सुविचार – हम वो आखरी पीढ़ी हैं – आखिरी पीढ़ी – 1026

* हम वो आखरी पीढ़ी हैं, जिन्होंने कई- कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है.

* हम वो आखरी लोग हैं, जिन्होंने बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ परम्परागत खेल, गिल्ली- डंडा, छुपा- छिपी, खो- खो, कबड्डी, कंचे जैसे खेल खेले हैं.

* हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं, जिन्होंने कम या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है और किताबें पढ़ें हैं.

* हम वही पीढ़ी के लोग हैं, जिन्होंने अपनों के लिए अपने जज़्बात, खतों में आदान प्रदान किये हैं.

* हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं, जिन्होंने कूलर, एसी या हीटर के बिना ही बचपन गुजारा है.

* हम वो आखरी लोग हैं, जो अक्सर अपने छोटे बालों में, सरसों का ज्यादा तेल लगा कर, स्कूल और शादियों में जाया करते थे.

* हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं, जिन्होंने स्याही वाली दावात या पेन से कॉपी, किताबें, कपडे और हाथ काले, नीले किये हैं.

* हम वो आखरी लोग हैं, जिन्होंने टीचर्स से मार खाई है.

* हम वो आखरी लोग हैं, जो मोहल्ले के बुजुर्गों को दूर से देख कर, नुक्कड़ से भाग कर, घर आ जाया करते थे.

* हम वो आखरी लोग हैं, जिन्होंने अपने स्कूल के सफ़ेद केनवास शूज़ पर, खड़िया का पेस्ट लगा कर चमकाया है.

* हम वो आखरी लोग हैं, जिन्होंने गोदरेज सोप की गोल डिबिया से साबुन लगा कर शेव बनाई है. जिन्होंने गुड़ की चाय पी है. काफी समय तक सुबह काला या लाल दंत मंजन या सफेद टूथ पाउडर इस्तेमाल किया है.

* हम निश्चित ही वो आखरी लोग हैं, जिन्होंने चांदनी रातों में, रेडियो पर बीबीसी की खबरें, विविध भारती, आल इंडिया रेडियो और बिनाका जैसे प्रोग्राम सुनें हैं.

* हम ही वो आखरी लोग हैं, जब हम सब शाम होते ही छत पर पानी का छिड़काव किया करते थे. उसके बाद सफ़ेद चादरें बिछा कर सोते थे. एक स्टैंड वाला पंखा सब को हवा के लिए हुआ करता था. सुबह सूरज निकलने के बाद भी ढीठ बने सोते रहते थे. वो सब दौर बीत गया, चादरें अब नहीं बिछा करतीं. डब्बों जैसे कमरों में कूलर, एसी के सामने रात होती है, दिन गुज़रते हैं.

* हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं, जिन्होंने वो खूबसूरत रिश्ते और उनकी मिठास बांटने वाले लोग देखे हैं, जो लगातार कम होते चले गए. अब तो लोग जितना पढ़ लिख रहे हैं, उतना ही खुदगर्ज़ी, बेमुरव्वती, अनिश्चितता, अकेलेपन व निराशा में खोते जा रहे हैं. हम ही वो खुशनसीब लोग हैं, जिन्होंने रिश्तों की मिठास महसूस की है…!!

हम एकमात्र वह पीढ़ी हैं, जिसने अपने माँ- बाप की बात भी मानी और बच्चों की भी मान रहे हैं.

हम वो आखरी पीढ़ी हैं इसने क्या खोया क्या पाया.

मैं तकरीबन 54 साल का हूँ, मैं और मेरे हमउम्र लोग या हमारे मौजूद बुजुर्ग गवाह हैं,
_उस टेक्नोलॉजिकल बदलाव या क्रांति के जो हमने पिछले 40-50 साल में देखा है.
— हमने अपने घरों में हाथ की चक्की पर औरतों को गेहूं पीसते देखा है, घर में औरतों को मटके में दूध बिलोते देखा है,
_हमने खुद चारा काटने की मशीन पर चारा काटा है, औरतों को सिल पर मसाला पीसते देखा है,
_मिट्टी के चूल्हे पर रोटी बनते देखी हैं, बरोसी(हांडी) में 10-12 घन्टे पका हुआ मोटी मलाईयुक्त दूध पिया है,
_हमने घर की औरतों को सेंवई(आज की मैग्गी, चाऊमीन), उड़द/मूंग की दाल की मंगोड़ी/बड़ी, आलू के चिप्स, चावल की कचरी को हाथ से बनाते देखा है.
— हमने वह वक़्त भी देखा है, जब गांवों में बिजली नही होती थी या नामचारे को होती थी,
_हमने मिट्टी के तेल की डिबिया, लालटेन या लैंप में पढ़ाई भी की है,
_हमने मिट्टी के कच्चे पक्के घर और आँगन में पेड़ और छप्पर भी पड़े देखे हैं,
_हमने कंचे, गुल्ली डंडा, कुश्ती कबड्डी खूब खेले/देखें है, हमने कैंची/डंडे की साइकिल भी खूब चलाई है,
_हमने बरसात के पानी मे कागज की नाव भी खूब चलाई हैं, हमने कागज के हवाई जहाज भी खूब उढायें हैं,
हमने खूब ट्यूबवेल की कुंडी में नहाने का भी मजा लिया है,
_हमने खूब पतंगों के पेच भी लड़ायें हैं,
_ हमने बाग के आम, अमरूद, जामुन खूब तोड़कर/चुराकर खाये हैं,
_हमने सिंचाई के साधन हल, ट्रेक्टर, ट्यूबवेल और कुछ हद तक रहट भी देखें हैं,
_हमने संचार के साधन पोस्टकार्ड, अंतरदेशीय पत्र, पीला लिफाफा, टेलीग्राम भी देखें इस्तेमाल किए हैं,
हमने रेडियो, टेपरिकॉर्डर, थोड़ा बहुत ग्रामोफोन, ब्लैक एंड व्हाइट टीवी की इतवार की फ़िल्म और बुधवार के चित्रहार का लोगों में क्रेज भी देखा है,
_हमने छत पर नाचते, पीहू पीहू करते मोर भी देखे हैं, हमने मुर्गे की बांग के साथ दिन निकलते भी देखा है.
_मुझे आज भी सुबह सूरज के निकलने से पहले की दादी नानी द्वारा चक्की पीसने की मद्धम मद्धम सरसराहट भरी आवाज और फाख्ता की बोली से बेहतर कोई रिंगटोन नही लगी.
— हमारी जनरेशन और आज की जनरेशन में जो बुनियादी फर्क है, वह तजुर्बे का है.
_नई नस्ल खुद को स्मार्ट बोल सकती है, पर हम लोग उनकी उम्र में कमोबेश सच्चे, सादा और सरल थे.
_आज की जनरेशन को केवल आज का तजुर्बा है _और हमारी जनरेशन को आज के साथ- साथ गुजरे कल का भी तजुर्बा है.
_आज की जनरेशन की दुनिया कमोबेश स्मार्ट फोन की आभासी दुनिया तक सिमटी हुई है,
_यही इनका मनोरंजन है, यही इनका खेल का मैदान है, यही इनका कारोबार है, और यही इनका ओढ़ना बिछोना है.
–एक और बड़ा फर्क है दोनो में, आज की जनरेशन दिन भर कुर्सी/चारपाई तोड़ने के बाद, शाम को जिम में पसीना बहाने जाती है,
_पैसे देकर आर्टिफीसियल सेहत खरीदती है.
_वहीं पुरानी जनरेशन, क्या आदमी क्या औरत सबकी दिनचर्या में ही जिम था,
_सारा दिन पसीना निकलता था, भूख बढ़िया लगती थी, सेहत तो खुदबखुद बढ़िया रहती थी.
_पहले सभी बच्चे दाई के हाथों घर मे ही पैदा होते थे.
— इतने सारे तजुर्बों का जखीरा रखने के बावजूद, बच्चों को बेहतर खिलाने-पिलाने, पहनाने के बावजूद,
पेट काटकर महंगी पढ़ाई दिलाने के बावजूद,
_जब फेसबुक-व्हाट्सएप्प से ज्ञान हासिल करने वाली नस्ल यह कहती है कि _हमारे बाप को आता ही क्या है _या हमारे बाप ने हमारे लिए किया ही क्या है _तो आदमी ठगा हुआ सा महसूस करता है.
_उसके पास सिवाय खामोशी अख्तियार करके आँसू पीने के अलावा कोई चारा नही होता.
_सयाने लोग शायद इसी चीज को ‘जनरेशन गैप’ कहते होंगे.
Notes : पहले हर चीज़ ज्यादा असली और शुद्ध थी, लेकिन कुछ भी स्थिर नहीं है. केवल परिवर्तन ही स्थिर है.
लेकिन आज जो जीवन जी रहे हैं, ये संभव नहीं है _अगर हम नए उपकरण नए उपकरणों का उपयोग न करें।
मोबाइल की सहायता से ही हमारा टिकट हो रहा, होटल बुकिंग हो रहा, क्या क्या नहीं हो रहा..
उस समय की बात है —

_ जब शाम ढलते ही जैसे प्रकृति खुद एक मौन घोषणा कर देती—
“चलो, अब रोशनी बुझा दें… इंसान थोड़ी देर साथ बैठे.”
_ लोडशेडिंग तब कोई असुविधा नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा था.
_ संध्या घिरते ही बिजली चली जाती, और पूरा मोहल्ला अंधेरे में डूब जाता.
_ लेकिन उस अंधेरे में एक खास तरह की उम्र की गर्माहट थी, एक साझा अपनापन था.
_ तब का जीवन था कुछ अलग—
_ सादा, सौम्य और सजीव.
_ बिजली जाते ही घर के लोग आंगन में चटाई बिछाकर इकट्ठा हो जाते.
_ चारों ओर पसरी नीरवता में जुगनुओं की टिमटिमाहट और तारों से भरा आसमान,
जैसे हमारी बातों का गुप्त श्रोता बन जाता.
_ हवा में तैरती शालिक की आवाज़, दूर कहीं कुत्तों का भौंकना,
_ इनके बीच शुरू होती थी कहानी की महफिल.
_ बड़ों की ज़ुबान से निकलती पुरानी यादें,
_ राजाओं की कहानियाँ, भूत-प्रेत के किस्से—
_ और हम बच्चे, डर और रोमांच के बीच डूब जाते उन शब्दों में.
_ मोबाइल, इंटरनेट और चमचमाती स्क्रीन तब की ज़िंदगी का हिस्सा नहीं थे.
_ व्यस्तता का मतलब होता था खेतों की कटाई, मेहमानों का आना या परीक्षा की तैयारी.
_ रिश्ते महज़ ज़रूरत नहीं थे, बल्कि एक-दूसरे के होने का सुख थे.
_ बातों में था अपनापन, और आंखों में थी समझदारी की मुस्कान.
_ उस समय हमने सीखा था— इंतज़ार करना,
_ किसी की बातों को महसूस करना, और इंसान को समय देना.
_ रिश्ते बनते थे हाथ थामकर, कंधे पर सिर रखकर, या साथ बैठकर तारों को निहारते हुए..
_ लोडशेडिंग ने हमें सिखाया था— अंधेरा सिर्फ खालीपन नहीं होता,
_ कभी-कभी वहीं सबसे गहरा उजाला बसता है— रिश्तों का, समझ का, अपनापन का.
लेकिन आज ?
_ आज सबके पास है रौशनी—बल्बों की, स्क्रीनों की,
_ 24 घंटे इंटरनेट, हर सुख-सुविधा हाथ में.
_ फिर भी कहीं वो सच्ची रौशनी बुझ-सी गई है.
_ अब साथ बैठना है—मगर सबके हाथ में है मोबाइल
_ बातें हैं—मगर सिर्फ चैटबॉक्स में.
_ लोग हैं—पर पास होने का सुख नहीं है.
_ लोडशेडिंग का वो अंधकार अब नहीं है,
_ लेकिन मन के भीतर एक और गहरा अंधेरा घर कर गया है.
_ जहां अकेलापन सबसे चमकीली रोशनी बन बैठा है, और रिश्ते बदल गए हैं खामोश साए.
हाय !
_ इस मशीनों से भरी दुनिया की बनावटी रौशनी में, हम खो बैठे हैं उस अंधेरे में उजाला खोजने का सरल तरीका—
_ हम खो बैठे हैं वो सीधा-सादा सूत्र, जिससे इंसान इंसान से दिल से जुड़ता है.!!
जिनका जन्म 1960, 1961, 1962, 1963, 1964, 1965, 1966, 1967, 1968, 1969, 1970, 1971, 1972, 1973, 1974, 1975, 1976, 1977, 1978, 1979, 1980 में हुआ है – खास उन्हीं के लिए यह लेख..

_ यह पीढ़ी अब 45 पार करके 65- 70 की ओर बढ़ रही है.
_ इस पीढ़ी की सबसे बड़ी सफलता यह है कि इसने ज़िंदगी में बहुत बड़े बदलाव देखे और उन्हें आत्मसात भी किया…
_ 1, 2, 5, 10, 20, 25, 50 पैसे देखने वाली यह पीढ़ी बिना झिझक मेहमानों से पैसे ले लिया करती थी.
_ स्याही–कलम/पेंसिल/पेन से शुरुआत कर आज यह पीढ़ी स्मार्टफोन, लैपटॉप, पीसी को बखूबी चला रही है.
_ जिसके बचपन में साइकिल भी एक विलासिता थी, वही पीढ़ी आज बखूबी स्कूटर और कार चलाती है.
_ कभी चंचल तो कभी गंभीर… बहुत सहा और भोगा लेकिन संस्कारों में पली–बढ़ी यह पीढ़ी.
_ टेप रिकॉर्डर, पॉकेट ट्रांजिस्टर – कभी बड़ी कमाई का प्रतीक थे.
_ मार्कशीट और टीवी के आने से जिनका बचपन बरबाद नहीं हुआ, वही आखिरी पीढ़ी है.
_ कुकर की रिंग्स, टायर लेकर बचपन में “गाड़ी–गाड़ी खेलना” इन्हें कभी छोटा नहीं लगता था.
_ “सलाई को ज़मीन में गाड़ते जाना” – यह भी खेल था, और मज़ेदार भी.
_ “कैरी (कच्चे आम) तोड़ना” इनके लिए चोरी नहीं था.
_ किसी भी वक्त किसी के भी घर की कुंडी खटखटाना गलत नहीं माना जाता था.
_ “दोस्त की माँ ने खाना खिला दिया” – इसमें कोई उपकार का भाव नहीं, और
“उसके पिताजी ने डांटा” – इसमें कोई ईर्ष्या भी नहीं… यही आखिरी पीढ़ी थी.
_ कक्षा में या स्कूल में अपनी बहन से भी मज़ाक में उल्टा–सीधा बोल देने वाली पीढ़ी.
_ दो दिन अगर कोई दोस्त स्कूल न आया तो स्कूल छूटते ही बस्ता लेकर उसके घर पहुँच जाने वाली पीढ़ी.
_ किसी भी दोस्त के पिताजी स्कूल में आ जाएँ तो –
मित्र कहीं भी खेल रहा हो, दौड़ते हुए जाकर खबर देना:
“तेरे पापा आ गए हैं, चल जल्दी” – यही उस समय की ब्रेकिंग न्यूज़ थी.
_ लेकिन मोहल्ले में किसी भी घर में कोई कार्यक्रम हो तो बिना संकोच, बिना विधिनिषेध काम करने वाली पीढ़ी.
_ कपिल, सुनील गावस्कर, वेंकट, प्रसन्ना की गेंदबाज़ी देखी,
पीट सम्प्रस, भूपति, स्टेफी ग्राफ, अगासी का टेनिस देखा,
राज, दिलीप, धर्मेंद्र, जितेंद्र, अमिताभ, राजेश खन्ना, आमिर, सलमान, शाहरुख, माधुरी – इन सब पर फिदा रहने वाली यही पीढ़ी.
_ पैसे मिलाकर भाड़े पर VCR लाकर 4–5 फिल्में एक साथ देखने वाली पीढ़ी.
_ लक्ष्या–अशोक के विनोद पर खिलखिलाकर हँसने वाली,
नाना, ओम पुरी, शबाना, स्मिता पाटिल, गोविंदा, जग्गू दादा, सोनाली जैसे कलाकारों को देखने वाली पीढ़ी.
_ “शिक्षक से पिटना” – इसमें कोई बुराई नहीं थी, बस डर यह रहता था कि घरवालों को न पता चले, वरना वहाँ भी पिटाई होगी.
_ शिक्षक पर आवाज़ ऊँची न करने वाली पीढ़ी.
_ चाहे जितना भी पिटाई हुई हो, दशहरे पर उन्हें सोना अर्पण करने वाली और आज भी कहीं रिटायर्ड शिक्षक दिख जाएँ तो निसंकोच झुककर प्रणाम करने वाली पीढ़ी.
_ कॉलेज में छुट्टी हो तो यादों में सपने बुनने वाली पीढ़ी…
_ न मोबाइल, न SMS, न व्हाट्सऐप…
_ सिर्फ मिलने की आतुर प्रतीक्षा करने वाली पीढ़ी.
_ पंकज उधास की ग़ज़ल “तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुड़ाया” सुनकर आँखें पोंछने वाली.
_ दीवाली की पाँच दिन की कहानी जानने वाली.
_ फिर से आँखें मूँदें तो…
_ वो दस, बीस… अस्सी, नब्बे… वही सुनहरी यादें.
_ गुज़रे दिन तो नहीं आते, लेकिन यादें हमेशा साथ रहती हैं.
_ और यह समझने वाली समझदार पीढ़ी थी कि –
आज के दिन भी कल की सुनहरी यादें बनेंगे.
_ हमारा भी एक ज़माना था…
_ तब बालवाड़ी (प्ले स्कूल) जैसा कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं था.
_ 6–7 साल पूरे होने के बाद ही सीधे स्कूल भेजा जाता था.
_ अगर स्कूल न भी जाएँ तो किसी को फर्क नहीं पड़ता.
_ न साइकिल से, न बस से भेजने का रिवाज़ था.
_ बच्चे अकेले स्कूल जाएँ, कुछ अनहोनी होगी –
ऐसा डर माता–पिता को कभी नहीं हुआ.
_ पास/फेल यही सब चलता था.
_ प्रतिशत (%) से हमारा कोई वास्ता नहीं था.
_ ट्यूशन लगाना शर्मनाक माना जाता था.
_ क्योंकि यह “ढीठ” कहलाता था.
_ किताब में पत्तियाँ और मोरपंख रखकर पढ़ाई में तेज हो जाएँगे –
यह हमारा दृढ़ विश्वास था.
_ कपड़े की थैली में किताबें रखना,
बाद में टिन के बक्से में किताबें सजाना –
यह हमारा क्रिएटिव स्किल था.
_ हर साल नई कक्षा के लिए किताब–कॉपी पर कवर चढ़ाना –
यह तो मानो वार्षिक उत्सव होता था.
_ साल के अंत में पुरानी किताबें बेचना और नई खरीदना –
हमें इसमें कभी शर्म नहीं आई.
_ दोस्त की साइकिल के डंडे पर एक बैठता, कैरियर पर दूसरा –
और सड़क–सड़क घूमना… यही हमारी मस्ती थी.
_ स्कूल में सर से पिटाई खाना,
पैरों के अंगूठे पकड़कर खड़ा होना,
कान मरोड़कर लाल कर देना –
फिर भी हमारा “ईगो” आड़े नहीं आता था.
_ असल में हमें “ईगो” का मतलब ही नहीं पता था.
_ मार खाना तो रोज़मर्रा का हिस्सा था.
_ मारने वाला और खाने वाला – दोनों ही खुश रहते थे.
_ खाने वाला इसलिए कि “चलो, आज कल से कम पड़ा”
_ मारने वाला इसलिए कि “आज फिर मौका मिला”
_ नंगे पाँव, लकड़ी की बैट और किसी भी बॉल से
गली–गली क्रिकेट खेलना – वही असली सुख था.
_ हमने कभी पॉकेट मनी नहीं माँगा,
और न माता–पिता ने दिया।
_ हमारी ज़रूरतें बहुत छोटी थीं,
जो परिवार पूरा कर देता था.
_ छह महीने में एक बार मुरमुरे या फरसाण मिल जाए –
तो हम बेहद खुश हो जाते थे.
_ दिवाली में लवंगी फुलझड़ी की लड़ी खोलकर
एक–एक पटाखा फोड़ना – हमें बिल्कुल भी छोटा नहीं लगता था.
_ कोई और पटाखे फोड़ रहा हो तो उसके पीछे–पीछे भागना –
यही हमारी मौज थी.
_ हमने कभी अपने माता–पिता से यह नहीं कहा कि
“हम आपसे बहुत प्यार करते हैं” –
_ क्योंकि हमें “I Love You” कहना आता ही नहीं था.
_ आज हम जीवन में संघर्ष करते हुए
दुनिया का हिस्सा बने हैं.
_ कुछ ने वह पाया जो चाहा था,
_ कुछ अब भी सोचते हैं – “क्या पता…”
_ स्कूल के बाहर हाफ पैंट वाले गोलियों के ठेले पर
दोस्तों की मेहरबानी से जो मिलता –
वो कहाँ चला गया ?
_ हम दुनिया के किसी भी कोने में रहें,
लेकिन सच यह है कि –
हमने हकीकत में जीया और हकीकत में बड़े हुए.
_ कपड़ों में सिलवटें न आएँ, रिश्तों में औपचारिकता रहे –
यह हमें कभी नहीं आया.
_ रोटी–सब्ज़ी के बिना डिब्बा हो सकता है –
यह हमें मालूम ही नहीं था.
_ हमने कभी अपनी किस्मत को दोष नहीं दिया.
_ आज भी हम सपनों में जीते हैं,
शायद वही सपने हमें जीने की ताक़त देते हैं.
_ हमारा जीवन वर्तमान से कभी तुलना नहीं कर सकता.
_ हम अच्छे हों या बुरे –
लेकिन हमारा भी एक “ज़माना” था.!!
Yahoooooooooo….
कोई काम करने और उसे पूरा करने का कोई अन्त नहीं है, हम काम करते जाते हैं और आगे आने वाली पीढ़ियाँ उसमे सुधार कर कुछ और नया करती जाती हैं. इस संसार में सीखने का कोई अन्त नहीं है.!!

सुविचार – उम्र को” दराज में रख दें, उम्रदराज न बनें – 1025

“उम्र को” दराज में रख दें, उम्रदराज न बनें।

खो जाएं जिन्दगी में, खुद को खोने का इन्तजार न करें।
जिनको आना है आए, जिसको जाना है जाए,
पर हमें जीना है, हैं, ये न भूल जाएं।
जिनसे मिलता है प्यार, उनसे ही मिलें बार बार,
कभी बचपन को जीएं, तो कभी जवानी को,
पर न छोड़ें बुढापे में भी सपने संजोने को।
महफिलों का शौक रखें, दोस्तों से प्यार करें,
जो रिश्ते हमें समझ सकें, उन रिश्तों की कद्र करें।
बंधें नहीं किसी से भी, ना किसी को बँधने पर मजबूर करें।
दिल से जोड़ें हर रिश्ता, और उन रिश्तों से दिल से जुड़े रहें।
हँसना अच्छा होता है, पर अपनों के लिये रोया भी करें।
याद आएं कभी अपने तो, आँखें अपनी नम भी करें,
ध्यान रखें कि जिन्दगी चार दिन की है,
तो फिर शिकवे शिकायतें कम ही करें …
“*उम्र को* दराज में रख दें ” उम्रदराज न बनें।”

सुविचार – जिन्दगी का सफ़र, हैं ये कैसा सफ़र – 1024

जिन्दगी का सफ़र, हैं ये कैसा सफ़र

_ कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं
_ है ये कैसी डगर, चलते हैं सब मगर
_ कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं
_ जिन्दगी को बहोत प्यार हम ने किया
_ मौत से भी मोहब्बत निभायेंगे हम
_ रोते रोते जमाने में आये मगर
_ हंसते हंसते जमाने से जायेंगे हम
_ जायेंगे पर किधर, हैं किसे ये खबर
_ कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं
_ ऐसे जीवन भी हैं जो जिए ही नहीं
_ जिनको जीने से पहले ही मौत आ गयी
_ फूल ऐसे भी हैं जो खिले ही नहीं
_ जिनको खिलने से पहले खिजा खा गयी
_ है परेशान नजर, थक गए चार अगर
_ कोई समझा नहीं, कोई जाना नही.!!
सफ़र कभी खत्म नहीं होता.. जीवन चूकते जाता है आहिस्ता आहिस्ता..
_ हम बीतते जाते हैं.. और एक दिन सब यहीं रह जाता है.!!
ये तस्वीर सिर्फ़ एक सफ़र नहीं, हौसले, जज़्बे और सपनों की कहानी है 🚴‍♂️🌧️

_ बारिश, ठंडी हवा और लंबा रास्ता… फिर भी चेहरे पर मुस्कान और दिल में जुनून 💙
_ क्योंकि असली खुशी मंज़िल में नहीं, हर मुश्किल को पार करते सफ़र में मिलती है ✨
_ आज की थकान, कल की सबसे बड़ी जीत बनेगी. 💪
– Cycle Baba
“उड़ना है तो डरना कैसा? पानी गहरा हो या रास्ता फिसलन भरा… कोशिश जारी रखो!” 😄

और हम इंसान छोटी-छोटी बातों पर टेंशन ले लेते हैं ! 😂
सीख यही है –
हालात कैसे भी हों, अपने हौसलों को गीला मत होने दो. 🕊️
– Cycle Baba[/su_quote
सपने बड़े रखो, दिल शांत रखो, और सफर का मज़ा लो…

_ शहर बदले या हालात, हिम्मत मत बदलना.
– Cycle Baba
जिंदगी भी कभी-कभी ऐसे ही जकड़ लेती है —

EMI 🧾, जिम्मेदारियाँ 🏠, सपने ✨ और लोगों की बातें 😅
पर असली खिलाड़ी वही है जो कहे —
“लिपटो जितना लिपटना है… मैं फिर भी आगे बढ़ूंगा!” 🚴‍♂️🔥
– Cycle Baba
एयरपोर्ट की भीड़ में खड़ा था… ✈️ चारो तरफ लोग थे, घोषणाएं थीं, उड़ानें थीं…

_ पर मेरे अंदर सिर्फ खामोशी चल रही थी.
_ कभी सोचा नहीं था कि एक दिन सफर सिर्फ जगह बदलने का नहीं, खुद को समझने का ज़रिया बन जाएगा.
_ इस फोटो में मेरा हाथ “बाय” बोल रहा है…पर असली में ये उन दोस्तों को अलविदा था, जो सालों से अंदर छुपे बैठे थे.
_ सफ़र ने एक बात सिखा दी – इंसान जब घर से बाहर निकलता है ना, तब सिर्फ दुनिया नहीं देखता… वो अपने अंदर के टूटे हुए हिस्सों से भी मिलता है.
_ कई बार flights लेट हुई, plans खराब हो गए, पैसे कम पड़े, language समझ नहीं आई… पर हर problem ने एक नया version बना दिया.
_ और मजेदार बात ये है 😅 airport पर सब लोग अपनी flight पकड़ने की जल्दी में थे… और मैं जिंदगी को थोड़ा धीरे समझने की कोशिश कर रहा था.
_ आज भी मंजिल [destination] से ज्यादा सुकून उन रास्तों में मिलता है, जहां इंसान खुद से मिलने लगता है.
– Cycle Baba

सुविचार – ज़िंदगी के दस सूत्र ” – 1023

ज़िंदगी के दस सूत्र “

इन दसों सूत्रों को पढ़ने के बाद पता चला कि सचमुच खुशहाल ज़िंदगी और शानदार मौत के लिए ये सूत्र बहुत ज़रूरी हैं।

1. *अच्छा स्वास्थ्य* – अगर आप पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं, तो आप कभी खुश नहीं रह सकते। बीमारी छोटी हो या बड़ी, ये आपकी खुशियां छीन लेती हैं।

2. *ठीक ठाक बैंक बैलेंस* – अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए बहुत अमीर होना ज़रूरी नहीं। पर इतना पैसा बैंक में हो कि आप आप जब चाहे बाहर खाना खा पाएं, सिनेमा देख पाएं, समंदर और पहाड़ घूमने जा पाएं, तो आप खुश रह सकते हैं। उधारी में जीना आदमी को खुद की निगाहों में गिरा देता है।

3. *अपना मकान* – मकान चाहे छोटा हो या बड़ा, वो आपका अपना होना चाहिए। अगर उसमें छोटा सा बगीचा हो तो आपकी ज़िंदगी बेहद खुशहाल हो सकती है।

4. *समझदार जीवन साथी* – जिनकी ज़िंदगी में समझदार जीवन साथी होते हैं, जो एक-दूसरे को ठीक से समझते हैं, उनकी ज़िंदगी बेहद खुशहाल होती है, वर्ना ज़िंदगी में सबकुछ धरा का धरा रह जाता है, सारी खुशियां काफूर हो जाती हैं। हर वक्त कुढ़ते रहने से बेहतर है अपना अलग रास्ता चुन लेना।

5. *दूसरों की उपलब्धियों से न जलना* – कोई आपसे आगे निकल जाए, किसी के पास आपसे ज़्यादा पैसा हो जाए, तो उससे जले नहीं। दूसरों से खुद की तुलना करने से आपकी खुशियां खत्म होने लगती हैं।

6. *गप से बचना* – लोगों को गपशप के ज़रिए अपने पर हावी मत होने दीजिए। जब तक आप उनसे छुटकारा पाएंगे, आप बहुत थक चुके होंगे और दूसरों की चुगली-निंदा से आपके दिमाग में कहीं न कहीं ज़हर भर चुका होगा।

7. *अच्छी आदत* – कोई न कोई ऐसी हॉबी विकसित करें, जिसे करने में आपको मज़ा आता हो, मसलन गार्डेनिंग, पढ़ना, लिखना। फालतू बातों में समय बर्बाद करना ज़िंदगी के साथ किया जाने वाला सबसे बड़ा अपराध है। कुछ न कुछ ऐसा करना चाहिए, जिससे आपको खुशी मिले और उसे आप अपनी आदत में शुमार करके नियमित रूप से करें।

8. *ध्यान* – रोज सुबह कम से कम दस मिनट ध्यान करना चाहिए। ये दस मिनट आपको अपने ऊपर खर्च करने चाहिए। इसी तरह शाम को भी कुछ वक्त अपने साथ गुजारें। इस तरह आप खुद को जान पाएंगे।

9. *क्रोध से बचना* – कभी अपना गुस्सा ज़ाहिर न करें। जब कभी आपको लगे कि आपका दोस्त आपके साथ तल्ख हो रहा है, तो आप उस वक्त उससे दूर हो जाएं, बजाय इसके कि वहीं उसका हिसाब-किताब करने पर आमदा हो जाएं।

10. *अंतिम समय* – जब यमराज दस्तक दें, तो बिना किसी दुख, शोक या अफसोस के साथ उनके साथ निकल पड़ना चाहिए अंतिम यात्रा पर, खुशी-खुशी। शोक, मोह के बंधन से मुक्त हो कर जो यहां से निकलता है, उसी का जीवन सफल होता है.

सुविचार – इन्सान की तीस गलतियां – 1022

इन्सान की तीस गलतियां: –

1. इस ख्याल में रहना कि जवानी और तन्दुरुस्ती हमेशा रहेगी।

2. खुद को दूसरों से बेहतर समझना।

3. अपनी अक्ल को सबसे बढ़कर.समझना।

4. दुश्मन को कमजोर समझना।

5. बीमारी को मामुली समझकर शुरु में इलाज न करना।

6. अपनी राय को मानना और दूसरों के मशवरें को ठुकरा देना।

7. किसी के बारे में मालुम होना फिर भी उसकी चापलुसी में बार-बार आ जाना।

8. बेकारी में आवारा घुमना और रोज़गार की तलाश न करना।

9. अपना राज़ किसी दूसरे को बता कर उससे छुपाए रखने की ताकीद करना।

10. आमदनी से ज्यादा खर्च करना।

11. लोगों की तक़लिफों में शरीक न होना, और उनसे मदद की उम्मीद रखना।

12. एक दो मुलाक़ात में किसी के बारे में अच्छी राय कायम करना।

13. माँ-बाप की खिदमत न करना और अपनी औलाद से खिदमत की उम्मीद रखना।

14. किसी काम को ये सोचकर अधुरा, छोड़ना कि फिर किसी दिन पुरा कर लिया जाएगा।

15. दुसरों के साथ बुरा करना और उनसे अच्छे की उम्मीद रखना।

16. आवारा लोगों के साथ उठना बैठना।

17. कोई अच्छी राय दे तो उस पर ध्यान न देना।

18. खुद हराम व हलाल का ख्याल न करना और दूसरों को भी इस राह पर लगाना।

19. झूठी कसम खाकर, झूठ बोलकर, धोखा देकर अपना माल बेचना, या व्यापार करना।

20. इल्म, दीन या दीनदारी को इज्जतन समझना।

21. मुसिबतों में बेसब्र बन कर चीख़ पुकार करना।

22. फकीरों, और गरीबों को अपने घर से धक्का दे कर भगा देना।

23. ज़रुरत से ज्यादा बातचीत करना।

24. पड़ोसियों से अच्छा व्यवहार नहीं रखना।

25. बादशाहों और अमीरों की दोस्ती पर यकीन रखना।

26. बिना वज़ह किसी के घरेलू मामले में.दखल देना।

27. बगैर सोचे समझे बात करना।

28. तीन दिन से ज्यादा किसी का.मेहमान बनना।

29. अपने घर का भेद दूसरों पर ज़ाहिर करना।

30. हर एक के सामने अपना दुख दर्द सुनाते रहना।

सुविचार – आखिर अंतर रह ही गया…… – 1021

आखिर अंतर रह ही गया……

बचपन में जब हम ट्रेन की सवारी करते थे, तो मां घर से सफर के लिए खाना बनाकर लें जाती थी, पर ट्रेन में जब कुछ लोगों को खाना खरीद कर खाते देखते, तो बड़ा मन करता कि हम भी खरीद कर खायें. पापा ने समझाया कि ये हमारे बस का नहीं है. अमीर लोग इस तरह पैसे खर्च कर सकते हैं, हम नहीं. बड़े होकर देखा, जब हम खाना खरीद कर खा रहें हैं, तो वो अमीर लोग घर से भोजन बांध कर ले जा रहें हैं. स्वास्थ के प्रति चेतन हैं वे.

आखिर वो अंतर रह ही गया……

बचपन में जब हम सूती कपड़ा पहनते थे, तब वो वर्ग टेरीलीन का वस्त्र पहनता था. बड़ा मन करता था टेरीलीन पहनने का, पर पापा कहते कि हम इतना खर्च नहीं कर सकते.

बड़े हो कर जब हम टेरीलीन पहने, तब वो वर्ग सूती के कपड़े पहनने लगा. सूती कपड़े महंगे हो गए. हम अब उतना खर्च नहीं कर सकते.

आखिर अंतर रह ही गया……

बचपन में जब खेलते खेलते हमारी पतलून घुटनो के पास से फट जाती, तो मां बड़ी ही कारीगरी से उसे रफू कर देती और हम खुश हो जाते. बस उठते बैठते अपने हाथों से घुटनो के पास का वो हिस्सा ढक लेते. बड़े हो कर देखा वो वर्ग घुटनो के पास फटे पतलून महंगे दामों में बड़े दुकानों से खरीद कर पहन रहा है, और हम उसे खरीद नहीं पा रहे हैं.

आखिर अंतर रह ही गया……

बचपन में हम साईकल बड़ी मुश्किल से पाते, और वे स्कूटर पर जाते. जब हमने स्कूटर खरीदा, तो वो कार की सवारी करने लगे और जब तक हमने मारुती खरीदी, वो बीएमडब्लू पर जाते दिखे.

आखिर अंतर रह ही गया……

और हमने जब अंतर मिटाने के लिए रिटायरमेंट का पैसा लगाकर BMW खरीदी, तो वो वर्ग साइकिलिंग करता नजर आया.

आखिर अंतर रह ही गया……

error: Content is protected