एक दिन अभाव थे और इतने थे कि उनके होने से ही ज़िन्दगी थी,
_ उनके होने से ही गर्व होता था, उनको खुलकर बताते थे और अपनी खुशियाँ जाहिर करते थे,
_ ये अभाव इतने ताकतवर थे कि एक बहुत बड़े – मतलब वृहद समाज से एक झटके में अलग कर पहचान बना देते थे,
_ चीन्हना बहुत आसान था – किसी को खोजना नही पड़ता था कि कौन, क्या है, कहाँ है और किस हाल में है,
_ वह दुनिया बहुत सुकून वाली थी – जब कुछ नही था तो कोई गलाकाट स्पर्धा नही, कोई होड़ नही – दौड़ नही, कही आने – जाने की जल्दी नही, किसी से जलन नही, बैर और ईर्ष्या का सवाल नही..
– बस जो मिलता था – उसी में संतोष था, उसी में सुख था – सुख जो किसी कच्ची दीवार में बना दिये गए तिकोने से आले की गोद रहता – दिन में धूप, शाम को गर्माहट और रात में किसी अलाव सा दीया बनकर जीवन के आँगन में जलता रहता,
_ यह नही पता था कि इस छोटे से सुख के लिये भी माँ – बाप का खून उसकी लौ को जिलाये रखने के लिये चौबीसों घण्टे जल रहा है.
_ जब संसार को देखना भोगना और महसूस करना शुरू किया तो सब कुछ इकठ्ठा करने की प्रवृत्ति जागने लगी –
– एक सुई से लेकर धागा, चम्मच, कपड़े, और वो सब जिसे जर, सम्पत्ति या माया कहते हैं इकठ्ठी करने में लग गए –
– धरती के विशाल कैनवास पर अजस्र योजन सेना को खड़े करने लायक मैदान पर सफ़ेद चुने की एक पँक्ति पर खड़े होकर देखा कि यह दौड़ बहुत छोटी है,
_ बस क्षणभर में सारी बाधाएं पार कर सोने का तमगा हासिल कर लेंगे तो बगैर किसी सीटी के या इशारे के दौड़ना शुरू कर दिया –
– हर जगह, हर बाधा को तोड़ने का जोश और हर जोश के बाद उपलब्धियों की शोहरत की ऐसी चरस चख ली कि नशा उतरता ही नही,
_ दौड़ता रहा, भागता रहा और अभी भी मन नही भरा है
जबकि अपनी बाज़ी के सारे खाने उठ गए है – कोई तयशुदा मैयार नही, माज़ी का अवसाद सर चढ़कर बोलता है कि बस करो – एकदम चुप, पर कहाँ ….
_ सब कुछ खोता गया – घर, परिवार, जीवन, सुख, शांति, भीतर का चैन, उजियारा, मन को तृप्त करने वाला दृश्य, क्षुधा मिटाने वाला हर वो अमृत पेय या पदार्थ..
जिसको छककर जीवन को बचाये रखना था, वितृष्णा हो गई – पर नही, इस सबमें वह सब जमा हो गया – जिससे शरीर ही नही, आत्मा के घावों में छाले पड़ गए और अब वे टींस दे रहें है तो पलटकर देखने की इच्छा नही होती –
– अपनी सजी हुई उपलब्धियों की दुकान, जर – ज़मीन को देखकर अपनी ही परछाई खोज रहा हूँ – जो इस सबके बीच खो गई है और अब जब परछाई को ओढ़कर जीने का स्वांग भरना है, तो लगता है सब कुछ लूटा दूँ, छोड़ दूँ यह सब..
_ और सिर्फ़ अपनी एकमेव सम्पत्ति यानी परछाई को संग लेकर चल दूँ कही –
– उसी अभाव की बेफ़िक्र दुनिया में ताकि जब फांकाकशी में पालथी मारकर किसी धूप के टुकड़े पर बैठूँ तो प्रकृति से निशुल्क मिलें बेशकीमती हवा, पानी और प्रकाश को भोग सकूँ.
_ मन ऊब गया है, बैरागी हो गया हूँ और शरीर – काया का गुमान छोड़ रहा है अपने अनंत में मिल जाना चाहता है,
_ रक्तरंजित आत्मा अपने ही बोझ से दबी जा रही हैं, किसी निर्धारित दिन पर एक ऐसे समय जब धरती थम रही हो, आसमान हाँफ रहा हो और इस पृथ्वी पर कोई चैतन्य अवस्था में ना हो ….. छोड़कर चल दूँगा.
_ सबके बावजूद भी ज़िन्दगी खूबसूरत है कि इतने मौके दिए और यह समझ भी कि भले – बुरे, अपने – परायों को पहचान पा रहा हूँ और यह सब सोचने – समझने – लिखने की शक्ति दी है बस यह बनी रहें और पूरे होशोहवास में दम निकलें चलते -फ़िरते, किसी का मोहताज ना बनूँ.
– Sandip Naik