सुविचार – किसी के अंदर इतना भी मत झांको कि अपनी नाक को कपड़े से ढकना पड़े. – 258

किसी के अंदर इतना भी मत झांको कि अपनी नाक को कपड़े से ढकना पड़े.

_ कभी-कभी हम जिज्ञासा या लगाव में दूसरों के भीतर इतना झांकने लगते हैं कि उनके छिपे हुए अंधेरे, कमज़ोरियाँ या असलियत हमें असहज करने लगती है.
_ तब हमें खुद को बचाने के लिए “नाक ढकनी” पड़ती है—यानी दूरी बनानी पड़ती है.
_ हर इंसान के भीतर कुछ सुंदर होता है और कुछ बोझिल भी..
_ हमें इतना ही देखना चाहिए जितना हमारे लिए आवश्यक और स्वस्थ हो.
_ क्योंकि दूसरों की गहराइयों में उलझकर हम अपनी रोशनी को धुंधला नहीं कर सकते.
_ असली संतुलन यही है: जानकारी और दूरी, अपनापन और सीमाएँ—इनके बीच सही रेखा खींचना.!!

मस्त विचार 307

मै इन्तजार में बैठा हूँ यार तेरे.

आज तो उसको महफ़िल में बुला लो यारों.

मेरे मोबाइल पर उसका मैसेज तो पढ़ो यारों.

जिसमे आने का वादा किया था उसने.

मस्त विचार 305

ज़िन्दगी मेरे कानों में हौले से कह गई,

उन रिश्तों को थामे रखना, जिनके बिना गुजारा नहीं.

मस्त विचार 302

ठोकरे खाकर भी ना सँभले तो मुसाफिर का नसीब..

वरना..

पत्थर तो अपना फर्ज निभा दिया ही करते हैँ…

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