जीवन को आसान बनाने के लिये हमने नये नये साधन अपना लिये हैं.
_ इसमें कोई शक नहीं की इनसे जीवन आसान हो चला है.
_ दूसरी तरफ देखें तो हमने इन संसाधनों की व्यवस्था में अपने आप को बहुत व्यस्त भी कर लिया है.
_ हम इनको ठीक ठाक रखने के लिये हर वक्त कहीं न कहीं लगे रहते हैं.
_ इनमें ज्यादातर चीजें इलेक्ट्रॉनिक या इलेक्ट्रिकल होने के कारण सब को सही रख पाना बहुत दुष्कर है.
_ टीवी, फ्रीज, पंखे, कूलर, एसी, कार, स्कूटर, मिक्सर, मोबाइल, लैपटॉप इत्यादि.
_ जहां भी हाथ रखें वहीं कुछ दर्द होता है.
_ ठीक है कि आजादी के पहले हमारे पास या उन्नीसवीं बीसवीं सदी तक दुनिया बहुत धीमी थी लेकिन क्या जीवन में इतनी मारामारी थी ?
_ पिछली सदी के साठ के दशक में हमारे घरों में पंखा या रेडियो या सायकिल तक नहीं था.
_ क्या हम जी नहीं रहे थे ?
_ विकास की आंधी ने हमें जिस कोने में धकेल दिया है या हम उसके भी आगे जाने को तैयार बैठे हैं क्या यही एक लक्ष्य रह गया है मानव का.
_ क्या रोटी कपड़ा और घर भर से संतुष्ट रहकर शून्य आवश्यकता की तरफ नहीं बढ़ा जा सकता है ?
– Tejbeer Singh Sadher