सुविचार 3055
हम जो हैं वही हम सोच पाते हैं ; _ हम अपने ढंग से सोचते हैं.
हम जो हैं वही हम सोच पाते हैं ; _ हम अपने ढंग से सोचते हैं.
इतना खुद को तराशा होता, तो फरिश्ते हो जाते.
*बल्कि* *महत्वपूर्ण यह है कि,* *”सोच” किस उम्र की रखते हो..!!!*
_ क्योंकि इसमें आप लोगों को छोटा और लोग आपको छोटा देखेंगे.
_ ज़िंदगी भी बस इतना ही मांगती है..!!
_ धूप कितनी भी तेज़ हो समंदर नहीं सूखा करते.
_ अक्सर वे पौधे मुरझा जाते हैं, जिनकी परवरिश छाया में होती है..!
“रहम” जो इंसानियत की बुनियाद पर आज भी खड़ा है.
और हौंसला तो देखिये शर्त हवाओं से लगा रखी है…