सुविचार – “हमारे ज़माने में” – 174
आ_अब_लौट_चलें..
_ जीवन के लगभग 40 साल बीतने पर नई पीढ़ी आ जाती है और हम “हमारे ज़माने में” कहने की सुविधा प्राप्त कर लेते हैं.
_ तो ! हमारे ज़माने में ऐसी गुंडागर्दी न थी.
_ प्यार मुहब्बत थे, दिल मिलने, न मिलने की बातें थीं.. लेकिन भई, मार-काट डालने की खबरें हमने नहीं सुनी थीं.
_ हमारे ज़माने में हम निर्द्वंद जीते थे, कहीं घूम-फिर लें, हमें कतई डर नहीं लगता था.
_ आजकल घर के अंदर घुसे रहते हैं.. तो भी डर लगता है.
_ अपने लिए नहीं तो बच्चों के लिए ही डर लगता रहता है.
_ इससे सिद्ध होता है कि ‘हमारा ज़माना अच्छा था’
– Manika Mohini
नई पीढ़ी के तौर-तरीके सन्न भी करते हैं और सुन्न भी.!!
– Manika Mohini
सुविचार 173
सुविचार – दया – दयालु – करुणा – कृपालु – मर्सी – Mercy – 172
सुविचार – हक़, अधिकार – 171
सुविचार – आसक्ति, ममता, राग, बंधन, अनुराग, प्रीति, लगाव, अटैचमेंट, Attachment – 170
आसक्ति बंधन है, बेड़ियां है…आसक्ति बंधे रहने को विवश करती है.
_ जिस क्षण आसक्ति मिटी…बंधन छूटा…बेड़ियां कटी…उसी पल हम आज़ाद हो जाएंगे.
_ किसी का हमारे जीवन में चले आना जितना स्वाभाविक है…उतना ही स्वाभाविक है उसका हमारे जीवन से चले जाना भी.
_ गीता कहती है कि ख़ुशी के क्षण में न तो अतिउत्साहित होइए न ही दुःख में अति व्याकुल..
_ लेकिन हम गीता को महज़ मानते भर हैं…न तो पढ़ते हैं न ही अमल में लाते हैं.
_ किसी का अपने जीवन में आने को इस दुनिया की सबसे अदभुत घटना मानते हैं..
_ तो वहीं उसके अनायास ही चले जाने को इतना कठिन मानते हैं..
_ जैसे ये महज़ हमारे साथ ही घटित हुआ हो.
_ और इन सब के पीछे जो शक्ति काम करती है वहीं आसक्ति है…
_ जिससे छूटना हमें दुष्कर कार्य प्रतीत होता है.
_ असल में हम आसक्ति की बेड़ियों का वरण भी स्वयं ही करते हैं…
_ हम स्वयं ही बंधन को गले का हार समझकर बड़ी प्रसन्नता से अपने गले में डाल लेते हैं..
..और फ़िर ताउम्र बंधन से छूटने को….आसक्ति से निकलने को चीखते पुकारते रहते हैं…..
_ जबकि आसक्ति की बंधन खोलने वाली कुंजी हमारे ही इर्द गिर्द कहीं पड़ी होती है..
..हम जब चाहे उस कुंजी को उठाकर अपनी आसक्ति से आज़ाद हो सकते हैं…
_ हम जब चाहे अपनी बेड़ियां काट सकते हैं।।
— अविनाश राही
लगाव शब्द जितना सरल दिखता है, उतना ही रहस्यमय और दोधारी है.
_ यह वो एहसास है जो इंसान को ज़मीन से जोड़ता भी है और कभी-कभी उसी ज़मीन में दफ़न भी कर देता है.
_ दरअसल, लगाव समस्या नहीं है, समस्या उसकी अंधी गहराई है.
_ हम अक्सर किसी को इतना अपना बना लेते हैं कि उसके बिना “स्वयं” की परिभाषा ही धुंधली पड़ जाती है.
_ हम भूल जाते हैं कि किसी और में खो जाना, प्रेम नहीं है, यह आत्मविस्मरण है..
_ और जब वह शख़्स जीवन से चला जाए या दूरी बना ले, तब वही लगाव एक खाली गुफा बन जाता है, जिसमें हमारी आवाज़ भी लौटकर नहीं आती.
_ पर क्या इसका अर्थ यह है कि हम किसी से न जुड़ें ? नहीं.. जुड़ें ज़रूर, पर इस बोध के साथ कि जो साथ है वो संयोग है, स्थायी नहीं.
_ हर संबंध एक ऋतु की तरह है, कुछ लंबे होते हैं, कुछ अल्पकालिक..पर दोनों ही अपने भीतर कोई न कोई फूल ज़रूर खिलाते हैं.
_ हमें लगाव को त्यागने की नहीं, बल्कि उसे संजीदगी से निभाने की ज़रूरत है, इतना कि अगर कभी अलग होना पड़े, तो अपनी ही परछाईं में हम फिर से मुस्करा सकें !
_ दिल से टूटें नहीं, बस थोड़ा गहराएं !
_ क्योंकि लगाव जब आत्मज्ञान से जुड़ जाए, तब वो दीमक नहीं, दीपक बन जाता है…!
लगाव दुख की जड़ है.. जो सबसे उम्मीद छोड़ देता है, वही सबसे शांत रहता है.
_ लगाव चाहे इंसान से हो, किसी चीज़ से या किसी जानवर से यह एहसास बेहद सुंदर होता है..
_ पर सच यही है कि लगाव अक्सर कुछ समय तक ही साथ निभाता है, क्योंकि वक़्त बदलता है और उसके साथ रिश्तों की शक्ल भी.!!
किसी चीज़ से लगाव रखना ज़रूरी नहीं कि वह हमेशा बना ही रहे..
_ वक़्त के साथ वही लगाव कभी मुस्कान बन जाता है, कभी आँखें भिगो देता है..
_ जो कभी हमारी दुनिया था, वही एक दिन याद बनकर रह जाता है और तब हम समझ पाते हैं कि लगाव भी वक़्त की तरह है, आता है, ठहरता है और फिर अपने निशान छोड़कर चला जाता है.!!




