में और भी बड़े लक्ष्य हैं।
हम अपने पैसे से हमेशा ऐसी चीजें भी खरीद लेते हैं जिनकी हमें जरूरत नहीं है।
हमारा पैसा उतना ही मूल्यवान है _जितना हम इसे जिस पर खर्च करना चुनते हैं।
_इसे सोच-समझकर खर्च करें.
एक समय ऐसा आया जब मैंने अपने जीवन पर नजर डाली और महसूस किया कि मैंने बहुत सारी चीजें जमा कर ली हैं..

_ और अगर मैं अपनी भौतिक संपत्ति को त्याग नहीं पाता, तो मैं कभी भी उन चीजों को हासिल नहीं कर पाऊंगा जो मेरे लिए सबसे ज्यादा मायने रखती हैं.
_ मुझे यह एहसास हो रहा था कि भौतिक वस्तुएँ मेरे लिए वह काम नहीं कर रहा था, जैसा मैं सोचता था.
1. Peace of mind.
मुझे एहसास ही नहीं था कि मैं अपनी चीज़ों को लेकर कितना चिंतित रहता था, जब तक मैंने उन्हें जाने नहीं दिया.
_ अचानक मुझे मानसिक और भावनात्मक ऊर्जा फिर से मिल गई, और अचानक एहसास हुआ कि – मैं आज़ाद हूँ.
_ अपनी चीज़ों को छोड़ने पर मुझे ऐसा ही महसूस हुआ.
_ मुझे मुश्किल से याद आया कि मुझे उनकी इतनी ज़रूरत क्यों थी.
_ छोड़ने से मुझे बहुत शांति मिली.
2. Impulse control. [आवेग नियंत्रण]
जब से मैंने बेवजह की खरीदारी बंद की है, तब से एक अद्भुत बदलाव आया है.
_ मैं किसी स्टोर या किसी भी किराने की दुकान में जाता हूँ और केवल वही चीजें खरीदता हूँ.. जिनकी मुझे ज़रूरत है,
_ और अगर वहाँ वह चीज़ नहीं है.. जो मैं ढूंढ रहा हूँ, तो खाली हाथ वापस आ जाता हूँ.
3. Health and happiness.
कम सामान के साथ रहने से मैं वास्तव में ज़्यादा स्वस्थ और खुश हूं.
_ शायद इसलिए क्योंकि मैं ज़्यादा सोता हूं, कम काम करता हूं और पैसों को लेकर कम तनाव महसूस करता हूं.
4. Freedom to pursue my dreams. [अपने सपनों को साकार करने की स्वतंत्रता]
मैं उन चीज़ों को पूरा कर पा रहा हूँ, जो मेरे लिए वाकई मायने रखता है,
_ क्योंकि अब मैं अपनी भौतिक चीज़ों से इतना आसक्त नहीं हूँ ;
_ अब वो काम कर पा रहा हूँ, जो मुझे पसंद है.
_ और इस तरह की आज़ादी मेरे लिए मायने रखती है.
5.** A more nuanced understanding of “responsibility.”
[“जिम्मेदारी” की अधिक सूक्ष्म समझ।]
_ मुझे लगता था कि मैं अपनी ज़्यादातर चीज़ें नहीं छोड़ सकता – क्योंकि यह “जिम्मेदाराना” नहीं होगा.
_ मैंने यह सीखा है कि ज़िम्मेदारी हर किसी के लिए अलग-अलग होती है, और ज़िम्मेदार होने का एक हिस्सा अपने आध्यात्मिक और भावनात्मक स्व का ख्याल रखना भी है, जो भौतिक से परे है.
_ दूसरे शब्दों में, क्या होगा अगर “जिम्मेदार” होने का एक हिस्सा यह भी हो कि आप अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनें, जब वह आपको हर सुबह काम पर जाते समय या अपने घर की अव्यवस्था को देखते समय बताती है कि आपको घुटन हो रही है ?
6. Extra cash.
मुझे लगता था कि मैं मुश्किल से अपने खर्च लायक ही कमा पाता हूँ, मेरे पास कोई क्रेडिट कार्ड नहीं है.
_ मैंने जो फैसले लिए हैं, वे शायद सबके लिए कारगर न हों,
_ लेकिन मैंने यह सीखा है कि अक्सर हमारे बजट में ऐसी जगह होती है.. जिसके बारे में हमें पता ही नहीं होता,
_ और जब उन चीजों को छोड़ दिया.. जिन्हें मैं वास्तव में नहीं चाहता था, तो मुझे ऐसे अनमोल अनुभव मिले.. जो मुझे अन्यथा कभी हासिल नहीं हो पाते.
7.** Once in a lifetime experiences. [जीवन में एक बार मिलने वाले अनुभव]
मैं हर महीने अपने पैसों का एक छोटा हिस्सा यादगार अनुभव संजोने के लिए बचाकर रखता हूँ.
_ मुझे अनुभव पर पैसा खर्च करने का कभी पछतावा नहीं होता.
_ मैं हमेशा यादगार अनुभव संजोने की कोशिश करते रहता हूँ, इसलिए मैं अक्सर यात्रा करते रहता हूँ.
_ मुझे नई जगहों को घूमना और अपने जैसे दोस्तों के साथ दिल खोलकर समय बिताना पसंद है.
8. Courage. [साहस]
यह जानकर हैरानी होती है कि जब मेरा जीवन मेरी चीज़ों के इर्द-गिर्द घूमता था, तब मैं कितना डरा हुआ था.
_ मुझे अपनी चीज़ों के बारे में बार-बार बुरे सपने आते थे.
_ पर जब से मैंने अपनी चीज़ें छोड़ी हैं, तब से मुझे जो साहस मिला है, उसे देखकर मैं दंग रह गया हूँ.
_ क्योंकि अब मेरी चीज़ें मुझे परिभाषित नहीं करतीं, इसलिए मैं उन चीज़ों के लिए ज़्यादा रिस्क उठा पाता हूँ.. जो मेरे लिए सच में मायने रखती हैं.
9. A developed sense of self. [आत्मबोध का विकसित होना]
लंबे समय तक मुझे लगता था कि मेरे पास जो कुछ भी है, वह मेरे बारे में कुछ बताता है, और शायद एक तरह से यह सच भी है.
_ लेकिन अब मैं जान गया हूँ कि मेरा आत्मसम्मान कहीं अधिक गहरे और सुरक्षित स्रोत से आता है, इसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती.
10. Better relationships. [बेहतर रिश्ते]
अब मेरे लिए किसी ऐसे हानिकारक रिश्ते में पड़ने की संभावना कम है जो मेरी सारी ऊर्जा [energy] छीन लेता है.
_ अब मेरे लिए उन छोटी-छोटी बातों को नज़रअंदाज़ करना आसान हो गया है.. जिनका कोई महत्व नहीं है – क्योंकि अब मैं समझता हूँ कि क्या मायने रखता है.
_ मेरा जीवन परिपूर्ण नहीं है, लेकिन मैं पहले से कहीं अधिक खुश और संतुष्ट हूँ और मैं कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहूँगा.!!
हम चीजों के खोने पर रोते हैं क्योंकि उनकी कीमत होती है;

_ लेकिन क्या हम जीवन की हानि पर भी रोते हैं,
_ [ जीवनयापन ] जीने का खर्च बहुत ज्यादा है,, और हमने इसकी कीमत चुकाने से इनकार कर दिया है..!!
_ काश, हम सब की ज़िन्दगी रोचक होती !
_ हम सब मज़े से जीना चाहते हैं.. लेकिन आस-पास के हालात हमारी चमड़ी उधेड़ते रहते हैं.. और हम अपने बदन को छिला हुआ देखकर भी.. यह नहीं तय कर पाते कि इस पर हंसें या रोएँ !
“मुश्किलों का सामना करने के दो तरीके हैं ;
_ आप कठिनाइयों को बदल देते हैं या उनका सामना करने के लिए खुद को बदल लेते हैं.”
हमारे पास कपड़ों की इतनी अलग-अलग वस्तुएं और हमारी ज़रूरत से कहीं ज़्यादा चीज़ें क्यों हैं ?

_ क्या ऐसा इसलिए है _क्योंकि हम उन सभी से प्यार करते हैं _ या हमें इतनी सारी शर्ट या जूते की ज़रूरत है ?
_ नहीं, हम उन्हें खरीदते हैं _क्योंकि हम बदलते फैशन के साथ बने रहने की कोशिश कर रहे हैं,
– वही बदलती शैलियाँ जिनके बारे में फैशन उद्योग ने हमें बताया था कि _हमें स्टाइल में बने रहने की जरूरत है.
_ हर बार, हम अपने आप को उस चीज़ की चाहत में पाते हैं _जो वर्तमान में हमारे पास नहीं है ;
_ हम उस पर केंद्रित हो जाते हैं जो हमारे पास नहीं है, और जो अच्छाई हम में पहले से ही है, __ उस पर से अपना ध्यान खो देते हैं.
_ यदि, मनुष्य के रूप में, हम मानते हैं कि केवल कुछ नया प्राप्त करके उच्च स्तर की खुशी पाई जा सकती है, तो हम हमेशा निराश होंगे.
_ हमारी आंतरिक आवाज़ इस तरह कभी संतुष्ट नहीं होगी.
_ कोई भी चीज़ कभी भी पर्याप्त अच्छी नहीं होती…. क्योंकि हमारे अंदर लगातार असंतोष भड़कता रहता है.
_ इस प्रकार आंतरिक और बाह्य दोनों ही दृष्टियों से हमारे हृदय, मन और आत्मा में निरन्तर असन्तोष भड़कता रहता है।
_ इस असंतोष के परिणामस्वरूप क्या होता है कि _ हम जल्दी ही अपने आस-पास की और अपनी अच्छाइयों को नज़रअंदाज कर देते हैं.
बेवजह की शाप्पिंग भी एक ट्रेंड बन गया है.

_ जब करने को कुछ न हो तो ‘चलो शाप्पिंग’ करते हुए निकल जाना कितना अजीब लगता है न.
_ आज बोर हो रहे हैं – चलो शाप्पिंग !
_ गर्मी बहुत है – चलो शाप्पिंग !
_ मेहमान आये हैं – चलो शाप्पिंग !
_ शाप्पिंग तो कम की मगर विंडो शाप्पिंग खूब की.
_ उपर वाला जब जरूरत से ज्यादा दे तो कहीं तो खपाना होता है.
_ जब खरीदना ही नहीं था तो शोरूम बन्द होने तक रुके रहने वाले विंडो शापर भी देखे होंगे.
_ वापसी में लालबत्ती चौक पर भीख मांगते गरीब के लिये कुछ नहीं था सिवाय झिड़की और गाली के !
-Tejbeer Singh Sadher

सुविचार – Result, रिजल्ट, परिणाम, नतीजा, प्रभाव, प्रतिफल, अंतिम परिणाम, अन्त – 075

13431647724_792b85bbb7

परिणाम जो भी हो, पर प्रयास,,,,, _ लाजवाब होना चाहिए ..
परिणाम बेकार ही सही, _ प्रयास सफ़ल होने चाहिए…!!!
हम प्रयास के लिए उत्तरदायी हैं, _ न कि परिणाम के लिए.
परिणाम…

कोई भी काम करने के पूर्व उसके परिणाम पर विचार अवश्य करें , फिर उस कार्य को शुरू करें, कहा भी है की बिना विचारे जो करे वो पाछे पछताए, यानी परिणाम के बारे में सोचे बिना किया गया कार्य अंत में पछताने पर मजबूर कर ही देता है !!!

हम जो कुछ भी हैं, वो हमने आज तक क्या सोचा इस बात का परिणाम है. यदि कोई व्यक्ति बुरी सोच के साथ बोलता या काम करता है, तो उसे कष्ट ही मिलता है.

यदि कोई व्यक्ति शुद्ध विचारों के साथ बोलता या काम करता है, तो उसकी परछाई की तरह ख़ुशी उसका साथ नहीं छोड़ती.

हमारी ज़िन्दगी में अच्छे या बुरे जो भी परिणाम आते हैं, _ वे हमारे विचारों का ही प्रतिफल होते हैं.

अच्छा हो या बुरा, नतीजा बाद में आता है, लेकिन आपकी मेहनत दिल से हो, तो मन हमेशा संतुष्ट रहता है.!!
यह सही है कि कभी- कभी आपके किसी निर्णय का परिणाम आपको तत्काल न मिले,

लेकिन हमेशा याद रखें, देर सबेर ही सही, यदि आपने अपने दृष्टिकोण से सही निर्णय लिया है तो

कोई वजह नहीं कि आपका फैसला आपको अच्छा परिणाम न दे.

परिणाम हमारी इच्छा के अनुसार नहीं मिलता है, _ परिणाम हमारी मेहनत के आधार पर मिलता है !!
वे लोग कभी सफल नहीं हो सकते, जो परिणाम से ज्यादा काम में आने वाली मुश्किलों के बारे में सोचते हैं.
अच्छी व्यवस्था, अच्छे परिणाम तभी हासिल कर सकती है, जब उसे संचालित करने वाला अच्छा हो.
खाली बैठना बहुत अच्छा लगता है, पर उसका परिणाम कभी अच्छा नहीं होता,
उतावले उत्साह से बड़ा परिणाम निकलने की आशा नहीं रखनी चाहिए.
लाख छुपाओ अपने कर्मों का फल, _ परिणाम सारा भेद खोल देता है.

_ आप सब कुछ करने के लिए आज़ाद हो.. लेकिन अपने किए का परिणाम चुनने के लिए आज़ाद नहीं हो.!!
गरीबी और समृद्धि दोनों विचार का परिणाम है…
कभी हार नहीं मानना चाहिए. _ अगर आप हार नहीं मानेंगे और कोशिश करते रहेंगे _

_तब चौंकाने वाले परिणाम सामने आएँगे.

सुलझा हुआ मनुष्य वह है, जो अपने “निर्णय” स्वयं करता है,

और उन “निर्णयो” के “परिणाम” के लिए किसी “दूसरे” को “दोष” नहीं देता.

मेहनत बताती है कि परिणाम कैसा होगा,

वरना परिणाम तो बता ही देगा की _ मेहनत कैसी थी..

परिणाम बता देते हैं कि आपकी सोच कैसी रही होगी,

क्योंकि आप वही कहते और करते हो, जैसा आप सोचते हो..

महान परिणाम तत्काल प्राप्त नहीं होते,

इसलिए हमें कदम- दर- कदम बढ़ते जाने में सन्तोष मानना चाहिए.

लोग आपकी बातों का यकीन तब तक नहीं करेंगे,

जब तक आपके परिणाम उन्हें हिला नहीं देते..

जहां अकारण अत्यंत सत्कार हो,

वहां परिणाम में दुख की आशंका करनी ही चाहिए.

हां ! ऐसी भी परिस्थितियां आयेंगी जब आप सब कुछ सही कर रहे होंगे, उसके बाद भी परिणाम आपके हक़ में नहीं आएगा…

_ और ये दौर ही आपको सरल, सुलझा हुआ और संयमी इंसान बनने को मजबूर करेगा…
_ क्योंकि तब आपको समझ आ जाएगा कि,
“जीवन केवल कुछ ‘पा’ लेने के बारे में नहीं, बल्कि कैसे ‘कुछ न पा पाने के बाद भी लगे रहना है इस बारे में है”..!!
कई बार हमें पहले से ही पता होता है कि परिणाम क्या होने वाला है,

_ मन बार-बार उसी परिणाम का संकेत देता रहता है,
_ फिर भी भीतर कहीं एक छोटी-सी उम्मीद बची रहती है कि शायद इस बार कुछ अलग हो जाए,
_ लेकिन जब वही होता है जिसका डर या अंदाज़ा पहले से था, तब भी दिल चौंक जाता है.
_ शायद इसलिए कि सच को जान लेना और उसे अपनी आँखों के सामने घटते हुए देखना इन दोनों के दर्द में बहुत फर्क होता है.!!
अक्सर वही होता है.. जो पहले से तय होकर आता है,

_ हर परिणाम हमारी कोशिशों का नहीं होता,
_ कुछ हिस्से समय और परिस्थितियाँ अपने पास रख लेते हैं.!!
कितनी भी कोशिशें करो वो, पूरी नही पड़ती और उस पे ये बोझ रहता है कि हम बता नही पाते कि हमने बहुत चाहा, कोशिश की.. मगर कर कुछ ना सके,

_ क्योकि हम जानते है कि दुनिया परिणाम देखती है,कोशिशें नही.!
– Nirarthak Nirarthak

सुविचार – किराएदार – किराया – Rent – 074

13429530584_9bb393e043

जो कमाता हूँ, किराए में दे आता हूँ, मैं किराएदार हूँ।

हर बार सोचता पैसे बचाने की, बचा नहीं पाता हूँ, मैं किराएदार हूँ॥
जो कमाता हूँ, किराए में दे आता हूँ, मैं किराएदार हूँ।
इनकम बढ़ती नहीं है मेरी, किराया बढ़ता जा रहा है,
हम कभी उठ नहीं सकते, दुनियां में किराया खा रहा है,
महीने भर की कमाई जाकर, मकान मालिक को चढाता हूं, मैं किराएदार हूँ॥
हर बार सोचता पैसे बचाने की, बचा नहीं पाता हूँ, मैं किराएदार हूँ॥
जो कमाता हूँ, किराए में दे आता हूँ, मैं किराएदार हूँ।
कुछ सपने पूरे करूँगा अपने, सोचकर दिन रात कमा रहा हूँ,
सुबह घर से निकलता हूँ, दिन भर मेहनत करता, रात को लौट के आ रहा हूँ,
सब खर्च हो जाता है, मैं कुछ भी नहीं बचाता हूँ, मैं किराएदार हूँ,
हर बार सोचता पैसे बचाने की, बचा नहीं पाता हूँ, मैं किराएदार हूँ॥
जो कमाता हूँ, किराए में दे आता हूँ, मैं किराएदार हूँ।
कभी खाने-पीने की चिंता, कभी कोई सामान लाना है,
फिर कमा कमा कर मकान मालिक को, हर महीने दान चढ़ाना है,
पैसे मकान मालिक को देकर, अपनों का पेट भर कर, खुद भूखा सो जाता हूँ,
मैं किराएदार हूं॥
हर बार सोचता पैसे बचाने की, बचा नहीं पाता हूँ, मैं किराएदार हूँ॥
जो कमाता हूँ, किराए में दे आता हूँ, मैं किराएदार हूँ।
— Mahesh Chalia
आज हमारा नाम लगा है, कल किसी और का होगा,
_किरायों के मकान से इश्क़ कैसा ?
_ हर महीने किराया दे कर रहने में कोई प्रॉब्लम नहीं है.
_ अपना मकान न होने से उसके मेंटेनेंस और टूट फूट की आपको चिंता नहीं.
_ भूकंप आ जाय और पूरा मकान गिर जाय तो आपको क्या चिंता होनी है ? आपका तो है ही नहीं.!!
किराए का घर बदलने पर

सिर्फ़ एक किराए का घर नहीं छूटता
उसके साथ एक किराने की दुकान भी छूट जाती है
कुछ भले पड़ोसी छूट जाते हैं
कुछ पेड़
कुछ पखेरू
एक सब्ज़ी की दुकान भी छूट जाती है
उन्हीं के पास
छूट जाते हैं
चाय के अड्डे
वहाँ की धूप-हवा-पानी
कुछ ठेले और खोमचे
वहीं छूट जाते हैं
जिन सड़कों पर सुबह-शाम चलते थे
अचानक उनका साथ छूट जाता है
हमारे लिए एक साथ कितना कुछ छूट जाता है
और उन सबके लिए
बस एक अकेला मैं छूटता होऊँगा
– संदीप तिवारी

सुविचार – समाज – सामाजिक – सोसायटी – सोसाइटी – Society – Social – 073

13435788734_270843e0c2

“समाज हमारी ताकत है”

_ समाज का अर्थ होता हैं, एक दूसरे को मदद करने वाले लोगों का समूह,
_ अगर मनुष्य एक दूसरे को समझ कर, एक दूसरे की सहायता करके, जीते हैं तो..
_ वह समाज हमारे लिए ताकत बन जाता है.
__ पर अभी हमने समाज के नाम पर कुछ और ही बना रखा है..
जिस समाज में हम रहते हैं, वह हमसे और आपसे ही बनता है, ऐसे में अगर समाज को बदलना या फिर उसमें नये विचारों को शामिल करना है तो, इसकी पहल हमें खुद करनी होगी.
“समाज की परवाह न करना तभी ठीक है जब हम इतने स्पष्ट और सक्षम हों कि अपना रास्ता खुद बना सकें — वरना सामाजिक नियमों से हटकर चलने वालों को समाज जीने नहीं देता.”
अगर कोई मुसीबत में है, तो आपको अपनी शांति की कीमत पर भी उसकी परवाह करनी होगी. अपने लिए जीना एक स्वार्थी जीवन शैली है.

If someone is in distress, you have to care even at the cost of your peace. Living for yourself is a selfish way of life.

समाज में लोगों की आदत होती है कि वे बुराइयों पर ज्यादा ध्यान देते हैं.

__ कुछ लोगों में इतनी कुंठा भरी होती है कि वे किसी के भी गुणों की चर्चा नहीं करते है, केवल आलोचना करते हैं.
__ किसी की अच्छाईयों की सराहना करें तो सामने वाले को नई ऊर्जा मिल जाती है,
_बस नजरिया बदलने की जरुरत है.
हम जिस समाज में रहते हैं वहां सिर्फ परफेक्ट लोगों के साथ संबंध रखना बुद्धिमानी नहीं है, क्योंकि हर आदमी में कुछ न कुछ कमी जरूर रहती है. _

_ हमें दूसरों की कमियों को स्वीकार करते हुए उनके भीतर की अच्छाइयों के लिए तारीफ कर अपने दोस्तों- संबंधियों का दायरा बढ़ाना चाहिए.

हम सामाजिक रूप से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिए तो..

_ कुछ लोग होते हैं ..जिनके चले जाने पर अनजाना गम छा जाता है,
_ बिना कोई जान पहचान हुए, बिना कोई व्यक्तिगत भाव हुए भी…
_ यह दिखाता है कि हम एक दूसरे से कितना जुड़े हुए हैं, संवेदना के तल पर…
_ यह कहना कि किसी का किसी पर क्या फ़र्क पड़ता है गलत साबित होता है…
_ फर्क पड़ता है…बिल्कुल पड़ता है एक दूसरे का…
_ जो ऊपर से नहीं जुड़े वो कहीं न कहीं जुड़े हैं…अदृश्यता में…जीवन बोध में…
रूढ़िवादी विचारधारा एक दिन में नहीं बदली जा सकती.

_ न ही नई वैज्ञानिक विचारधारा कोई ऐसी चीज है, जिसे दूसरों पर जबरदस्ती थोप सकें.
_ वह तो धीरेधीरे किंतु दृढ़ता से विकसित हो रही है और हमारे परिवार और समाज का ढांचा बदलती जा रही है.
_ इसलिए हमें सिर्फ अपने विचारों की चिंता करनी चाहिए कि वे कहाँ तक रूढ़िवाद से मुक्त हो सके हैं और कहाँ तक नए वैज्ञानिक विचारों को ग्रहण कर रहे हैं.
समाज में निःस्वार्थ व्यक्ति कोयले के ढेर में हीरे की तरह है.

_ ऐसे व्यक्ति की पहचान, प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता स्वतः अलग हो जाती है.
_ ऐसा व्यक्ति हर किसी के लिए प्रिय होता है.
_ निःस्वार्थता एक उत्कृष्ट गुण है.
_ अपनी दया और करुणा को यदि निःस्वार्थता से जोड़ दिया जाए, तो आप का व्यक्तित्व दो गुना निखर जाएगा.
_ निःस्वार्थता की भावना को बढ़ाने से आप में अपनाने की छमता बढ़ती रहेगी.
_ कभी भी जीवन में किसी को धोखा देने के बारे में न सोचें,
_ क्योंकि ऐसा करने से आप को चंद मिनटों का आनंद तो मिल सकता है,
_ लेकिन भविष्य में आप को जिंदगीभर का दुख भी मिल सकता है.
_ इसलिए अपने अंदर निःस्वार्थता की भावना को विकसित करें.
_ ऐसा करने से आप के व्यक्तित्व में चमत्कारिक बदलाव होगा.
हर उम्र में हम दो जीवन जीते हैं एक अपनों के लिए, एक समाज के लिए,

_ अब आप तय करें कि आप किस को लगातार जीना चाहते हैं.
_ क्योंकि ज्यादातर लोग लगातार सामाजिक जीवन जीते हैं और दूसरे को तदनुसार बदल देते हैं, लेकिन यह इसके विपरीत होना चाहिए.
_ आप किस के साथ स्थिर रहने के लिए चुनेंगे ?
हमारे मन में बचपन से ही यह डर बैठा दिया जाता है कि हम समाज के बिना अधूरे हैं, कि अकेले रहना कमजोरी है.

_ हमें सिखाया जाता है कि ज़िंदगी तभी सही है जब उसके गवाह हों, जब हर उम्र में कोई साथ चलने वाला हो..
_ धीरे-धीरे यह बात इतनी गहरी उतर जाती है कि हम अपने ही साथ रहना भूल जाते हैं.!
_ हम भीड़ में सुरक्षित महसूस करने लगते हैं, पर अपने साथ बैठना भूल जाते हैं.
_ अकेलापन नहीं डराता..- अपने ही भीतर से सामना डराता है.
_ समस्या अकेले रहने में नहीं है, समस्या यह मान लेने में है कि हम अपने लिए पर्याप्त नहीं हैं.
_ समाज ने हमें साथ रहने का हुनर सिखाया, पर खुद के साथ रहने की कला नहीं.!!
इस दुनिया में जीने के लिए साहस चाहिए.

_ साहस हो तो दूसरों द्वारा परिभाषित नैतिकता से ऊपर उठकर आप जी सकते है.
_ “साहस हो तो व्यक्ति केवल समाज द्वारा दी गई नैतिकता पर नहीं जीता ; वह स्वयं भी जांचता है कि क्या वास्तव में सही है”
_ “परिपक्वता तब आती है जब व्यक्ति भीड़ की नैतिकता और अपनी अंतरात्मा के बीच अंतर करना सीख लेता है”
**”साहस केवल भीड़ के विरुद्ध खड़े होने का नाम नहीं है.
_साहस यह भी है कि जो सही लगे उसे अपनाया जाए, और जो केवल परंपरा के कारण सही माना जा रहा हो, उसे परखा जाए”**
यानी असली प्रश्न यह नहीं है :
“समाज क्या कहता है ?”
बल्कि:
“मैं जो सही मान रहा हूँ, क्या उसे मैंने स्वयं समझा है या केवल विरासत में पाया है ?”
यहीं से साहस और विवेक दोनों की शुरुआत होती है.!!
हमारी दबी हुई तमन्नाएं ज्यादा नुकसान करवा देतीं है,

_ खुलकर सब कुछ जाहिर करने और जीने के लायक दुनिया का निर्माण हमने किया ही नहीं है तो दबाकर रखते हैं और मौका मिलते ही वह बाहर आ जाती हैं और कुछ ना कुछ नुकसान करवा देतीं हैं
_ हमने जिस तरीके का समाज बनाया है, ये उसी के साइड इफेक्ट्स हैं !
_ क्योंकि हम बहुत ज्यादा स्वघोषित सभ्य बनते हैं और हर वक्त झूठ बोलते हैं और बनावटी जीवन जीते हैं
_ सच से सामना होते ही होश फाख्ता हो जाते हैं और समस्याएं खड़ी हो जाती हैं.!!
एक समाज जो इलाज को गुप्त रखता है ताकि वे भारी मुनाफे के लिए दवा बेचना जारी रख सकें, वह वास्तविक समाज नहीं बल्कि एक विशाल पागलखाना है.

A society that keeps cures a secret so they can continue to sell medication for huge profits is not a real soceity but a huge mental asylum.

समाज इतना नकली हो गया है कि सच्चे लोगों को परेशान कर देता है.

Soceity has become so fake that the truth actually bothers people.

हम वास्तव में एक सड़े हुए समाज में जी रहे हैं.. जहाँ सिर्फ़ झूठा सच, धोका और नफ़रत है.!!

_ संस्कृति की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह हमें कुछ निश्चित विचारों में कैद कर देती है.!!

चुप रहना ही सिखाती है सोसाइटी हमारी..

_बस सहे जाओ किसी को बताओ नहीं.!!
“समाज बनाने का गुमान रखना आसान है.

_ मनोरंजन और भोज में भीड़ तो हर कोई इकट्ठा कर लेता है…
_ सच्ची परीक्षा तो तब है —
_ जब आप विज्ञान, पुस्तक, चिंतन के नाम पर दस-बीस मन भी साथ नहीं जोड़ पाते.”
_ पर असली समाज वही बनाता है,, जो विचार, पुस्तक, और चिंतन के नाम पर
कुछ गिने-चुने सच्चे खोजियों को जोड़ पाए.”
कोई कितना भी डेवलप या मॉर्डन हो जाए लेकिन सामाजिक दृष्टिकोण से संकीर्णता के मामले में उबर जाने में अभी और वक्त लगेगा.
दूसरे के पैसों पर समाज सेवा करने का फैशन बहुत बढ़ गया है,
_ जबकि वास्तविक सेवा अपनी पसीने की कमाई का अंश लोगों की मदद में खर्च करना है.!!
— वह जमाना कुछ और था, जो आदेश मिला, चुपचाप मान लिया, जिससे विवाह हुआ, निभा लिया, जो परोस दिया गया वह खुश होकर खा लिया;

_वह वक्त जैसे अब न रहा..
_अब सवाल पर सवाल हैं, मुंहतोड़ जवाब है, गुणा-भाग है, चतुराई है और सबसे ऊपर ‘मेरी मर्जी’
_परिवर्तन शाश्वत है, हर पल आधुनिक समय होता है.
_समय के अनुरूप सोच और रुझान बदलते रहते हैं,
_रिश्तों की गर्माहट में भी परिवर्तन आता है _किन्तु लोग स्वयं को इस तरह स्वकेन्द्रित कर लेंगे तो _सामाजिक निर्वाह की भावना कैसे बचेगी ?
_आश्चर्य यह है कि _व्यवहार के तरीके बदल गए _लेकिन मनुष्य की अनुभूतियाँ यथावत हैं,
_उस समय भी लोग दुखी थे और आज भी दुखी हैं.
ज़िंदा लाश बन जाओ ; कोई भी बात कितनी ही गलत क्यों न हो, बस मौन रहकर हाँ में हाँ मिलाने लग जाओ.

_ अपनी राय, अपने सपने और अपनी इच्छाएँ मत बताओ और कुछ नया या अपनी इच्छानुसार करने की भी मत सोचो, बल्कि बस वही करो जो दुनिया, समाज और घर वाले करने को कह रहे हैं.
_ यक़ीन मानो, आप अपने घर और समाज के सबसे अच्छे और संस्कारी बच्चे कहलाओगे.!!
– Mayank Mishra
जब हम किसी से कुछ उम्मीद करते हैं, तो अक्सर हम निराश होने की संभावना में होते हैं.

_ इसलिए किसी से कुछ भी उम्मीद न करें, जो कुछ भी मिला है उसके लिए आभारी रहें.
– प्रकृति से जुड़ी हर चीज उसका सम्मान करती है और उसकी सबसे ज्यादा परवाह करती है.
– जो कुछ भी प्यार, देखभाल और करुणा के साथ किया जाता है, वह बहुत आगे तक जाता है और यह कई गुना और परिमाण में आता है.
– अगर कोई आपको कुछ नहीं देता है और आपको किसी चीज की सख्त जरूरत है, तो उसकी मदद करें और वह आपके बिना पूछे ही आपकी मदद करेगा.
-अपने आप पर विश्वास करें जैसे कि आप केवल खुद पर विश्वास नहीं करते हैं कि कौन करेगा.
_ हर कोई अपने आयाम में अद्वितीय है,
_ उनके मार्ग में व्यापक अनुभव है, _इसपर विश्वास करो.
_ एक इंद्रधनुष में सात रंग होते हैं,
_ मनुष्यों के पास लाखों और करोड़ों रंग होते हैं _जो विभिन्न प्रकार के लोगों के विभिन्न रंगों से भरे रंगीन जीवन जीने के लिए वास्तव में आवश्यक हैं.
– समाज को कुछ देना शुरू करें
_जैसे कि जब हम कमजोर होने के लिए पैदा हुए हैं और खुद से पूछें कि क्या आप कपड़े का एक टुकड़ा या एक कील भी लाए हैं.
_ नहीं, यह परोक्ष रूप से आपको प्रकृति द्वारा दिया गया है और आप कुछ भी वापस भुगतान नहीं कर सकते हैं बस आप उत्पादन कम कर सकते हैं.
– प्रोत्साहित करने की तुलना में हंसना आसान है और हां मानवता का द्रव्यमान भी ऐसा ही करता है.
_ यदि आप मदद नहीं कर सकते हैं तो उस व्यक्ति और उसके विचारों को अवमानना ​​में न डालें,
_ क्योंकि यह आपके प्रोग्राम किए गए दिमाग के अनुरूप नहीं है, सरल !
– अंत में, चीजों को आसान बनाएं, जीवन आसान है हम इंसान इसे जितना जटिल बना रहे हैं उतना ही जटिल बना रहे हैं.
_ नौकरी के लिए डिग्री की आवश्यकता हो सकती है
_ लेकिन जीवन में पास होने के लिए अनुभवों से सीखने के अलावा कोई डिग्री नहीं है.
— रोहन अग्रवाल [ Hiker ]
मैं खुदको Anti-social नहीं– Selective social मानता हूँ।

_ सबसे घुलना-मिलना ज़रूरी नहीं– हर बातचीत meaningful नहीं–
_ कुछ दुनिया को सिर्फ Black & white में देखते हैं।🔲
_ कुछ सुनते ही reject करते हैं— हमेशा से ऐसा ही होता आया है।
या ये सब फालतू है।
_ बिना समझे जज करना– बिना सोचे criticize करना, बिना जाने opinion बना लेना— Dramebazi इनकी आदत है।
_ कुछ लोग ऐसे भी होते हैं— Argument खत्म हो जाए, तो आवाज़ loud कर लेते हैं।📢
_ Dialogue नहीं, monologue करते हैं। पूरा स्पेस occupy कर लेते हैं।
_ सच कहूँ तो— loud + small-minded👽 एक Dangerous Combination है।
_मैं Anti-social नहीं–❌ बस high-quality✔️Interactions पसंद करता हूँ।
_ मैं Tolerate करने से ज़्यादा choose करना पसंद करता हूँ।
_ लोग कहते हैं— बददिमाग है। मुंहफट है।☹️
_ हाँ, हूँ– मैं चुप रहकर भीतर सड़ना नहीं चाहता।😐
_ मैं बस अपनी energy बचाता हूँ।
_ मैं बस अपनी सीमाएँ तय करता हूँ।
_ सच यह है—👈 मुझे भीड़ नहीं, संवाद चाहिए।
_ मुझे शोर नहीं, समझ चाहिए।
_ और जहाँ ये नहीं मिलता— वहाँ मैं दूसरों को नहीं, खुद को चुन लेता हूँ।🌷
– Yu Hi
एक लाइन है जो उम्र के साथ धीरे-धीरे समझ आती है, खासकर तब, जब इंसान 40-45 के पार निकल जाता है.

_ ऑर्थर शॉपनहॉवर ने कहा था, इंसान तब तक ही खुद रह सकता है, जब तक वो अकेला है.
_ सुनने में ये बात थोड़ी कठोर लगती है, लेकिन जिसने ज़िंदगी जी है, लोगों के बीच रहा है, रिश्तों को निभाया है, वो जानता है कि इसमें कितनी सच्चाई छिपी है.
_ शुरुआत में हमें लोगों के साथ रहना अच्छा लगता है, दोस्त, बातें, हंसी, मेल-जोल.
_ लेकिन धीरे-धीरे एहसास होने लगता है कि हर बातचीत में, हर रिश्ते में, हमें थोड़ा-थोड़ा खुद को रोकना पड़ता है.
_ कहीं अपनी बात नरम करनी पड़ती है, कहीं अपनी सच्चाई छुपानी पड़ती है, कहीं सिर्फ इसलिए हँसना पड़ता है ताकि माहौल खराब ना हो.
_ और ये जो छोटे-छोटे समझौते हैं, यही धीरे-धीरे हमें थका देते हैं.
_ समाज बुरा नहीं है, लेकिन समाज चलता ही समझौतों पर है.
_ अगर आप बिल्कुल वैसे ही रहेंगे जैसे आप हैं, तो टकराव होगा.
_ इसलिए हम अपने असली विचार, अपनी असली भावनाएँ, अपने असली रूप को थोड़ा-थोड़ा दबाते जाते हैं.
_ और एक दिन ऐसा आता है जब हम खुद से ही दूर हो जाते हैं.
_ हम “लोगों के बीच ठीक” तो दिखते हैं, लेकिन अंदर से खाली होने लगते हैं.
_ सबसे खतरनाक बात ये है कि ये सब बहुत चुपचाप होता है.
_ आपको लगेगा कि आप बस “एडजस्ट” कर रहे हैं.
_ लेकिन सच में आप खुद को छोटा कर रहे होते हैं, फिट होने के लिए.
_ धीरे-धीरे आपकी सोच की धार कम हो जाती है, आपकी अलग पहचान घुल जाती है. _ और आप भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं, बिना ये समझे कि आपने क्या खो दिया.
_ कोई इंसान जितना भीतर से गहरा होता है, उतना ही उसे समाज भारी लगता है.
_ क्योंकि जिसके अंदर बहुत कुछ चल रहा होता है, उसे हर वक्त खुद को रोकना पड़ता है.
_ उसकी हर बात, हर सोच “ज्यादा” लगती है दूसरों को.
_ और फिर वो या तो चुप हो जाता है… या खुद को बदल लेता है.
_ धीरे-धीरे इंसान एक अजीब सी हालत में पहुँच जाता है… जहाँ वो लोगों के बीच रहकर भी अकेला होता है, और अकेले रहकर थोड़ा सुकून महसूस करता है.
_ क्योंकि अकेले में उसे कुछ छुपाना नहीं पड़ता, कुछ निभाना नहीं पड़ता.
_ वो जैसा है, वैसा रह सकता है.
_ लेकिन हम अकेले रहने से डरते क्यों हैं ?
_ क्योंकि हमें अपने ही दिमाग की खामोशी से डर लगता है.
_ जब बाहर शोर नहीं होता, तब अंदर की आवाज़ें साफ सुनाई देती हैं, और हर कोई उन आवाज़ों का सामना नहीं कर पाता.
_ इसलिए हम खुद को व्यस्त रखते हैं, फोन, बातें, मीटिंग्स, शोर… ताकि हमें खुद से मिलने का मौका ही ना मिले.
_ शोपेनहावर कहते हैं. जिनके अंदर कुछ नहीं होता, वो बाहर ज़्यादा ढूंढते हैं.
_ उन्हें हर वक्त किसी का साथ चाहिए, कोई डिस्ट्रैक्शन चाहिए.
_ लेकिन जिसके अंदर सोच है, गहराई है, वो अकेले में भी पूरा होता है.
_ उसे हर वक्त लोगों की ज़रूरत नहीं होती.
_ समाज एक अजीब खेल खेलता है, वो औसत लोगों को आराम देता है, और गंभीर लोगों को असहज करके रखता है.
_ अगर आप कुछ अलग सोचते हैं, कुछ अलग महसूस करते हैं, तो आपको या तो चुप रहना पड़ेगा, या “अजीब” कहलाना पड़ेगा.
_ इसलिए बहुत से लोग अपनी असली सोच छुपा लेते हैं… सिर्फ फिट होने के लिए.
_ धीरे-धीरे यही आदत बन जाती है, और दिमाग सिकुड़ने लगता है.
_ हम वही बातें करने लगते हैं जो सब करते हैं, वही सोचने लगते हैं जो सब सोचते हैं.
_ और एक दिन हम खुद को खो देते हैं, बिना किसी शोर के.
_ असल में, अकेलापन समस्या नहीं है.
_ बिना खुद के साथ रह पाने की क्षमता ही असली समस्या है.
_ अगर आप अकेले रह सकते हैं, अपने विचारों के साथ सहज रह सकते हैं, तो आप सच में आज़ाद हैं.
_ और अगर नहीं… तो चाहे आप कितनी भी भीड़ में हों, आप भीतर से कमजोर ही रहेंगे.
_ सच तो ये है, हर बार जब आप भीड़ में खुद को दबाते हैं, आप एक कीमत चुकाते हैं.
_ और हर बार जब आप अकेले रहकर खुद को समझते हैं, आप कुछ वापस पा लेते हैं.
– इसलिए शायद ज़िंदगी का असली संतुलन यही है, भीड़ में बेशक रहो, लेकिन खुद को इसके लिए मत खोओ.
– Krishna Chaudhary
लोगों से मिलने से, बात करने से, जीवन में फ़र्क तो पड़ता है.

_ मन उत्साहित रहता है, कुछ करने के लिए मन मचलता रहता है.
_ मनुष्य का सामाजिक होना उसके अपने लिए बहुत रचनात्मक है, सकारात्मक है, अन्यथा अकेले पड़े रहो, निराशावाद को ढोते रहो, क्या करूं, क्या करूं सोच-सोच कर उदासियों को गले लगाते रहो.!!
– Manika Mohini
समाज का प्रत्येक सदस्य बाकियों की जासूसी करता है और उनके विरुद्ध मुखबिरी करना उसका कर्तव्य है.

_सभी गुलाम हैं और अपनी गुलामी में समान हैं… इसके बारे में सबसे बड़ी बात समानता है… गुलाम समान होने के लिए बाध्य हैं.
Every member of the society spies on the rest, and it is his duty to inform against them. All are slaves and equal in their slavery…
The great thing about it is equality… Slaves are bound to be equal.
– Fyodor Dostoevsky
एक व्यक्ति जो पूरी तरह से अलग-थलग नहीं हुआ है,

_ जो संवेदनशील बना हुआ है और महसूस करने में सक्षम है,
_ जिसने गरिमा की भावना नहीं खोई है, जो अभी तक ‘बिकाऊ’ नहीं है,
_ जो अभी भी दूसरों की पीड़ा सह सकता है,
_ जिसने अर्जित नहीं किया है पूरी तरह से अस्तित्व का तरीका –
_ संक्षेप में, एक व्यक्ति जो एक व्यक्ति बनकर रह गया है और एक वस्तु नहीं बन पाया है
– वह वर्तमान समाज में अकेला, शक्तिहीन, अलग-थलग महसूस करने से बच नहीं सकता है.
A person who has not been completely alienated, who has remained sensitive and able to feel, who has not lost the sense of dignity, who is not yet ‘for sale’, who can still suffer over the suffering of others, who has not acquired fully the having mode of existence – briefly, a person who has remained a person and not become a thing – cannot help feeling lonely, powerless, isolated in present-day society. – Erich Fromm
अधिकांश लोगों का मानना ​​है कि जब तक किसी बाहरी शक्ति द्वारा उन्हें कुछ करने के लिए खुलेआम मजबूर नहीं किया जाता है, तब तक उनके निर्णय उनके हैं,
_ और यदि वे कुछ चाहते हैं, तो वे ही इसे चाहते हैं.
_ लेकिन यह हमारे अपने बारे में मौजूद सबसे बड़े भ्रमों में से एक है.
_ हमारे अधिकांश निर्णय वास्तव में हमारे अपने नहीं होते _ बल्कि हमें बाहर से सुझाए जाते हैं;
_ हम खुद को यह समझाने में सफल हो गए हैं कि यह निर्णय हमने ही लिया है,
_ जबकि हम वास्तव में दूसरों की अपेक्षाओं के अनुरूप हैं, अलगाव के डर से और हमारे जीवन, स्वतंत्रता और आराम के लिए अधिक प्रत्यक्ष खतरों से प्रेरित हैं
Most people are convinced that as long as they are not overtly forced to do something by an outside power, their decisions are theirs, and that if they want something, it is they who want it.
But this is one of the great illusions we have about ourselves.
A great number of our decisions are not really our own but are suggested to us from the outside; we have succeeded in persuading ourselves that it is we who have made the decision, whereas we have actually conformed with expectations of others, driven by the fear of isolation and by more direct threats to our life, freedom, and comfort.
– Erich Fromm

सुविचार – भाषा – 072

13429353833_a1bc874db6

शरीर की भाषा सबसे ज्यादा बोलती है.

_ भाषा शरीर का ऐसा अदृश्य अंग है, जिसमें इंसान का सब कुछ दिखाई देता है.!!

कोई भी भाषा को भाषा के ही रूप में प्रयोग करना चाहिए — मतलब, भाषा विचारों के आदान-प्रदान का साधन है. _बस !!

_सांकेतिक भाषा से भी विचारों का आदान प्रदान होता है. _ इसको निज-गौरव इत्यादि जैसी बातों से जोड़ना सही नहीं है.

मनोवैज्ञानिक बेंजामिन होर्फ के मुताबिक ” भाषा हमारे सोचने के तरीके को स्वरुप प्रदान करती है और निर्धारित करती है कि हम क्या- क्या सोच सकते हैं ?”

कहने का अर्थ यह है कि हमारे शब्द खुद ही भीतर और बाहर के एक परिवेश का जाल रचते हैं, इसलिए ख्याल रहे कि अपमानजनक लहजे और अश्लील शब्दों के साथ किया गया संचार एक चक्रव्यूह की तरह होता है. यह आपके आसपास नकारात्मकता का एक ऐसा जाल निर्मित कर देता है, जिसमें एक बार फंस जाने के बाद यह व्यवहार आपकी बोली और भाषा का हिस्सा बन जाता है. इससे लोगों की नजर में आपकी वैल्यू गिरती जाती है. अतः कोशिश यही होनी चाहिए कि आप इस दिखावटी आत्मविश्वास और कूल दिखनेवाली भाषाई बेहूदगी से बच कर रहें.

शब्दों को तहजीब का साथ न मिले तो अर्थ का अनर्थ होते देर नहीं लगती. इतना ही नहीं, भाषा की अभद्रता रिश्तों से लेकर माहौल तक, हर चीज में नेगेटिविटी भर देती है. गलत ढंग और गलत मंशा से कहे गये शब्द कुछ भी सही नहीं होने देते. अगर संवाद का तरीका गलत हो, तो कुछ सकारात्मक होने की उम्मीद ही कहां बचती है ? अतः यह समझना जरुरी है कि हमें केवल अपनी बात को कहना ही नहीं, बल्कि उसे सही ढंग से कहने की भी कला भी आनी चाहिए. इसकी बुनियाद है शब्दों की शालीनता.
अभद्र भाषा कहीं से भी प्रोग्रेसिव होने की निशानी नहीं है. सच तो यह है कि प्रोग्रेसिव विचारों का अश्लील और अभद्र भाषा से कोई लेना- देना नहीं. प्रोग्रेसिव या प्रगतिशील होने का अर्थ है – सही गलत का विवेक रखते हुए अपनी बात को दृढ़ता के साथ साझा करना और किसी का अपमान न करते हुए आत्मविश्वास के साथ अपनी बात कहना तथा अन्य लोगों के दृष्टिकोण का सम्मान करना. अतः अगर प्रोग्रेसिव होने के नाम पर आप अपनी जुबान बिगाड़ रहे हैं, तो संभल जाइए.
किसी को अभद्र भाषा से ठेस पहुंचा कर आप भी सिर्फ ईर्ष्या, द्वेष, असहजता, अपमान और रिश्तों में दूरियां ही पा सकते हैं. इससे सामनेवाले की नजरों में आपकी नकारात्मक छवि बनती है. बोलने का सही ढंग और मर्यादित शब्द आपके व्यक्तित्व की प्रभावी और पॉजिटिव इमेज की सौगात देते हैं. याद रखें, जो लोग मानसिक रूप से मजबूत होते हैं, वे लोग हमेशा सधे, संतुलित और संयमित शब्दों में ही अपनी बात कहते हैं.
अक्सर लोग तनाव हो या गुस्सा आने पर अमर्यादित शब्दों का उपयोग करते हैं. पर यह जरुरी तो नहीं कि तनाव या गुस्सा जाहिर करने का तरीका बिगड़े बोल ही हों. आप लिख कर, मौन रह कर, कहीं घूम कर आदि के जरिये भी अपने तनाव को कम कर सकते हैं. इसके लिए असभ्य शब्दों को संवाद में शामिल करना आपकी कमजोरी दर्शाता है. घर हो या दफ्तर, गालियां देकर या किसी का मजाक बना कर आप किसी भी तरह औरों से बेहतर साबित नहीं हो सकते. इस ख्याल को अपने मन से निकाल दें कि अभद्र शब्दों के उपयोग से आपकी छवि एक बेबाक, बिंदास और आधुनिक वक्ता की बनेगी. आपकी बात पर लोग गौर करेंगे या आप अपनी बात मनवाने में सफल होंगे. सच तो यह है कि होता इससे बिलकुल उल्टा है.
कुछ लोग शौकिया या फैशन के तौर पर अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं, जो कि आगे चलकर उनके धैर्य और समझ पर हावी होती है. अभद्र शब्द आपकी बातचीत में इतनी गहराई से जड़ें जमा लेते हैं कि फिर आपके सामने बच्चे हों या बड़े, घर हो या बाहर आप बिना सोचे- समझे इन शब्दों का इस्तेमाल करने लगते हैं. छोटी- छोटी बातों में धैर्य खोने लगते हैं. जिस तेजी से धैर्य और समझ खोती जाती है उसी तेजी से आक्रोश जताने के लिए ऐसे शब्द आपकी लाइफ स्टाइल का हिस्सा बन जाते हैं. इस कारण यह अभद्र भाषा आपसे जुड़े लोगों के मन को चोट पहुंचाने लगती है. लोग आपके साथ बातचीत ना करने की राह तलाशने लगते हैं. आपसे अपनी व्यक्तिगत बातें शेयर करना छोड़ देते हैं, कारण असभ्य या अश्लील व्यवहार किसी समस्या का हल नहीं होते. हाँ, नासमझी और नकारात्मकता से पूर्ण संवाद का यह तरीका आपके लिए नयी परेशानियां जरूर खड़ी कर देता है.
बात ज़बान से और तीर कमान से, निकल जाए तो वापस नहीं आते.

_ अपनी भाषा, व्यवहार, धारणाओं और आग्रहों पर नियंत्रण की पूरी कोशिश रहनी चाहिए.
_ कई बार अपनत्व के चलते हम किसी ‘अपने’ के लिए औरों से भिड़ पड़ते हैं, कभी-कभी तो दुश्मन तक बना बैठते हैं, और एक दिन हमारा वही ‘अपना’ उसी इंसान के साथ हँसी-ठिठौली करता पाया जाता है.
_ फिर आप कहीं के नहीं रहते.
_ ख़ुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं.
_ मनुष्य की निष्ठा, उसके सुखवाद और तुष्टीकरण के समानुपाती होती है.
_ स्थिर कुछ भी नहीं रहना है.
_ किसी के साथ अपनत्व निभाइये, ख़ूब निभाइये, मगर उसके शब्दोँ, भावों और मूल्यों पर आँख मूँदकर भरोसा मत कीजिए, वर्ना न केवल आप दुःखी होंगे, बल्कि किसी अपराध’बोध की गिरफ़्त में भी आ सकते हैं.
_ गतिमान होते हुए भी थोड़ा स्थिर रहिये, लिप्त होते हुए भी थोड़ा निर्लिप्त रहिये.!!
– Sahil Tyagi
मुझे पश्चिमी सभ्यता में रचे-बसे लोग भी अच्छे लगते हैं.

_ उनके पहनावे से और अंग्रेज़ी भाषा बोलने से मुझे कोई आपत्ति नहीं.
_ व्यक्ति आधुनिक लगता है और मुझे आधुनिकता पसंद है, सिर्फ़ दिखने में नहीं बल्कि अंतर्मन में विचारों से.
_ पुरुषों के पहनावे से कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि सामान्यतः भारतीय पुरुष पैंट, कमीज़, कोट आदि पहनते हैं, धोती, पाजामा नहीं.
_ लड़कियों के पहनावे से पता चलता है कि वे भारतीय संस्कृति के अनुरूप सज संवर रही हैं या पश्चिनी सभ्यता के अनुसार पोषाक पहने हैं.
_ पश्चिमी फैशन में अलग तरह का ग्लैमर है, लेकिन भारतीय फैशन में जो सात्विक सौंदर्य है, वह अद्भुत है.
– Manika Mohini

सुविचार – पड़ोस – पड़ोसी – 071

13421957573_4d1f210521

वो आज नाराज हैं, तो कल उन्हें मना लेंगे हम, _

_ पड़ोसियों से बोलचाल बन्द हो तो मोहल्ला नहीं बदला करते..!

वह व्यक्ति वास्तव में अच्छा है, जिसका पड़ोसी उसे अच्छा मानता हो ..
एक अच्छे पड़ोसी में क्या – क्या गुण होते  हैं ?

Answer:

  • एक अच्छे पड़ोसी में एक दोस्त की तरह एक परिवार की तरह रहने के गुण होने चाहिए.
  • अच्छे पड़ोसी को अपने सामने वाले पड़ोसी की मदद के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए, _ कभी भी मना नहीं करना चाहिए.
  • पड़ोसी को हमेशा सभी त्योहार मिलकर मनाने चाहिए.
  • आपस में ऐसे रहना चाहिए जैसे लगे एक परिवार हो.
  • आपस में विश्वास होना भी बहुत बड़ा गुण है.
  • एक- दूसरे के घर का ध्यान रखना चाहिए.
  • किसी और की बातों में आ कर _ किसी का विश्वास करके _ लड़ाई नहीं करनी चाहिए.
पड़ोस सामाजिक जीवन के ताने-बाने का महत्तवपूर्ण आधार है, _ दरअसल पड़ोस जितना स्वाभाविक है, हमारी सामाजिक सुरक्षा के लिए तथा सामाजिक जीवन की समस्त आनंदपूर्ण गतिविधियों के लिए वह उतना ही आवश्यक भी है,

_ यह सच है कि पड़ोसी का चुनाव हमारे हाथ में नहीं होता, इसलिए पड़ोसी के साथ कुछ न कुछ सामंजस्य तो बिठाना ही पड़ता है.

पड़ोसियों से हमारा रिश्ता सामान्य होता है वे न तो हमारे घनिष्ठ मित्र होते हैं और न ही शत्रु _ परंतु फिर भी वे हमारे करीबी होते हैं.

_ जब आपको कोई मुसीबत होती है तो रिश्तेदार बाद में काम आते हैं सबसे पहले पड़ोसी ही काम आते हैं.

किसी पड़ोसी के यहा जाएं, तो उसके घर प्रवेश करने से पहले शालीनता से अनुमति अवश्य ले लें, _ _ जबरन आ धमकने वाले बिन बुलाए मेहमानों को कोई पसंद नहीं करता,,

_ जरूरत पड़ने पर अगर आपने पड़ोसी से उसकी कोई चीज मांगी है, तो वायदे के मुताबिक समय पर उसे लौटाने का ध्यान जरूर रखें.

मुश्किल के समय में सबसे पहले हमारे पड़ोसी ही हमारे काम आते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा, जब हम पड़ोसियों के साथ सामान्य शिष्टाचारों का ध्यान रखें.
अगर सबसे ज़रूरी कोई बात है तो आपस में मिलना है,_ चाहे वो दोस्त हों या पड़ोसी या कोई और लोग, _

_ दिलों में दूरियों के बढ़ने का एक ही कारण है और वो है कम मिलना या नहीं मिलना..

  • ” अपने पड़ोसियों से अनजान बनकर न रहें, उनसे बोलचाल रखें “
  • ” आपके पड़ोसी आपको तभी जानेंगे, जब आपका उनसे परिचय, बोलचाल होगा “
पड़ोसी होने से हम एक दूसरे के घरों में भी जाकर बैठ सकते हैं गली में भी चहल – पहल रहती है, _

पड़ोसी कोई भी छोटा बड़ा काम एक दूसरे के साथ मिलकर करते हैं, _ पड़ोसी होने से हमें कभी किसी प्रकार का खतरा नहीं रहता, _

वे हमारे दुःख सुख में सबसे पहले हमारे लिए खड़े होते हैं, _ _ पड़ोसी हमारी गैर मौजूदगी में हमारे घर की देखभाल भी करते हैं.

पड़ोसियों की मदद के लिए खुद आगे आएं, _

  • ” आप उनके काम आएंगे, तो वे भी जरूरत पड़ने पर आपके साथ होंगे “
पड़ोसियों के साथ अकड़ू न बनें, न ही डींग हाकें

– ” यदि आप पड़ोसियों को छोटा जताने की कोशिश करेंगे, तो वे आपको कभी पसंद नहीं करेंगे. “

घर से बाहर निकलते समय यह जरूर देख लें कि आपने आधे-अधूरे कपड़े तो नहीं पहन रखे हैं.

  • ” इससे आपके पड़ोसियों को अटपटा लग सकता है, _ सलीके से कपड़े पहनने पर वे आपकी तारीफ करेंगे और इस आदत से आप आगे भी सम्मान पाएंगे “
भूलकर भी पड़ोसियों के बारे में कोई अंट – शट बात न कहें.

  • ” बातें अक्सर घूम-फिरकर उसी तक पहुंच जाती हैं, जिससे संबंधित होती हैं, _ फिर सोचिए, वह आपके बारे में क्या सोचेगा ?
पड़ोसियों के यहां से कोई निमंत्रण आए और आप व्यस्त न हों तो उसमें अवश्य जाएं, _ अगर किसी वजह से न जा पाएं, तो क्षमा अवश्य माग लें.

  • ” आप ऐसा करेंगे, तो वे भी आपके निमत्रण पर सहर्ष आना पसद करेंगे “
 

सुविचार – राय – सलाह – 070

जब तक कोई सलाह मांगे नहीं, तब तक देना मत ; _

_और जब कोई सलाह मांगे, तो तभी देना, जब तुम्हारे जीवंत अनुभव से निकलती हो..

एक व्यक्ति जो लगातार आपकी सलाह मांगता है, फिर भी हमेशा आपके कहे के विपरीत काम करता है.

A person who constantly asks for your advice, yet always does the opposite of what you told them.

जिस व्यक्ति की सलाह का कोई मूल्य है, _ वह कभी बिना मांगे सलाह देता ही नहीं है..
सलाह देने वाले लोग होते हुए भी, _ अपनी आत्मा की आवाज सुनना सबसे बेहतर है !!
समस्या का समाधान इस बात पर निर्भर करता है कि हमारा सलाहकार कौन है.
किसी की सलाह से रास्ते जरूर मिलते हैं, पर मंजिल तो खुद की मेहनत से मिलती है.
जब कोई अपना घर नहीं संभाल पाता तो वह दूसरों की चौखट पर सलाह देने निकल पड़ता है.
दूसरों की राय बदलने में वक्त बर्बाद मत करो,

_ अपना फोकस काम पर रखोगे तो नतीजे खुद जवाब देंगे.!!

आजकल लोग सलाह को ताना समझ लेते हैं,
_और फ़िक्र को दखलअंदाज़ी.!!
सलाह देने सब आ जाते हैं, साथ देने के लिए कोई नहीं आता.
“जिस दिन लोग आपकी राय तय करने लगे, उस दिन आपकी राय रह ही नहीं जाती”
स्वयं को जानने वाला व्यक्ति दूसरों की राय पर निर्भर नहीं रहता.
जो व्यक्ति स्वयं को जान लेता है, वह अब दूसरों की राय पर निर्भर नहीं रहता.!!
जब आप खुद को अपनाते हैं, तब दुनिया की राय की कोई चिंता नहीं रहती.!!

_ आपके जीवन का अपना कुछ मूल उद्देश्य है, सार्थक लक्ष्य है, आप केवल उस पर ध्यान दो,
_ लोग आपको पसंद करते हैं या नापसंद करते हैं या आपके लिए अपशब्द का प्रयोग करते हैं, या तारीफ करते है,
_ ये सब बात एक समय के बाद धूमिल हो जाती हैं..!!
लोग अक्सर अपनी राय, सलाह या जवाब देने में जल्दबाजी करते हैं,

_ लेकिन दूसरों के सवालों को सुनने या समझने में समय नहीं लगाते.!!

आपको ऐसी सलाह देने वाले बहुत कम मिलेंगे, जिससे आपका फायदा हो.

परंतु ऐसी सलाह देने वाले बहुत मिल जाएंगे, जिससे उनका अपना फायदा हो.

मानसिकता ऐसी हो गयी है कि अगर किसी को अच्छी सलाह दी जाए, तब भी सामने वाला समझता है कि उन पर अपनी बातें थोपना चाहता है.!
परेशानी में कोई सलाह मांगे तो सलाह के साथ अपना साथ भी देना…

_ क्योकि सलाह गलत हो सकती है… साथ नहीं…!!!

सलाह उसकी मानो _ जो सहयोग भी करता हो ;

_ क्योंकि सलाह के बिना सहयोग का कोई मूल्य नहीं..

बुद्धिमान व्यक्ति को सलाह की जरुरत नहीं होती, _

_ और मूर्ख व्यक्ति आपकी सलाह मानेगा नहीं.

जिंदगी में सिर्फ दो लोगों की सलाह लेना :-

– पहला ऐसे लोग खुद कामयाब हुए हैं, ऐसे लोगों से आप सीख सकते हो कि क्या करना चाहिए,

– दूसरा ऐसे लोग जो बहुत नाकामयाब हुए है, ऐसे लोग से आप सीख सकते हो कि क्या नहीं करना चाहिए,

– ऐसे लोगों की कभी सलाह मत लेना जो Normal Life जीते हैं, जो कामयाब भी नहीं हैं और नाकामयाब भी नहीं हैं,

मतलब कुछ बड़ा करने की कोशिश ही नहीं की.

दूसरों से मिलने वाली सलाह को तुरंत भूल जाइए, क्योंकि किसी और को यह बताने देना कि आपको क्या करना है और क्या नहीं, अपने आप में सबसे बड़ी मूर्खता है.

_ जब कोई बात आपको अजीब लगे या उलझन में डाले, तो उसी पल अपने दिल और दिमाग की सुनिए और जैसा आपको सही लगे, वैसा कीजिए.!!
खुद को प्रेरणा देना, खुद को सलाह देना बहुत सुंदर परिकल्पना है. कैसी भी स्थिति आ जाए खुद को राय देना और अपनेआप से मशविरा करना बहुत सकारात्मक रिजल्ट दिलवा देता है.

पराजित वह होता है जो स्वयं से संवाद करना बंद कर देता है. माना कि जीवन की जद्दोजेहद बहुत सारी हैं और उन का कोई रूप हमें दिखाई भी नहीं दे रहा है पर अपने अंतर्मन से राय ले कर देखें, तमाम जटिलताएं सुलझ जाएंगी.

शुरुआत से जीवन के अन्त तक हमें क्या हासिल होगा, हमारा जीवन कैसा होगा, यह सब समय समय पर लिए जाने वाले हमारे निर्णयों पर निर्भर करता है. कोई भी निर्णय लेने से पहले आत्मविष्लेशण जरुर करें, जहाँ एक सही निर्णय ज़िन्दगी बना सकता है, वहीँ गलत फैसला ज़िन्दगी बिगाड़  भी सकता है.

कभी- कभी हम कुछ फैसले अपने बड़ों या आस पास के लोगों के दबाव में ले लेते हैं, जो भविष्य में हमारे लिए मुसीबत बन जाते हैं. इसका मतलब यह नहीं कि हमें किसी की सलाह पर अमल नहीं करना चाहिए, पर हमें सलाह और दबाव में अन्तर करना आना चाहिए.

लोगों की मानसिकता ऐसी हो गयी है या फिर लोगों में आधुनिकता घर कर गयी है,

_ उन्हें यदि अच्छी सलाह दी जाए, तब भी वे सिर्फ वहीं तक समझ पाते हैं कि सामने वाला उन पर अपनी बातें थोपना चाहता है…!

**दुनिया में करोड़ों लोग हैं, लेकिन हम अपनी जिंदगी का फैसला अक्सर…

_ उन्हीं कुछ लोगों की राय से करवाते रहते हैं,
_ जिन्हें हमारे जीवन की पूरी कहानी मालूम भी नहीं.
_ अपनी जिंदगी, उन्हें मत सौंपिए.
_ उनकी राय सुनिए, उनका सम्मान कीजिए,
_ लेकिन अपनी जिंदगी का निर्णय अपनी समझ से कीजिए.
_ क्योंकि जिंदगी आपकी है- जीना आपको है.
———
– दुनिया बहुत बड़ी है, लेकिन हमारी मनोवैज्ञानिक दुनिया बहुत छोटी होती है.
_ हमारे आसपास के 100–200 लोग धीरे-धीरे हमारे लिए एक तरह का “आईना” बन जाते हैं.
_ उनकी राय से हम अपनी सफलता, सुंदरता, हैसियत, व्यवहार और यहाँ तक कि अपनी खुशी तक मापने लगते हैं.
_ फिर अनजाने में सवाल यह नहीं रहता कि “मुझे कैसा जीवन चाहिए?”, बल्कि यह हो जाता है- “ये लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे ?”
_ यहीं से परेशानी शुरू होती है.
ऐसा क्यों होता है ?
1. अपनापन और स्वीकार किए जाने की जरूरत:
_ इंसान सामाजिक प्राणी है.
_ अपने लोगों की स्वीकृति हमें सुरक्षा देती है.
_ इसलिए उनकी नाराज़गी या असहमति अपेक्षा से ज्यादा बड़ी लगती है.
2. परिचित लोग हमारी “सामाजिक दुनिया” बन जाते हैं:
_हम रोज उन्हीं चेहरों को देखते हैं, उन्हीं से तुलना करते हैं.
_ करोड़ों अनजान लोगों की राय का कोई वजन नहीं होता ; पड़ोसी या रिश्तेदार की टिप्पणी बहुत असर कर सकती है.
3. तुलना का चक्र:
_ किसी की गाड़ी, घर, नौकरी, शादी, पैसा, यात्रा- हमारी नज़र बार-बार उन्हीं कुछ लोगों पर जाती है.
_ फिर अपनी जिंदगी को उनकी जिंदगी से मापना शुरू कर देते हैं.
4. पुरानी भूमिकाएँ :
_ परिवार और पुराने रिश्ते अक्सर हमें उसी पुराने रूप में देखते रहते हैं.
_ हम बदल भी जाएँ, उनकी अपेक्षाएँ नहीं बदलतीं.
5. हम अपनी खुशी की चाबी बाहर रख देते हैं
और फिर कोई तारीफ करे तो अच्छा, आलोचना करे तो खराब.
_ यानी मन का रिमोट दूसरे लोगों के हाथ में चला जाता है.
———————————
सही समाधान क्या है ?
_ मेरे हिसाब से समाधान लोगों को छोड़ देना नहीं, बल्कि उनका प्रभाव सही अनुपात में रखना है.
– एक बहुत उपयोगी सवाल रोज अपने आप से पूछ सकते हो :
– “अगर इन 100–200 लोगों की राय मेरे बारे में बिल्कुल मायने न रखती, तो मैं अपनी जिंदगी में क्या अलग करता ?”
– इसका जवाब काफी कुछ खोल देगा.
फिर चार चीजें करो:
1. अपना “आंतरिक दायरा” बनाओ.
_ कुछ लोग ऐसे हों, जिनकी राय वास्तव में आपके लिए महत्वपूर्ण हो – क्योंकि वे आपको समझते हैं, ईमानदारी से बताते हैं और आपका भला चाहते हैं.
_ हर परिचित को सलाहकार मत बनाइए.
2. बाकी लोगों की राय को सूचना मानो, आदेश नहीं.
_ कोई कहता है “तुम्हें ऐसा करना चाहिए”
मन में कहो:
_ “ठीक है, तुम्हारी राय मैंने सुन ली, अब फैसला मैं करूँगा”
_ यह छोटा-सा बदलाव बहुत बड़ी स्वतंत्रता देता है.
3. अपनी जिंदगी का पैमाना खुद तय करो
दूसरों से पूछने के बजाय :
_ क्या मैं शांत हूँ ?
_ क्या मैं स्वस्थ ढंग से जी रहा हूँ ?
_ क्या मेरे पास पर्याप्त है ?
_ क्या मेरा समय मेरी पसंद की चीज़ों में जा रहा है ?
_ क्या अपनी नजरों में सम्मान बना रहता है ?
– अगर इन सवालों के जवाब अच्छे हैं, तो बाहरी ranking बहुत मायने नहीं रखती.
4. अपनी दुनिया थोड़ी बड़ी करो :
_ यात्रा, पढ़ना, प्रकृति, नए लोगों से मिलना, अलग संस्कृतियाँ देखना, नए अनुभव लेना- इनसे पता चलता है कि जिसे हम “दुनिया” समझ रहे थे, वह वास्तव में हमारी छोटी-सी परिचित दुनिया थी.
_ और शायद यही कारण है कि यात्रा इंसान को इतना बदल देती है – वह हमारे सामाजिक घेरे की सीमाएँ तोड़ देती है.!!

हम जीवन के हर मोड़ पर औरों की राय लेते हैं, हमारे हर चुनाव पर उनकी छाप होती है.

_ हम चलते हैं के हिसाब से… सोचिए ! क्या हम वास्तव में आगे बढ़ रहे हैं या और पीछे जा रहे हैं ?
_ हम उनसे सलाह इसलिए लेते हैं, क्योंकि उनके पास जीवन का अनुभव ज़्यादा है, ‘नहीं’ केवल उम्र बढ़ जाने से अनुभव नहीं बढ़ते.
_ केवल बाल सफेद हो जाने से जीवन की समझ नहीं आ जाती.
_ बाल तो उम्र भर चार दिवारी में कैद रहने वाले व्यक्ति के भी पक जाते हैं.
_ ग़ौर से देखिए, आप जिनसे सलाह लेते हैं उन्होंने कितनी किताबें पढ़ी है, अपने कदमों से कितनी दुनिया नापी है, कितने दार्शनिकों, चिंतकों, विचारकों, वैज्ञानिकों को जाना-समझा है.
_ क्या वे नये अनुभवों के प्रति खुले रहते हैं ? क्या उनमें तर्क करने की क्षमता है ? क्या वे पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर स्वतंत्र चिंतन कर सकते हैं ?
_ क्या उनमें सच सुनने की हिम्मत है ? सच बोलने में उनकी ज़बान काँपती है या नहीं ?
_ केवल परम्परा को ढोने और भीड़ के पिछलग्गू होने से अनुभव नहीं आ जाते.
_आप सोच के स्तर पर आगे नहीं, पीछे, पीछे और पीछे… जा रहे हैं.
_ आपका मानसिक विकास नहीं, पतन, पतन और पतन… हो रहा है.
—————————————————————————
— आदमी बड़ी उत्सुकता से दुनिया-जहान की बात करता है – वह दूसरे लोगों की बात करेगा, आस-पड़ोस की बात करेगा, राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज, धर्म, संस्कृति, सभ्यता की बात करेगा.
_ लेकिन जैसे ही बात के केन्द्र में उसकी अपनी ज़िन्दगी को लेकर आओ – पूछो कि तुम जैसे जी रहे हो, क्या यह जीने का उत्कृष्ट तरीका है ?
_ तुम जो कर रहे हो, क्या यह करना सर्वथा उचित है ?
_ क्या तुम जो मानते हो, उसकी बुनियाद मजबूत है ?
_ क्या तुम जो सोचते हो, उसे ईमानदारी से परखा है ?
_ कभी सोचा है कि तुम इतना डरे हुए से, दबे हुए से क्यों रहते हो ?
_ क्या तुम्हें सच में लगता है कि तुम्हारा जीवन सार्थक है ?…
– वह इस कदर झुंझला जाता है, मानो दुनिया का सबसे खतरनाक मिसाइल उसकी ओर छोड़ दिया गया हो..
_ और आसपास उसकी पकड़ में जो भी चीज़ आती है, वह उससे अपनी सुरक्षा करने की भरपूर कोशिश करता है.
_ लेकिन उसे गहराई से यह पता होता है कि वह कितना भी हाथ-पाँव मार ले, वह अपने आप को नहीं बचा पाएगा.
_ अजीब स्थिति है उसकी – वह दुनिया-जहान के बारे में बहुत-कुछ जानता है,
_ लेकिन अपने बारे में कुछ भी नहीं जानता.
— Chhitij

सुविचार – शत्रु – दुश्मन – 069

13426361293_89d7faae7e

बहुत बार ऐसा होता है कि मित्र के मरने पर इतनी हानि नहीं होती, जितनी शत्रु के मरने पर हो जाती है. क्योंकि वह जो विरोध कर रहा था, वही आपके भीतर चुनौती भी जगा रहा था. वह जिसके विरोध और संघर्ष में आप सतत रत थे, वही आपका निर्माण भी कर रहा था.

साधारणतः देखने में ऐसा लगता है कि अगर आपका शत्रु मर जाए, तो आप ज्यादा सुख में होंगे; लेकिन शायद आपको पता न हो कि आपके शत्रु के मरते ही आपके भीतर भी कुछ मर जाएगा, जो आपके शत्रु के कारण ही आपके भीतर था.

नकारात्मक सोच हर मर्ज की जड़ है. हम जिन्हें शत्रु समझते हैं, दरअसल वे व्यायामशाला के वो भार हैं, जो हमारे शरीर सौष्ठव को निखारने में मुख्य भूमिका का निर्वहन करते हैं. शत्रुविहीन व्यक्ति कभी आसमान नहीं छू सकता.

सकारात्मक सोच के सहारे आप बड़े- से- बड़े अवरोधों का सामना सुगमता से कर सकते हैं.

यदि आपका कोई दुश्मन नहीं है तो इसका अर्थ है कि आप उन जगहों पर भी ख़ामोश रहे _ जहाँ बोलना बहुत ज़रूरी था.
आपसे बड़ा शत्रु आपके जीवन के लिए और कोई भी नहीं हो सकता, खुद को खुद से बचाओ.!!
जब आपने किसी का हित किया हो और वही आपका दुश्मन बन गया हो..

_तो यूँ समझें कि ऐसे दुश्मन भी आप को ही निखारते हैं.!!

सुविचार – मूर्ख – मुर्ख – बेवकूफ – नासमझ – अक्ल – बेअक्ल – बेअकल – मंदबुद्धि – क्रैक होना – हिला होना – 068

13423881774_65af7189c5

समझदार बोलता है क्योंकि उसके पास बोलने या बांटने के लिए अच्छी बातें होती हैं,

_ लेकिन एक बेवकूफ मात्र इसलिए बोलता है.. क्योंकि उसे कुछ न कुछ बोलना होता है.

लोगों को दिखाओ कि आप मूर्ख हो, आपको कुछ नहीं पता..

_ इससे आप उनके मनसूबे जान पाओगे.!!

जो भी बुद्धिमान व्यक्ति किसी मूर्ख के साथ बहस करता है, उसे नुकसान उठाना पड़ता है.

अगर हम परेशानियों से बचना चाहते हैं तो मूर्ख व्यक्ति से दूर ही रहना चाहिए और उसके साथ बहस करने की गलती नहीं करनी चाहिए.

जिस तरह से आकाश में मिट्टी उछालने पर, वह मुहँ पर ही गिरती है ; _उसी तरह से मूर्ख व्यक्ति, जब अच्छे लोगों के साथ, बुरा करने की कोशिश करते हैं तो _ उनका खुद का ही बुरा होता है ..!!
जिसे आपकी कोई बात समझ नहीं आए, फिर भी आप उसे समझाते जाएँ और मन में सोचते भी जाएँ कि यह मूर्ख मेरी बात नहीं समझ रहा तो, _ मूर्ख वह नहीं, आप हैं. “आप एक जड़बुद्धि के पीछे क्यों पड़े हैं ?”
सच्चे होने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि मूर्खो से मुक्ति जल्द ही मिल जाती है..

_ और मूर्खो को उनकी मूर्खता का सबसे बड़ा लाभ ये होता है कि..
_ उनके जैसे और कई मूर्ख उनको मूर्ख बनाने के लिए उनके निकट बने रहते हैं.!!
जब किसी मूर्ख के हाथ में पावर आता है, तो सबसे पहले वह बुद्धिमानों की आवाज़ ख़ामोश करता है.

_ फिर अपने चारों तरफ़ दूसरे मूर्खों की भीड़ जमा करता है.!!
मूर्ख इंसान की जुबान ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन होती है,

_ क्योंकि वो सुनने में कम और बोलने में ज़्यादा विश्वास रखता है.!!
बहस में ज्ञानी और सच्चे लोग अक्सर मौन हो जाते हैं, मूर्ख और झूठे लोग

खुद को सही साबित करने के लिए जरुरत से ज्यादा दलीलें पेश करते हैं.

अक्लमंद आदमी जो कुछ बोलता है, सोच समझ कर बोलता है.

बेवकूफ बोल लेता है, तब सोचता है कि वह क्या कह गया.

समस्या पैदा करने के लिए आपका मजबूत होना जरूरी नहीं है,

_ बस आपका मूर्ख होना जरूरी है.

मूर्ख होने में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन जिद्दी होना

और इस बात पर जोर देना कि आपकी मूर्खता ज्ञान है, यह एक समस्या है.

पहला सिद्धांत यह है कि आपको स्वयं को मूर्ख नहीं बनाना चाहिए ;

_और आप सबसे पहले खुद को ही मूर्ख बनाते हैं.!!

मूर्ख से बहस कर आप जीत नहीं सकते, इसलिए उसे ही जीतने का घमंड पालने दो..

_ क्योंकि तर्क सिद्धांत वे मानते नहीं.!!

जीवन में मूर्ख और धोखेबाज़ अच्छे नही लगते..
_लेकिन फिर भी यही जीवन है कि.. इनके बीच ही जीना है.!!
मूर्ख लोगों के साथ बहस करने के लिए जीवन बहुत छोटा है.

Life is too short to argue with stupid people.

मूर्ख होने के लिए कोई उम्र तय नहीं होती, आप किसी भी उम्र में मूर्ख हो सकते हैं.
मूर्ख व्यक्ति एक ही काम बार-बार करता है और अलग परिणाम की उम्मीद करता है.
[su_quoteमुर्ख लोग धैर्य रखना जानते ही नहीं हैं, कुछ न कुछ मुंह खोल कर बकवास करना ही है.!!][/su_quote]
“हर कोई आपको समझे, ये ज़रूरी नहीं…- पर खुद को समझना ज़रूरी है”
नासमझ- बेवकूफ चाहते हैं कि हर कोई “उनकी तरह सोचे”

The idiots wish everyone would think like them.

मूर्खों की संगति में सुखी रहने की बजाय, समझदारों के साथ दुखी रहना बेहतर है !!
मैंने मूर्खों की एक खासियत देखी है, उन्हें पूरा यकीन होता है कि वे बुद्धिमान हैं..
एक मूर्ख से समझदारी की बात करो तो वह आपको ही मूर्ख कहने लगेगा.!!
एक मूर्ख अपनी ज़िंदगी को अपनी मूर्खता से औऱ अधिक कठिन बना लेता है.!!
मूर्ख लोगों को अपना कीमती वक़्त ख़राब करने का मौक़ा देना छोड़ दो, खुश रहोगे !!
जो लोग अपने पाँव पर ख़ुद कुल्हाड़ी मारते हैं, उनसे ज्यादा मूर्ख कोई और नहीं.!!
मूर्ख इंसान दाने-पानी का इंतजाम किए बिना.. और सारे इंतजाम करता है.!!
बुद्धि से ही यह दुनिया चलती है, दिल के हाथों जीने लगे तो बेड़ा ग़र्क हो जाए.!!
अगर हमें अपनी मूर्खता का पता है तो हम बुद्धिमान व्यक्ति हैं.
जीवन बिगाड़ने की बेअक्ली करते-करते जीवन सुधारने की अक्ल आ जाती है.
मूर्ख चाहता है कि रास्ता आसान हो जाए,
_ समझदार चाहता है कि उसे मुश्किल रास्तों पर चलने की ताक़त मिले.!!
बुद्धिमान का दुर्भाग्य मूर्ख की समृद्धि से बेहतर है.

The misfortune of the wise is better than the prosperity of the fool.

बेअक्लों की ख्वाहिश है, सब उनके जैसा सोचें.

Idiots wish everyone would think like them.

जब हम यह समझ जाते हैं कि कोई हमारे कहने से नहीं, बल्कि अपनी समझ से बदलेगा तो हम दूसरों को सुधारने की बेचैनी से मुक्त हो जाते हैं.!
क्रैक होना, हिला होना, बावला, और मंदबुद्धि के बीच एक महीन-सा अंतर है.

_ “हिला होना” अर्थात् बार-बार अपना प्रचार करना.. मैं तो ये हूँ, मैं तो वह हूँ, मैं सब कुछ हूँ.
_ “क्रैक” वह होता है जो समय, स्थान और माहौल नहीं देखता है और अपने काल्पनिक शत्रु की निंदा करने लगता है.
वह घर की लड़ाई बीच बाज़ार में लाता है.
_ “बावला” वह जो जगत को मिथ्या समझता है और अपने कल्पना लोक में विचरण करता है.
_ “मंदबुद्धि” ऐसा नमूना है जो कर्म तो करेगा नहीं.. लेकिन हवाई क़िले बनाएगा राजमहल में रहने के..
_ उसकी चौकड़ी उसे बेवक़ूफ़ बनाती है और वह बनता है.
_ यह आदमी रात और दिन में फ़र्क़ नहीं कर पाता.
_ ये सब नमूने हमारे आस-पास मौजूद हैं, तलाश करिए और मज़े लीजिए.!!
साधारण मूर्ख ठीक हैं; आप उनसे बात कर सकते हैं, और उनकी मदद करने का प्रयास कर सकते हैं.

_ लेकिन आडंबरपूर्ण मूर्ख-लोग _ जो मूर्ख हैं और इसे हर जगह छिपा रहे हैं और लोगों को प्रभावित कर रहे हैं कि _ वे इस सब दिखावटीपन के साथ कितने अद्भुत हैं-
_ मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता !
_ एक साधारण मूर्ख जालसाज़ नहीं होता; एक ईमानदार मूर्ख बिल्कुल ठीक है.
– लेकिन एक बेईमान मूर्ख भयानक होता है !
मूर्ख वह है जो अहंकार, मैं को जन्म देता है।

मूर्ख हमेशा बहस जीतता है.
_ बुद्धिमान व्यक्ति हमेशा मूर्ख से सहमत होता है.
_ मूर्ख वह है जो विचारों के जाल में फँस जाता है और मान लेता है कि यही परम सत्य है.
_ बुद्धिमान व्यक्ति को न कुछ साबित करना होता है और न ही कहीं जाना होता है.
_ मूर्ख हमेशा कोई न कोई व्यक्ति बनता रहता है.
_ बुद्धिमान व्यक्ति न कुछ होता है और न कुछ.
_ मूर्ख हमेशा अंतहीन ध्वनि प्रदूषण का बकबक करने वाला होता है.
_ बुद्धिमान व्यक्ति शांत और मौन रहता है.
_ मूर्ख हमेशा अतीत में जीता है.
_ बुद्धिमान व्यक्ति बस वर्तमान और वर्तमान में जीता है.!!
जिस क्षण आप किसी मूर्ख व्यक्ति को समझाने की कोशिश करते हैं, आप उसी जगह प्रवेश कर जाते हैं.. जहाँ वे रहते हैं.

_ मूर्खता सत्य की परवाह नहीं करती, बस अपने अंधेपन से चिपकी रहती है.
_ आप हज़ार तथ्य लाएँ, लेकिन उनकी आँखें पहले ही बंद हो चुकी हैं.
_ कभी भी अपनी जीवन ऊर्जा किसी को समझाने में बर्बाद मत करो.
_ सत्य को किसी को साबित करने की ज़रूरत नहीं है..
_ सत्य कोई बहस नहीं, बल्कि एक अनुभव है.
_ अगर सामने वाला तैयार और इच्छुक है, तो एक शब्द भी उसे समझा सकता है.
_ अगर वे तैयार नहीं हैं, तो हज़ार शास्त्र भी निरर्थक होंगे.
__ अगर किसी का दिल खुला है, तो वह आपकी लौ से जल उठेगा.!!
अगर किसी ने दो बार अपनी लापरवाही और असंवेदनशीलता से आपको दुखी किया हो और आप तीसरी बार उस पर भरोसा करते हैं, तो गलती उसकी नहीं, आपकी है.

_ क्योंकि वह तो दो बार अपनी प्रवृत्ति का परिचय दे ही चुका था.
_ अब तीसरी बार मूर्ख बनना आपने खुद चुना है.!!
किसी मूर्ख व्यक्ति को समझाना बहुत मुश्किल होता है.

_ आप दिन को दिन कहेंगे, वह कहेगा, नहीं, यह रात है और रात, रात, रात कहता रहेगा.
_ आप अपना सिर धुनिए, पर मूर्ख से जीत नहीं सकेंगे.!!

– Manika Mohini

हर इंसान अपने जीवन में कुछ-न-कुछ बेवकूफ़ियां अवश्य करता है.

_ मुझे अपनी कुछ बेवकूफ़ियों को सोच कर हँसी आती है, कुछ को सोच कर रोना और कुछ को सोच कर शर्म.
_ मैंने ऐसे भी लोग देखे हैं, जिन्हें अपनी बेवकूफ़ियों पर घमंड होता है.
_ उन्हें लगता है कि वे जन्मजात अक्लमंद हैं.
_ क्या कोई व्यक्ति जन्मजात अक्लमंद या जन्मजात मूर्ख होता है ?
_ नहीं ना ?
– Manika Mohini
“मूर्ख कौन है ?”

_ मूर्ख वह है जो मानता है कि दुनिया को उसकी ज़रूरत है… कि उसके बिना, सब कुछ बिखर जाएगा.
_ सच तो यह है कि दुनिया को कोई परवाह नहीं है.
_ कल सूरज उगेगा, नदियाँ बहती रहेंगी, सूरज और प्रकृति की तो बात ही छोड़िए,
_ जिस ऑफिस में आप काम करते हैं, उसे भी आपकी परवाह नहीं है.
_ आज आप महीने के सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी हैं और अगले महीने आपको नौकरी से निकाल दिया जाएगा, इसलिए नहीं कि कंपनी घाटे में जा रही है, बल्कि इसलिए कि उनका मुनाफा 20% से घटकर 19.99% हो गया है.
_ और लोग: वे हँसेंगे और रोएँगे, आपके साथ या आपके बिना..
_ आज आप मरेंगे, कल वे कोई और रास्ता खोज लेंगे..
_ यह उनकी गलती नहीं है, समस्या यह है कि आपने खुद को बहुत ज़्यादा महत्व दे दिया है.
_ आप उनके जीवन में वह नायक नहीं हैं.. जो आप सोचते हैं.
_ यह सोचना कि दुनिया आपका सम्मान करती है, अहंकार का सबसे गहरा भ्रम है.
_ “दुनिया पूरी है”.. यह आपसे पहले भी थी, आपके बाद भी रहेगी.
_ बुद्धिमान व्यक्ति अस्तित्व या किसी भी चीज़ से महत्व की माँग नहीं करता.
_ वह बस उसका हिस्सा बन जाता है..
_ बहते रहो – जैसे एक बूँद सागर में पिघल रही हो,
_ न ज़रूरी, न अनावश्यक – बस अभी में मौजूद रहो.
_ अपने बीते हुए कल से सीखो और आज जियो.!!
_ “यह बहुत ही प्रासंगिक है ! दुनिया को वाकई हमारी ज़रूरत नहीं है, हम तो बस उसका एक छोटा सा हिस्सा हैं.”
– SACHIN
एक मित्र ने अभी कहा कि आज अक्ल दाढ़ निकलवाई डॉक्टर के कहने पर, तकलीफ हो रही है तो मैंने जवाब दिया – “इस मामले मैं बहुत सुखी हूँ, न अक्ल दाढ़ आई, ना आने-जाने या निकालने का दर्द है, पूरा जीवन यूंही बगैर अक़्ल के निकल गया”

_ सच कहूँ तो अपनी मूर्खता में ही मैं बहुत खुश हूँ,
_ जीवन और सब सुख-दुख के पल निकल ही गए रोते-झीकते हुए,
_ हालांकि एक लंबा समय अपनी शर्तों, अपने सिद्धांतों, और उसूलों पर, किसी से कोई अपेक्षा ना करते हुए, बगैर कोई सुरक्षा के, सारी उम्र बेहद कम पैसे, गुजारे लायक न्यूनतम सुविधाओं और नगण्य परिलब्धियों और किन्हीं संसाधनों के बिना अकेले निकालना मुश्किल था, पर बहुत मजा आया,
_ जीवन में खूब बदनामी झेली, ताने, निंदा, जूते, गाली, ठोकरें, धोखे, बदहाली, जिल्लत, प्यार और बहुत कम सम्मान मिला, ज्यादा खोया और थोड़ा सा पाया जीवन में..
_ अब पलटकर देखता हूँ तो लगता है, एक सामान्य जीवन ऐसा ही होता है, ना किसी से अपेक्षा रखी कोई, ना नोबल की आस और ना किसी से चरित्र प्रमाण पत्र लिखवाया,
_ जो मिला – उसको अपनी गठरी में बांधकर चलता चला आया और कोई रंजो गम नहीं,
_ एक औसत बुद्धि वाला व्यक्तित्व जिसे भली भांति ज्ञात था कि ना अपुन न्यूटन है ना आइंस्टीन, बस कुल मिलाकर संतुष्ट हूँ,
_ इस मोड़ पर रूपया नहीं पर संतोष है,
_ आगे का नहीं पता, पर अब अकेले रहने, चलने और अपने एकांत में जीने की हिम्मत बढ़ गई है.
_ मैं पगडंडियों से चलकर आया हूँ तो सड़कों की हिम्मत नहीं कि पाँवों पर छाले कर दें,
और हो भी जायेंगे तो इतने काँटे है पगों में कि छालों के लिए जगह नहीं है.!!
– Sandip Naik

सुविचार – बुद्धि – बुद्धिमान – बुद्धिमानी – समझ – समझना – समझें – समझदार – समझदारी – अक़्लमंद – अक़्लमंदी – 067

13422273723_36888ebf12

बुद्धिमान …

जो बात के मर्म को तुरंत समझ लेता है, सुनने योग्य बातों को एकाग्र चित्त होकर सुनता है, और व्यर्थ की बातों में  रूचि नहीं रखता है, खूब सोच विचार के ही कोई काम शुरू करता है, हाथ में लिया काम अधूरा नहीं छोड़ता, जो बिना पूछे किसी को सलाह नहीं देता, वो बुद्धिमान है !!!!

समझदार बनने के तीन रास्ते हैं..

_ किताबें — किसी का पूरा जीवन अनुभव कुछ पन्नों में दे देती हैं.
_ फ़िल्में — कल्पना को आकार देती हैं.
_ सफ़र — मन, संस्कार और समझ — को विस्तार देता है.!!
हम बुद्धि से नहीं समझेंगे तो और कैसे समझेंगे ?

_ समझने का काम ही बुद्धि का है..
_ शरीर का और कौन-सा अंग समझ सकता है ?
_ बुद्धि न होती तो न कुछ जान सकते न समझ सकते ?
अक़्लमंदी की एक बड़ी निशानी है…ख़ामोश रहना, अपने काम से काम रखना, हर ग़लतफ़हमी की सफ़ाई न देना और लोगों को अपने बारे में कुछ भी कहने देना.

_ क्योंकि हर बात का जवाब देना ज़रूरी नहीं, और हर किसी को सही साबित करना भी नहीं.
_ जो आपको समझना चाहता है, वह समझ जाएगा.
_ और जो नहीं समझना चाहता, उसे समझाते-समझाते ज़िंदगी गुज़र जाएगी.!!
**लोग मुख्यतः तीन तरह से जीते हैं, जो कि जीवन जीने के भी अलग-अलग ढंग हैं।

1. आदत से –
आज वही करते हैं जो कल किया था.
2. प्रश्नों से –
बार-बार पूछते हैं, “मैं ऐसा क्यों कर रहा हूँ ?”
3. समझ से –
जहाँ प्रश्न कुछ शांत हो जाते हैं और अनुभव बोलने लगता है.
समझदार लोग विचार ना मिलते हुए भी एक दूसरे के विचारों की कद्र करते हैं ना ही कोई हस्तक्षेप करते हैं, _

_ नज़रअन्दाज़ भी ऐसे करते हैं की दूसरे को बुरा ना लगे और इन्ही विचारों के साथ अपनी जिंदगी का पूरा समय हंसी ख़ुशी व्यतीत कर जाते हैं !

बुरे लोग तो सिर्फ़ शोर मचाते हैं, पर जब एक समझदार और सुलझा हुआ इंसान बिगड़ता है, तो वो सीधा ‘Game Over’ करके ही दम लेता है.!!
किसी को सुनना और उसे समझना दो अलग-अलग चीजें हैं.

_ सुनना तो मात्र शब्दों को ग्रहण करना है, लेकिन समझना उससे कहीं आगे जाता है—यह किसी के भावनाओं, अनुभवों और अनकहे शब्दों को महसूस करने की कला है.
_ हर इंसान अपने मन की गहराइयों को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाता.
_ कई बार डर, संकोच, या शब्दों की कमी के कारण लोग अपने दिल की बात पूरी तरह कह नहीं पाते.
_ उनकी चुप्पी, उनके हावभाव, या उनके शब्दों के बीच की खामोशी में बहुत कुछ छिपा होता है.
_ अगर हम केवल सुनने तक सीमित रहते हैं, तो हम शायद उस अनकहे को miss कर दें.
_ सुनना शुरुआत है, लेकिन समझना वह कदम है जो सच्चे संवाद और रिश्तों को बनाता है.!!
किसी बात से जब आपका दम घुटने लगे और उनसे जुड़े सवालों के जवाब किसी के पास भी न हो..

_ क्योंकि आप पूछना ही नही चाहते.. तो ऐसी हकीकत को झूठ समझ के आगे बढ़ जाने में ही समझदारी है.!
बुद्धिमान वे हैं, जो अपने अमूल्य जीवन की एक- एक घडी का सदुपयोग करना जानते हैं.
जब भीतर की समझ गहरी होती है,- तो बाहर की बेकार बातें प्रभावी नहीं होती.”
साधारण योग्यता को बुद्धिमानी से काम में लाने पर ही प्रशंसा प्राप्त होती है.
जिसे समझ आता है, वो समझाता नहीं ;

_ वो बस अपनी समझ को व्यक्त करता है.!!

जिन बातों से समझा और सीखा जा सकता है,

_ वो सब पहले से ही लिखा जा चुका था.!

बुद्धिमान सोच विचार करके ही कोई काम करतें है,

_ पर मूर्ख पहले काम कर लेते हैं, फिर विचार करते हैं.!!

“समझदार वही, जो सवालों में नहीं उलझता, बल्कि ख़ुद जवाब बनकर जीता है.”
शायद हम आज न समझें, लेकिन ऐसा न हो कि जब समझें, तब देर हो चुकी हो.!!
जो चीज समझ आ जाती है… उसे बार-बार सुनाने की जरूरत नहीं पड़ती.
“हर बात समझने के बाद, फिर उसे जीना भी चाहिए.”
ज़हरीले जीवों का सामना करने में कोई बहादुरी नहीं है.
_ अक़्लमंदी इसी में है कि उनसे दूर रहा जाए.;
“यदि आप बुद्धिमान लोगों के साथ चलते हैं, तो आप भी बुद्धिमान बनेंगे और मूर्खों के साथ ही सदा उठेंगे-बैठेंगे तो आपका मानसिक तथा बुद्धिमता का स्तर और सोच भी उन्हीं की भांति हो जाएगी..!!”
“मनुष्य का दुःख यह नहीं कि उसके पास बुद्धि नहीं है ;

_ दुःख यह है कि उसकी बुद्धि इतनी है कि वह उलझनों को देख सके, पर इतनी नहीं कि सबको सुलझा सके”
किसी को कुछ समझाने से पहले यह अवश्य समझ लें कि दूसरा व्यक्ति आपकी बात समझने में सक्षम है या नहीं,

_ क्योंकि यदि घड़े में छेद हो तो उसमें पानी डालना व्यर्थ है.!!
“जितना ज्यादा हम जानने लगते हैं, उतना ही समझ आता है कि हर फैसला सिर्फ पैसे का नहीं, लाइफ स्टाइल का भी होता है.”
“बुद्धिमानी सिर्फ़ सही बात जानना नहीं, बल्कि यह जानना भी है कि किससे, कब और कितनी बात करनी है”
कभी चीज़ को तोड़ देना ज़रूरी नहीं होता..
_ कभी उसे हल्का करके चलने देना ज़्यादा समझदारी होती है.
इंसान की समझ तब गहरी होती है, जब उसकी बातें कम और ख़ामोशी ज़्यादा हो जाती है.!!
“कुछ समझें हमें खाली नहीं करतीं..
_ वे केवल उन कहानियों को गिरा देती हैं, जिन पर हम टिके हुए थे.
अपने आप को बुद्धिमान कहने वालों को भी अच्छा जीवन नहीं जीते देख..

_खीझ /दर्द /दुःख होने लगता है.!

गुस्से में लिए फैसले अक्सर पछतावे की गूँज छोड़ जाते हैं ;

_ समझदार वही है.. जो शोर में भी अपने मन को ठंडा रखना जानता है.!!

बुद्धि ही मनुष्य को नवीन परिस्थितियों को ठीक से समझने और उसके साथ अनुकूलित (adapt) होने में सहायता करती है.
इंसान तभी समझदार बनता है जब वो अपनी मासूमियत की कीमत चुका होता है.
हम हर बात का कोई न कोई निष्कर्ष ढूँढ़ने लगते हैं.

_ जबकि कुछ बातें सिर्फ महसूस करने के लिए होती हैं, समझने के लिए नहीं.!!
समझदार होना एक सज़ा भी है, क्योंकि आपको हर उस व्यक्ति से निपटना होगा..

_जिसके पास समझदारी नहीं है.!!

चतुर [Clever] होने से बुद्धिमान [Wise] होना बेहतर है.

_ एक चतुर व्यक्ति कर तो बहुत कुछ सकता है लेकिन एक बुद्धिमान व्यक्ति वही करेगा जो सही है.!!
मेरे हिसाब से बुद्धिमान होना बहादुरी नहीं बल्कि सजा भी है.

_ क्योंकि बुद्धिमान लोग न तो दूसरों पर क्रोध कर सकते हैं.. और न ही चिल्ला सकते हैं.
_ क्योंकि हम जानते हैं कि अगले व्यक्ति ने जो कहा या किया..
_ वह क्यों कहा या किया..!
_ क्योंकि हम तुरंत अपने आप को अपनी जगह से स्थानांतरित कर उसकी तरफ से सोचने लगते हैं..!!
एक ही घटना हर व्यक्ति को अलग ढंग से प्रभावित करती है..

_ जैसे वर्षों तक शिक्षा देने वाले अध्यापक के सभी छात्रों का जीवन एक जैसा नहीं होता,
सीख सबको एक-सी मिलती है,
_ लेकिन उसे समझने, अपनाने और उससे अपना भविष्य गढ़ने का तरीका हर किसी का अलग होता है.!!
दुनिया में बहुत भीड़ है – आपको अपने लिए इतनी समझ होनी चाहिए कि.. क्या अपने पास रखना है और क्या छोड़ देना है.!!
कभी-कभी सबसे गहरा जवाब होता है “कुछ नहीं”,
_ जिसे समझने के लिए दिमाग की नहीं, बल्कि दिल की जरूरत होती है.!!
अपनी समझदारी साबित मत करो, उन्हें अपनी मूर्खता साबित करने दो, आप खुद ही समझदार साबित हो जाओगे.!!
नासमझी में दुनिया हसीन लगती थी, समझदारी ने Reality दिखाकर जीना हराम कर दिया.!!
बहुत सुंदर होते हैं वो लोग..- जो समझते भी हैं और समझाते भी हैं.!!
लोगों की समझ या तो मुझसे कम है या फिर मेरी समझ से परे है.

_ जो समझ को समझ रहे हैं, वे उसे अपने जीवन में लागू कर रहे हैं.!!
मूर्ख अफवाह फैलाता है, चापलूस उसे बढ़ाता है और बुद्धिमान उसका अंत करता है.!!
जिन स्थितियों में हम जी रहे होते हैं, उन स्थितियों की समझ उन स्थितियों से बाहर निकल आने के बाद आती है.!!
समझदारी सभी जगह काम नहीं आती, आती तो अफ़सोस क्यों होता

_ अफ़सोस कर रहे हैं ग़लती कर-कर के, और जबकि बार-बार ग़लती कर ही रहे हैं तो कहाँ गयी समझदारी,
_ समझदार कम बना करिए.. अफ़सोस भी कम ही होगा…!!
समझदार होने की सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि, हम खुद ही अपनी धारणा बना लेते हैं,

_ लेकिन ये ग़लत है कि हम सामने वाले को अपनी ही धारणा को पालन करने को कहें,
_ सबकी अपनी सोच समझ होती है, किसी पर भी अपने विचार थोपने नहीं चाहिए.!!
कुछ लोग समझदारी के नाम पर सिर्फ यह चाहते हैं,
_ आप सहन करना सीख लो और वो वैसे ही रहेंगे.!!
असल में समझदार कहलाने का मतलब.. अक्सर ये होता है कि लोग आपकी भावनाओं, तकलीफ़ों और उलझनों को स्वतः ही नज़रअंदाज़ कर देते हैं..

_ सबको लगता है कि आप अपने आप ही सब संभाल लेंगे, आपको ज़्यादा समझाने की ज़रूरत नहीं..
_ लेकिन हकीकत ये है कि समझदार इंसान को भी समझे जाने की उतनी ही चाह होती है.. जितनी किसी और को..
_ फर्क सिर्फ इतना है कि वो अपनी कमी-कसूरी या दर्द को ज़ाहिर कम करता है, दबा देता है और यही उसका सबसे बड़ा अकेलापन बन जाता है…!
किसी भी व्यक्ति का चाल-चरित्र सदैव एक सा रह पाना बहुत मुश्किल होता है.

_ समयानुसार परिवर्तन आना प्राकृतिक नियम है और यह नियम घर-बाहर समान रूप से लागू होता है.
_ न कोई सदैव शिखर पर रह सकता है और न ही धरातल पर..
_ समझदारी इसी में है कि हम सब जीवन की इस कटु सच्चाई को समय रहते समझ लें.!!
समझदार लोगों से अक्सर कहा जाता है की तुम तो समझदार हो, चुप रहो और यही बात उन्हें बार-बार ठगती है.!!
_ समझदार होना सच में कई बार सबसे बड़ा पागलपन बन जाता है,
_ क्योंकि समझदारी हमें दूसरों के लिए झुकना सिखाती है,
_ खुद को रोकना, खुद को समझाना सिखाती है..
_ हम हालात को समझ लेते हैं, लोगों की मजबूरियाँ समझ लेते हैं,
_ पर इसी समझ के बोझ तले अपनी ही बातें दबा देते हैं.!!
नासमझ लोगों के फेर में पड़ने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि आप अपनी मानसिक शांति खो बैठते हैं,

_ इसलिए हर बहस का जवाब देना ज़रूरी नहीं होता,
_ कई बार अपनी शांति बचाकर आगे बढ़ जाना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है.!!
नासमझों के झुंड को संभालना आसान नहीं होता..
_ कई बार उन्हें समझाने से ज़्यादा अपनी समझदारी और धैर्य को बचाए रखना पड़ता है,
_ क्योंकि जहाँ तर्क की जगह अहंकार और शोर हावी हो जाए, वहाँ समझदारी की आवाज़ अक्सर अनसुनी रह जाती है.!!
बुद्धिमान व्यक्ति मूर्ख को पहचान सकता है _ क्योंकि वह बुद्धिमान है _ दूसरी ओर,

_ एक मूर्ख एक बुद्धिमान व्यक्ति को नहीं पहचान सकता _ क्योंकि वह मूर्ख है.

हममें इतनी चतुराई अवश्य होनी चाहिए कि दूसरों के द्वारा हमारे खिलाफ़ चली गई चालों को हम पहचान सकें और उन्हें निस्तेज कर सकें.

_ हम दूसरे को मारें नहीं लेकिन यदि दूसरा हमें मार रहा है तो हमें अपना बचाव करना आना चाहिए.. “यही बुद्धिमानी है”
किसी के लिए अच्छा करना हमेशा सही होता है, पर जब वही अच्छाई किसी की नजर में हमारी कमजोरी या बेवकूफी बन जाए, _ तो वहां सिर्फ अच्छा होना काफी नहीं, थोड़ा समझदार और सीमाएं तय करना भी जरूरी हो जाता है.!!
समझदार व्यक्ति बड़ी से बड़ी बिगड़ती स्थितियों को दो शब्द प्रेम के बोलकर संभाल लेते हैं,, हर स्थिति में संयम और बड़ा दिल रखना ही श्रेष्ठ है.
समझदारी उम्र बढ़ने से नहीं, ज़िंदगी की ठोकरों और कड़े संघर्षों से आती है.!!
इज्जत वहाँ दी जाती है जहाँ सामने वाला समझदार हो,
_ अकड़ रखने वालों से तो बस दूरी ही बेहतर है.!!
समझदार लोग शोर नहीं मचाते..
_ जहां उनका आदर खत्म होता है, वहां से वे चुपचाप विदा ले लेते हैं.!!
कई ऐसे होते हैं, जिनकी उम्र तो बढ़ जाती है.. मगर समझ वही की वही रह जाती है.
_ क्योंकि वो सिर्फ़ उम्र से बड़े होते हैं समझ से नहीं..!!
जो समझाने से भी वक्त रहते नहीं समझे, उन्हें वक्त सब कुछ सिखा देता है,
_ फिर वो गिरते हैं उन्हें ख़ुद उठना पड़ता है.!!
हर टूटे हुए टुकड़े को जोड़ना आपकी ज़िम्मेदारी नहीं..
_ कभी-कभी समझदारी इसी में होती है कि आप खुद को बचाने के लिए पीछे हट जाएं.!!
हर जगह बुरा हाल है..  समझ में नहीं आता कि ये लूट किसलिए है ?
_ क्या रब का ज़रा भी ख़ौफ़ नही है ?
बुद्धिमान लोग हर चीज़ पर सवाल उठाते हैं, _

_ मूर्खों के पास हर बात का जवाब होता है !!

जो समझ गया उसका जीवन निखर गया..

_ जो समझाने में उलझ गया वो बिखर गया.!!
यदि आप औसत बुद्धि से थोड़ा भी ऊपर हैं,

_तो आपमें लोगों को गंभीरता से परखने की प्रवृत्ति होगी.!!

हर मौके पर बोलना बुद्धिमानी नहीं होती,

_ जो समय और स्थिति को समझकर बोलता है, वही समझदार होता है.!!

दुनिया में समझदार वही है जो सुनता ज्यादा है और बोलता कम..

_तभी तो वो दूसरों से आगे निकल जाता है.!!

हर किसी की समझ को ध्यान में रखकर कुछ नहीं लिखा जाता,

_ बल्कि समझने के लिए व्यक्ति को समझ विकसित करनी पड़ती है.!!

समझदार लोग बखूबी जानते हैं कि.. उन्हें ख़ुद को नासमझ कहाँ दिखाना है.!
अधिकतर लोगों को कम बुद्धिमान लोग पसंद आते हैं,

__क्योंकि उन्हें अधिक बुद्धिमान लोगों से चिढ़ होती है..!!

समझदारी इसी में है कि वक्त और नसीब को लेकर घमंड ना किया जाए..

_ क्योंकि हर रात के बाद सबकी सुबह आती है.!!

सब को समझाने वाला एक दिन ख़ुद ही समझ जाता है ;

_ बात कोई नहीं मानता, बात का बुरा सब मान जाते हैं..!!

आपको वो सभी चीजें सीखनी चाहिए जो आपको कभी नहीं सिखाई गईं,

_तभी आपकी समझ बढ़ती है.

जल्दबाज़ी में चीज़ों को ठीक करने की कोशिश कभी मत करो..

_ जब आप सोचने समझने की स्थिति में होंगे तो हर चीज़ ख़ुद ब ख़ुद ठीक हो जाएगी.!!

अगर किसी को समझाना चाहते हो, तो ये बात जानना जरूरी है, कि सामने वाला आपकी बात, समझने के लायक है भी या नहीं..

_ क्योंकि, घड़े में अगर छेद हो, तो पानी डालना, व्यर्थ जाता है.!
समझदारी यही है जो ख़ुद को ज्यादा समझदार समझे, समझने दो..

_ आप ख़ामोश रहो बस..

बस इतना समझदार बनना है कि,

“मेरा वो मतलब नहीं था..” का मतलब समझ सकूं.!!

इस छोटी सी जिंदगी का बस इतना सा सार है..

_बेवकूफ बना रहता है जो ..वो यहां समझदार है.

आपको दिमाग होने का भुगतान नहीं किया जाता है,

_ आपको केवल बुद्धिमानी से उपयोग करने का पुरस्कार मिलता है.

_ इसे बेकार मत छोड़ो – अपने दिमाग का इस्तेमाल करो.

कुछ बातें समझाने पर नहीं, बल्कि खुद पर बीत जाने पर ही समझ आती है.
जीवन बहुत विचित्र है, इसलिये समझदार लोगों को गुंजाइश लेकर हमेशा चलना चाहिए.!!
जैसे जैसे आप बुद्धिमान होते जाते हैं, _ वैसे वैसे आप के पास लोगों का जमाव कम होता जाता है.
समझदार इंसान दूसरों के जीवन में ताक-झाँक नहीं करता, वह दूसरों की निजता का सम्मान करता है.
जिसे हमारी कोई बात समझ नहीं आए, फिर भी हम उसे समझाते जाएँ और मन में सोचते भी जाएँ कि यह मूर्ख मेरी बात नहीं समझ रहा, तो मूर्ख वह नहीं, हम हैं, जो एक जड़बुद्धि के पीछे पड़े हैं.!!
कई बार जानने और लगातार सीखते रहने की हमारी आदत ही वो चीज़ बन जाती है जो मुश्किल हालात में हमें सबसे बड़ा फायदा दिला देती है..

_ क्योंकि जो इंसान सीखना नहीं छोड़ता, वह हर परिस्थिति में कुछ न कुछ समझ लेता है और वही समझ कई बार रास्ता भी बना देती है.!!
7 संकेत कि आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं ज़्यादा बुद्धिमान हैं.
1. आप किसी भी बात पर आँख बंद करके विश्वास करने के बजाय सवाल पूछते हैं.
2. आप बेझिझक कह सकते हैं कि “मुझे नहीं पता”
3. आपको नई-नई और अलग-अलग चीजें सीखने में मज़ा आता है क्योंकि आपमें जानने की उत्सुकता होती है.
4. बेहतर सबूत मिलने पर आप अपनी राय बदल सकते हैं.
5. आप ऐसी चीज़ों में पैटर्न और कनेक्शन देख पाते हैं जिन्हें दूसरे अक्सर नहीं देख पाते.
6. कोई भी ज़रूरी फ़ैसला लेने से पहले आप गहराई से सोचते हैं.
7. आप समझते हैं कि सीखने के लिए हमेशा कुछ न कुछ नया होता है.
सबसे समझदार व्यक्ति वह होता है, जिसके आँख कान खुले हैं _ पर मुंह बंद है !!
बुद्धिमान वही होता है जो जानता है कि उसे मूर्ख कब दिखना है.!!
ज़िन्दगी ने समझदार बना के सिर्फ समझौते करना सिखाया है..
जीवन की त्रासदी यह है कि हम बहुत जल्दी बूढ़े हो जाते हैं और बहुत देर से बुद्धिमान होते हैं.

Life’s tragedy is that we get old too soon and wise too late.

“एक बुद्धिमान व्यक्ति एक ही पहाड़ी से दो बार नहीं गिरता”
“A wise person doesn’t fall down the same hill twice.”
“बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी अपने पैर के लिए एक कदम भी लंबा नहीं लेता है”
“The wise man never takes a step too long for his leg.”
“मूर्ख को कुछ कहना होता है,
_ एक बुद्धिमान व्यक्ति के पास कहने के लिए कुछ होता है”
“A fool has to say something. A wise person has something to say.”
“एक बुद्धिमान व्यक्ति हमेशा एक रास्ता खोजेगा”
“A wise person will always find a way.”
“संकट की घड़ी में बुद्धिमान लोग सेतु बनाते हैं और मूर्ख लोग बांध बनाते हैं”
“In the moment of crisis, the wise build bridges, and the foolish build dams.”
“बुद्धि के बिना ज्ञान रेत में पानी के समान है”

“Knowledge without wisdom is like water in the sand.”
“केवल एक बुद्धिमान व्यक्ति ही एक कठिन समस्या का समाधान कर सकता है”

“Only a wise person can solve a difficult problem.”
“बुद्धि आग की तरह है _ लोग इसे दूसरों से लेते हैं”
“Wisdom is like fire. People take it from others.”
“बुद्धिमान व्यक्ति का हृदय निर्मल जल के समान शान्त रहता है”
“The heart of the wise man lies quiet like limpid water.”
“बुद्धि रातोंरात नहीं आती”

“Wisdom does not come overnight.”
असहमति में चुप रहना ही बुद्धिमानी है.
The wisdom lies in remaining silent in disagreement.
समझना सब जानते हैं, बोलना भी सब जानते हैं और गलत को गलत कहने की समझ भी सबमें है..

_ फिर भी जब बोलने का वक्त आता है तो एक अनजान-सा डर सबको घेर लेता है..
_ शायद यही डर है, जिसकी वजह से लोग सब कुछ देखते हुए भी अनदेखा करते हैं, सब समझते हुए भी चुप रहते हैं और आवाज़ उठाने की जगह गूंगे-बहरे बन जाते हैं.!!
– Nirarthak Nirarthak
नासमझी कोई बड़ी समस्या नहीं, उसे वक्त और समझ से दूर किया जा सकता है.

_ असली मुश्किल तो वहाँ है, जहाँ इंसान सब कुछ समझते हुए भी समझना नहीं चाहता.
_ क्योंकि जिसे सच स्वीकार ही नहीं करना, उसे कितनी भी बार समझा लो, बात उसके मन तक पहुँचती ही नहीं.!
– Nirarthak Nirarthak
हम प्रयास करते हैं लोगों को समझाने का, उन्हें कुछ दिखाने और समझाने का, लेकिन हर किसी की अपनी अलग विचारधारा होती है.

_ कई बार इंसान सामने की सच्चाई भी देखना नहीं चाहता,
_ क्योंकि उसकी सोच उसे वही देखने देती है, जो वह पहले से मान चुका है.!!
– Nirarthak Nirarthak
कई लोगों की सोच को समझना और उन सबको एक साथ मैनेज करना थोड़ा मुश्किल तो लगता है, लेकिन असल में यह उतना कठिन नहीं है, जितना हम सोचते हैं.

_ बस हर इंसान को समझने का तरीका आना चाहिए..
_ जब आप यह समझने लगते हैं कि कौन किस तरह सोचता है, किस बात पर कैसे रिएक्ट करता है और उसे किस तरह हैंडल करना है, तो यही काम काफी आसान हो जाता है.!
– Nirarthak Nirarthak
नासमझ को समझाया जा सकता है,

_ अनपढ़ को भी समझाया जा सकता है,
_ गलती करने वाले को भी सही रास्ता दिखाया जा सकता है,
_ लेकिन सबसे मुश्किल उसे समझाना है, जिसने पहले ही तय कर लिया हो कि उसे कुछ समझना ही नहीं है..
_ फिर आपके शब्द उसके कानों तक तो पहुँचते हैं, मगर भीतर तक नहीं उतरते.
_ सब सच सामने रखते रह जाते हैं और वह अपनी बनाई हुई धारणा में ही उलझा रहता है.
_ आखिर एक वक्त के बाद इंसान समझाने की कोशिश नहीं छोड़ता,
_ बस यह स्वीकार कर लेता है कि हर किसी को समझाया नहीं जा सकता,
_ कुछ लोगों को वक्त ही समझाता है.!!
– Nirarthak Nirarthak
जरूरत से ज्यादा समझदारी इंसान को स्वार्थी बना देती है, उसके भीतर से सादगी और सरलता मिटा देती है,,

_ फिर हर जगह हर रिश्ते को वो संदेह भरी दृष्टि से देखने लगता है, जिससे उसकी आंतरिक ख़ुशी भी मिट जाती है..
_ इसलिए हर चीज़ जान लेना जीवन के उन पलों को भी इंसान से छीन लेता है जो उसके ना जानने तक उसे खुशनुमा लगते थे,,
_ बहुत सारी चीजें अज्ञात ही रहें तो अच्छा है ताकि कुछ बातों के उनसे संबंधों के एहसास बने रहें और इंसान उनमें ढला रहे..
_ जीवन के लिए ये बहुत उपयोगी है..!!
– रिदम राही
तुम समझदार हो, कह कह के ये दुनिया हमसे हमारे तमाम हक़ छीन लेती है.

_ तुम समझदार हो तो वो सब छोड़ते जाओ जो तुम्हारा था.
_ तुम समझदार हो तो तकलीफ़ होने पर रोने का हक़ छीन लिया जाता है.
_ तुम समझदार हो तो रिएक्ट करने का हक़ भी छीन लिया जाता है.
_ तुम समझदार हो तो कुछ मांग नहीं सकते.
_ तुम समझदार हो तो अपनी तकलीफ़ कह नहीं सकते, क्योंकि किसी और को बुरा लग सकता है.
_ तुम समझदार हो तो चुप रहो.
_ और एक दिन समझदार इंसान इतना ख़ामोश हो जाता है कि उसी ख़ामोशी में ख़त्म हो जाता है.
_ और फिर हमारे आसपास वाले कहते हैं अरे वो तो चुप ही रहती/रहता था..
_ कुछ कहती/कहता ही नहीं थी, कुछ पता ही नहीं चलता था.
_ ख़ैर समझदारी का मतलब ख़ुद को ख़त्म कर देना है.
– Nida Rahman
मैं तो चाहता हूँ कि हर इंसान समझदार बने, सवाल करना सीखे, अपने हक और जिम्मेदारियों को समझे..

_ लेकिन अफसोस, बहुत से लोग नासमझ बने रहने में ही सुकून महसूस करते हैं और दूसरों को ही बेवकूफ समझने में अपनी समझदारी मानते हैं.!!
– Nirarthak Nirarthak
समझदारी जब समझ से ऊपर चली जाए, तो परेशानी जरूर पैदा करती है..

_ या तो समझदार के लिए, या फिर उस नासमझ के लिए.. जो उसकी समझदारी को समझ ही नहीं पाता.!!
– Nirarthak Nirarthak
कुछ लोग बिना किसी वजह किसी को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं,

_ सिर्फ इसलिए कि सबके सामने वे खुद को सबसे ज्यादा ज्ञानी साबित कर सकें, उन्हें लगता है कि दूसरे को छोटा करके उनकी समझदारी बड़ी दिखाई देगी,
_ जबकि असल में यह उनकी सोच की कमी को ही उजागर करता है.!!
– Nirarthak Nirarthak
हमारी समझदारी को लोग बेवकूफी समझना चाहते हैं और खुद-को हमसे बेहतर साबित करना चाहते हैं.

_ लेकिन बेहतर वही होता है, जो सिर्फ बातों में नहीं, बल्कि धरातल पर अपने परिणाम दिखाए.!!
– Nirarthak Nirarthak
 
 
error: Content is protected