सच कहूं तो अब मैं रिश्ते-नाते, खून के बंधन, औपचारिक अपनापन और उन तमाम संबंधों को भीतर से लगभग अस्वीकार कर चुका हूं.
_ ये किसी के प्रति घृणा नहीं है, न ही कोई अहंकार है कि मुझे किसी की आवश्यकता नहीं. _ ये उस व्यक्ति की थकी हुई स्वीकारोक्ति है- जिसने वर्षों तक रिश्तों को पूजा की तरह निभाया, लेकिन बदले में बार-बार अपने ही विश्वास को टूटते देखा.
_ मैंने रिश्तों को कभी लेन-देन नहीं समझा.
_ मेरे लिए हर रिश्ता एक जिम्मेदारी था, एक श्रद्धा थी, एक ऐसा मंदिर था – जिसमें मैं बिना किसी स्वार्थ के अपना समय, अपना स्नेह, अपनी संवेदनाएं और अपना विश्वास अर्पित करता रहा.
_ मैंने हमेशा यही माना कि अपने लोग अंततः अपने ही होते हैं, चाहे समय कितना भी कठिन क्यों न हो.. लेकिन जीवन ने धीरे-धीरे ये भ्रम भी मुझसे छीन लिया.
_ जिस-जिस संबंध में मैंने पूरी निष्ठा रखी, वहीं सबसे गहरे घाव मिले.
_ जिन लोगों के लिए बिना कहे खड़ा रहा, उन्हीं लोगों ने कई बार मेरी चुप्पी को कमजोरी समझा.
_ जिनके दुःख को अपना दुख माना, उन्होंने मेरे दुख को शायद कभी देखा ही नहीं.
_ जिनके लिए अपनी सुविधा छोड़ी, उन्होंने मेरी असुविधा को कभी महत्व नहीं दिया और सबसे पीड़ादायक पर जब छल किसी पराए ने नहीं, बल्कि उसी ने दिया- जिसे अपना कहने में कभी गर्व महसूस होता था.
_ अब मैं लोगों से दूर इसलिए नहीं रहता कि मुझे उनसे नफ़रत है.
_ मैं दूर इसलिए रहता हूं- क्योंकि मैं अपने भीतर बची हुई संवेदनाओं को बचाना चाहता हूं.
_ हर चोट इंसान को थोड़ा-थोड़ा बदल देती है.
_ बार-बार का विश्वासघात इंसान को कठोर नहीं बनाता, पहले उसे बहुत रुलाता है, फिर बहुत शांत कर देता है, और जब वह शांत हो जाता है, तब उसके भीतर रिश्तों को लेकर उत्साह नहीं, केवल एक गहरी सतर्कता बचती है.
_ आज यदि मैं कम बोलता हूं, कम मिलता हूं, कम अपेक्षाएं रखता हूं, तो ये मेरे स्वभाव का परिवर्तन नहीं है ; ये मेरे अनुभवों का परिणाम है.
_ कुछ अनुभव इतने कड़वे होते हैं कि वे जीवन की पूरी दिशा बदल देते हैं.
_ वे सिखा देते हैं कि हर मुस्कान अपनापन नहीं होती, हर रिश्ता सुरक्षा नहीं देता और हर अपना, वास्तव में अपना हो- ये आवश्यक नहीं.
_ मैंने अब सीख लिया है कि अकेलापन हमेशा दुःख नहीं होता.
_ कई बार अकेले रहना उन रिश्तों से कहीं अधिक शांतिदायक होता है- जो हर दिन भीतर कुछ न कुछ तोड़ते रहते हैं.
_ अपने कमरे की खामोशी, एक किताब, कुछ अधूरे शब्द और अपनी डायरी, ये अब मुझे उन भीड़ों से अधिक सच्चे लगते हैं- जहां चेहरे तो अपने होते हैं, पर मन कहीं और होता है.
_ फिर भी, मेरे भीतर प्रेम मरा नहीं है.
_ विश्वास पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है.
_ बस अब उसे किसी पर सहजता से खर्च करने का साहस नहीं बचा.
_ अब मैं संबंधों को शब्दों से नहीं, समय से परखता हूं.
_ वादों से नहीं, व्यवहार से पहचानता हूं और शायद यही मेरे जीवन की सबसे महंगी सीख रही है.
_ कभी-कभी रात के सन्नाटे में मैं स्वयं से यही पूछता हूं कि क्या सचमुच गलती मेरी थी कि मैंने लोगों पर इतना विश्वास किया ?
_ फिर मन कहता है विश्वास करना गलती नहीं था, गलत लोग चुन लेना दुर्भाग्य था.
_ इस उत्तर से दर्द कम नहीं होता, लेकिन स्वयं से शिकायत थोड़ी कम हो जाती है.
_ अब मेरी सबसे बड़ी इच्छा किसी से जीतने की नहीं, केवल स्वयं को बचाए रखने की है.
_ यदि इसका अर्थ लोगों को ये लगता है कि मैं बदल गया हूं, तो शायद वे ठीक ही कहते हैं.
_ क्योंकि जो व्यक्ति बार-बार टूटता है, वह वही नहीं रह सकता- जो कभी हुआ करता था.
_ आज मेरी डायरी इस बात की साक्षी है कि मैंने रिश्तों से मुंह अहंकार में नहीं मोड़ा, बल्कि उन अनगिनत अनकहे घावों के बाद मोड़ा है- जिन्हें शब्दों में पूरी तरह कभी लिखा ही नहीं जा सकता.
_ मैं अब किसी से शिकायत भी नहीं करता,
_ क्योंकि शिकायत वहीं की जाती है जहां उम्मीद बची हो, और मैंने उम्मीदों का बोझ उतार दिया है.
_ शायद यही मेरे लिए शांति का पहला कदम है.
_ यदि भविष्य में कभी कोई रिश्ता मेरे जीवन में आएगा, तो वह अधिकार से नहीं, विश्वास से आएगा ; दिखावे से नहीं, सच्चाई से आएगा.
_ तब तक मैं अपने अकेलेपन को ही अपना सबसे ईमानदार साथी मानकर जीना सीख रहा हूं, क्योंकि उसने मुझे कभी धोखा नहीं दिया.!!
– Ishq Banaras इश्क बनारस