सुविचार – यात्रा के लिए सलाह/टिप/ट्रिक – advice/tip/trick for travelling – 066

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सफ़र में खुद की ही सारी तैयारी रखनी चाहिए, _ किसी के भरोसे नहीं रहा जा सकता.
1. Do a detailed research on the specific location

विशिष्ट स्थान पर विस्तृत शोध करें.
2. Carry map (in print out version) नक्शा साथ रखें ( प्रिंट आउट संस्करण में )
3. Be aware of crimes that happens in that area
उस क्षेत्र में होने वाले अपराधों से अवगत रहें.
4. Carry Tripod – Tripod ले जाना.
5. Keep money in separate places पैसों को अलग-अलग जगहों पर रखें.
Carry travel card, avoid carrying much cash.

ट्रैवल कार्ड कैरी करें, ज्यादा कैश ले जाने से बचें.
6. Book accommodation before the trip यात्रा से पहले आवास बुक करें.
7. Be alert always हमेशा सतर्क रहें.
8. At last take care of your belongings. अंत में अपने सामान का ख्याल रखना.
What’s your best advice/tip/trick for solo travelling?
1. Don’t plan too much ahead. बहुत आगे की योजना न बनाएं.
2. Socialize with locals and get to know the local culture. If you want to eat Indian food, do it in India.
स्थानीय लोगों के साथ मेलजोल बढ़ाएं और स्थानीय संस्कृति को जानें। अगर आप भारतीय खाना खाना चाहते हैं, तो इसे भारत में करें.

3. Meet other travelers, exchange experiences, and even join some of them on the next day excursion.
अन्य यात्रियों से मिलें, अनुभवों का आदान-प्रदान करें, और उनमें से कुछ को अगले दिन भ्रमण पर भी शामिल करें.
4. Travel light. यात्रा प्रकाश
5. Use public transportation. सार्वजनिक परिवहन का प्रयोग करें.
6. Respect the local culture/ rules even if it doesn’t go down smoothly with your bundle of values and habits.
स्थानीय संस्कृति/नियमों का सम्मान करें, भले ही वह आपके मूल्यों और आदतों के बंडल के साथ आसानी से नीचे न जाए.
7. Lower your expectations, you’ll only enjoy more.
अपनी अपेक्षाओं को कम करें, आप केवल अधिक आनंद लेंगे.
Long journey by Car

अगर कोई कार से लंबा सफर तय करते हैं, तो उन्हें इन जरुरी चीजों को रखने की जरुरत है….
कार की सर्विसिंग की हुई हो,
फुल टैंक पेट्रोल या डीजल भरा होना,
ड्राइविंग लाइसेंस (खैर आजकल तो Digilocker App है, जिसे सरकारी मान्यता प्राप्त है, उसमें सारे ज़रुरी कागज रखे जा सकते हैं।)
गाड़ी की PUC वैलिड होोनी चाहिए,
गाड़ी की इंश्योरेंस के पेपर,
बिना सीट बेल्ट लगाए आगे की सीट पर‌ न बैठें। ड्राइवर के अलावे बगल वाली सीट पर बैठने वाले भी सीट बेल्ट जरूर लगाएँ।
गाड़ी में फास्ट टैग होना चाहिए with balance,
क्रेडिट कार्ड, और कैश,
बच्चे साथ में हैं तो उनकी पसंद का खाने-पीने का सामान, पानी, कुछ घर के बने नाश्ते,
पॉली बैग जिसमें कचरा जमा करके रख सकें,
मास्क और सैनीटायजर‌,
गूगल मैप एक्टिव होने के बावजूद भी रोड पर लिखे गए डायरेक्शन पर भी जरूर ध्यान दें, वरना गूगल मैप कभी – कभी लंबे चक्कर कटवा देता है।
कुछ जरुरी दवाइयाँ जैसे- पेरासिटामोल, उल्टी बंद होने की दवा, सर्दी से बचने की दवा रखना, साथ ही किसी की जरुरी दवा जो खाते हैं, वो रखना चाहिए।
एक एक्स्ट्रा हवा भरी हुई टायर ( स्टेपनी), और जैक जो हर कार में होता ही है।
जब भी ऐसा लगे कि गाड़ी चलाकर थकान हो रही है तो कहीं रूककर चाय कॉफी पीना सही है।
पानी हमेशा पीते रहना चाहिए।
बस ! हो गई तैयारी सफर‌ पर जाने की।
कुछ छूट गया हो तो सुझाव आमंत्रित है।
तीन बिंदुओं पर संक्षिप्त जानकारी दें :-
किसी भी होटल या रेस्टोरेंट का सम्पूर्ण नाम लिखें जिसे गूगल मैप में ढूंढ सकें, साथ ही किराया, खाने के खर्च पर भी प्रकाश डालें.
ये इस तरह हों:
स्थान का परिचय, मौसम कैसा था, क्या क्या देखने योग्य है, लोकल घूमने के लिए किस सवारी का उपयोग बेहतर है और सवारी में क्या खर्च आया.
ठहरने की सुविधा: आप कहां ठहरे और क्या खर्च आया और अन्य सुविधाएं क्या थी.
खाने की सुविधा: आपको किस रेस्टोरेंट में खाना अच्छा लगा और क्या खर्च आया.
_ और वहां के कुछ नामी गिरामी जायेके का नाम, स्थान की जानकारी क्या है इसे दें.
__ ( जैसे प्रसिद्ध चाट, लस्सी, थाली, मिठाई आदि जो उस जगह का फेमस जायका हो )
उपरोक्त तीनों प्वाइंट की संक्षिप्त जानकारी दें.

सुविचार – यात्रा – घुमक्कड़ी – घूमना – 065

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जीवन में यात्रा करना एक अलग ही सुंदर अनुभव होता है, यात्रा करने से हर किसी व्यक्ति को देश- दुनिया के विषय में बहुत कुछ सीखने को मिलता है,

इससे व्यक्ति एक सीमा के अंदर बंधे रहने से मुक्त होता है और जीवन में नई चीजों के बारे में जानता है.

-“यात्रायें मनुष्य जीवन को बहुत कुछ अवलोकन तथा मूल्यांकन करने में सहायक होती हैं.”

जो आपको थका दे, जिससे आपको मानसिक तनाव हो, जिससे आपकी सेहत का नुकसान हो, उसे यात्रा मानना ही नहीं चाहिए ;

_ हुल्लड़ बाजी टूर नहीं होता ; यात्रा वही है जिससे आप कुछ सीखते हैं, जिससे आपको सुकून का अनुभव होता है, जिससे आप तरोताजा अनुभव करते हैं ;

_दूसरी संस्कृति या सभ्यता को जानना, दूसरी भाषा वाले लोगों से मिलना और जहाँ गए हैं वहां का भोजन करना ;

_ यात्रा करने से पहले खुद से एक सवाल कीजिए कि आप यात्रा कर क्यों रहे हैं ? इसके बाद ही यात्रा कि जगह फाइनल कीजिए..!!

मैं घुम्मक्कड़ों को सबसे अमीर समझता हूं, ये तिजोरी में सिक्के नही बल्कि किस्से जमा करते हैं.

कभी कभी अंदर से मन करता है कि कहीं दूर घूमने का, इंसानी दुनियाँ से बिल्कुल अलग, कुछ मालूम नही होता है जाना कहाँ हैं, घूमने की तीव्र इच्छा _ घर की चार दिवारी से आज़ाद होने का विगुल फूंक देती हैं.

हम मनुष्य आनुवांशिकी तौर पर घुमंतू ही तो थे, लेकिन वर्षो पहले एक दिन मनुष्य ने आग जलाई, फिर अपनी कुटिया बनाई, खेत और खूंटा बांधा और स्थाई हो गया, घुमंतू मन पीछे छूट गया.

लेकिन वही जब कभी हमारा पुरातन मन वापस लौटता है तब कहता है” चल घूमने चलें …

जो लोग अधिक यात्रा करते हैं , _ वे समय को धन के बराबर होने के सभी तर्कों को झुठलाते हैं ; _ उनके लिए समय ही जीवन है और उनके समय में धन का कोई स्थान नहीं है.

_ वे न्यूनतमवादी जीवन जीते हैं, उनके पास लेने के लिए कम देने के लिए अधिक होता है ; अनुभव बताते हैं कि जो लोग अधिक यात्रा करते हैं _वे कम आलोचनात्मक, अधिक लचीले और महान सहानुभूति रखने वाले होते हैं;

_ वे सभी रूढ़ियों को तोड़ते हैं और दुनिया को बताते हैं कि दुनिया के लोगों में कोई अंतर नहीं है ; दिल की गहराई से हम सब एक जैसे हैं और हम सभी अच्छे लोग हैं ; हमारी मूल प्रवृत्ति दूसरों की सहायता करना है.

घुमक्कड़ी सिर्फ आनंद और विलास का माध्यम नही, बल्कि, घुमक्कड़ी आपका ज्ञानवर्धन भी करती है ; _ आपका सांसारिक और व्यवहारिक ज्ञान बढ़ता है ; _ नई जगहों पर जाना, नये लोगों से मिलना, कई चुनौतियाँ, कई अच्छे – बुरे अनुभव आपको मानसिक रूप से मजबूत बनाते हैं, आपके निर्णय लेने की छमता बढ़ जाती है.

आप कई तरह के मौसम और अलग-अलग जलवायु मे रहते हैं, कई तरह से शारीरिक श्रम करते है ; _ ये सभी आपकी शारीरिक क्षमता का विकास करती है आप शारीरिक रूप से सुदृढ़ बनते हैं, _ जिससे आप किसी भी तरह के मौसम और परिस्थिति को झेल सकते हैं.

तो घुमक्कड़ी, सिर्फ आमोद-प्रमोद और विलासिता का साधन ना होकर, हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है ; _ घुमक्कड़ी हमारे सुखी जीवन के लिए नितांत आवश्यक है.

मेरा मानना है कि थोड़ा घूमिए… It’s Never Too Late to Start Traveling

हाँ घूमते और लोगों से मिलते हुए आप सुख-दुःख दोनों का अनुभव करेंगे, आपने लाइफ़ में जो प्रिंसपल बनाए हैं जीने के _ वो कई बार टूटेगें, जिसको अकड़ और औक़ात समझते हैं, वो समझ आने लगेगा.

_ यात्राएँ सिर्फ़ खूबसूरत दृश्य नहीं दिखाती हैं, असल में आईना दिखाती हैं…

कई लोग यात्राओं को फिजूल मानते हैं, पर ये वो ही लोग होते हैं जो कहीं जाते नहीं हैं,

_ मेरे हिसाब से यात्राओं से इतना कुछ सिखने को मिल सकता हैं जितना और कहीं नहीं मिलेगा.

जीवन यात्रा है, यात्राएं जीवनभर चलती रहेंगी ; _ यात्राएं जीवन सिखाती हैं ; _यात्रा ही मंजिल हो जाए तो मंजिल की चिंता नहीं रह जाती ; _ यात्राएं मंजिल हो जानी चाहिए ; _ जीवन को यात्रा बना लेना ही जीवन ही..
यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के बारे में नहीं है, यह उससे कहीं अधिक है, _ यह मैंने हमेशा महसूस किया और अनुभव किया है,

यहां तक ​​​​कि हम 100 किमी की यात्रा भी करते हैं, हम उन चीजों का अनुभव करते हैं जो सीखने और बढ़ने में मदद करती है.

Travel is not only about going from one place to another its much beyond that. This I always felt and had experienced,

even we travel for a 100km we experience things that helps to learn and grow.

घुमक्कड़ी पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए क्योंकि आप इसके माध्यम से बहुत कुछ सीख सकते हैं.

_ घुमक्कड़ी should be part of syllabus as you can learn so much through it.

यात्रा केवल जगह देख लेना नहीं, __ उस जगह से आपने क्या जाना, सीखा या महसूस किया इन सबसे मिलकर बनती है.
यात्रा सिर्फ जीना ही नहीं सिखाती, यात्राओं से जीने का नजरिया बदलता है !!
कभी – कभी आपको खुद को खोजने के लिए अकेले यात्रा करनी चाहिए.

_ अकेले घूमने का अपना ही मज़ा है,,,.. तो आप भी सभी घुमक्कड़ी करते रहिए,_

_सोलो ट्रेवलिंग ज़िंदगी ही नहीं बदलते ज़िंदगी जीने का नज़रिया बदलते हैं ..

_ क्यूँ कि घुमक्कड़ी की फ़क़ीरी जिसने जी ली, _ वो दुनिया का सबसे अमीर इंसान है. _ इस क्षणभंगुर संसार का और इस शरीर का कुछ कह नहीं सकते कौनसा दिन आख़िरी होगा ये भी पता नहीं,;

_ तो बस मौज करो, अपनी मस्ती में मस्त रहो _ बिंदास रहो..

यदि हम ग़ौर करें तो ऐसा मालूम होता है, कि मानव इस धरती पर घूमने निकला हुआ है_

_ उसकी जिज्ञासा उसे कहीं ठहरने ही नहीं देती..

घुमक्कड़ी आपको सिखाती है, हर वस्तु से मोहब्बत करना और अपने साथ अनेकों लोगों के सपनों को जिंदा करने का काम कर देती है ।।
हर मुसाफिर यहाँ मंज़िल का इंतज़ार नहीं कर रहा खुश होने के लिए _

_ कुछ सफर का मज़ा भी जी भर कर ले रहे हैं..

“यात्रा पर ध्यान केंद्रित करें, गंतव्य पर नहीं ; _ ख़ुशी किसी गतिविधि [ Activity ] को ख़त्म करने में नहीं _बल्कि उसे करने में मिलती है.”

यात्रायें सबसे अच्छे प्यार की तरह होती हैं, जिसका वास्तव में अंत नहीं है.

_ वो मंजिल ही क्या जिसके रास्ते में मजा न हो..!

हम उस राह के राही नहीं, जिसे मंजिल की तलाश है..

_ हम तो वो हैं जो बस सफर का मजा लेने आये हैं !!

कुछ तो है जो घर नहीं दे पाता ;

_वर्ना ऐसे तो यात्रा में कोई नहीं रहता..!!

कुछ राहों के सफर को भी जी लेना चाहिए, _

_ हर सफर मंजिल तक पहुंचने का इरादा नहीं रखते..

” यात्रा का असली आनंद मंजिल से अधिक रास्तों पर मिलता है..”

तू चलता चल, ऐ पथिक _

_ बस इतना समझ, कि रास्ता जीत, और मंज़िल हार है..

अपने किसी विशिष्ट दायरे से निकल कर यात्रा करना और घूमना बेहद जरुरी है.
हर यात्रा एक किताब की तरह होती है, हर यात्रा के साथ अलग पन्ना खुलता है.
मंजिल प्राप्त करने से अधिक महत्वपूर्ण है _ एक अच्छा मुसाफ़िर बनना…!!!
कोई बातों में ही उलझ जाता है, _ और कोई यात्रा पर निकल जाता है.
कुछ सफर ऐसे होते हैं, _ जिनमें सिर्फ रास्ता ही हमसफर हो सकता है.
यात्राएँ हमें बहोत कुछ सिखाती हैं, _ बस निर्भर करता है हम कैसे हैं..
पहुचने से ज़्यादा ज़रूरी है… _ ठीक से यात्रा करना…
एक घूमना ही तो है जो इन्सान को जिन्दा रखता है !
मुश्किल रास्ते खूबसूरत मंजिलों तक ले जाते हैं..
यात्रा सिखाता हूँ मैं, _ मंजिल तो बहाना है
यात्रायें हमें नये संसार से मिलाती हैं !!
सफर से बेहतर कोई मंज़िल नहीं..
” मजे से चलो – चलने में ही मजा है,” लोगों को पहुँचने की बड़ी जल्दी है ; क्यों आप को इस रास्ते पर मजा नहीं आ रहा है ?

आप को चारों तरफ खिले फूल दिखाई नहीं पड़ते ? ये पेड़ों की छाया, ये हरियाली, ये पछियों के गीत, यह कलरव – इसमें आप को मजा नहीं आता ?

आप कहते हो, हमें तो मंजिल पर पहुंचना है –_– ” मैं मानता हूँ, यात्रा ही मंजिल है “–

जो लोग घूमने के दौरान सिर्फ फोटो ही लेते हैं _उन्हें अपना घूमना याद नहीं रहेगा ; उन्हें केवल यही याद रहेगा कि _उन्होंने कौन सी फोटो खींची थीं.

सफ़र सिर्फ मंजिलों तक पहुंचने के लिए नहीं होते बल्कि_

_ उन तमाम जगहों से गुजरने के लिए भी होते हैं जो मंजिल के रास्ते में पड़ते है.

मंज़िल तो आ ही जाएगी एक न एक दिन जनाब, _

_ आज ज़रा रुक कर इन राहों के हालात जान लेते हैं ..!!

सदियों से मुसाफ़िर हूँ, कई मंज़िल मिलीं, पर कई मिलनी बाक़ी है,

_ हर युग में होता है कोई ना कोई मेरे जैसा, _ उसे ढूँढना बाक़ी है…

जूते उतार देना _ मेरी यात्राओं की समाप्ति की घोषणा नहीं थी,

जीवन ने कुछ यात्राएं मुझसे नंगे पांव करवाई.

भारत मे घूमना फिरना सिर्फ मौज मस्ती या फिर धार्मिक कारणों से ही accept किया गया है. _ घूमने को शिक्षा मे शामिल ही नहीं किया गया, _घूमना शिक्षा का एक महत्वपूर्ण अंग है.

आप मानिए या ना मानिए ; _ घूमना आपको शिक्षित भी करता है ; _किताबों से कहीं ज्यादा..!!

_कई बार आपके शिछक से भी ज्यादा शिक्षा घूमना देता है.

लेकिन जब आप विशेष जगहों पर घूमेंगे तो कम resources मे रहना, बिना स्वाद का खाना, पर्वतों, पठारों के अंतर, नदियों के उद्गम स्थल, तापमानों के अंतर और उनका प्रभाव, लोगों की और पेड़ों के बनावट के अंतर, समुंदर की विशालता, विभिन्न टाइम जोन तथा ऐसी अनेकों शिक्षाएं हमें मिलती हैं,

संभव हो तो घूमिए और हर बार कोई नई टोपोग्राफी चुनिये, _ इसके दूरगामी प्रभाव का फाइदा उठायें.
__ कभी कहीं सुना और पढ़ा था कि यात्राएं अनुभव की ऐसी पिटारा होती हैं _जो मानव जीवन को सदैव से समृद्ध करती रहीं हैं.
घूमना सिर्फ पागलपन नहीं है,; घूमना जीवन की सार्थकता को करीब से देखना और उसे महसूस कर पाने की कसौटी पर खरा उतरना भी है.
उस सभ्यता, संस्कृति और लोक को समझना है.
”पर्यटन स्थलों के व्यापारीकरण और वहां बढ़ती भीड़ ने सब जगह _ऐसी बदसूरती फैला दी है कि _अब प्राकृतिक सौंदर्य कहीं नहीं बचा, केवल प्रसिद्धि बच गई है _जिसे देखने के लिए लोग उमड़ पड़ते हैं.”
—इससे आगे की बात और भी ज़ोरदार है: सैलानियों को देखकर ऐसा लगता है _जैसे वे घर से ‘मार्केटिंग’ करने के लिए निकले हैं _या फिर खाने-पीने;__ प्रकृति का सौंदर्य देखने तो कतई नहीं.”

सुविचार – छुट्टी – छुट्टियां – 064

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काम जब करते थे, तो सोचते थे छुट्टी कब मिलेगी ;

_ छुट्टी मिली है तो सोचते हैं काम कब मिलेगा..!!

कुछ छुट्टियां बस सुनहरी याद रह गईं.. और कुछ छुट्टियां ऐसी भी जो छुट्टियां नहीं लगती..!!
ख़ुद को पैंपर [ Pamper- संतुष्ट ] करना भी कभी-कभी बहुत अच्छा होता है. अपने लिए वक़्त निकालें. छुट्टी लेकर पूरा दिन अपने हिसाब से बिताएं. घूमने जाएं, शॉपिंग करें या मूवी देखें. इससे आप तरोताज़ा हो जाएंगे.

सुविचार – भूख – तंगी – 063

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बहुत वाकिफ़ हूँ मैं रोटियों की ताकत से, _

_ दो वक्त ना मिले तो मेरी औकात बतला देती हैँ..

भूख को समझने के लिए भूखा रहना पड़ता है – ” रहे _ हो _ कभी “
” खाने का स्वाद ” ज़ुबान नही भूख तय करती है.
रोटियां उन्हीं की थालियों से कूड़े तक जाती हैं, _

_ जिन्हें पता नहीं होता ” भूख क्या होती है “

जो कहता है कि जिंदगी बहुत हसीन है, _

_ शायद उसने कभी पेट की भूख नहीं देखी होगी.

छोटी – सी उम्र ने तजुर्बे बड़े दिखा दिए, _

_ पेट की भूख ने सैकड़ों हुनर मुझे सिखा दिए.

भूख, तंगी.. ये जीवन के सबसे शांत शिक्षक होते हैं..
_ जो शब्दों के बिना ही बहुत कुछ सिखा जाते हैं.!!
एक निवाला पेट तक पहुंचाने का ऊपर वाले ने क्या खूब इंतजाम किया है.

_ अगर गरम है तो हाथ बता देते हैं,
_ अगर सख्त है तो दांत बता देते हैं,
_ कड़वा या तीखा है तो जुबान बता देती है,
_ बासी है तो नाक बता देती है,
_ बस मेहनत का है या बेईमानी का इसका फैसला हमें अपने आप करना है.

सुविचार – गाँव – शहर – 062

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जिम्मेदारियो के बोझ तले तेरी गिरफ्त मे हू ऐ शहर,

_ वरना मेरे गाँव के खेत तुझसे ज्यादा सुकून देते है..

“नौकरी जो इस तरह निर्मम है, कि इसे न तो परिवार का महत्व समझ में आता है और ना अकेले जीने का दर्द “

मैंने शहर को देखा और मैं मुस्कराया,

_वहाँ कोई कैसे रह सकता है, यह जानने मैं गया शहर और फिर वापस न आया.!!
– मंगलेश_डबराल
पहले मुझे लगता था कि शहरों की अपेक्षा गाँवों में अधिक सुकून होता है, मगर फिर महसूस हुआ कि गाँवों और कस्बों में सुकून नहीं होता.

_ बल्कि, धरती पर सबसे अधिक ईर्ष्यालु और दूसरों के जीवन में ताका-झांकी करने वाले लोग आपको गाँवों और कस्बों में ही मिलेंगे.
_ गाँव देहात कस्बों को जितना महिमा मंडित किया गया है, उतने ये हैं नहीं.
कवि और लेखकों ने जो गाँव की छवि गढ़ी है. _सच कहूं तो गाँव उससे एकदम विपरीत है.
– Mayank Mishra
कोई जगह बदलने से नहीं बदलता जीवन, जीने का ढंग बदलता है – और वही हर जगह को अपना बना लेता है.

_ जगह बदलने से हमेशा समाधान नहीं मिलता, कभी-कभी हमें अपने जीने के ढंग को बदलना होता है.
_ जहाँ हम होते हैं, अगर मन उसी से तालमेल न बिठा पाए, तो कोई भी जगह हो, वहां अधूरापन ही लगेगा.
_ जहाँ मन ठहर जाए, वहीँ जीवन बसाना चाहिए- बाकी जगहें सिर्फ गुजरने- गुजारने के लिए होती हैं.
कोई ज़माने में अपना सा लगता वो गाँव, पीछे छूट गया जनाब _

_ अब वो चाय की टपरी पर मिलते दोस्त भी, शहर जो आ गए .!!

गाँव से शहर में बसते ही खुद को ऊंचा समझते हैं लोग,,,,,_ कैसे बताऊँ उन्हें..

_तेरी पक्की सड़क से अच्छी है वो पगडंडियां, _जो बाट निहारती है मेरे आने की..

“नही चाहिए बड़ा शहर”

_ कंक्रीट के जंगल में मुझे एक वक्त के बाद उफनाहट [बोरियत] होने लगती है.!!

_ बड़े शहर मेरे लिए सिर्फ एक मजबूरी है, पसंद कभी नहीं..
_ यहाँ जो लोग विनम्र भी हैं, वह भी रिज़र्व हैं.. इसलिए एक बाहरी व्यक्ति को यहाँ अकेलापन हमेशा महसूस होता रहेगा.!!
सबसे अच्छा है गाँव में शान से रहना.!!

_ शहर कभी अच्छे लगे ही नहीं घुटन होती है वहां.!!
किसी शहर व गाँव के बदलाव को वहीं का बाशिंदा ही सही बता सकता है..
_ जिसने उस शहर व गाँव में बचपन से जवानी तक का सफर जिया हो.!!
जिस तरह अच्छे अच्छे पकवानों से मन भर जाता _ ” रोटी से नहीं, “

_ उसी तरह बड़े से बड़े शहरों में मन भर जाता _ ” गांव में रहने से नहीं…”

गाँव छूटते ही रंग बदल जाते हैं..

_ जो देखा वो द़िमाग मे रह जाता है और कुछ यादें थकी हुई जिंदगी का हिस्सा बन जाती हैं.
_ लगता है कि हम ठहर गये हैं और खालीपन लगने लगता है.!!
गाँव का घर हर किसी को कहाँ नसीब होता है साहब ?

_ बहुत से लोगों की जिंदगी गुजर जाती है.. बाहर कमाते कमाते.!
_ चार दिन की छुट्टी लेकर जब घर आता है.. तब घर वाले हजारों टेंशन परोस देते हैं.
_ कुछ नये सपने जगा देते हैं, फिर उन सपनो के सपने देखते हुए फिर से ड्यूटी पर चला जाता है.
_ जवानी अकेले कट जाती है, कोई दर्द बाँटने वाला भी नही होता.
_ फिर जब हमेशा के लिए घर आता है तब तक बुढ़ा हो जाता है.!!
आगे बढ जाने की विवशता और पीछे लौट जाने की इच्छा..

_ हम लड़कों का इनके मध्य ही जीवन बीतता जाता है..!!
छोड़ कर एसी और कूलर, पीपल की छांव चलते हैं,_

_ शहर से जी भर गया, चलो अब गाँव चलते हैं !!

जिस्म तोड़ नौकरी है शहरों में..

_ बेटे गाँव कमा कर नहीं, थक कर लौटते हैं !!

शहर में छाले पड़ जाते है जिन्दगी के पाँव में, _

_ सुकून का जीवन बिताना है तो आ जाओ गाँव में..

पैसा भले ही शहर में ज्यादा होगा , _

_ सुकून मगर अभी भी गाँव में मिलता है ..

घर न जाऊं किसी के तो वो रूठ जातें हैं,_

_ मेरे गांव में अब भी, वो तहज़ीब बाकी है..!

मैं गांव हूं मुझे गांव ही रहने दो ; शहर की जकड़न में दम घुटता है मेरा !!
शहर आ गये हैं सब छोड़ के, लेकिन मुश्किल ये है की सब कुछ छूटता कहाँ है.!!

_ शहर बुरा नहीं है, बस परिस्थिति अलग बना देती है, गांव-जवार, अपने यार, घर-परिवार सब पीछे छुड़वा देती है.
_ शहर में भीड़ है, जेब में पैसा है, लोग हैं, फिर भी पता नहीं कुछ तो है.. जो खाली-खाली सा महसूस होता है.
_ पता नहीं कुछ तो है, पता तो सब है, बस कह नहीं सकता, ये खालीपन क्यों है.
_ चुप हो जाता हूं, पहले मजबूरी थी, अब आदत हो गयी है.
_ ठीक है..- शायद जिंदगी यही है.!!
‘शहर’ आने के बहुत से रास्ते खुला रखता है,

_ लेकिन लौटने के सभी रास्ते बंद रखता है.!!

इस भरे शहर में कौन मेरा अपना है,

_ जो मेरे पास ना होने पर रूठ जाए..!!

बहुत महंगा सौदा कर रही है ये ज़िन्दगी एक जॉब के चक्कर में,

_ माँ, दोस्त, घर, गाँव सब कुछ छोड़ना पड़ रहा है !!

किस आज़ादी में कैद हो गए शहर में,

_ कि फिर गाँव जाने को तरस गए !!

शहर में मेहमान की बिदाई सीमित है दहलीज़ों तक, _

_ गांव में अभी भी लोग सड़क तक छोड़ने आते हैं..

शहर बसा के _ गाँव ढूंढ़ते हैं..!

अजीब पागल हैं _ हाथ में कुल्हाड़ी ले कर छाँव ढूँढ़ते हैं ..!!

अपनी मिट्टी से हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं,

_ कुछ लोग जो शहर जाकर मशहूर हो जाते है.

कोई किसी की तरफ़ है कोई किसी की तरफ़ _

_ कहां है शहर में, अब कोई ज़िंदगी की तरफ़..!!

मेरे गाँव की मिट्टी से भरता है तेरे शहर का पेट…_

_ और तेरे शहर वाले… गाँव वालों को… गवार कहते हैं…!!

कहीं जमीं से ताल्लुक न खत्म हो जाए,

_ बहुत न खुद को हवा में उछालिए साहब !!

गाँव से आने वाले लड़के लालटेन के उजाले में पढ़कर, _

_ एक दिन पूरी दुनिया को रोशनी दिखाते हैं..!!

गुज़री तमाम उम्र उसी शहर में जहाँ,

_वाक़िफ़ सभी थे कोई पहचानता न था.
सुना पड़ा गांव का दालान ..जहां बचपन में खेला करते थे.
_ अब जिम्मेदारी ने शहर बुला लिया.!!
ये रोजगार की तलब गाँव से शहर तक ले आई ज़िन्दगी को,
_अब अपने ही घर-गाँव जाने के लिए दूसरों से पूछना पड़ता है.!!
अपनी गली में अपना ही घर ढूंढ़ते हैं लोग _ यह कौन शहर का नक्शा बदल गया !!
दुनियाँ के किसी शहर में नहीं मिलेगा, _ सुकून के लिए अपने गाँव लौटना होगा..
शहर में तो बस मेरा शरीर रहता है, _दिल मेरा आज भी गाँव में बसता है..
अपने गाँव से निकले तो खो गये, अपने जो दूर हुए तो अजनबियों से हो गये..!!
जिम्मेदारी ने छुड़वा दिए गाँव, घर, दोस्त.. गाँव छोड़ कर जाने वाले यही सोचते हैं.!!
गाँव में पक्का मकान बनाना था… सो कच्ची उम्र में घर छोड़ना पड़ा ..
हर आदमी के अंदर एक गाँव होता है _ जो कभी भी शहर नहीं होना चाहता..
जहाँ कमरे में कैद हो जाती है ” जिन्दगी ” _ लोग उसको बड़ा शहर कहते हैं.
यदि रोजगार की मज़बूरी न होती तो शहरों का अस्तित्व ही न होता !!
गांव का छोड़ मकान अपना, _ किराए में शहर में रहते हैं।।
शहर के मकान फीके पड़ जाते हैं, _जब गाँव वाले घर याद आते हैं.
गाँव ने ही बचा रखा है रातों का वजूद, शहर वाले तो अँधेरा नहीं होने देते..!!
हम भी गाँव में शाम को बैठा करते थे, _ हमको भी हालात ने बाहर भेजा है..
शहर से संभावनाएं जुड़ी हैं, गाँव से भावनाएं जुड़ी हैं.!!
“जीवन” _शहर की अमीरी में कितना गरीब हो गया है..!!

_शहर के लोग गाँव में नहीं रहना चाहते, _पर गाँव की ज़िन्दगी का मज़ा लेना चाहते हैं.!!

शहर और गाँव दोनों की अपनी अलग-अलग विशेषताएँ हैं..

_ और दोनों ही जीवन के अलग-अलग अनुभव प्रदान करते हैं !!

शहरी जीवन लाखों लोगों का एक साथ अकेले रहना है.
शहर की दवा और गाँव की हवा बराबर होती है.
शहर तेज़ दौड़ रहा है… 🏙️

_ मैं किनारे खड़ा होकर ज़िंदगी को समझ रहा हूँ 😌
_ ये जहाज़ बता रहा है कि धीरे चलो, लेकिन सही दिशा में ⛵
_ कभी हँसना सीखो 😂
_ कभी रुककर महसूस करो ❤️
_ और कभी खुद से कहो —
“अभी सफ़र बाकी है मेरे दोस्त!”
– Cycle Baba
गांव में रहने से कोई ग्रामीण नहीं होता है,

_ जिसके अंदर गांव रहता है, वही गांववाला होता है.
_ हो जिनमें एक अनगढ़ भोलापन.. वही ग्रामीण है.
_ ये चतुर सुजान गांववाला कहलाने के हकदार नहीं है.!!

– Shailendra Sudhrama

NOTE : भोलापन और गाँव दोनों का कोई कनेक्शन नहीं है.
_ पर आजकल देखा जा रहा.. हर गाँव वाला महा धूर्त है.. सिटी वाले फिर भी सुलझे हैं..
_ गाँव वालो से ज्यादा चालाक असंवेदनशील [insensitive] लोग नहीं देखे मैंने..!!
_ ईर्ष्यालु और दूसरे के जीवन में अनावश्यक ताक-झांक करने वाले ज्यादातर आपको गाँव में ही मिलेंगे.!!
गाँव छोड़ के जाना पड़ता है, घर छोड़ के जाना पड़ता है,

_ वो खिड़की और छत को अलविदा कहना पड़ता है,
_ हमारा बस चले तो यहीं सुकून से आराम फरमाते,
_ लेकिन कुछ मजबूरियों तले भी जीना पड़ता है .!!
बहुत दिनों बाद खुले आसमान के नीचे सोकर बचपन याद कर रहा हूं, सच कहूं तो इस भौतिक परिवर्तन में अब खुले आसमान के नीचे सोना एक लग्जरी अनुभव दे रहा है,

गर्मियों के मौसम में रात में खुले आसमान के नीचे सोना जब सामान्य न रहकर वैभव लगने लगे तो समझ लो _ जीवन शहर की अमीरी में कितना गरीब हो गया है….

अपने गांव अपने शहर से लगाव सभी को होता है और होना भी चाहिए, जिस जगह बच्चा पैदा होता है, _ वहां की एक-एक चीज से उसकी यादें जुड़ी होती हैं ; वह कभी भी विस्मृत नहीं की जा सकती हैं, _ फिर चाहे वह पेड़ पौधे हों या सुबह – सुबह डालों पर अठखेलियां करते पंछियों की माधुर्य उत्पन्न करती चहचहाहट हो.

अपना गांव/ शहर तो अपना होता है तब चाहे वह छोटा हो या बड़ा हो जब हम उसके बारे में कुछ अच्छा कहे तो बड़ी प्रसन्नता होती है.

_ लेकिन अपनी जन्मस्थली होने के नाते यदि किसी शहर या गाँव को देखा जाए तो उस पर बहुत अपना बहुत लाड़ बहुत प्रेम स्वत: ही न्यौछावर होता है.

_ये सब यादों के वही पृष्ठ है जिसे कोई इंसान बचपन से बुढ़ापे तक भरता है और कभी अकेलापन महसूस होने पर उन्हें पड़ता है,_ _ लोगों की तो मजबूरियां होती है जिसके कारण ही कोई अपना शहर या गाँव छोड़कर जाता है, _ वरना कौन अपनी जन्मस्थली छोड़ कर जाना चाहेगा.

शहरों में रहने वाले अधिकांश लोगों की गतिविधियों ने पृथ्वी से अपना संबंध खो दिया है;

_ वे मानो हवा में लटके रहते हैं, सभी दिशाओं में मँडराते हैं, और कोई जगह नहीं पाते जहाँ वे बस सकें.

यहां तक कि शहर के उन चकाचौंध भरे और पॉश इलाकों में भी, जो शिक्षित और बुद्धिमान होने का दावा करते हैं, एक रूढ़िवादी-दकियानूसी समाज मौजूद है.!!
यह व्यक्तिगत प्राथमिकताओं और ज़रूरतों पर निर्भर करता है.

_ गांव का जीवन उन परिवारों के लिए बेहतर हो सकता है जो शांतिपूर्ण और आरामदेह माहौल चाहते हैं,

_ जबकि शहर का जीवन उन परिवारों के लिए बेहतर हो सकता है जो जॉब के अवसरों और सुविधाओं और सुख-सुविधाओं की एक विस्तृत श्रृंखला तक पहुँच चाहते हैं.

ज़मीन पे चल न सका, आसमान से भी गया ;

_ कटा के पर वो परिंदा, उड़ान से भी गया..
_ तबाह कर गई उसे, पक्के मकान की ख्वाहिश;
_ वो अपने गाँव के कच्चे मकान से भी गया..!!
भागम- भाग की दुनिया में समय रहते लोग जरुरत से ज्यादा जमा करने के चक्कर में फंसे रहते हैं,

_ लंबे समय के बाद अपनों के बीच लौटने पर उनकी अहमियत कम हो जाती है,
_ क्योंकि लोग उनके बगैर जीना सीख लेते हैं.
_ जब भी लगे कि अब लौटना बेहतर है, तभी वापसी कर लेनी चाहिए !!
_ साथ ही सत्य यह भी है कि जहाँ रोटी मिलती है, वही अपना घर है.
_ जो कहते हैं कि वो कभी अपने देश, अपने घर लौटेंगे, वे सत्य नहीं बोलते..
_ उन्हें केवल अपने घर से लगाव रहता है, लेकिन वो वहां रह नहीं पाएंगे.
_ क्योंकि जिस घर, गाँव को छोड़ कर गए थे _ वापसी में वो वैसे नहीं मिलेंगे, निराशा ही मिलेगी..
_ उसके बाद सिर्फ सपने में ही घर और गाँव दिखाई देंगे..!!
_ पर मन थेथर होता है, जहाँ हम लौट नहीं सकते, अपनी ही मज़बूरी के कारण _ फिर भी उन्हीं छोड़े के साथ हमेशा जीते हैं.
_ इसीलिए जहाँ पर हो, वहीँ पर जी लो अपनी ज़िन्दगी खुल कर शान से ;
_ वरना आधी ज़िन्दगी हम जिम्मेदारियां पूरी करने में खर्च कर देंगे..
_ और बची ज़िन्दगी हम वापस जाने की तैयारियों में खर्च कर देंगे..
_ तो अपने लिए कब जियेंगे ??
_ इसलिए अब आगे की तैयारी करने का वक़्त है,
_ समय में पीछे जाने पर सिर्फ़ राख़ मिलती है, जैसे ही छुओगे भरभरा कर गिर जाती है ;
_ अब आगे देख कर जीना ही उत्तम है..!!
चलो गाँव चलते हैं, अपनी मंजिल अपने पांव चलते हैं

कैसे चले, गाँव पूछता है, सभी चले गए,

पहले मुझसे, फिर शहर से रूठ गए

अब लौट आना चाहते हो,

अपनी मंजिल अपने पांव आना चाहते हो

ना वो मंजिल रही, ना वो रास्ते

तुम जिन रास्तों पर अपनी मंजिल अपने पांव जाना चाहते हो

अब बदल गया वो गाँव भी

बदल गए रास्ते भी उसके

ना खेत है अब ना खलियान है

ना पगडंडियां है ना फसलें लहलहान है

कहाँ आओगे _ इसको भी उजाड़ गए,

उसको भी छोड़ आए

ना तुम उसके बने, ना इसके

बस भागते रहे

यूँ ही अब भागते जाना है

ना मंजिल है ना पांव _ कहां जाना है

अपनी मंजिल अपने पांव कैसे जाना है.

गाँव बेचकर शहर खरीदा, कीमत बड़ी चुकाई है।

जीवन के उल्लास बेच के, खरीदी हमने तन्हाई है।
बेचा है ईमान धरम तब, घर में शानो शौकत आई है।
संतोष बेच तृष्णा खरीदी, देखो कितनी मंहगाई है।।
बीघा बेच स्कवायर फीट, खरीदा ये कैसी सौदाई है।
संयुक्त परिवार के वट वृक्ष से, टूटी ये पीढ़ी मुरझाई है।।
रिश्तों में है भरी चालाकी, हर बात में दिखती चतुराई है।
कहीं गुम हो गई मिठास, जीवन से कड़वाहट सी भर आई है।।
रस्सी की बुनी खाट बेच दी, मैट्रेस ने वहां जगह बनाई है।
अचार, मुरब्बे आज अधिकतर, शो केस में सजी दवाई है।।
माटी की सोंधी महक बेच के, रुम स्प्रे की खुशबू पाई है।
मिट्टी का चुल्हा बेच दिया, आज गैस पे कम पकी खीर बनाई है।।
पहले पांच पैसे का लेमनचूस था,अब कैडबरी हमने पाई है।
बेच दिया भोलापन अपना, फिर चतुराई पाई है।।
सैलून में अब बाल कट रहे, कहाँ घूमता घर- घर नाई है।
कहाँ दोपहर में अम्मा के संग, गप्प मारने कोई आती चाची ताई है।।
मलाई बरफ के गोले बिक गये, तब कोक की बोतल आई है।
मिट्टी के कितने घड़े बिक गये, अब फ्रीज़ में ठंढक आई है ।।
खपरैल बेच फॉल्स सीलिंग खरीदा, जहां हमने अपनी नींद उड़ाई है।
बरकत के कई दीये बुझा कर, रौशनी बल्बों में आई है।।
गोबर से लिपे फर्श बेच दिये, तब टाईल्स में चमक आई है।
देहरी से गौ माता बेची, अब कुत्ते संग भी रात बिताई है ।
ब्लड प्रेशर, शुगर ने तो अब, हर घर में ली अंगड़ाई है।।
दादी नानी की कहानियां हुईं झूठी, वेब सीरीज ने जगह बनाई है।
बहुत तनाव है जीवन में, ये कह के मम्मी ने भी दो पैग लगाई है।
खोखले हुए हैं रिश्ते सारे, कम बची उनमें कोई सच्चाई है।
चमक रहे हैं बदन सभी के, दिल पे जमी गहरी काई है।
गाँव बेच कर शहर खरीदा, कीमत बड़ी चुकाई है।।
जीवन के उल्लास बेच के, खरीदी हमने तन्हाई है।।
कीमत बड़ी चुकाई है।कीमत बड़ी चुकाई है।
गांव और प्रकृति में रहने का मतलब ये नहीं है कि आप कोई बसे बसाये गांव में गांव वालों बीच जा कर रहने लगें.. नहीं..

_अगर आप शहरों में पले बढ़े हैं और बहुत अधिक सभ्य हैं तो गांव में आपके लिए रहना आपके लिए एक सज़ा से कम नहीं होगा.. ख़ासकर उत्तर प्रदेश के गांवों में.
_ भारत के जो गांव आप पुरानी फिल्मों में देखते थे, वो सब किसी कहानियों के गांव हैं..
_ वो गांव न पहले कभी थे और न अब हैं..
_ गांव के लोगों की मानसिकता शहर वाले सोच भी नहीं सकते हैं..
_ कितने पढ़े लिखे लोगों को मैं जानता हूं जो “भावनाओं” में बहकर, नौकरी वगैरह छोड़कर, गांवों में, गांव वालों के बीच जा बसे, सिर्फ इसलिए कि वो उन्हें शिक्षित करेंगे, उनके बच्चों को आगे बढ़ाएंगे, मगर गांव वालों ने उन्हें ऐसा नोचा खसोटा कि उनका जीवन नर्क से बदतर बन गया और अपने जीवन के क़ीमती सालों को गँवा कर वो लोग वापस शहर की ओर भागे.
_ ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इन लोगों ने किताबी जीवन जिया था,
_ ग़रीब, मज़दूर और गांव के अनपढ़ लोग इन्हें साहित्य में हमेशा बेचारे, परेशान और भोले बताए गए..
_ इन्होंने ख़ुद कभी अपने किसी बड़े प्रोजेक्ट पर मज़दूरों से मज़दूरी नहीं करवाई, न ही ग़रीब लोगों को अपने पास रख के पाला, न ही गांव वालों के साथ जीवन बिताया..
_ इन्होंने जो किताबों में पढ़ा और सोशल मीडिया पर देख लिया, वही सच मान लिया..
_ अमीरों से नफ़रत सीखी, गरीबों से मुहब्बत सीखी..
_ सब कुछ इन्होंने साहित्यकारों और सिनेमा से सीखा, ख़ुद कुछ भी एक्सपीरियंस नहीं किया.
_ गांव वालों का आपस में इतना प्रेम होता है कि अगर उनका पड़ोसी अपने दरवाज़े पर एक पेड़ बो दे तो ये उसे चुपके से उखाड़ देंगे..
_ ये अपने पड़ोसी को जितनी अधिक से अधिक तकलीफ़ दे पाते हैं देते हैं और वही इनके आनंद का एकमात्र सोर्स होता है..
_ किसी को दुखी देखना इनका सबसे बड़ा एंटरटेनमेंट होता है और ये बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि शहर वाले भावुक और बेवकूफ़ होते हैं और उसका ये भरपूर फ़ायदा उठाते हैं..
_ भारत के गांव सिर्फ़ राजनीति, धोखा, लड़ाई, झगड़े और शोर कि बस्तियां हैं..
_ अब तो ये हालात हैं कि एक व्यक्ति, जो डीजे का बिज़नेस करता है, पूरी रात दारू पीकर ऐसी तेज़ आवाज़ में गाना बजाएगा कि आसपड़ोस के लोग अस्पताल पहुंच जाते हैं,
_ मगर अगर वो सिर्फ़ मना कर दें उस डीजे के लिए तो खून और क़त्ल की नौबत आ जाती है.. _ ये आपस में एक दूसरे को जितना अधिक दुख देते हैं उतना ही प्रसन्न होते हैं..
_बड़ा ही कुंठित जीवन होता है भारत के गांव वालों का.
_ इसलिए गांवों की पगडंडी देखकर भावुक मत हुआ कीजिए..
_मैं भी जब प्रकृति के बीच बसने की बात करता हूं तो मैं आपसे बसे बसाये गांव के भीतर बसने की बात नहीं करता हूं..
_ उत्तर प्रदेश गांवों में रहने का जो अप्रोच सिख भाईयों का होता है, वो अपनाइये..
_ सिख हमेशा गांव से दूर अपने विशाल खेतों के बीचों बीच अपना खूब बड़ा सा घर बनाते हैं..
_ चारों तरफ़ से सुरक्षित और गांव वालों की भसड़ से बहुत दूर..
_ उत्तर प्रदेश के गांवों के पास रहना है तो सिखों की तरह रहिए..
_वो सबसे अच्छा और सुरक्षित तरीका है प्रकृति के बीच जीने का.!!
~सिद्धार्थ ताबिश

सुविचार – स्कूल – विद्यालय – 061

बच्चों को स्कूल अच्छा नहीं लगता है,

परन्तु बच्चों के जीवन को स्कूल ही अच्छा बनाता है..

स्कूल तो ज्ञान का एक झरना है, जहाँ कुछ विद्यार्थी अपनी प्यास बुझाते हैं ;

कुछ एक दो घूँट पीते हैं और कुछ सिर्फ कुल्ला करते हैं – शिव खेड़ा

स्कूल का पहला दिन और आखिरी दिन एक जैसा था,

दोनों बार आँखों में आंसू थे, पर दोनों बार रोने की वजह अलग थी..

*ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना..*

कमीज के बटन, _ ऊपर नीचे लगाना, वो अपने बाल, _ खुद न संवार पाना,
पीटी शूज को, चाक से चमकाना, वो काले जूतों को, _ पैंट से पोंछते जाना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,**जरा फिर से तो बुलाना…*
वो बड़े नाखुनों को, दांतों से चबाना,
और लेट आने पर, _ मैदान का चक्कर लगाना,
वो प्रेयर के समय, _ क्लास में ही रुक जाना,
पकड़े जाने पर, _ पेट दर्द का बहाना बनाना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना…*
वो टिन के डिब्बे को, _ फ़ुटबाल बनाना,
ठोकर मार मार कर, _ उसे घर तक ले जाना,
साथी के बैठने से पहले, _ बेंच सरकाना,
और उसके गिरने पे, _ जोर से खिलखिलाना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना…*
गुस्से में एक-  दूसरे की, _ कमीज पे स्याही छिड़काना,
वो लीक करते पेन को, _ बालों से पोंछते जाना,
बाथरूम में सुतली बम पे, _ अगरबत्ती लगाकर छुपाना,
और उसके फटने पे, _ कितना मासूम बन जाना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे’* *जरा फिर से तो बुलाना…*
वो गेम्स के पीरियड के लिए, _ मास्टरजी को पटाना,
कार्य – अनुभव को टालने के लिए, _ उनसे गिड़गिड़ाना,
जाड़ो में बाहर धूप में, _ क्लास लगवाना,
और उनसे घर – परिवार के, _ किस्से सुनते जाना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना…*
वो बेर वाले के बेर, चुपके से चुराना,
लाल – पीला चूरन खाकर, _ एक दूसरे को जीभ दिखाना,
खट्टी मीठी इमली देख, _ जमकर लार टपकाना,
साथी से आइसक्रीम खिलाने की, _ मिन्नतें करते जाना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना…*
वो लंच से पहले ही, _ टिफ़िन चट कर जाना,
वो पानी पीने में जमकर, _ देर लगाना,
बाथरूम में लिखे शब्दों को, _ बार – बार पढ़ के सुनाना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना…*
वो परीक्छा से पहले, _ मास्टरजी के चक्कर लगाना,
लगातार बस इम्पोर्टेन्ट ही, _ पूछते जाना,
वो उनका पूरी किताब में, _ निशान लगवाना,
और हमारा ढेर सारे कोर्स को देखकर, _ सर का चकराना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना…*
वो मेरे स्कूल का मुझे, _ यहाँ तक पहुँचाना,
और मेरा खुद में खो, _ उसको भूल जाना,
बाजार में किसी, _ परिचित से टकराना,
वो जवान मास्टरजी का, बूढ़ा चेहरा सामने आना…
*ऐ दोस्त*
*तुम सब अपने स्कूल* *एक बार जरुर जाना…*
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना….*
शायद सभी याद करेंगे👍

 

 

सुविचार – अपमान – अनादर – तिरस्कार – 060

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*क्या है अपमान ?*

किसी व्यक्ति की वह व्यक्तिगत कल्पना जिसमें वह दूसरों से *वेवजह सम्मान* की चाह रखता है और उस चाह का पूरा ना होना ही अपमान कहलाता है. *अपेक्षा की उपेक्षा का ही तो नाम अपमान है*. हमें दूसरों से कम अपनी सोच से ज्यादा अपमानित होना पड़ता है.

किसी ने नमस्कार ना कर हमारा *अपमान* कर दिया, यह सिर्फ हमारी सोच है. उसने तुम्हारा अपमान नहीं किया, उस बात को *बार-बार सोचकर* तुम खुद अपना अपमान करते हो. जो लोग मान और सम्मान पर ज्यादा विचार करते हैं वही तो *बेचारे* कहलाते हैं। अतः अपनी सोच का स्तर ऊपर उठाकर *मान-अपमान* से मुक्त होकर *प्रसन्नता* के साथ जिन्दगी जीओ.

जहां से एक बार अपमान का घूंट पीकर वापस आ जाएं,

_ निमंत्रण मिले तो भी वहां न जाएं.!!

सार्वजनिक रूप से की गई आलोचना अपमान में बदल जाती है

और एकांत में बताने पर सलाह बन जाती है.

किसी के अपमानित करने से आप अपमानित नहीं होते..
_ अपमानित तब होते हैं जब आप अपने भीतर अपमानित महसूस करते हैं.
किसी भी तरह के अपमान को सिर्फ इसलिए मत सहन कीजिए कि उसका कारण प्रेम है.!!
” उन्होंने मेरा अपमान किया ,,,”कितनी बार मैंने ऐसा महसूस किया और आज तक वह दर्द पकड़ा है.

_ उन्होंने अपने संस्कारों अनुसार व्यवहार किया, और मैंने उसे अपना अपमान समझ लिया.
_ मुझे मान और महिमा की जरुरत नहीं, कोई मेरा अपमान नहीं कर सकता.
दुरी ही अनादर का एकमात्र उत्तर है, प्रतिक्रिया न करें, बहस ना करें, बस अपनी उपस्थिति हटा दें.!!
किसी को अपमानित करके आप उसके आज को तो चोट पहुंचा सकते हैं, उसके कल का फैसला नहीं कर सकते.!!

सुविचार – घर – 059

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जब हम किसी स्थान को छोड़ते हैं तो हम अपना कुछ न कुछ पीछे छोड़ जाते हैं, दूर चले जाने पर भी हम वहीं रहते हैं

_और हमारे अंदर ऐसी चीजें हैं जिन्हें हम केवल वहां वापस जाकर ही दोबारा पा सकते हैं.

We leave something of ourselves behind when we leave a place, we stay there, even though we go away. And there are things in us that we can find again only by going back there. – Pascal Mercier

“आपका घर तनाव का इलाज होना चाहिए, _न कि इसका कारण”

“Your home should be the antidote to stress, not the cause of it.” —Peter Walsh

” मैं अब घर जाना चाहता हूँ लेकिन घर लौटना नामुमकिन है, क्योंकि घर कहीं नहीं है.” – श्रीकांत वर्मा
छूट जाता है सब कुछ वहीं

कि घर छूटता है
लेकिन उसका मोह नहीं
घर की महक
भटकती रह्ती है आस-पास
लगातार
हम तलाशते हैं रास्ते
तय करते है सफ़र
लेकिन कोई होता है भीतर
जो लौट जाना चाहता है घर की ओर
हमें मालूम है
सारे रास्ते तय करने के बाद
हमारे चेहरे घर की तरफ़ ही होंगे
लेकिन तब
क्या घर होगा वहाँ
उसी तरह
– संजीव गुप्त
मेरे खुदा, मुझे इतना तो मोतबर कर दे.

_ मैं जिस मकान में रहता हूँ, उसको घर कर दे.
(इफ्तेख़ार आरिफ़)
“मकान जितने भी सुन्दर हों, घरों से ज़्यादा सुन्दर नहीं होते.”
_ कोठी-बंगलों में भी कई बार घर नहीं होते..
_ और कई बार एक कमरे में भी घर होता है.
_ सुन्दर घर किसे अच्छे नहीं लगते.
_ घर सुन्दर होते हैं सुन्दर लोगों से..
_ सुन्दर वे लोग होते हैं.. जिनके दिल सुन्दर हों.
_ खूबसूरत घर यूँ ही नहीं बन जाते, उसके लिए बड़ी क़तर-ब्यौंत करनी पड़ती है, उखाड़-पछाड़ करनी पड़ती है.
_ छोटों को हँसना सिखाने के लिए बड़ों को कई बार रोना पड़ता है.
_ अनुशासन सिखाने के लिए खुद अनुशासन में रहना पड़ता है.
_ आज़ादी और उच्छृंखलता के बीच फ़र्क बताने का काम, आधुनिकता और परम्परा के बीच तारतम्य बैठाना सिखाने का काम कोई आसान नहीं.
_ मुश्किलों से गुज़र कर ही आसानियों को पाया जाता है.
_ छोटे कभी बड़े नहीं बनते, बड़ों को छोटा बनना पड़ता है.
_ मुश्किल से कोई मकान घर बनता है.
_ घर बनाएँ, खुशियां लायें.!!
– Manika Mohini
जगहों के सुंदर होने से मन की व्यथा कम होती है क्या ???
‘मेरा घर तेरे घर से बड़ा’ कहने को ‘घर’ लेकिन बिना प्रेम की छत, बिना प्रेम की नींव..- घुटन भरा.!

_ डिब्बियों [Flat] को भी मजबूरी में घर कहने लगे लोग.!!
मानव सदियों से जंगलों में रहता आया है.
_ इधर बीसवीं सदी से एक स्वैच्छिक पिंजरे बन्दी में उसकी रुचि बढ़ी है.
_ विकास के नाम पर दुनिया में गगनचुंबी इमारतों का गढ़ा जाना शुरू हो गया.
_ मध्यम वर्गीय लोगों ने भी इन गगनचुंबी इमारतों का स्वागत किया और इनमें बन्दी बनने में गहरी रुचि दिखाई.
_ हर कोई ‘मेरा अपना फ्लैट हो’ का गाना गाते हुए प्रवेश करने लगा.
_ बिल्डरों की भी बाढ़ आ गयी.
_ रुपया लोगों की जेबों से निकल कर गगनचुंबी इमारतों में घुसने लगा.
_ यह सब वहां तक तो ठीक-ठाक है जहां बड़े महानगरों में जमीन उपलब्ध नहीं है.
_ लेकिन हुआ ये कि सब-अर्बन क्षेत्रों में भी लोग फ्लैट लेकर रहने लगे और फ्लैट्स का निर्माण होने लगा.
_ और सौ दो सौ गज के फ्लैट्स में कैद होने लगे.
_ इंसान इन फ्लैट्स में अगल बगल रह कर भी एक दूसरे से अनजान जीवन बिताने लगा.
_ अवसाद की बिमारी ने लोगों को घेरना शुरू कर दिया.
_ गांव के बड़े बड़े घर, आंगन छोड़कर लोग इन ऊंची इमारतों में ‘पड़ोसी’ की भावना से अनजान होने लगे.
_ खुली जगहों की बोली मिट्टी के भाव सब तरफ़ पड़ी है.
_ यह एक सकारात्मक पोस्ट है.
_ मैं गगनचुंबी डिब्बों का विरोधी नहीं हूँ.
– Tejbeer Singh Sadher
आना मगर पहले से खबर देकर..
_ कहीं ताले में न बन्द हो घर मेरा.
Tejbeer Singh Sadher
अच्छा घर वो नहीं.. जो इम्प्रेस [Impress] करे, अच्छा घर वो होता है ‘जो थकाए नहीं’
_ “हमने अपने घरों को इतना रहने लायक नहीं छोड़ा कि वहाँ रहना हमें अच्छा लगे”
मुद्दतों बाद आया हूँ मैं पुराने घर में.

_ ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा..!
हर किसी के पास लौटने को घर नहीं होता.
“एक घर जला के निकले थे एक घर की तलाश में..
_ ‘ना इधर ज़िंदा रहा कोई ना उधर कोई मिला.!!’
दूर की संभावनाएं हमेशा अच्छी लगती हैं, पर असली सुकून अक्सर उसी घर में मिलता है..
_ जिसे हम धैर्य से बनाते हैं.!!
“घर छोटा हो या बड़ा,” सामान कम हो तो ज़िन्दगी बड़ी लगती है.!!
मैं दुनिया को मनाने में लगा हूँ, मेरा घर मुझसे रूठा जा रहा है.!!
“घर अब घर नहीं रहा..” वो बस चार दीवारों का मकान रह गया है.!!
घर सिर्फ कंक्रीट का स्ट्रक्चर नहीं होता – “घर वही है जहाँ हमारा मन चैन में रहे”
अपना घर शान्ति के लिए होता है, उसका उद्देश्य शान्ति खोना नहीं होना चाहिए.!!
घर की सजावट सर्वप्रथम ख़ुद की खुशी के लिए भी करनी चाहिए..

_ महज़ दुनिया को दिखाने के उद्देश्य से नहीं.!!

महंगे सजावटी लेकिन निर्जीव वस्तुओं से भरे स्थान को घर नहीं कहा जाता,

_ बल्कि घर वह स्थान होता है जहां लोग प्रेम से मिलजुल कर रहते हैं..!!

कितनी कितनी स्मृतियां जुड़ी होती हैं पुराने घर से..!! हम महसूस करते हैं बार बार..!!

_ घर हमें बचपन की उन सभी घटनाओं की याद दिलाता है, जिन्होंने हमें “हमें” बनाया है..!
_हमारे पुराने दिन उसमें इस तरह संरक्षित होते हैं _ कि उस दौर की ओर मन बार बार लौट जाना चाहता है..
_वो घर आज नहीं है, तब भी स्मृतियां उसे खड़ा कर लेती हैं.!!!
_ ना जाने कैसे इन बेजान चीजों से भी हमारी जानें यादों से कैसे चिपक जाती है !!
__ और जिंदगी भर दर्द की एक सुई सा चुभोती रहती है !!
_ हम अपने जीवन में कुछ भी प्राप्त कर लें ..पर उससे अपनी पसन्दीदा चीज को खो देने से उपजा खालीपन कभी नहीं भर सकते..!!
– जिस घर में आप तीस साल रहे हों, वो घर क्या कभी आपके लिए खत्म हो सकता है ? _ वो मकान जिसमें इतनी उम्र गुजारी, वहां कोई और रहता है, वो मकान भी नहीं रहा अब वहां, पर मेरे लिए आज भी वह मकान वहीं है.!!
आज फिर तेरी याद आई..

_ कई सालों की यादें एक साथ सरक गईं, वो बचपन की खुशियाँ, वो छोटे-छोटे झगड़े, वो अनकहे लम्हें..
_ सब कुछ बदल गया है, लोग बदल गए, हम बदल गए, परिस्थितियाँ बदल गईं..
_ लेकिन उन यादों की खुशबू आज भी वैसी ही ताज़ा लगी, जैसे समय ने उन्हें सिर्फ हमारी यादों में संजो कर रखा हो.!!
हर दिन बहुत कुछ घटता है, और बीता हुआ समय धीरे-धीरे जीवन की दोहराई बन जाता है.

_ हम लौट-लौटकर उन्हीं पलों को देखते हैं, जिन्हें कभी साधारण समझकर छोड़ दिया था.
_ वक़्त अपनी क़ीमत बताते हुए नहीं जाता.. वह बस गुज़र जाता है,
_ और उसके जाने के बाद ही एहसास होता है कि ‘सबसे कीमती पल वही थे.!!’
“घर” मेरे लिए सिर्फ एक भौतिक स्थान नहीं है, बल्कि वह जगह है जहाँ दिल और आत्मा को सुकून मिलता है.

_ यह वह स्थान है.. जहाँ हम पूरी तरह से अपने आप को व्यक्त कर सकते हैं, बिना किसी डर या चिंता के.
_ यह वह जगह है.. जहाँ रिश्तों की गहराई, समझ और समर्थन होता है.
_ घर वह जगह है.. जहाँ हम एक-दूसरे की कमियों और कमजोरियों को स्वीकार करते हुए, एक-दूसरे को मजबूत बनाने की कोशिश करते हैं.
_ घर एक अहसास है—एक ऐसी जगह जहाँ हम अपनी पहचान पा सकते हैं..
_ और जहां हमें प्यार, स्नेह और सुरक्षा का अनुभव होता है.
_ यह सिर्फ चार दीवारों में सिमटा नहीं होता, बल्कि उन रिश्तों और भावनाओं में समाहित होता है, जो हमें एक-दूसरे से जोड़ते हैं और हमें एक परिवार के रूप में एकजुट करते हैं.
_ घर का मतलब सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि वह सुरक्षित और सजीव स्थान है..
_ जहाँ हम अपने दर्द, खुशियाँ और सपनों को साझा कर सकते हैं.
_ घर तब सच में घर बनता है, जब वह हमारे जीवन की सबसे गहरी भावनाओं और रिश्तों का गवाह बनता है.
घर जैसा भी था फिर भी आ जाती थी नींद,
_ मैं नए घर में बहुत रोया पुराने के लिए..!!
उस दिन उस पुराने मकान से विदा लेते समय ..मैं आखरी बार रोया.._ मेरे स्मृति कोष में यह अनुभूति बनी हुई है.
_ और जब मैं रो रहा था तो ..यह बात मुझको नितांत रूप से सुनिश्चित थी कि ..उस मकान की आंखों में भी आंसू अवश्य आए होंगे,
_ हांलाकि मैं उस मकान की आंखें देख नहीं पाया ..और मुझे आंसू भी दिखाई नहीं दिए, किंतु मैं अनुभव कर सका..
_ जब मैंने उस मकान को आखिरी बार स्पर्श किया तो ..मुझे उसकी उदासी अनुभव हुई, और मैं उसका आशीष, अलविदा अनुभव कर पाया..
_ और निश्चित रूप से यह मेरी उसके साथ अंतिम भेंट थी,
_ क्योंकि उसके बाद ..उसे वहां से हटा दिया गया.
_ पुरानी यादों की दुनियां अब भी अपनी लगती है.
_ जिस घर में हम रहे थे, उसके निशान भले ही मिट गए हों, _ खुशियों और तकलीफों के असर अब भले न दिखाई पड़ते हों ..लेकिन उनकी उपस्थिति मौके-ब-मौके उभरती रहती है.
_ बहुत तकलीफ देह होता है ये…पुरानी इमारतों में विलक्षण नशा होता है…अतीत अपनी समग्र भव्यता में खड़ा नज़र आता है…!!
_जब इनका मलबा दिखता है तो एक टीस सी उठती है…
मैं हर बात बहुत जल्दी भूल जाता हूँ, दिन में तो सबके साथ सामान्य व्यवहार करता हूँ.. _ लेकिन रात को सोते समय सारी पुरानी भूली हुई बातें एक-एक करके बाहर आ जाती हैं और मेरा मन कभी रोता है, कभी गुस्साता है..

_ भले ही मेरा चेतन मन अतीत को भूलने और माफ करने का दिखावा करे तो अवचेतन मन उसपर हावी हो जाता है..!!
— छूट जाना एक जगह का और छूट जाना पुरखों का घर..

_ और एक जगह का छूटना _सिर्फ़ जगह का छूटना नहीं होता..
_ जगह के साथ छूट जाते हैं कुछ दोस्त, परिचित चेहरे और उनकी आँखों की चमक, छूट जाते हैं पड़ोसी और उनकी बातचीत..
_ छूट जाता है छत से दिखता पीपल का पेड़..
_तीन चिड़ियाएँ रह जाती हैं उस पेड़ पर..
_ छूट जाती है एक पुरानी ईंट की दीवार..
_ और उस पर लगी भूरी पड़ गई काई..
_ चिट्ठियों के लिए पुराना पड़ जाता है एक पता..
_ बदल जाता है सूर्योदय का कोण..
_ छूट जाता है वहां का आकाश..
_ छूट जाता है पीछे चलता -चलता एक दोस्त.. हो उठता है भावुक..
_ आँखें पीछा करती हैं दूर तक..
_और अश्वगति से पीछे छूटता जाता है..
_ जाना पहचाना रास्ता, जगह और मकान..!!
**”बेशक मैं छोड़ आया उस घर, उस जगह को..

– मगर वहां कुछ तो छूट गया.!!”
— वो दिन जब सब ख़त्म हो गया, मेरे भीतर एक अजीब-सी घुटन छोड़ गया..
_ तुम्हारी मौजूदगी, तुम्हारे साथ बिताए उन छोटे-छोटे पलों को याद करता हूँ तो..
_ दिल खुद से ही शिकायत करने लगता है कि हमने किसी अनमोल चीज़ को गँवा दिया.!!
“कुछ जगहें हमसे छूट जाती हैं, पर वहाँ का अपनापन कभी हमारे भीतर से नहीं जाता.”
जब हमारा घर था ना…

_ अब तुम कभी नहीं दिखोगे,
_ न वो छत न वो गलियारा
_ तुम याद आओगे..
_ जब भी तुम्हारे उत्साह को याद करेंगे पर अब उत्साह से नहीं भरेंगे,
_ तब आओगे याद..
_ याद तो आओगे..
_ घर का गलीनुमा मैन गेट को खड़ खड़ा कर खुलवाना..
_ और वो पानी कि मोटर की आवाज़ अब कहाँ ढूंढेगे..
_ याद आओगे तुम..
_ तुम नहीं हो तब भी खूब हो..
_ हमारी बातों और यादों का ज्यादा हिस्सा छेंक रखे हो..
_ तुम्हारी यादों में ही देखते हैं अपना अक्स..
_ हमारे पास इससे सुंदर कोई बात नहीं इन दिनों..
_ जब तुम थे ना……
_ जब हमारा घर था ना…जो अब नहीं है !!
बरसों बीत गए, नई दुनिया बसाए हुए,

_ फिर भी याद आते हैं वो पल, जो हमने थे वहां बिताए,
_ रम गया हूँ इस नई ज़िन्दगी में, घर-परिवार और बच्चों की ख़ुशी में,
_ फिर भी जब भी आता है, नाम उस घर का..
_ खो जाता हूँ उस घर की कहानी में..
_ कुछ पुरानी बातें कुछ पुरानी यादें, ज़िंदा हैं आज भी वो कहीं..
_ ये नाता फ़ुरसत में ही सही, कुछ पल के लिए ही सही..
_ चाहता हूँ जीना, फिर से वही ज़िन्दगी..
_ ये मेरी तमन्ना ही सही, कितना भी बसा लो अपना घर,
_ पर बहोत याद आता है वो घर !!
हमारा घर बिकने की घटना ने सदैव मुझे उदास किया है..

_ पीछे कुछ छोड़कर जाने का दुःख, आगे कुछ मिलने के सुख से सदैव भारी ही रहा..
_”जगहें नई हों या पुरानी” वहाँ एक दिन का प्रवास हो या एक महीने का, छूटने का दु:ख बराबर ही रहता है.
_ “बराबर” शब्द लिखते हुए अपने ऊपर हंसी आ रही है.. ‘भला दुःखों की क्या बराबरी..’
_ लोग याद आएं न आएं.. छूटती हुई जगह पर होने की वजहें, वहाँ की चीजें, वहाँ की बातें, वहाँ की दुनिया अनायास बेतहाशा याद आती है..
_ कई बार कहीं से लौटकर, लौटने का सुख मनाने के बजाय घंटों बरबस रोता रहता हूँ.
_ उन क्षणों में गला रुंध जाता है, मन भारी हो जाता है, बरबस ही आँसू बहने लगते हैं.
_ उन क्षणों में रोना इतना स्वाभाविक हो जाता है कि.. न रोना अपने प्रति बेमानी लगने लगता है..
_ किन्हीं किन्हीं दिनों में जाना इतना भयावह हो जाता है कि.. लगता है यहाँ से जाऊंगा तो जाऊंगा कहाँ ?
_ उन यादों से बचते हुए भी उन्हीं में रह जाता हूँ..
_ जीवन कभी कभी कितना कठोर हो जाता है न..!!
**वो गाँव-घर कई सालों पहले छोड़ दिया, पर उसकी खुशबू, वो गलियाँ, वो चहल-पहल आज भी दिल के किसी कोने में वैसे ही बसी रहती हैं.

_ कहते हैं वक़्त बहुत कुछ बदल देता है, मगर कुछ यादें ऐसी होती हैं.. जो हर गुज़रते साल के साथ और गहरी हो जाती हैं, खैर.!!
_ कुछ बातें वाक़ई भुलाए नहीं भूलती, और शायद भूलनी भी नहीं चाहिए..
_ क्योंकि वहीं तो हमारी कहानी का सबसे सच्चा हिस्सा छिपा होता है.!!
“यहाँ जब तक रहता हूँ तब तक वहां की फ़िक्र रहती है..

_ अब किसे जाकर बताऊँ कि कहाँ का रहने वाला हूँ और कहाँ की याद आती है.”
_ कभी-कभी मन दो ठिकानों के बीच अटका रहता है —
_ जहाँ हूँ, वहाँ पूरी तरह नहीं ; और जहाँ नहीं हूँ, वही भीतर बसा है.
_ यादें हमें उस जगह से बाँधे रखती हैं जो अब सिर्फ एहसासों में है.
_ शायद घर कोई पता नहीं होता,
बल्कि वो जगह होती है.. जहाँ अपनापन महसूस होता है.!!
नहीं रहा वो घर मगर अपनेपन की बात है, जहाँ भी रहें पर आज भी याद वही घर है.!!
पुराने घर की वो मीठी यादें, अब बहुत रूलाई आती है … सब कहीं खो गया !!
कौन सा घर संभालूँ, रोज़ कुछ न कुछ टूटता रहता है..!!
जब छोटे थे तो जोर से रोते थे, जो पसंद था उसे पाने के लिए..
_ आज बड़े हैं तो चुपके से रोते हैं, जो पसंद है उसे भुलाने के लिए.!!
“क्या मैं इस खोए हुए मकान को केवल दर्द के रूप में याद करूंगा,

_ या उसकी स्मृतियों को अपने जीवन की ताक़त और जड़ों की तरह अपने भीतर संजोऊंगा ?”
हम सालों तक कई चीज़ें सहेजकर रखते हैं,

_ इसलिए नहीं कि वे कीमती होती हैं, बल्कि इसलिए.. क्योंकि वे हमारे साथ चुपचाप बहुत कुछ जी चुकी होती हैं और जिस दिन वे अचानक गुम हो जाती हैं, तो ऐसा लगता है.. जैसे सब कुछ लुट गया हो..
_ क्योंकि गुम वो चीज़ नहीं होती, उससे जुड़ा हमारा एक पूरा दौर गुम हो जाता है.!!
हमारा पुराना घर जोइन्ट फैमिली की टेंशन के कारण बिक गया, लेकिन आज भी वो बहोत याद आता है..
“एक तरीका ये भी था फल खाते-बांटते वो उम्र भर..
_भाइयों ने पेड़ काटा और लकड़ी बाँट ली.!!”
…सही मे _जहां पर मैं छोटे से बड़ा हुआ, अगर काफी समय के बाद _ उस जगह पर जाएं तो ;; _  रोना ही आता है,

__ क्यूंकि वहां पर जाकर _ मुझे अपने बचपन की वो सारी बातें याद आ जाती हैं _ और वो एक फिल्म की तरह मेरी आंखों के सामने आ जाती हैं _ जो इतने वर्ष वहां रहे ; यह बहुत ही दर्द भरा दृश्य होता है..!!

_ उस शानदार घर को जमींदोज होते हुए देखने गया तो, सच में, दिल दुःख गया.

‘कल चमन था, आज इक सहरा हुआ, देखते ही देखते ये क्या हुआ ?’

“ज़िन्दगी के यादगार पल जो आज ख़त्म हो गए.. पर सदैव वो स्म्रतियों के रूप मे जिंदा रहेंगे…!”

कोई भी हर पल एक तरह की सोच नहीं रखता और न ही हमेशां एक ही जगह बंधा रहना चाहता है.

_ जिन्दगी के रियर मिरर में जिन्दगी को देखने पर इसे मुड़कर देखा तो जा सकता है मगर दोबारा जिया नहीं जा सकता.
_ उसपर भी कुछ दर्द रह जाते हैं देखी हुई जगहों को दोबारा न जी पाने के.!!
नया घर कितना भी खूबसूरत हो, लेकिन पुराना घर फिर भी आंखो में पानी ला देता है !!

_ क्योंकि उसमे यादें दौड़ती हैं, बचपन खिलखिलाता है.
_ अगर पुराने सुने घर मे अकेले जाकर खड़े हो जाओ तो.. एक एक कर सारे यादों के पंछी आँखों सामने उड़ने लगते हैं.
_रह रह कर दिल मे एक मिठी सी हूक उठती है.. कि काश वो दिन फिर लौट आते.!!
_ सभ्य और विकसित होने की चाह में हम न जाने कितने गली-कूचे भूल आये..
_ पुरानी बातें अब जाने किस जन्म की कहानियाँ लगती हैं.!!
पिता द्वारा कमाया हुआ और बनाया हुआ.. हमें बढाना चाहिये.. बेचना नहीं..

_ फिर चाहे इज्जत हो या दौलत..!!

बचपन कि ख्वाहिशें आज भी खत लिखती हैं मुझे,

_ शायद बेखबर इस बात से कि मैं अब इस पते पर नहीं रहता..!!

  • “बदल चुके हैं मोहल्ले के सभी कोने, मेरे बचपन का आखिरी निशां भी गया.”
पता बदल गया हमारा, न वो घर है न वो क़िस्सा हमारा..!!

_ कुछ यादें कभी खत्म नहीं होती, कुछ आंसू कभी नहीं सूखते..
_ कुछ हादसे एक सदमे की तरह होते हैं, जो मुझे नींद से चौंका कर उठा दिया करते हैं,
_ और इस अचानक हुए हादसे से उपजी अस्थिर मनोस्थिति का कोई पक्का इलाज नही,
_ कैसे बयां करूँ कि क्या होता है,
_ अचानक से उठकर उसी शिद्दत से वह सोचना जिसको न सोचने की मुझे दवाई चाहिए…!
दूसरे शहर में रहते हुए भी मैं,

_ बार बार अपने जामुरिया को सिरहाने लगा लेता हूँ,
_ जैसे दुनियां जहान के धूप में जलते कोई छांव मिल जाए..
– हमारी चर्चा में जामुरिया ..इस तरह धीरे से आ जाता है ..जैसे हवा में आती है नमी..
_ कुछ गलियों के खो जाने पर मैं नाराज हूँ..
_ कुछ दुकानों के जिक्र पर उदास..
_ कुछ गली आधे रास्ते पर खत्म हो जाती है..
_ निज़ाम स्टोर दुकान की बहुत याद आती है..
_ वहीं से खरीदता था डबल सेवेन और पॉप्पीन्स..
_ वो दूर से देखते बोलता था..
_ अबके बहुत दिन बाद आये हो..
_ वो पहचान की दुकानें छूट गई हैं..
— आधी उम्र बीती जहाँ हो ..उसी कि लंबी बात है..
_ सिनेमा मोड़ पर रुका कोई रिक्शा है..
_ रिक्शे पर सवार हमारा अतीत है..
_ अतीत की छाती से लिपटा हमारा बचपन है..
_ मुहल्ले की दुकान पर कचौड़ी और जलेबी है..
— आपस की चर्चा में आसरा सा धड़कता ..ये वहां का जादू है..
_ वहां गलियों का जादू है..
_ हर गली हटिया की तरफ जाती है..
_ मैं हवा के साथ फिर उस दिशा में घूम आता हूँ..
_ अब तो इच्छा यही है कि ..जीने में साथ ना दिए न सही..
_ मरने में ही देना..!!
कुछ वही रहा, कुछ बदल गया..

_ दिन वही रहा, दिनांक बदल गया..
_ घर बदल गया, लोग बदल गए..
_ रिश्ते वही रहे, मायने बदल गए !
_ आ गए हम कहां कि, सब कुछ बदल गया..
_ मुड़ना जो चाहा तो, मोड़ बदल गए थे..
_ मिलना जो चाहा उनसे तो, वो लोग जा चुके थे..
_ जो रह गए थे शेष, वो भी ख़ुद को बदल लिए थे !
_ शरारत जो करना चाहा तो, वो उम्र जा चुकी थी..
_ उम्र के इस पड़ाव पर, वो बात जा चुकी थी..
_ आहत जो हुआ दिल तो, ढूंढ़ने लगा किसी को..
_ मिलता भी कोई कैसे, कि रोशनी जा चुकी थी !
_ मंजिल वही रही, पर रास्ते बदल गए..
_ वक़्त के इशारे बदल गए..
_ लगता है जैसे, सब कुछ बदल गया.!!
कुछ वही रहा, कुछ बदल गया..
—दूर होने का फैसला आसान नहीं था, कौन कहता है दिल परेशान नहीं था..
_ खामोशी के पीछे छुपे थे आंसू, कौन कहता है दर्द का नामोनिशान नहीं था.!!
“विदाई पुश्तैनी मकान से”

_ तेरी दीवारों ने सुनी थीं, मेरे बचपन की खिलखिलाहटें…
_ तेरे आँगन ने सहेजे थे, मेरे सपनों के पहले फूल…
_ आज जब तुझे आख़िरी बार छुआ, तो मेरे हाथ भी काँपे,
_ और तेरी साँसों में भी उदासी थी.
_ तेरी आँखें मैंने कभी नहीं देखीं,
_ पर यक़ीन है — तू भी रोया होगा..
_ तू बिक गया…
_ पर तेरे आँगन में खेले मेरे दिन कभी नहीं बिकेंगे.!!
—
– आज पुश्तैनी मकान से आख़िरी बार विदा लिया.
_ दीवारें मौन थीं, पर उनकी उदासी मैंने महसूस की.
_ मेरे बचपन की हँसी और सपने वहीं रह गए…
_ मकान बिक गया, पर यादें अब भी मेरे भीतर जीवित हैं.
— हमारा घर उजड़ने की घटना पूरे रिश्तेदारों और भाईयों के लिए शर्म की बात होनी चाहिए थी,
_ पर हुई वह बस चुप्पी.. या खुसरपुसुर की बात ..
— क्या उनकी आत्मा कभी कचोटती नहीं उनको ?
_ कि कोई किसी के साथ इतना बुरा कैसे कर सकता है…?
_ जिन्होंने षड्यंत्र करके गहरी चोट दी है, उनसे अपेक्षा और आत्मीयता की डोर तोड़ देना ही समझदारी है.
_ रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि नियत और भरोसे से चलते हैं.
_ ऐसे लोगों से बस उतना ही व्यवहार रखना है, जितना सामाजिक रूप से न्यूनतम आवश्यक हो — न गहरी आत्मीयता, न अनावश्यक द्वेष.
_ यह घटना केवल एक संपत्ति खोने का मामला नहीं थी, बल्कि अपनी जड़ों, बचपन और आत्मा का एक हिस्सा खोने जैसी थी.
_ पुश्तैनी मकान घर से बढ़कर होता है — वह स्मृतियों, संस्कारों और अपनापन का केंद्र होता है.
_ मकान मात्र दीवारें और छत नहीं था — वह जीवन का साक्षी, हंसी और आंसुओं का साथी था.!!
हमारा घर उजड़ने की घटना पूरे रिश्तेदारों के लिए शर्म की बात होनी चाहिए थी,

_ पर हुई वह बस चुप्पी.. या खुसरपुसुर की बात ..
— क्या उनकी आत्मा कभी कचोटती नहीं उनको ?
_ कि कोई किसी के साथ इतना बुरा कैसे कर सकता है…?
_ किसी के साथ गलत करना आसान तो होता है..!
_ आसान नहीं होता.. उस बात का बोझ लिए रहना.!!
_ “उन्होंने मेरी जमीन नहीं.. मेरा घर छीना है.”
_ मेरे पिता के जाने के बाद से घर बिकने तक [2003-2021] के दौरान चार ऐसे काम आए, जिनमें उन रिश्तेदारों की बहुत जरूरत थी, लेकिन उन्होंने अपनी भूमिका नहीं निभाई.
वे चार काम थे : —
1. घर के पांच सदस्य जो कि तकलीफ में थे, उनकी समस्या का हल उन्होंने नहीं किया.
2. मेरी दुकान जो भाड़ा में दी हुई थी उसमें फचांग किया, लेकिन इन्होंने इसको नहीं रोका.
3. जब मेरी माँ गई तो केवल दो लोगों ने ही खर्च उठाया, बाकी दो ने क्यों नहीं ?
4. घर को दूसरों को बेचने से रोकना था, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया.
_ अब प्रश्न उठता है कि इस अन्याय के खिलाफ़ कोई एक्शन क्यों नहीं लिया गया..
_ जवाब है कि जलन और ईर्ष्यालु प्रवृत्ति !!
— इससे बड़ा पाप क्या होगा भला.. जब किसी का घर नष्ट कर दिया जाए,
_ यह पाप उन सभी को लगेगा, जिन्होंने गलत किया और गलत का साथ भी दिया,
_ और वे तटस्थ [neutral] होने का दिखावा कर रहे, जो मज़े ले रहे, सभी इस पाप के भागीदार होंगे..!
_ उनके कर्म निश्चित रूप से उन लोगों को प्रभावित करेंगे,
_ हालांकि मैंने सबको माफ़ कर दिया है, सबकुछ समय पर छोड़ दिया है,
_ समय ही न्याय करेगा, समय ही कहानी लिखेगा..
_ सब चुप हैं.. जैसे मैं कभी था ही नहीं, या जैसे मैं हूँ ही नहीं..!!
—- इतिहास गवाह है कि दुनिया में बहुत से राजा रंक बन गए,
_ बहुत से महल मिट्टी में मिल गए,
_ बहुत शक्तिशाली लोग अंत में लाचार होकर मरे..
_ कोई अमर नहीं है, कोई अजर नहीं है,
_ कोई भी स्थिति सदा नहीं रहती..
_ बस मायने रखता है कि आपने सही का साथ दिया या नहीं !!
कुछ बाते लिखी ही इसलिए गई.. ताकि लोग उन परिस्थितियों को जान-समझ पायें,
_ कि कैसे एक फ़ैसले की वजह से कितना कुछ पल भर में तबाह हो गया, खैर !..
“घर हमारा उन्हीं चिराग़ो ने जलाया”
_ हांथ जला कर हमने, जिन चिरागो को बुझने से बचाया.!
_ दुख तब और भी पाया,
_ जब घर जलने के बाद.. उन चिराग़ो को भी बुझते पाया !!
** ऐसे कोई करता है क्या ?

_ हमारा घर उजड़ना केवल मेरा व्यक्तिगत नुकसान नहीं था,
_ यह पूरे रिश्ते और रिश्तेदारी के लिए आत्ममंथन का विषय और शर्म की बात होना चाहिए था.
पर हुआ क्या..
_ चुप्पी… या फिर धीमी-सी खुसरपुसर, जैसे यह सब सामान्य हो.
_ कभी मन में प्रश्न उठता है.. – क्या किसी की आत्मा को यह खटकता नहीं
कि किसी के साथ इतना अन्याय कैसे किया जा सकता है ?
_ गलत करना शायद आसान होता है, पर उस गलती का बोझ जीवन भर उठाना आसान नहीं होता.
_ उन्होंने मेरी ज़मीन नहीं छीनी, उन्होंने मेरा घर छीना है.
_ फिर सवाल आता है कि इस अन्याय के विरुद्ध कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया गया.
_ उत्तर साफ़ है..- ईर्ष्या, जलन और स्वार्थ.
_ किसी का घर उजाड़ देना.. इससे बड़ा पाप और क्या हो सकता है ?
_ यह दायित्व केवल उन्हीं का नहीं.. जिन्होंने यह किया,
_ बल्कि उनका भी है, जो साथ खड़े रहे, जो तटस्थ बने रहे, और जो चुप रहकर तमाशा देखते रहे.
_ गलत का साथ देना भी एक कर्म है और कर्म अपना असर छोड़ता ही है.
_ मैंने सबको माफ़ किया है और सब कुछ समय पर छोड़ दिया है.
_ क्योंकि मुझे भरोसा है..- समय ही न्याय करता है, समय ही पूरी कहानी लिखता है.
_ आज भी सब खामोश हैं, मानो मैं कभी था ही नहीं, या मानो मेरा होना मायने ही नहीं रखता.
_ पर कोई भी स्थिति सदा नहीं रहती.
_ अंततः यही देखा जाता है कि किसने सही का साथ दिया.. और किसने नहीं.
_ अब यह बात कहना मेरे लिए ज़रूरी है..
_ आपके व्यवहार से मुझे कई बार गहरी मानसिक पीड़ा हुई.
_ मेरी चुप्पी यह संकेत नहीं थी कि मुझे दर्द नहीं हुआ, बल्कि यह कि मैं सहता रहा.
_ मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि.. जो हुआ, वह सही नहीं था.
_ और यह जानना मेरा अधिकार है कि इसके पीछे आपकी सोच या कारण क्या था.
_ यह शब्द आपको बदलने के लिए नहीं लिखे गए हैं, बल्कि अपने मन का बोझ हल्का करने के लिए..
_ अगर आप समझें.. तो अच्छा.
_ अगर न समझें..- तब भी मैंने अपनी बात रख दी.!!
कुछ बाते केवल पढ़ने के लिए नहीं लिखी जातीं, बल्कि इसलिए कि लोग उन्हें जान सकें, समझ सकें..

_ उन परिस्थितियों को महसूस कर सकें,
_ जहाँ एक छोटे-से फ़ैसले ने पल भर में घर को उजाड़ दिया.!!
न लौट पाने का दुःख.. सब दुखों में सबसे बड़ा न सही.. सबसे गहरा जरूर है,

_ खास कर तब, जब वो दुःख घर न लौट पाने का हो.!!
हमें बेघर करने वालों को “हम कैसे हैं” पूछने का कोई हक़ नहीं !!
आप किसे कह रहे हैं पुराना था वो घर,

_ जिसे खरीदने और बनाने में ज़माना लगा मुझे..!!

_ दो पक्के कमरे बनाकर रहने वाले का संघर्ष भी कभी कभी बहुत बड़ा होता है.. ( उसकी मेहनत, त्याग वही बता सकता है ).

_ मुझे एक दो कमरे का फ्लैट खरीदने के लिए नाकों चने चबाने पड़ गए थे.

घर में अपनों का होना बहुत जरुरी है, _ वरना घर को कितना भी सजा लो, दीवारें कभी नहीं बोलतीं..
अपनों से ही तो मकान “घर” बन जाता है, _ अपने साथ ना रहें तो महल भी खंडहर बन जाता है.
जिसने उम्र भर रचा घर का एक एक कोना _ आज वही बागवान पड़ा है घर के एक कोने में.
सोचा था घर बना कर बैठूँगा सुकून से, _ पर घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना डाला..
उड़ गये वो परिंदे घोंसला छोड़कर, _ जिनको अपना खून पिला पिला कर सींचा था..
घास के तिनके जो बेकार कूड़ा समझे जाते थे, _ चंद पक्षियों के हुनर ​​से बन गए घर !
सब अपने अपने हिस्से की ईंट खींचकर भाग रहे थे, घर का बिखरना तो लाजिमी ही था.!!
जब से कमाना मैंने शुरू किया, _ मेरा प्यारा घर मुझसे दूर हुआ ..
पुराने घरों मकानों की अपनी कहानी होती है..

_ वो कुछ मायनों मे जिंदा से लगते हैं.!!

पूरी दुनिया घूम लो यार, पर जो सुकून घर में मिलता है, वो कहीं भी नहीं मिलता..

“दुनिया की यात्रा करें, लेकिन ध्यान रखें कि घर सबसे अच्छा है.”

जिसका मन सच्चे सुकून से भरा होता है, वो छोटे से घर में भी महलों जैसा
आराम महसूस करता है.!!
झोपड़ी में रहना सही है लेकिन, महल के लिए मेहनत ना करना ग़लत है ..!!!
“हर कोई घर लेता व बनाता है, पर हर कोई समझ कर नहीं लेता और न ही बनाता.”
सुकून चाहिए महल नहीं… महल तो हम कच्चे घर को भी बना लेंगे !!
अपने ही घर का मेहमान हूँ मैं, __ अब केवल त्योहारों में घर जाता हूँ…!!!

_ सोचा था घर बनवाकर घर पर चैन से रहूंगा, जो घर बनाया अब उसी घर में मेहमान बनकर जाना पड़ता है.

_ यही होती है एक परदेशी की जिंदगी..!!

घर नाम की जगह को इतना सुकून भरा, प्यार भरा और भरोसे भरा होना चाहिए कि पढ़ने, कमाने या दुनिया देखने निकला बच्चा बार बार वहां लौटना चाहे,

_ वर्ना तो जिसे जब जैसा बहाना, मौक़ा मिलेगा वह घर छोड़ जाएगा फिर आप रोते रहिए नए ज़माने को.!!

दुनिया में अगर कहीं सुकून मिलता हैं तो “वो है अपना घर “
घर सहनशीलता और धैर्य को सीखने की पाठशाला है.
चाँद छोटे घर से दिखता था, बड़े घर से नहीं दिख रहा.!!
घर क्या होता है _ ये घर मेँ पता नहीं चलता..
घर बड़े हुए लेकिन रिश्ते कम हो गए, घर न रहकर मकान हो गए..

_ घर जरूर बड़े हुए लेकिन दिल छोटे हो गए हैं और होते जा रहे हैं..!!

नए आशियाने की तलाश में कितने घरौंदे वीरान हो गए,

_ लोग अपने पुराने घरों को छोड़ गए..!!

अपनी सब बातें मन में ही रखना बेहतर है.!

_ इस दुनिया में खूब भरे हैं, सबके घर तुड़वाते लोग.!!

गिरवी रक्खा अपने सारे ख्वाबों को, _

_ और इस ज़मीन पे छोटा सा घर लिया मैंने ..

जो घर बच्चों को अब पुराना लगता है, _

_ वही घर माँ – बाप को खरीदने में जमाना लगा था ..

झोपड़ी में भी चैन होता है.. अगर वो आपकी हो..

_ और महल भी बेमानी लगता है अगर वहां गुलामी करनी पड़े.!!

“घर” धैर्य और समर्पण सीखने के लिए किसी प्रशिछण स्थल के समान होता है.

यहाँ तपस्या और त्याग की सर्वोत्तम शिछा मिलती है.

घर कच्चा हो या पक्का , छोटा हो या बड़ा कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता …

….अगर …. घर का माहौल ख़राब है तो बहुत फ़र्क़ पड़ता है !

सारी दुनिया बंद दरवाजे में सिमटी है, बाहर क्या है कोई आवाज ना सुनती है !

_अब त्यौहार त्यौहार नहीं लगते _ क्योंकि यहां अब घर नही मकान बसते हैं !!

जब तक घर के अंदर था, पता न चला कि धूप क्या होती है ?

जब घर से बाहर निकला, तब पता चला कि छत क्या होती है !!

दरारे पड़ गई है,,, _ मेरे घर की दीवारों में भी ,

एक वही है,,, _ जो मुझे कान लगा के सुनती है

घर छोटा हो या बड़ा हो, कोई फर्क नहीं पड़ता ;

लेकिन घर का माहौल, जरूर अच्छा होना चाहिए.

आगे आने वाला शहर कितना भी पसंदीदा क्यूँ ना हो,

पीछे छूटने वाला घर बैचैन कर ही देता है..

जीवन में हमेशा ये सोच के दुखी मत रहो कि मेरा घर बड़ा नहीं है,

_ये सोचो कि घर में सुख है या नहीं, जिस घर में सुख होता है.. वही घर सबसे बड़ा होता है.!
हम हर जगह नहीं रह सकते हैं, पता करना होगा कहां आप सहजता से रह सकते हैं,

_ मैं बहुत सी जगहों में रहा पर सब जगह मुझे अच्छा नहीं लगा.
मेरे लिए सबसे सहज रहना अपने होमटाउन में रहा और आज भी वही है.
_ इसलिए अपनी कनेक्टिविटी, अपना वास्तविक घर तलाशना होता है.
_ ये बात संगीत, खाना, कपड़े, रिश्ते हर चीज पर लागू होती है.!!
घर की कलह में अगर जाता है तो घर के बच्चों की खुशी, बच्चों के संस्कार, पत्नी के अरमान और सपने, और एक पुरुष का सुकून और शांति.!! परिणाम – घर की बर्बादी
घर खुद का छोटा हो तो भी चलता है, यदि परिवार के सदस्यों की तुलना मे कमरें ज्यादा हो तो साफ सफाई में दिक्कत होती है और सुरक्षा की दृष्टि से भी दिक्कत होती है.
एक निश्चित उम्र के बाद, व्यक्ति का अपना घर होना चाहिए..

_ जिसे वह अपनी इच्छानुसार सजा सके, चीजों को अपनी इच्छानुसार कहीं भी रख सके, स्वतंत्र रूप से जी सके, बेफिक्र होकर घूम सके, बिना किसी रोक-टोक के, बिना किसी डर के आसानी से सांस ले सके, और पूरी तरह से अपने आप को जी सके.
केवल वही घर खरीदें जिसकी आपको आवश्यकता है, न कि वह घर जिसे आप खरीद सकते हैं.

Buy only the home you need, not the house you can afford.

**”क्या मैंने घर खरीदा, या घर ने मेरा जीवन खरीद लिया ?”

“हम साधन जुटा रहे हैं, या जीवन जी रहे हैं ?”
“घर का सपना तभी पूरा होता है जब वह बोझ नहीं, सुकून दे !!”
अपना घर होना अच्छी बात है, लेकिन उसके लिए खुद को कर्ज में डुबो देना समझदारी नहीं.
“घर, जमीन और संपत्ति जीवन को सहारा देने के लिए हैं ; यदि उन्हें पाने में पूरा जीवन ही गिरवी रखना पड़े, तो कम से कम एक बार रुककर यह पूछ लेना चाहिए कि हम साधन जुटा रहे हैं या जीवन जी रहे हैं”
“घर तब संपत्ति बनता है जब वह सुकून दे ;
जब वह वर्षों की चिंता बन जाए, तो सोचना चाहिए कि कीमत कहीं ज़्यादा तो नहीं चुकाई जा रही”
जो चीजें हम जीवन को बेहतर बनाने के लिए बनाते हैं, कहीं वही पूरा जीवन तो नहीं लेतीं ?
– हर व्यक्ति घर खरीदने का निर्णय अपने कारणों से लेता है.
लेकिन कभी-कभी यह पूछना भी बुरा नहीं कि हम घर बना रहे हैं, या घर बनाने में अपना जीवन खर्च कर रहे हैं.
“इसका उत्तर हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है, इसलिए किसी एक निर्णय को सार्वभौमिक रूप से सही या गलत कहना कठिन है.”
हंस ने तो अकेला उड़ना ही है.. पर क्या जीने के लिए इंतज़ाम भी न करें ?

_ जब तक जीना है, तब तक रहने के लिए घर तो चाहिए ही.. और सारे आराम भी चाहिए.
_ जीवित व्यक्ति कर्म करता है.. खाली बैठ कर तो कर्म होंगे नहीं, यानी जब तक जीवन है, तब तक कर्मशील रहने के लिए सबकुछ चाहिए.
_ हां, अपने स्वार्थ के लिए किसी दूसरे का घर न हथियाओ.!!
– Manika Mohini
मुझे नहीं पता कि लोग अपने रिश्ते, अपने प्रियजनों के साथ अपने बंधन, अपने घर को आकार देने के तरीके को क्यों नहीं आकार देते हैं.

_ हम महीनों तक डिज़ाइन देखते हैं, कुछ चुनते हैं, और चुनते हैं कि घर के लिए सबसे अच्छा क्या है,
_ बैकग्राउंड, माहौल और वाइब के लिए क्या फिट बैठता है,
_ लेकिन जब रिश्ते को आकार देने की बात आती है, तो हम इसे अनदेखा कर देते हैं.
_ हम थोड़ी सी गलतफहमी के आधार पर लोगों के माहौल का चयन नहीं करते हैं.
_ हम किसी गलतफहमी के कारण इसे जल्दी ही छोड़ देना पसंद करते हैं.
_ हम अपने रिश्तों को सुधारना पसंद नहीं करते.
_ हम बस टूटे हुए रिश्ते के साथ जीना शुरू कर देते हैं.
_ लेकिन घर पर, हम पेंट को उतरते हुए नहीं देख सकते.
_ हम रिसाव-लीकेज को नहीं देख सकते.
_ मैं पूछना चाहता हूँ, क्या आपको अपने प्रियजनों के आँसू नहीं दिखते ?
_ क्या आपको नहीं लगता कि घर की मरम्मत करने से ज़्यादा ज़रूरी है उन्हें ठीक करना ?
_ घर सिर्फ़ लोगों के साथ होता है.
_ जिस घर में बात करने के लिए कोई न हो, वह सिर्फ़ यादों का कब्रिस्तान होता है.
_ मुझे ऐसी जगहें पसंद नहीं हैं जहाँ मुझे यादों की खुशबू आती हो.
_ मुझे जगहों, लोगों और उनके रिश्तों में जीवंतता पसंद है.
_ मुझे हवा में बंधन, खुशी, प्यार की खुशबू पसंद है.
_ हमें अपने रिश्तों पर उसी ऊर्जा और इरादे से काम करना चाहिए,
_ जिस तरह हम अपने घर के लिए करते हैं.!!
_ घर सजावट से नहीं, बल्कि हंसी से सुंदर बनता है।
— Sohrab Amaan
हर समाज की एक व्यवस्था, एक अधिकार क्षेत्र होता है.

_ जैसे-जैसे व्यवस्था में अनुचित बदलाव आयेंगे, व्यवस्था चरमरायेगी.
_ बस यह उसी का परिणाम है.
_ पहले आदमी ने औरत पर अति की, अब औरत कंधे से कंधा मिला रहीं हैं.
_ बराबरी का मतलब कोई सिर्फ शिक्षा, घर से बाहर नौकरी, घरेलू काम की अवहेलना आदि-आदि नहीं है.
_ गाली देना, मोर्चे निकालना, पुरजोर विरोध, षडयंत्र, हत्या, गुंडागर्दी, और भी सब कुछ, बराबरी का ही तो हो रहा है, अब डरना क्या.
_ सकारत्मक बदलाव के लिए अहंकार की आवश्यकता नहीं, एक सुदृढ़ सोच की ज़रूरत है.
_ स्वतंत्रता और स्वच्छंदता मे अन्तर समझ आना चाहिए.
_ रोना क्या है कि घर के काम कौन करे, भले ही वो काम बच्चे को दवा देना ही क्यूँ न हो.
_ घर के काम बोझ लगते हैं, जो कि जीवन का अभिन्न अंग हैं.
_ आत्मनिर्भरता सिर्फ धन कमाने का नाम नहीं, अपने दैनिक काम स्वयं करना भी है.
_ यही mind set बढ़ाने की ज़रूरत है.
_ पर पता नहीं क्यों, वह घर जो हमें सुरक्षा देता है, घर की रसोई जिस में सुपाच्य भोजन बनता है, शयनकक्ष जिसमें दिन भर की थकान उतरती है, वह बैठक जहाँ मनोरंजन होता है, घर के वो सभी काम जिनसे जीवन चलता है, महत्वहीन हो गए.
_ सुकून की जगह अहंकार ने ले ली, परिणाम बद से बदतर होते जा रहे हैं.
उफ्फ, भगवान भला करे.
– Anshu Mouli

सुविचार – मकान – 058

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“इन बारिशों से दोस्ती अच्छी नहीं, फराज़

_ कच्चा तेरा मकान है, कुछ तो ख़्याल कर…!!”

“हम सब कच्चे मकान में रह रहे हैं”

‘मकान’ केवल ईंटे भर हैं’ __ घर ईंटो और प्यार से बनता है..!!

A Home is always a house, but a house is not necessarily a home.

मकान ऊंचा होने से नहीं _अपने मयार [ दया करने वाला ] की ऊंचाई से आदमी ऊंचा होता है.
मकान इतने बन गए हैं जगह-जगह, जमीन भर गई है मगर दिल खाली है !!
छोटी-छोटी दरारें अक्सर बड़े-बड़े मकान के ढहने का कारण बनती हैं.!!
पहले मकान कच्चे थे और लोग सच्चे थे..अब मकान पक्के हो गए और लोग कच्चे.!!
एक मकान ऐसा भी था, जिसका हर कोना _ मेरी आहट को पहचानता था ;

_उस घर के कोने में मेरा नाम था _ और सारे खिड़की – दरवाजे मुझे बहुत करीब से जानते थे !!

मकान साथ लेकर कौन जाता है, सब देखभाल ही तो करते हैं.

मूर्ख आदमी मकान बनवाता है, बुद्धिमान आदमी उसमें रहता है,

जिसने भी ये कहा ….उसे ज़िंदगी का कितना गहरा तज़ुर्बा रहा होगा…

दीवार क्या गिरी मेरे मकान की, लोगो ने मेरे घर से रास्ते बना लिए..
तारीखों में गुम पुरखों का पैगाम बुलाता है, मुझे गॉव का टूटा मकान बुलाता है…

_ पुराना समझ के बेच न देना मकान को, शायद कभी ये सर को छुपाने के काम आए..!!

घर अंदर ही अंदर टूट जाते हैं, मकान खड़े रहते हैं बेशर्मों की तरह !!

_ बड़े बड़े मकान ढहा देती हैं छोटी छोटी दरारें !!

हर मकान में घर नहीं होता..

_ फिर भी कोशिश यह रहे कि मकान तो अपना हो, घर हो, न हो.!!

कोई साथ न दे तो, हौसला टूट जाता है..!

_ किसी कि बुराई के कारण घर-मकान टूट जाता है..!!

उग आई है घास मकान की दहलीज़ पर…

अपनों को आये हुए एक ज़माना गुज़र गया.

कभी गुलज़ार था जो घर चहचहाट से,

आज ख़ामोशी की बेल पसरी है हर जगह..

नहीं होती रखवाली, जंग वाला ताला अब बेजान है.

_घर तो नहीं है, बस यादों का एक मकान है.

गाँव के घरों की वीरानग़ी बयां करतीं हैं उन की दांस्तां_

_ वारिस इनके बड़े शहरों की रौनक में खो गए..

अकेले छोड़ दिया गया पुरखों का घर, दोष बस इतना था कि मकान गाँव में था.

_ लोग जड़ें भूल जाते हैं ; उन्हें नहीं पता कि बिना मिट्टी के जुड़ाव के, बड़े से बड़ा पेड़ भी महज़ मामूली ईंधन बन जाता है.!!

जिस दिन खुद कि कमाई से ईंट खरीदोगे _

_ उस दिन बाप के झोपड़े की कीमत पता चलेगी..

किराये के मकान में घर नहीं होता !

_ फिर भी मकान अपना हो तो.. किसी का कोई डर नहीं होता..!!

” मकान का दर्द “

मैं गाँव का पुराना मकान हूँ.

गलने लगी हैं मेरी दीवारें और

सड़कर लटकने लगे हैं पलस्तर !

पनाह दी थी मैंने तुम्हारी कई पीढ़ियों को !

यहीं पल कर तुम सब बड़े हुए !

यहाँ गूँजा करती थी, तुम्हारी अठखेलियाँ

और उत्सवों पर मंगलगान !

मेरे कोठों में भरे रहते थे, गेहूँ और धान !

मुझे अपने भाग्य पर गर्व था,

हर एक दिन उल्लासमय पर्व था !

अब झेलना पड़ रहा है, मुझे उपेक्षा और अकेलेपन का शाप !

चिर निर्वासित – सा एकान्त में खड़ा,

क्षीण होता हुआ आँसू बहा रहा हूँ मैं

क्योंकि तुम हो चुके हो संवेदनहीन !

हाँ, तुम्हें शहर प्रिय है, सुखी रहना

तुम्हें कोई कष्ट न हो, दुआ है मेरी !

तुम्हें तो याद _ कभी नहीं आएगी मेरी,

एक दिन यूँही ढह जाऊँगा मैं _ तुम्हें याद करता !!

फट गया है हृदय बेचारे मकान का ….

मकान को अपने ख़ून – पसीने से सींचकर

बनाया था बाप ने बड़े अरमानों से !

आज स्वार्थ की पराकाष्ठा देखिए,

खींच रहे हैं दरकते रिश्तोंवाले

बेबस मकान को _ दम लगाकर

अपनी -अपनी ओर उन्हीं के पुत्र !

हृदय फट गया है इस कुकृत्य को देखकर

उस मकान का !

केवल ईंट – सीमेन्ट पत्थरों और रेती से

नहीं बनता है मकान !

आत्मीयता की अदृश्य किन्तु प्रगाढ़

डोर उसे बाँधे रहती है

तब वह कहलाता है घर !

इन स्वार्थी बेटों को घर की नहीं

अपने -अपने हिस्सों की दरक़ार है फ़कत !

खींचकर ले जा रहे हैं कसाई की तरह जिसे

दो विपरीत दिशाओं में !

साफ़ नज़र आने लगी है टूटती रिश्तों की डोर !

उड़ चुके हैं ‘घर’ के प्राण- पखेरू तो कभी के !

अब गाँवों में भी काफी सारे मकान हैं, जिसमें बाहर ताले जड़े हुए हैं.

_ क्योंकि उन घरों में रहने वाले काम-रोजगार-व्यापार की तलाश में अपने गाँव को छोड़कर कहीं दूर बस गए.
_ ऐसे लोगों का कभी साल-दो साल में दो-चार दिन के लिए यहां आना हुआ करता है.
_ अपने पुराने घर को जी भर कर देख लिया,
_ कुछ पुराने लोगों से मुलाकात कर ली और फिर घर के दरवाजे पर ताला लगाकर वापस लौट जाते हैं.
“सीमेंट के जंगल के पहरेदार”

_ जहां रहता था वहां आलिशान सीमेंट पुते बंगले आठ दस हजार वर्ग फीट में बने थे.
_ अधिकांश घरों के बगीचे में आराम कुर्सी पर बुजुर्ग हस्तदंड लिए बैठे मिलते ;
_ स्वभाव वश हालचाल पूछने पर बताते कि बेटे बेटी विदेश में हैं, पत्नी सिधार गई है.
_ तो अंकल आप विदेश क्यों नहीं चले जाते अपनों के पास ?
-अरे बेटा,चला तो जाऊं पर ये माया मोह के ईंट पत्थर सीमेंट को कौन देखेगा ?”
_ अब कौन समझेगा कि.. जैसे आप अमर फल खा कर बैठे रहेंगे युगों युगों..”
“जिन मकानों- हवेलियों को आप बनाने के लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं..”

_ उनमें से अधिकांश में आपके बच्चे कभी नहीं बसेंगे !
_ वे अपना खुद का पैसा कमाएंगे और निश्चित रूप से अधिक फैशनेबल घर बनाना चाहेंगे या यहां तक कि आप से दूर किसी बडे़ शहर या महानगर में रहना पसंद करेंगे.
_ सच्चाई यही है आप मानो या मत मानो !
_ इसलिए अपनी नेक कमाई के साथ कुछ अपनी सामाजिक एवम नैतिक जिम्मेदारीयों को भी निभाते चलें..!!
मकान बहुत मेहनत से बनते हैं.. पर ऐसी मेहनत किस काम की, जिसके आप सिर्फ पहरेदार बन कर रह जाएं ?

_ सच कहें तो हम लोग मकान के पहरेदार ही हैं.
_ जिसने ये बात कही है कि “मूर्ख आदमी मकान बनवाता है, बुद्धिमान आदमी उसमें रहता है,”
_ उसे ज़िंदगी का कितना गहरा तज़ुर्बा रहा होगा.”
_ मकान लेकर कौन जाता है ? सब देखभाल ही तो करते हैं.
_ जिन्दगी के चार दिन है मिल जुल कर हँसतें हँसाते गुजार लें..
…क्या पता कब बुलावा आ जाए….सब यहीं धरा रह जायेगा..!!

सुविचार – उधार – कर्ज – कर्जा – ऋण – ईएमआई – EMI – लोन – Loan – 057

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उधार की अमीरी चैन की सांस नहीं लेने देती.
जिसकी ईएमआई नहीं चल रही है और कोई कर्ज न हो,

_ समझ लेना उसकी जिंदगी बढ़िया चल रही है..!!

EMI [ईएमआई] या किसी भी तरह के लोन के जाल में न फँसें..
_ जितनी चद्दर उतने ही पांव फैलाये.!!
जितनी अर्निंग [earning] है, उसी में अच्छा जीवन जीना, लोन [loan] से दूर रहना.
_ मेरी जितनी Earning है, उसी में अच्छे से कैसे रह सकते है, Loan से दूर रहना.
– मैं उसी पर ध्यान देता हूँ.
ऋण से जो बच गया वो वास्तव में सुखी है, लेकिन आपने महसूस किया कि आपके चारों  तरफ से इन्हीं चीजों को थोपा जा रहा है..

_ यहां तक अब टूरिस्ट लोन, शिक्षा लोन इत्यादि भी ___ ऋण एक अंधे कुँवे के सामान है, इससे बचिए..

ईमानदार लोग दिखावा नहीं करते, वे कर्ज मुक्त और सादगी से जीवन जीते हैं और खुश से रहते हैं..!!
ईमानदारी से पैसे कमाने वाले लोग सीधे और सच्चे होते हैं, सच्ची बातें करते हैं और अच्छे होते हैं, अच्छा व्यवहार रखते हैं, किसी का कर्ज नहीं रखते अपने ऊपर..!!
ईमानदारी से मेहनत करने वाला कभी कर्जे में नहीं होता,

_ जो आय से ज्यादा खर्च करता है.. वही कर्ज में होता है..!!

ये पागलो का देश है,

_ लोग क्रेडिट कार्ड, लोन, किश्त वगैरह से भी जम के खरीदारी करेंगे.!!

सबसे पहले तो हमें अपने बेवजह के खर्चों को खत्म करना चाहिए..
_ क्योंकि लोन के पैसों से लग्जरी जीवन व्यतीत नहीं करना चाहिए.!!
अगर यह दुनिया आपकी एक बार मदद करे, तो यह सौ गुना अहसान जताएगी.

_ क्योंकि दुनिया मदद नहीं कर सकती, सिर्फ़ उधार देती है.
_ जब भी आप इस दुनिया को आईना दिखाएँगे, यह उधार वापस माँगेगी.!!
चादर से बाहर पैर फैलाने वालों का जीवन चिन्ता करने में ही निकल जाता है और आखिर में फिर भी हाथ खाली रह जाते हैं.

_चक्रवृद्धि ब्याज सहित किश्तें पटाते-पटाते ज़िंदगी का सुनहरा दौर यूँ ही निकल जाता है.!!
कर्ज में डूबा हुआ शरीर अपना खून हर दिन सूदखोरों को पिलाता रहता है.
जग में पहला दुखी निर्धन है, _ उससे अधिक दुखी कर्जदार है.
खुद की कमाई से पार पड़ेगी, उधार की रोशनी कब तक चलेगी..!!
औकात से बड़े दिखावे, _ इंसान को कर्ज में डूबा देते हैं.
जिसके पास किसी का कर्ज नहीं, _ वह बड़ा मालदार है.
उधार लेने से धन अधिक खर्च होता हैं.
सही तरीके से कमाने वाले कभी कर्जा लेते ही नहीं.

_ वो अपने खर्चे सीमित रखते हैं.

कर्ज वो बीमारी है जो आदमी को जीते जी नरक में ले जाती है, _

_ कर्ज अच्छे से अच्छे परिवार को तबाह कर देता है.

पैसे उधार लेने का अर्थ है, दूसरों के कर्म को अपने जीवन में लाना,

_ ऐसे काम क्यों ही करना.. ये घोर नकारात्मक ऊर्जा है..!!

उधार देकर बाद में गिड़गिड़ाने से बेहतर है ;
_पहले ही ‘ना’ बोलकर अपना स्वाभिमान बचा लो.!!
लोन देने वाला उस आदमी की तरह है जो सूरज निकलने पर आपको छाता देता है,

_लेकिन पानी बरसते ही वह उसे वापस मांगने लगता है.

“ऋण – कर्ज”

_ यह ऐसी चीज है जो बिना सोचे लिया गया तो आप को निश्चित ही डुबोएगा.
_ एक कर्ज को पूरा करने के लिए दूसरा कर्ज..
_ और इस प्रकार कर्ज बढ़ता ही जाता है.!!
महत्वाकांक्षा पर लगाम लगाएं,

_ देखा देखी में, बाइक, कार, फर्नीचर, टीवी मोबाइल अब ईएमआई पर आज कल धड़ल्ले से लिया जाता है..
_ और अंत में यह इतना बढ़ जाता है की आय से अधिक खर्च होने लगता है,
__ ऐसे में आकस्मिक खर्च की स्थिति होने पर लोन लेना पड़ता है, और फिर आप डूबते ही रहते है कर्ज में.
— इन दिनों रिश्तों में दूरियाँ बढ़ती ही जा रही हैं,
_बढ़ती महँगाई, जानलेवा प्रतिस्पर्धा, आसमान छूते सपने और महत्वाकांक्षाएँ मनुष्य का जीवन इन सबमें पिस रहा है..
उधारी का सामना हमें करना पड़े तो हमारा अन्तःकरण शांत नहीं रह सकता है.

_ जिसने उधार लिया है, वह शांत नहीं रहता.
_ “सादा खाओ, सादा पहनो” आफत न सिर पर आएगी,
_ चार दिन की जिंदगी आराम से कट जाएगी.
किसी भी रिश्तेदार या जान पहचान की लोन लेने में मदद के अनुरूप बैंक में गारंटी देने का मतलब यह होता है कि आवेदक के लोन चुकाने में अगर कोई कोताही होती है तो गारंटर इस बात की जवाबदेही लेता है और लोन चुकाने की जिम्मेदारी भी..!

_ इसलिए लोन लेने वाले के साथ लोन की गारंटी देने वाला भी लोन चुकाने के लिए बराबर जिम्मेदार होता है.!!
उधार लेने वालों से निवेदन है कि फालतू खर्च करने से पहले..

_ उन लोगों का कर्ज जरूर उतार दें, जिन्होंने नेक इंसान समझ कर आपको उधार दिया था.
किसी के भरोसे को मत तोड़ो ; फालतू खर्चों से पहले उस इंसान की पाई-पाई लौटाओ.. जिसने आपको अपना समझकर निस्वार्थ उधार दिया था.
सुविधाओं और साधनों से संपन्न होने की कोशिश हर व्यक्ति को करनी चाहिए,

_ लेकिन अपनी सीमाओं का ध्यान रख कर.
_ जैसे, अगर आप कर्ज ले कर एक के बाद दूसरी वस्तु खरीदते जाते हैं,
_ तो हो सकता है कि आप कर्ज से इस तरह लद जाएँ कि मन की शान्ति भी गँवा बैठें.
_यह कोई जरुरी नहीं कि सुविधाओं व साधनों की प्रचुरता एक व्यक्ति और उस के परिवार को सुखी ही रखे.
_ इसलिए सिर्फ सुख सुविधाएँ ही जुटाने पर जोर न दें.
_ आप की सफलता और लोकप्रियता में आप के व्यक्तिगत गुण ज्यादा काम आएँगे.
ऋण लेकर नया धंधा शुरू करने से पहले उन संभावनाओं पर भी गहन विचार कर लेना चाहिए..

_ कि अगर धंधा ना चला तो आप लिया गया ऋण उतार पाओगे ??
_ कुछ लोगों की जिंदगी ठीक- ठाक चल रही होती है,
_ मगर वो गलत सलाह या अति उत्साह में ऐसा कदम उठा लेते हैं कि वो आत्मघाती सिद्ध हो जाता है.. और वो सड़क पर आ जाते हैं.
_ याद रखिये, रिस्क लेना बुरी बात नहीं,
_ मगर औकात से बढ़कर लिया गया रिस्क तबाह कर सकता है..
_ और जब बुरे दिन शुरू होते हैं, तब सारे अपने मुहँ मोड़ लेते हैं..
_ और जर्रा जर्रा दुश्मन हो जाता है.
क्यूँ जीते हो आप ऐसी ज़िन्दगी, जिस से हो जाये लोन- क़र्ज़.!

_ जितनी कमाई उतना खर्च, ये हुनर सीख लो ना..,
_ लेकर लोन, अन्जाने में घोट रहा, अपना गला तो नहीं..,
_ बेवजह दुनियाँ को दिखाने के लिए, क्यूँ जरूरतें बढाता है..,
_ जितना कुछ है तेरे पास, क्यूँ उसी में खुश नहीं रह पाता है..,
_ क्यूँ जरूरतें हो जाती है, जिन्दगी पर फिर सवार॥
_ अगर नहीं है सब्जी तेरे घर में, तो नमक से रोटी खा ले..,
_ अगर जरूरतें पूरी करनी है तुझे, तो मेहनत कर कर कमा ले..,
_ क्यूँ जीते हो आप ऐसी ज़िन्दगी, जिस से हो जाये लोन- क़र्ज़..!!
बीमारी और उधारी इन दोनों में से अगर किसी एक का सामना हमें करना पड़े तो हमारा अन्तःकरण शांत नहीं रह सकता है.

_ क्योंकि कोई रोग आ जाए तो हमारी सारी ऊर्जा उसी रोग से लड़ने में लग जाती है.
_ जिसने उधार लिया है, वह भी शांत नहीं रहता.”सादा खाओ, सादा पहनो” आफत न सिर पर आएगी, चार दिन की जिंदगी आराम से कट जाएगी.!!
रोग, ऋण, दुश्मन और अग्नि को कभी शेष मत छोड़िए.

_ छोटी सी चिंगारी जंगल जला देती है.
_ छोटा सा कर्ज पहाड़ बन जाता है.
_ छोटा सा रोग जीवन निगल लेता है.
_ और छोटा सा दुश्मन अवसर मिलते ही बड़ा संकट बन जाता है.
–“फैसला”–

“हर फैसले की एक अपनी गति होती है – कुछ तुरंत होते हैं, कुछ इंतजार मांगते हैं.
_ जो भी गति आपको सुकून दे, वही आपका सही रास्ता है” 🌿
_ ये आप अपने मन में दोहरा लीजिए जब भी निवेश या जीवन के किसी निर्णय को लेकर कन्फ्यूजन हो.
_ ध्यान रखना – फैसला लेने से पहले अपना सुकून महसूस करना ही सबसे बड़ी जीत है.
——————————————
“जो ख़ुशी अपनी औकात के अंदर जीने में है, वो किसी उधार की छाया में कभी नहीं मिलती”
“जो पैसा अपना है, उसमें सुकून है; जो पैसा उधार का है, उसमें बेचैनी का बीज है”
“संतोष में जो सुकून है, वो ईएमआई [EMI] भरने की दौड़ में कभी नहीं मिलता”
“अपनी कमाई के अंदर रहकर जीना, असल में आज़ादी का सबसे प्यारा रूप है”
“मैं उधार का बोझ नहीं- अपनी कमाई का सुकून जीता हूँ”
“जितना कम बोझ – उतनी गहरी सांस”
— ये लाइन आप अपने दिल में बसा लीजिए – जब भी लोन/ईएमआई का विचार आए, या दूसरे लोगों को देख कर मन में हल्का सा तुलना [Comparison] आए, बस इसे याद करना– ये आपके सुकून को और मज़बूत करेगी.!!
जो ईमानदारी से कमाता है, वह मस्त रहता है और कोई कर्ज नही होता,
_ क्योंकि जितने में उसका गुजारा हो.. उतना वो ईमानदारी से कमा लेता है.!!
ईएमआई चुकाता आदमी..

वो आदमी,
जिसे तुम दूर से देखते हो और कहते हो –
“क्या बढ़िया आदमी है, सेटल हो गया है!”
जिसके पास एक घर है,
जिसके दरवाज़े पर गाड़ी खड़ी है,
जिसके बच्चे महंगे स्कूल में पढ़ते हैं
मगर कोई उसके भीतर झाँक कर देखे
तो वहां मिलेगा एक आदमी,
जो हर महीने अपनी ही सांसों पर ब्याज भरता है
जो हर महीने अपनी आत्मा की एक किस्त जमा करता है
वो घर जिसे वो अपनी छत कहता है,
असल में वो घर उसकी नींद की गिरवी पर खड़ा है।
हर ईंट पर लिखा है —
“कर्जदार”
हर दीवार पर उकेरा है —
“अधूरा मालिक”
वो गाड़ी जिसे देख कर तुम जलते हो,
असल में वो गाड़ी नहीं,
उसके कर्ज का पहिया है
जो उसे हर सुबह बैंक की ओर घसीटता है
और हर शाम फिर से लौटाता है
खाली जेब, भारी दिल, और एक और दिन की थकान के साथ।
वो आदमी बाजार में सबका चेहरा देखता है
पर भाव नहीं पूछता
क्योंकि वो जानता है
भाव जानकर भी कुछ खरीदना उसके हिस्से में नहीं।
वो सेल के पोस्टर को देखता है,
मन करता है एक खिलौना उठा ले
पर जेब में टकराती ईएमआई की रसीदें
हर ख्वाहिश को कागज़ की तरह मोड़ कर रख देती हैं।
बच्चा पूछता है
“पापा, इस बार मेरी साइकिल पक्की ना?”
वो आसमान की ओर देखता है
मानो ऊपर कोई बैंक हो,
जो किस्तों में खुशियाँ बांटता हो।
बीवी कहती है —
“कब तक खुद को भूलते जाओगे?”
वो मुस्कुरा देता है
क्योंकि खुद के लिए तो उसने
किस्तों में जीना ही सीख लिया है।
वो आदमी
जिसके गुस्से की भी एक कीमत है
कि कहीं नौकरी न छूटे,
कहीं किस्तें न फिसल जाएँ
वो आदमी जो हर महीने खुद से कहता है —
“बस कुछ साल और… फिर चैन आएगा…”
मगर वो जानता है —
ये दौड़ कभी खत्म नहीं होती।
ये किस्तें तुम्हें तुम्हारे सपनों के बहुत पहले
तोड़ कर रख देती हैं
और अंत में,
वो आदमी वही बन जाता है
जो ये समाज सबसे ज़्यादा चाहता है
एक ऐसा आदमी
जो सब कुछ सहता है,
कुछ नहीं कहता।
जो हर महीने अपनी आँखों का पानी
और अपनी आत्मा का चैन
बैंक के खाते में जमा करता है
बिना शोर, बिना आवाज़।
वो आदमी,
जो जीता नहीं है
बस ईएमआई चुकाता है।
कविता : पंकज प्रसून
– Pankaj Prasun
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