सुविचार 607
इस बात का प्रयास करें कि आप स्वयं अपने भीतर भी वही व्यक्ति हों, जो आप दूसरों के समछ पेश आते हैं.
हम ने पलकों को बिछाया है.
याद में तेरी आंसू को बहाया है.
हमें मालूम है आदत तेरी
हौले से
हमारी ओर कदम बढ़ाते हो,
ज्ञान की मस्ती बरसाते हो
चले जाते हो.
तेरे क़दमों की चाप को,हम महसूस करते हैं.
ऎसा सजाया है तुम को इस बार
आ गए हो एक बार
तो फिर
जाने ही तुम को नहीं देंगे.
लगता है डर फ़रेब-ए-वफ़ा से कभी कभी-
ऐसा न हो कि ज़ख्म कोई फिर नया मिले-
अब तक तो जो भी दोस्त मिले बेवफ़ा मिले.
हमने बारिश में भी जलते मकान देखे हैं.
ये तो है वक़्त के हाथों में खिलौने जैसी………