हम अपने शरीर में घर जैसा महसूस क्यों नहीं करते ?
_ बस बैठना, सांस लेना और आराम करना इतना मुश्किल क्यों है – बिना किसी बाहरी मदद की ज़रूरत के ?
_ तनाव सिर्फ़ मांसपेशियों में नहीं होता.. यह एक मानसिकता है, एक आदत.. पर्याप्त न होने या तैयार न होने का डर..
_ तनाव का मतलब है कि आप पहले से ही कल में जी रहे हैं,
_ ऐसे भविष्य का अभ्यास कर रहे हैं जो अभी तक नहीं हुआ है..
_ या इसका मतलब है कि आप अभी भी कल को घसीट रहे हैं.. जिसे आपने कभी पूरी तरह से नहीं जिया –
– ऐसे अजीवित पल जो लंबे समय तक बने रहते हैं और पूरे होने की मांग करते हैं.
_ कोई भी अनुभव जो पूरी तरह से नहीं जीया गया है, आपके अंदर चक्कर लगाता रहेगा, और पूछता रहेगा—“मुझे खत्म कर दो.. मुझे जियो.. मुझे आगे बढ़ने दो”
_ इसलिए हमें शरीर से शुरुआत करनी चाहिए.
_ रुकें.. अपना ध्यान अंदर की ओर ले जाएँ.
_ पूछें: मैं कहाँ जकड़ रहा हूँ ? जबड़े में ? कंधों में ? छाती में ?
_ फिर धीरे से वहाँ जाएँ.. अपनी आँखें बंद करें..
_ अपने शरीर के उस हिस्से से एक दोस्त की तरह बात करें:
_ “अब तुम छोड़ सकते हो.. “मैं यहाँ हूँ”
_ अगर आप अपने शरीर के साथ प्यार से पेश आते हैं, तो यह आपकी बात सुनता है.. आखिरकार, यह आपका है.
_ जब शरीर भरोसा करना शुरू करता है, तो आप देखेंगे कि कुछ और भी नरम हो जाता है- “मन’
_ लेकिन मन से शुरुआत न करें.. यहीं पर हममें से ज़्यादातर लोग असफल हो जाते हैं.
_ हम बीच से तूफ़ान को शांत करने की कोशिश करते हैं.. किनारे से शुरू करें.. शरीर से शुरू करें.
_ जब शरीर आराम करना सीखता है, तो मन उसका अनुसरण करता है और जब मन शांत होने लगता है, तो दिल खुल जाता है- यह भी सांस लेना शुरू कर देता है.
_ मेरे दोस्त, आराम करना छोड़ देने की कला है. बलपूर्वक नहीं, बल्कि प्रेम से.!!
— इसे याद रखें:
_ हमें एक समय में सिर्फ़ एक पल ही दिया जाता है.
_ इसलिए अच्छी तरह से जीने के लिए, हमें अपने पूरे जीवन का पता लगाने की ज़रूरत नहीं है –
– हमें बस यह जानना है कि यहाँ और अभी पूरी तरह से कैसे मौजूद रहना है.
_ अगर हम इस पल का ध्यान रख सकते हैं, तो बाकी सब अपने आप ठीक हो जाएगा.!!
NOTES :
“मेरा शरीर जाग चुका है, मैं उसकी सुखद गति में हूँ”
“हम हर चीज़ की शुरुआत मन से करते हैं, इसलिए असफल हो जाते हैं…जबकी शुरुआत शरीर से होनी चाहिए”
“मन को बदलने की चाह, मन से ही करना – एक चक्रव्यूह है :
– “शरीर से शुरू करो, सांस से शुरू करो – मन स्वयं पिघलने लगेगा”