मस्त विचार 558
सोचू तो बिखर जाऊँ ना सोचू तो किधर जाऊँ…..
सोचू तो बिखर जाऊँ ना सोचू तो किधर जाऊँ…..
…क्योंकि मै जिस माहौल में रहता हूँ उसे दुनिया कहते हैं.
_ अगर आपकी अपनी ही जड़ें मजबूत नहीं हैं तो आप इस भ्रान्ति में मत रहना कि आप किसी को सुगन्ध देने में कभी भी समर्थ हो सकते हो.
परन्तु इस बात को सुनिश्चित करें कि अन्त में फैसला आपका ही होना चाहिए.
हम ने पलकों को बिछाया है.
याद में तेरी आंसू को बहाया है.
हमें मालूम है आदत तेरी
हौले से
हमारी ओर कदम बढ़ाते हो,
ज्ञान की मस्ती बरसाते हो
चले जाते हो.
तेरे क़दमों की चाप को,हम महसूस करते हैं.
ऎसा सजाया है तुम को इस बार
आ गए हो एक बार
तो फिर
जाने ही तुम को नहीं देंगे.
लगता है डर फ़रेब-ए-वफ़ा से कभी कभी-
ऐसा न हो कि ज़ख्म कोई फिर नया मिले-
अब तक तो जो भी दोस्त मिले बेवफ़ा मिले.
हमने बारिश में भी जलते मकान देखे हैं.