सुविचार – तनाव – चिंता – चिन्ता – परेशानी – परेशान – मुसीबत – मुसीबतें – मुसीबतों – आपदा विपदा – 078

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तनाव क्या है ?

तनाव मन की वह स्थिति है जिसमे मनुष्य का मन हमेशा बोझिल रहता है. मन लगातार द्वन्द की अवस्था में रहता है. छोटी- छोटी बातों से भी मन उद्विग्न हो जाता है, मनुष्य कोई भी काम मन की स्थिरता में नहीं कर पाता, घर और बाहर के दैनिक कार्य करते हुए हड़बड़ी मचाना उसकी आदत ही बन जाती है. बात- बात में चिढ जाना, अचानक भड़क जाना, शरीर और मन में थकावट महसूस करना, चेहरे की मुस्कुराहट का गायब हो जाना, ये मन की तनावग्रस्त स्थिति के लछण हैं. जब यह स्थिति लम्बे समय तक चलती रहती है, तो उसके परिणामस्वरुप कई रोग शरीर और मन में उत्पन्न होने शुरू हो जाते हैं.

अक्सर वे ही लोग तनाव के शिकार होते हैं, जो दिमागी तौर पर कमजोर हों और जिनको जटिल परिस्थितियों को सहजता से सुलझाने का हुनर नहीं हो.
तनाव का मूल कारण है- अस्वीकार भाव. विगत और वर्तमान की परिस्थितियों को स्वीकार न करना और भविष्य के प्रति आशंकित रहना ही तनाव की जड़ है. यदि हमारे मन और ह्रदय का दायरा बढ़ सके, तो तनावमुक्ति आसान हो जाएगी. मन को एक से अधिक कामों में लगाने से मन खंडित हो जाता है और इससे तनावग्रस्त होने से बचा जा सकता है.

इसलिए, कुछ- कुछ समय के पर चंद सेकेंड का ही सही, लेकिन ब्रेक लें और इस ब्रेक में अपना ध्यान किसी अन्य विषय पर रखें.

हमारे भीतर जो ऊर्जा इकट्ठी होती रहती है, उसके निकास का मार्ग पता न होने से भी हमारी ऊर्जा क्रोध या तनाव का रूप ले लेती है. अगर हम हल्के- फुल्के व्यायाम करने के भी अभ्यस्त हो जाएं, तो हमारी ऊर्जा को निकास का मार्ग मिलता है और हमारे भीतर सकारात्मक भाव बनने लगते हैं.

चिन्ता और तनाव तो पछियों की तरह है, _ जिन्हे हम अपने आस पास उड़ने से नहीं रोक सकते. परन्तु उन्हें मन में घरोंदा मत बनाने दो .

अपने तनाव को खत्म कर दो, _ इससे पहले कि आपका तनाव आपको खतम कर दे.

जो दूसरों को परेशान करना चाहता है, वह हमेशा परेशान और विचलित रहता है.!
उन सभी परेशानियों के लिए आभारी रहें… जिनका आपको सामना नहीं करना पड़ा.!
तनाव में जीने से बेहतर है.. आप तनाव देने वालों को अपनी ज़िंदगी में से शांति से हटा देना.!!
“कौन आया कौन गया उसकी चिंता मत करो, जो इस वक्त तुम्हारे पास है वही तुम्हारा है..”
चिन्ता जब चिन्तन में बदल जाती है, तो सकारात्मक परिणाम होते हैं. 
चिंता करने से हमारी परेशानियां दूर हों ना हों,

_ लेकिन हमारा आज का सुकून जरूर दूर हो जाता है.!!

अपनी परेशानियों का रोना किसी से ना रोयें..

_ क्योंकि 20% लोगों को आपकी परवाह नहीं होगी..
_ और बाकी 80% इस बात से खुश होंगे कि आप परेशानी में हैं..!!
हम अपनी जागरूकता बढ़ाएं, ज्यादा जिम्मेदार बनें तो कई आपदाएँ रुक जाएंगी..
_ सिर्फ भाग्य भरोसे रहेंगे तो कुछ नहीं होगा.!!
कोई भी काम तनावपूर्ण नहीं होता है. शरीर, मन और भावनाओं का प्रबंधन नहीं कर पाने से आप तनाव में होते हैं.

तनाव से बचना अपने हाथ में है, जितना इससे भागने की कोशिश करेंगे, उतना ही यह आपका पीछा करेगा.

इस दुनिया में सभी लोग अपने-अपने हिसाब से घूम रहे हैं, हमें बस जिंदगी को जीना है,

_ वे सकारात्मक तरीके से जियेंगे तो परेशानियो में भी अवसर दिखेंगे, नहीं तो खुशी में भी दुखी रहेंगे..

जितना संभव हो सके, किसी को परेशान न करें या दूसरों के लिए परेशानी का कारण न बनें.

_ दूसरों को अनावश्यक परेशानी देने से बचकर, कई लोगों के साथ रिश्ते अच्छे हो सकते हैं.
_ जब लोग हमसे परेशान महसूस करते हैं, तो वे अक्सर हमसे दूरी बनाने या हमसे बचने की कोशिश करते हैं.!!
अपनी परेशानियाँ गुप्त रखें; दुनिया में सहानुभूति कम और तमाशा देखने वालों की तादाद ज़्यादा है, इसलिए हमेशा खुद के सबसे अच्छे हमदर्द बनें.!!
चिंता इंसान का सबसे गहरा डर है, और यह अक्सर तब आती है जब आप अकेले होते हैं..

_ और ऐसे कारणों से घिरे होते हैं.. जिन्हें समझाना मुश्किल होता है.
_ कभी वो वजह कोई ऐसी घटना होती है जो अभी घटी ही नहीं, या फिर वो बीत चुकी होती है.. जिसे आप बदल नहीं सकते.
_ और जब इन विचारों को रोकने की ताक़त भी आपके पास न रहे, तो चिंता एक बेहद दर्दनाक अनुभव बन जाती है.!!
चिंता सबसे भयानक अनुभव है, यह हमें तब घेरती है जब हम अकेले बैठे होते हैं और किसी वजह से दुखी होते हैं जिसे हम समझा नहीं सकते..
_ क्योंकि या तो वो घटना घटी ही नहीं या फिर घट चुकी है, जिसे हम बदल नहीं सकते..
_ और जब हम चाह कर भी इन विचारों को रोक नहीं सकते तो बहुत तकलीफदेह होता है.!!
आधुनिक जीवन में तनाव से पूरी तरह बचना संभव नहीं है, लेकिन उसे नियंत्रित करना सीखा जा सकता है.
_ लगातार तनाव में रहना हृदय और मस्तिष्क दोनों के लिए नुकसानदायक है.
_ योग, प्राणायाम, ध्यान और पर्याप्त नींद तनाव को कम करने में सहायक होते हैं.
_ शांत मन शरीर को भी स्वस्थ रखता है.!!
जब सारे कार्य तनाव रहित और खुश रहकर किए जाते हैं _

_ तब आत्मिक संतुष्टि के साथ-साथ सांसारिक उन्नति भी प्राप्त होती है.

जैसे हर रास्ते पर कुछ न कुछ परेशानी होती है,

_ वैसे ही हर परेशानी का कोई न कोई रास्ता भी होता है !!

हम उन मामलों को भी अपने ऊपर तनावग्रस्त होने दे रहे हैं, जो हमारे नियंत्रण से बाहर हैं.!

प्राकृतिक आपदा से नहीं बच सकते..
_ पर अन्य आपदाओं को अपनी बुद्धि और श्रम से टाला जा सकता है.!!
जब हम जीवन की परेशानियों को स्वीकार करना सीख जाते हैं तो हमारे लिए जीवन आसान हो जाता है.
उन लोगों पर अधिक ध्यान केंद्रित करें जो आपको परेशान करने के बजाय आपको प्रेरित करते हैं.

_आप जीवन में बहुत आगे बढ़ेंगे.

Focus more on the people who inspire you rather than annoy you.

You’ll get much further in life.

चिंता आपके आनंद को चुराने के अलावा और कुछ नहीं करती और आपको कुछ न करते हुए व्यस्त रखती है.

Worry does nothing but steal your joy and keep you very busy doing nothing.

परेशानियां और तनाव हमारी जिंदगी का एक हिस्सा है, जो हमें अपना बेस्ट देने के लिए प्रेरित करता है. इसे खुद पर हावी होने देने के बजाय अगर हम इसे पॉजिटिवली लेकर चलें, तो हमें सफल होने से कोई नहीं रोक सकता.
हर इंसान जीवन में कभी न कभी बेचारगी के उस दौर से गुजरता है,

_ जहाँ उसकी व्यक्तिगत चुनौतियाँ और परेशानियाँ उसके विवेक पर इस कदर हावी हो जाती हैं कि वह यह तक महसूस नहीं कर पाता जिस स्वभाव से उसे खुद नफ़रत है,
_ वो फिलहाल उसी स्वभाव की गिरफ्त में है.!!
जो अपनी चिंताओं से, अपने तनावों से, अपने अवसादों से लड़ नही पाता, वह युवावस्था में ही बुढापा जी रहा होता है.

_ अतः अपनी चिंताओं को ताख पर रख कर अपनी जीवन जिये.
_ हाँ, ये जितना कहना आसान है, उतनी ही मुश्किल है करना, पर यह असम्भव तो नही है.!!
चिंता सबसे भयानक अनुभवों में से एक है, वो आपको तब घेरती है जब आप अकेले बैठे होते हैं और किसी ऐसी वजह से दुखी होते हैं.. जिसे आप बयां नहीं कर सकते,

_ क्योंकि या तो वो घटना अभी घटी ही नहीं होती, या फिर पहले ही घट चुकी होती है.. जिसे आप बदल नहीं सकते और जब आप चाहकर भी इन विचारों को रोक नहीं पाते, तो ये बहुत दर्दनाक हो जाता है.!!
हर किसी के जीवन में कभी ना कभी ऐसा समय आता है जब हम मुश्किलों में घिर जाते हैं और हमारे सामने अनेकों समस्यायें एक साथ आ जाती हैं. ऐसी स्थिति में ज्यादातर लोग घबरा जाते हैं और हमें खुद पर भरोसा नहीं रहता और हम अपना आत्मविश्वास खो देते हैं, और खुद प्रयास करने के बजाय दूसरों से उम्मीद लगाने लग जाते हैं जिससे हमें और ज्यादा नुकसान होता है तथा और ज्यादा तनाव होता है और हम नकारात्मकता के शिकार हो जाते हैं और संघर्ष करना छोड़ देते हैं.

इसलिए जब भी कभी आपके जीवन में मुश्किलें या समस्यायें आयें तो उनसे घबरायें नहीं बल्कि डट कर उनका सामना करें. संघर्ष करते रहें तथा नकारात्मक विचार त्याग कर सकारात्मकता के साथ प्रयास करते रहें. एक दिन आप अपने मुश्किल रूपी कोकून से बाहर आयेंगे और खुले आसमान में उडान भरेंगे अर्थात आप जीत जायेंगे.

आप सभी मुश्किलों, समस्यायों पर विजय पा लेंगे.

वर्तमान समय में हर व्यक्ति अपनी क्षमता से अधिक कर गुजरने की कोशिश में लगा हुआ है.

इस भौतिकवादी युग में हर काम में तेजी, प्रतिद्वन्द्विता का दबाव एवं हर हाल में सर्वोच्च बनने की इच्छा के चलते हमारे तन मन और बुद्धि को बहुत से परिवर्तन झेलने पड़ते हैं.

इससे हमारा शारीरिक और बौद्धिक तारतम्य गड़बड़ हो जाता है. ऐसे परिवर्तनों के लिए हमारे तन और मन में जो स्वाभाविक प्रतिक्रिया परिलक्षित होती है, वही तनाव है.

इन संकेतों की अनदेखी निश्चयतः हानिकारक और घातक सिद्ध होती है.

तनाव प्रबंधन के लिए तीन उपाय बताए गए हैं, A A A.
(1) A = Alter
(2) A = Avoid
(3) A = Accept
(1) A = Alter = परिस्थिति में बदलाव : जो भी तनावपूर्ण स्थिति है या जो भी तनाव देने वाला व्यक्ति या स्थान है, उसे बदल दिया जाए. : Try to alter the situation.
(2) A = Avoid = परिस्थिति से बचाव : तनावपूर्ण स्थिति से दूर रहा जाए या उस पर ध्यान न दिया जाए.
: If alteration is not possible, avoid it.
(3) A = Accept = परिस्थिति से समझौता : जैसा भी तनाव हो उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया जाए.
: If it’s no way, accept it.
भौतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए दिन-रात की भागदौड़ से उपजे तनाव को कम किया जा सकता है, लेकिन समाप्त करना असंभव है.
बेहतर है कि तनाव को तनाव न मानकर चुनौती के रूप में स्वीकार कर लिया जाए तो _तनाव का मौलिक स्वरुप ही बदल जाएगा.
वैसे थोड़ा तनाव हमारी क्षमताओं को जागृत करने में सहायक होता है. _ यदि जीवन में प्रतिस्पर्धा नहीं होगी तो _हमारे जीवन में ठहराव आ जाएगा.
इसलिए काम को पूरा करने का तनाव हमारी मदद भी करता है. तनाव हमें अधिक कार्य करने की प्रेरणा दे _तो इसके सकारात्मक परिणाम मिलेंगे अन्यथा तनाव की वज़ह से हमें मानसिक कष्ट होगा ही.
चिंता सबसे भयानक अनुभव है, वो आपको तब घेरती है जब आप अकेले बैठे हों, और किसी ऐसी बजह से परेशान हों, जिसको बया नही कर सकते ;
_क्योकि या तो वो घटना घटी ही नही है या फिर घट चुकी है जिसे आप बदल नही सकते और जब आप चाहकर भी इन विचारों को रोक नहीं सकते, _ तो ये बहोत दर्दनाक होता है…!
चिंता कम करें—-

1. इस बात को कम महत्व दें कि दूसरे लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं: दूसरे लोग आपके नियंत्रण से बाहर होते हैं और अगर आप अपनी इमेज के बारे में चिंता करना छोड़ नहीं सकते तो आप खुलकर नहीं जी पाते | आप हर किसी को खुश नहीं कर सकते इसलिए अगर आप ऐसा सोच रहे हैं कि आप ऐसा कर सकते हैं तो यह आपको अलग-थलग और निराश करके छोड़ देगा |
आप खुद को दूसरों की सोच के अनुसार न ढालें |अपने जीवन में खुद को “टॉक्सिक या जहरीले” लोगों से अलग रखें | ये वे लोग होते हैं जो आपको मैनीपुलेशन, नकारात्मकता और अन्य प्रकार के नियंत्रणों से नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं | बेहतर होगा कि, नॉन-वायलेंट कम्युनिकेशन तकनीक को सीखकर और कम प्रतिक्रियाशील और अधिक जिम्मेदार और मुखर बनकर अपने मुद्दे पर अडिग रहते हुए ऐसे लोगों को अपने वश में करना सीखें, आपके अंदर वो शक्ति है जिससे आप ऐसे लोगों से खुद को मुक्त रख सकते हैं और उनके गलत इरादों से खुद को बचा सकते हैं | अच्छे दोस्त भी आपका संतुलन खोजने में आपकी मदद करेंगे |
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2. बुरी चीजों पर फोकस करना बंद करें: जो चीजें हो चुकी हैं उन पर फोकास करना बंद करें बल्कि जो किया जा सकता है उस पर फोकस करें | अपना ध्यान इस ओर लगायें कि आप अपने और दूसरों के लिए चीज़ों को बेहतर बनाने के लिए क्या कर सकते हैं | ऐसा करने से, आप जीवन जीने के लिए श्रेष्ठ स्वतंत्रता खोज लेंगे |
अपनी असफलताओं को याद रखने की बजाय खुद की सफलताओं को याद रखें |
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3. ईमानदार रहें: झूठ आपको छल के जाल में उलझता जाता है जिससे आप खुलकर जी नहीं पाते | खुद से और दूसरों से बोले जाने वाले झूठ को पहचानें | भरोसेमंद और इंसान बनने से आप उन लोगों से बेहतर रूप से जुड़ सकते हैं जिन पर आप भरोसा करते हैं क्योंकि वे ही आपकी भेद्यता (vulnerability) को पहचान सकते हैं |
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4. पैसा शब्द पर आयें (और उसकी हानि पर भी नज़र डालें): कई लोग “काफी पैसा होने” को सम्बन्ध आजादी से जोड़ते हैं, लेकिन पैसे के प्रति आपकी लालसा बताती है कि पैसा ही आपके लिए सब कुछ है, स्वतंत्रता नहीं | धन या पैसे के साथ अपने जीवन में एक उपकरण की तरह बर्ताव करें, इसे अपने जीवन का ड्राइवर न बनायें | बचत करने, बजट बनाने और एक सचेत ग्राहक बनने के बारे में सीखें.
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5. वो चीज़ें बनायें जिन्हें बनाने पर आप अच्छा महसूस करते हैं.
जितना हो सके, कुछ न कुछ नया करते रहें: नए अनुभवों को दिल खोलकर स्वीकार करना स्वतंत्रता का स्त्रोत होता है क्योंकि आप अपने क्षेत्र को विस्तृत करते हैं, छुपी हुई नयी प्रतिभाओं को खोजते हैं और जीवन की अच्छाइयों को दिल खोलकर आत्मसात करते हैं |
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6. ऐसा मानें जैसे कि आपकी हर रोज़ की जिंदगी में आपको एक बैकग्राउंड म्यूजिक मिल गया है: सभी मूवीज में साउंड ट्रैक होता है इसलिए आपके पास भी होना चाहिए | एक मूसलाधार बारिश के दिन किसी गली से गुजरें, खुद को किसी चीज़ के साथ थामे जिससे आपके पैर चलते रहें और दिमाग आपका मनोरंजन करता रहे |
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7. थोडा टहलें: बाहर निकलें और टहलना शुरू करें | बिना किसी विशेष दिशा के, सिर्फ टहलते रहें और जब तक आपका रुकने का मन न हो न रुकें | अपने दिमाग से सारी परेशानियों को निकालकर टहलना बहुत अच्छा होता है |

सुविचार – Home Maintenance System – घर रखरखाव सिस्टम – 077

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“जो repeat होता है, उसका सिस्टम बनाओ… और सिस्टम को टूटने मत दो”

_ किसी भी चीज का सिस्टम एक बार सेट हो जाए, तो फिर वो खुद ही चलने लगता है.!!
_ बस उसे सब मेन्टेन करें और सिस्टम को टूटने मत दो.!!
Home Maintenance System Checklist (Daily + Weekly)

1.🌅 Daily System
☐ सुबह उठने का fixed time
☐ 10–15 min cleaning (कमरा/रसोई)
☐ चीज़ों को उनकी जगह पर रखना
☐ kitchen basic setup (next meal prep)
☐ 10–20 min silence / meditation
☐ सोने से पहले quick reset (5 min)
2.🧹 Weekly System
☐ Deep cleaning (एक दिन fix)
☐ कपड़े wash + organize
☐ groceries check & refill
☐ fridge साफ़ / expired items remove
☐ घर का एक कोना declutter
3.🍽️ Kitchen System
☐ weekly menu decide
☐ grocery list ready
☐ cook instructions simple & clear
☐ basic items always stocked
4.📦 Organization System
☐ हर चीज़ की fixed जगह
☐ “use → वापस रखो” rule follow
☐ extra सामान हटाओ (declutter)
5.💰 Money System
☐ weekly खर्च check
☐ महीने की शुरुआत में planning
☐ unnecessary खर्च note करो.
कुछ अच्छा दिखा ? तुरंत मत खरीदो.
“24” घंटे बाद भी लगे, “जरुरी है”, तब लो.
“चाहत और जरुरत अलग दिखने लगती है”
6.📱 Digital System
☐ phone साफ़ (photos/apps)
☐ important docs organized
☐ useless notifications off
7.🧘 Inner System
☐ रोज़ 10–20 min meditation
☐ एक line reflection: “आज कैसा महसूस हुआ ?”
☐ हफ्ते में 1 बार self-check
Monthly Clarity Checklist (हर महीने की 1 तारीख को )

🏥 Health & Medicines

Health & Medicines
☐ Medicine expiry check
☐ First aid box refill
☐ BP reading note karna
☐ Weight record karna

🍳 Kitchen & Food Safety
☐ Fridge items expiry check
☐ Gas cylinder level check
☐ Gas stove + pipe leakage test
☐ RO / Water purifier indicator
☐ Micro oven
☐ Mixer Grinder
☐ Washing Machine
🚿 Washroom Hygiene & Safety
☐ Exhaust fan working check
☐ Geyser safety & heating test
☐ Tap leakage check
☐ Flush tank proper working
☐ Floor drain blockage check
☐ Anti-skid [फिसलन रोधी] mat condition
☐ Cleaning supplies refill
☐ Toothbrush replace (3 months rule review)
☐ Mirror & tiles deep clean
☐ Odonil / Freshner

⚡ Electrical & Devices
☐ Inverter water level
☐ All remote batteries
☐ Weighing machine battery
☐ Wall clock battery
☐ Emergency torch working
☐ Main MCB off–on test
☐ All mobiles, Laptop, Remote clean
☐ Air Purifier
☐ Iron
☐ Hair Dryer
🏠 Home Safety & Maintenance
☐ Door locks & latches [कुंडी] check
☐ Sink / washbasin leakage check
☐ Switch boards heating check
☐ Extension boards dust clean

📱 Digital & Financial Hygiene
☐ Important data backup (photos/documents)
☐ Auto-debit / bank SMS review

Extra (Optional, jab mann kare)
☐ Wardrobe / papers mini-declutter (1 item release)
☐ Attachi & Bag
☐ corner cleaning
☐ Nursery maintain
☐ Nail + baal trim
☐ Sofa cleaning
☐ TV Cleaning
☐ Book shelf Cleaning

———————————–
🌳 Yearly Master Review
(Har Saal – January ya Apne Birthday Par)

🏥 Health
☐ Full body check-up / blood test review
☐ Dental check-up
☐ Eye check-up
☐ Walking shoes replace (agar ghis gaye ho)

🏠 Home & Assets
☐ Insurance policies review
☐ Important documents file organise
☐ Appliances deep cleaning / servicing
☐ Emergency contacts list update

💰 Financial Clarity
☐ Investment review
☐ Nomination details verify
☐ Annual expense summary dekhna

🌿 Life Reflection
☐ इस साल क्या सीखा ? [3 बातें लिखना]
☐ क्या छोड़ना है ? [1 आदत ]
☐ क्या बढ़ाना है? [1 Quality/ गुण ]
——————————–
🌅 5-Year Vision Reflection
(शांत मन से, बिना जल्दी किये लिखें)
🌿 मैं 5 साल बाद कैसा व्यक्ति बनना चाहता हूं ?
———

🏠 मेरा जीवन किस तरह का होना चाहिए ?
(Simple / Travel / Seva / Study / Financial Freedom etc.)
——

💰 आर्थिक स्थिति का लक्ष्य


🧘 Health & Inner Growth


✍ एक वाक्य में मेरा 5 साल का संकल्प:
——
“Simplicity is the highest form of order.”
[सरलता ही व्यवस्था का सर्वोच्च रूप है.]

सुविचार – न्यूनतमवादी बनना – मिनिमिलिस्ट – Becoming minimalist – खरीदना – Purchase – 076

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धीमी गति से खरीदें, ऊंचे स्तर पर रहें..

Buy slow, stay high.

“सुंदरता जोड़ने से नहीं, अनावश्यक हटाने से उभरती है.”
सबसे जरुरी है अपने घर का चूल्हा जलाए रखना,
_ इनकम के वो सोर्स बनाना.. जिनसे ज़िंदगी चल सके.. बाकी चीजें उतनी जरुरी नहीं.!!
कोई कितना खरीदे और क्या क्या खरीदे ? इतना पैसा भी कहां से लाओ ? और खरीद लाओ तो काम आए न आए ?

_ क्या उसे इस्तेमाल करने का समय होगा या नहीं ?
_ और अगर खरीदा भी जाए, तो क्या वह काम आएगा या नहीं ?
_ समय का तो अभाव ही अभाव है आधुनिक जिंदगी में.!!
मिनिमिलिस्ट होने के अपने सुख और दुख हैं.!

_ सुख कि आपको सामानों के ढेर को सहेजना नहीं पड़ता, न चुनाव की समस्या होती है.!!
हम ख़ालीपन की वजह से नहीं, अनचाही चीज़ों के भराव से ख़ाली हैं.!!
अब समय है अपनी सही समझ के अनुसार जीने का..

_ क्योंकि आज सब कुछ बाजार है और बाजार में हर कोई अपना फायदा देखता है.!!

ये हमारा दोष है कि चीजें तो हर कोई चाहता है,

_लेकिन उन्हें मेन्टेन [ रख-रखाव ] कोई नहीं करना चाहता.!!

यदि आप अपने घर में जिस सामान का उपयोग नहीं कर रहे हैं, तो उससे छुटकारा पाएं.

आप इसे किसी कोठरी में रखकर इसका अधिक उपयोग शुरू नहीं करेंगे.

बाजार द्वारा जो कुछ भी हमें बेचा जाता है, हम उसका उपभोग [ consumption ] कर रहे हैं.

_हमने यह निर्णय लेने की जागरूकता खो दी है कि वास्तव में क्या आवश्यक है और क्या नहीं !!
चीजों से हो रही है पहचान आदमी की, औकात अब हमारी बाजार लिख रहे हैं !!
जब ज़िंदगी से ज्यादा कीमत सामान की हो, तो समझो इंसान बाज़ार का गुलाम बन चुका है.!!
चीजें तब तक ही आकर्षित करती हैं, जब तक वो हमारी नहीं हो जातीं..!!
कोई ऐसा प्रोडक्ट न खरीदें, जो खरीदते समय सस्ता/अच्छा लगता है ;

_परन्तु उसका मूल्य चुकाते चुकाते सदियां निकल जाती हैं..!!

जरूरतों [needs] को देखने के लिए अपनी आंखों का उपयोग करें..

..और उन्हें पूरा करने के लिए अपनी प्रतिभा [talents] का उपयोग करें.

हर चीज़ को तुरंत खरीदना जरूरी नहीं है ;
_ खरीदने से पहले कुछ समय लेना बेहतर है.!!
इच्छाओं और जरूरतों के बीच अंतर को समझने से..

_हम अनावश्यक बोझ से मुक्त हो जाते हैं.!!

कर्ज में विलासितापूर्ण ढंग से रहने की तुलना में बजट के तहत सस्ते में जीवन जीना बेहतर है.

It’s better to live cheap under budget than luxuriously in debt.

जिंदगी में हम अपने ऊपर बहुत सारा बोझ लेकर चलते हैं, जो हमें बहुत जरूरी लगता है..

..लेकिन असल में वो जरा सा भी जरूरी नहीं होता..!!

जितनी अधिक हम चीजों की कदर करते हैं, उतनी ही कम हम खुद की कदर करते हैं.
The more we value things, the less we value ourselves.
कर्ज में मज़े लेने का कोई फायदा नहीं, जितना है उतने में आनंद करें.
हम सभी गहराई से जानते हैं, कि डिपार्टमेंटल स्टोर या मॉल में खुशी नहीं खरीदी जा सकती है ;
_ हमें सिर्फ इतनी बार झूठ कहा गया है कि _ हम उस पर विश्वास करने लगते हैं.
—— लेकिन क्या होगा अगर, वास्तव में, न्यूनतम जीवन जीने और जानबूझकर कम में जीने में _वास्तव में अधिक आनंद है ?
_ दूसरे शब्दों में, न्यूनतम जीवन _जीवन को बदलने वाला और जीवन देने वाला _अहसास होगा.
“आप अपना घर उन चीजों से नहीं भरें, जिनकी आपको आवश्यकता नहीं है..”

— क्या कम सामन होने से घर खाली या उबाऊ लगने लगेगा ???
–सरल का मतलब ..उबाऊ नहीं है ; सामने है सच..
_ _ कम गंदगी के साथ, आपका घर अधिक शांतिपूर्ण बन सकता है.
_ ये व्यवस्था आपकी समस्या को हमेशा के लिए हल कर देगी.
_ आप का घर आपके लिए तनाव के स्रोत के बजाय _ आराम का स्थान होगा..!!
यदि आप अच्छी क्वालिटी वाली वस्तुएँ खरीदते हैं, तो वे एक ही काफी हैं,

_क्योंकि उनमें शायद ही कुछ सुधार करना होता है.!!
_अच्छी क्वालिटी वाली वस्तुएँ की सावधानी से देखभाल की जाए, तो अपग्रेड करने की आवश्यकता के बिना वर्षों तक अच्छी तरह से काम चला सकते हैं.
_ हमारे रहने की जगह में ‘कम चीज़ें’ रखने से _हमें अधिक महत्वपूर्ण चीज़ों पर खर्च करने के लिए अधिक समय मिलता है.
हमारे पास कपड़ों से भरी अलमारी और हमारी ज़रूरत से ज़्यादा क्यों है ? क्या यह इसलिए है _ क्योंकि हम उन सभी से प्यार करते हैं या इसलिए कि हमें इतने सारे शर्ट या जूते चाहिए ? नही बिल्कुल नही..
_हम उन्हें खरीदते हैं _क्योंकि हम बदलते फैशन के साथ बने रहने की कोशिश कर रहे हैं – वही बदलती शैली जो फैशन उद्योग हमें बताता है कि हमें शैली में बने रहने की आवश्यकता है.
इसी तरह, जब हम अपने बाकी सामन को देखते हैं, तो जो हमारे अलमारियों को अस्त-व्यस्त कर देते हैं ; _ हमारे पास क्यों है ?
क्योंकि हम उनसे प्यार करते हैं और वे हमारे जीवन की कहानी कहते हैं ?
इसके बजाय, क्योंकि वे बिक रहे थे और हमनें उन्हें ख़रीदा, वे सोफे से मेल खाते थे, या अंतर्मन को कुछ चाहिए था.!!
प्रत्येक मामले में, हम चीजें खरीदते हैं और उन्हें रखते हैं, इसलिए नहीं कि वे हमारे जीवन को लाभ पहुंचाते हैं, बल्कि किसी अन्य उद्देश्य के लिए..
उन चीजों को न खरीदें, जिनकी आपको आवश्यकता नहीं है…ताकि आप वह जीवन जीना शुरू कर सकें जो आप चाहते हैं.!!
ऐसा लगता है कि हमारी पूरी व्यवस्था लोगों को, उनके पास जो कुछ है _उससे असंतुष्ट महसूस कराने पर तुली हुई है ;
_ और कोई भी सावधानीपूर्वक और समझदारीपूर्वक जीवन जीने को तैयार नहीं है.!!
मैं अक्सर अपने आप से एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछता हूं, “अधिक लोग सरल और न्यूनतम जीवन की ओर आकर्षित क्यों नहीं होते ?”

_हमारी ज़रूरत की चीज़ों के मालिक होने के सभी फ़ायदों को देखते हुए, कोई भी उन चीज़ों का पूरा मालिक होना क्यों चाहेगा _ जिनकी उन्हें ज़रूरत नहीं है ?
_ मैं श्रेष्ठता, घमंड या नैतिकता के भाव से प्रश्न नहीं पूछता। मेरे लिए, यह एक व्यक्तिगत प्रश्न है _ जिससे मैं जूझता रहता हूँ।
_वह चीजें जिसकी मुझे आवश्यकता नहीं थी ? मैंने यह सब क्यों खरीदा ?”
हम सबसे पहले वह चीज़ें क्यों खरीदते हैं, _ जिनकी हमें ज़रूरत नहीं है ? लेकिन हम पूरी तरह दोषी नहीं हैं. बाहरी दुनिया हमारे खिलाफ साजिश रचती है।
प्रत्येक मामले में, हमें “अपनी आवश्यकता से अधिक की इच्छा करने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है” _क्योंकि इससे उन्हें पैसा मिलता है.
_ हम यह उम्मीद करने लगे हैं कि जीवन का यह तरीका सामान्य है और जीवन कैसे जीना चाहिए ?
बस यही तो जिंदगी है… जरूरत से ज्यादा चाहना और खरीदना… सही है ?
लेकिन कोई गलती न करें. हमें धोखा दिया जा रहा है. _ हमें ऐसे वादे बेचे जा रहे हैं _ जिन्हें खुदरा विक्रेता और निर्माता कभी पूरा नहीं कर सकते।
_ उनका बाहरी हेरफेर हमारी आंतरिक असुरक्षा को आकर्षित करता है _और हमें ज़रूरत से ज़्यादा पीछा करने, खरीदने और संचय करने के लिए मजबूर करता है।
तो हम इस हेरफेर पर कैसे काबू पाएं ?
काश यह एक आसान उत्तर होता, लेकिन मैंने पाया कि ऐसा नहीं है।
हेरफेर पर काबू पाने के लिए निरंतर सतर्कता की आवश्यकता होती है। लेकिन इसे पूरा करने के लिए हम यहां कुछ महत्वपूर्ण कदम उठा सकते हैं:–>
1. पहचानें कि हमारे चारों ओर स्वार्थी प्रेरणाएँ हैं.
हर कंपनी और हर विज्ञापन हमारे भले के लिए नहीं है। वे सिर्फ अपने लाभ के लिए हैं।
2. कंपनियों के हेरफेर को देखने के लिए काम करें.
अधिकांश विज्ञापन हमारी अवचेतन इच्छाओं (स्थिति, लिंग, प्रतिष्ठा, खुशी, उपस्थिति, आत्म-सम्मान, पहचान, या प्रतिष्ठा) और भय (अकेलापन, सुरक्षा, कमजोरियां, अनिश्चितता) को आकर्षित करते हैं।
_उनकी रणनीति से अवगत रहें _ताकि आप इससे मूर्ख न बनें.
_ याद रखें कि खुशियाँ खरीदी नहीं जा सकतीं.
3. हमारे जीवन की सीमित प्रकृति का सम्मान करें।
सारा जीवन सीमित है – हमारा समय, हमारा पैसा, हमारी ऊर्जा। इस वजह से, यह सीखना अविश्वसनीय रूप से महत्वपूर्ण है कि _हमें अपना ध्यान कहाँ रखना है.
4. चीजें उनकी उपयोगिता के लिए खरीदें, हैसियत के लिए नहीं।
वस्तुएं आपकी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता के आधार पर खरीदें, न कि लोगों को प्रभावित करने के लिए ;
इस सिद्धांत को हर जगह लागू करें- आपका घर, आपकी कार और आपके कपड़े सभी शुरुआत करने के लिए बेहतरीन जगह हैं।
आपको हर किसी की तरह जीने की ज़रूरत नहीं है। वास्तव में, यदि आप ऐसा नहीं करेंगे _तो संभवतः आप अधिक खुश रहेंगे।
5. खुद को याद दिलाएं कि जीवन में और भी बड़े लक्ष्य हैं।
हम अपने पैसे से हमेशा ऐसी चीजें भी खरीद लेते हैं जिनकी हमें जरूरत नहीं है।
हमारा पैसा उतना ही मूल्यवान है _जितना हम इसे जिस पर खर्च करना चुनते हैं।
_इसे सोच-समझकर खर्च करें.
हम चीजों के खोने पर रोते हैं क्योंकि उनकी कीमत होती है;

_ लेकिन क्या हम जीवन की हानि पर भी रोते हैं,
_ [ जीवनयापन ] जीने का खर्च बहुत ज्यादा है,, और हमने इसकी कीमत चुकाने से इनकार कर दिया है..!!
_ काश, हम सब की ज़िन्दगी रोचक होती !
_ हम सब मज़े से जीना चाहते हैं.. लेकिन आस-पास के हालात हमारी चमड़ी उधेड़ते रहते हैं.. और हम अपने बदन को छिला हुआ देखकर भी.. यह नहीं तय कर पाते कि इस पर हंसें या रोएँ !
“मुश्किलों का सामना करने के दो तरीके हैं ;
_ आप कठिनाइयों को बदल देते हैं या उनका सामना करने के लिए खुद को बदल लेते हैं.”
हमारे पास कपड़ों की इतनी अलग-अलग वस्तुएं और हमारी ज़रूरत से कहीं ज़्यादा चीज़ें क्यों हैं ?

_ क्या ऐसा इसलिए है _क्योंकि हम उन सभी से प्यार करते हैं _ या हमें इतनी सारी शर्ट या जूते की ज़रूरत है ?
_ नहीं, हम उन्हें खरीदते हैं _क्योंकि हम बदलते फैशन के साथ बने रहने की कोशिश कर रहे हैं,
– वही बदलती शैलियाँ जिनके बारे में फैशन उद्योग ने हमें बताया था कि _हमें स्टाइल में बने रहने की जरूरत है.
_ हर बार, हम अपने आप को उस चीज़ की चाहत में पाते हैं _जो वर्तमान में हमारे पास नहीं है ;
_ हम उस पर केंद्रित हो जाते हैं जो हमारे पास नहीं है, और जो अच्छाई हम में पहले से ही है, __ उस पर से अपना ध्यान खो देते हैं.
_ यदि, मनुष्य के रूप में, हम मानते हैं कि केवल कुछ नया प्राप्त करके उच्च स्तर की खुशी पाई जा सकती है, तो हम हमेशा निराश होंगे.
_ हमारी आंतरिक आवाज़ इस तरह कभी संतुष्ट नहीं होगी.
_ कोई भी चीज़ कभी भी पर्याप्त अच्छी नहीं होती…. क्योंकि हमारे अंदर लगातार असंतोष भड़कता रहता है.
_ इस प्रकार आंतरिक और बाह्य दोनों ही दृष्टियों से हमारे हृदय, मन और आत्मा में निरन्तर असन्तोष भड़कता रहता है।
_ इस असंतोष के परिणामस्वरूप क्या होता है कि _ हम जल्दी ही अपने आस-पास की और अपनी अच्छाइयों को नज़रअंदाज कर देते हैं.
बेवजह की शाप्पिंग भी एक ट्रेंड बन गया है.

_ जब करने को कुछ न हो तो ‘चलो शाप्पिंग’ करते हुए निकल जाना कितना अजीब लगता है न.
_ आज बोर हो रहे हैं – चलो शाप्पिंग !
_ गर्मी बहुत है – चलो शाप्पिंग !
_ मेहमान आये हैं – चलो शाप्पिंग !
_ शाप्पिंग तो कम की मगर विंडो शाप्पिंग खूब की.
_ उपर वाला जब जरूरत से ज्यादा दे तो कहीं तो खपाना होता है.
_ जब खरीदना ही नहीं था तो शोरूम बन्द होने तक रुके रहने वाले विंडो शापर भी देखे होंगे.
_ वापसी में लालबत्ती चौक पर भीख मांगते गरीब के लिये कुछ नहीं था सिवाय झिड़की और गाली के !
-Tejbeer Singh Sadher

सुविचार – Result, रिजल्ट, परिणाम, नतीजा, प्रभाव, प्रतिफल, अंतिम परिणाम, अन्त – 075

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परिणाम जो भी हो, पर प्रयास,,,,, _ लाजवाब होना चाहिए ..
परिणाम बेकार ही सही, _ प्रयास सफ़ल होने चाहिए…!!!
हम प्रयास के लिए उत्तरदायी हैं, _ न कि परिणाम के लिए.
परिणाम…

कोई भी काम करने के पूर्व उसके परिणाम पर विचार अवश्य करें , फिर उस कार्य को शुरू करें, कहा भी है की बिना विचारे जो करे वो पाछे पछताए, यानी परिणाम के बारे में सोचे बिना किया गया कार्य अंत में पछताने पर मजबूर कर ही देता है !!!

हम जो कुछ भी हैं, वो हमने आज तक क्या सोचा इस बात का परिणाम है. यदि कोई व्यक्ति बुरी सोच के साथ बोलता या काम करता है, तो उसे कष्ट ही मिलता है.

यदि कोई व्यक्ति शुद्ध विचारों के साथ बोलता या काम करता है, तो उसकी परछाई की तरह ख़ुशी उसका साथ नहीं छोड़ती.

हमारी ज़िन्दगी में अच्छे या बुरे जो भी परिणाम आते हैं, _ वे हमारे विचारों का ही प्रतिफल होते हैं.

अच्छा हो या बुरा, नतीजा बाद में आता है, लेकिन आपकी मेहनत दिल से हो, तो मन हमेशा संतुष्ट रहता है.!!
यह सही है कि कभी- कभी आपके किसी निर्णय का परिणाम आपको तत्काल न मिले,

लेकिन हमेशा याद रखें, देर सबेर ही सही, यदि आपने अपने दृष्टिकोण से सही निर्णय लिया है तो

कोई वजह नहीं कि आपका फैसला आपको अच्छा परिणाम न दे.

परिणाम हमारी इच्छा के अनुसार नहीं मिलता है, _ परिणाम हमारी मेहनत के आधार पर मिलता है !!
वे लोग कभी सफल नहीं हो सकते, जो परिणाम से ज्यादा काम में आने वाली मुश्किलों के बारे में सोचते हैं.
अच्छी व्यवस्था, अच्छे परिणाम तभी हासिल कर सकती है, जब उसे संचालित करने वाला अच्छा हो.
खाली बैठना बहुत अच्छा लगता है, पर उसका परिणाम कभी अच्छा नहीं होता,
उतावले उत्साह से बड़ा परिणाम निकलने की आशा नहीं रखनी चाहिए.
लाख छुपाओ अपने कर्मों का फल, _ परिणाम सारा भेद खोल देता है.

_ आप सब कुछ करने के लिए आज़ाद हो.. लेकिन अपने किए का परिणाम चुनने के लिए आज़ाद नहीं हो.!!
गरीबी और समृद्धि दोनों विचार का परिणाम है…
कभी हार नहीं मानना चाहिए. _ अगर आप हार नहीं मानेंगे और कोशिश करते रहेंगे _

_तब चौंकाने वाले परिणाम सामने आएँगे.

सुलझा हुआ मनुष्य वह है, जो अपने “निर्णय” स्वयं करता है,

और उन “निर्णयो” के “परिणाम” के लिए किसी “दूसरे” को “दोष” नहीं देता.

मेहनत बताती है कि परिणाम कैसा होगा,

वरना परिणाम तो बता ही देगा की _ मेहनत कैसी थी..

परिणाम बता देते हैं कि आपकी सोच कैसी रही होगी,

क्योंकि आप वही कहते और करते हो, जैसा आप सोचते हो..

महान परिणाम तत्काल प्राप्त नहीं होते,

इसलिए हमें कदम- दर- कदम बढ़ते जाने में सन्तोष मानना चाहिए.

लोग आपकी बातों का यकीन तब तक नहीं करेंगे,

जब तक आपके परिणाम उन्हें हिला नहीं देते..

जहां अकारण अत्यंत सत्कार हो,

वहां परिणाम में दुख की आशंका करनी ही चाहिए.

हां ! ऐसी भी परिस्थितियां आयेंगी जब आप सब कुछ सही कर रहे होंगे, उसके बाद भी परिणाम आपके हक़ में नहीं आएगा…

_ और ये दौर ही आपको सरल, सुलझा हुआ और संयमी इंसान बनने को मजबूर करेगा…
_ क्योंकि तब आपको समझ आ जाएगा कि,
“जीवन केवल कुछ ‘पा’ लेने के बारे में नहीं, बल्कि कैसे ‘कुछ न पा पाने के बाद भी लगे रहना है इस बारे में है”..!!

सुविचार – किराएदार – किराया – Rent – 074

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जो कमाता हूँ, किराए में दे आता हूँ, मैं किराएदार हूँ।

हर बार सोचता पैसे बचाने की, बचा नहीं पाता हूँ, मैं किराएदार हूँ॥
जो कमाता हूँ, किराए में दे आता हूँ, मैं किराएदार हूँ।
इनकम बढ़ती नहीं है मेरी, किराया बढ़ता जा रहा है,
हम कभी उठ नहीं सकते, दुनियां में किराया खा रहा है,
महीने भर की कमाई जाकर, मकान मालिक को चढाता हूं, मैं किराएदार हूँ॥
हर बार सोचता पैसे बचाने की, बचा नहीं पाता हूँ, मैं किराएदार हूँ॥
जो कमाता हूँ, किराए में दे आता हूँ, मैं किराएदार हूँ।
कुछ सपने पूरे करूँगा अपने, सोचकर दिन रात कमा रहा हूँ,
सुबह घर से निकलता हूँ, दिन भर मेहनत करता, रात को लौट के आ रहा हूँ,
सब खर्च हो जाता है, मैं कुछ भी नहीं बचाता हूँ, मैं किराएदार हूँ,
हर बार सोचता पैसे बचाने की, बचा नहीं पाता हूँ, मैं किराएदार हूँ॥
जो कमाता हूँ, किराए में दे आता हूँ, मैं किराएदार हूँ।
कभी खाने-पीने की चिंता, कभी कोई सामान लाना है,
फिर कमा कमा कर मकान मालिक को, हर महीने दान चढ़ाना है,
पैसे मकान मालिक को देकर, अपनों का पेट भर कर, खुद भूखा सो जाता हूँ,
मैं किराएदार हूं॥
हर बार सोचता पैसे बचाने की, बचा नहीं पाता हूँ, मैं किराएदार हूँ॥
जो कमाता हूँ, किराए में दे आता हूँ, मैं किराएदार हूँ।
— Mahesh Chalia
आज हमारा नाम लगा है, कल किसी और का होगा,
_किरायों के मकान से इश्क़ कैसा ?
_ हर महीने किराया दे कर रहने में कोई प्रॉब्लम नहीं है.
_ अपना मकान न होने से उसके मेंटेनेंस और टूट फूट की आपको चिंता नहीं.
_ भूकंप आ जाय और पूरा मकान गिर जाय तो आपको क्या चिंता होनी है ? आपका तो है ही नहीं.!!
किराए का घर बदलने पर

सिर्फ़ एक किराए का घर नहीं छूटता
उसके साथ एक किराने की दुकान भी छूट जाती है
कुछ भले पड़ोसी छूट जाते हैं
कुछ पेड़
कुछ पखेरू
एक सब्ज़ी की दुकान भी छूट जाती है
उन्हीं के पास
छूट जाते हैं
चाय के अड्डे
वहाँ की धूप-हवा-पानी
कुछ ठेले और खोमचे
वहीं छूट जाते हैं
जिन सड़कों पर सुबह-शाम चलते थे
अचानक उनका साथ छूट जाता है
हमारे लिए एक साथ कितना कुछ छूट जाता है
और उन सबके लिए
बस एक अकेला मैं छूटता होऊँगा
– संदीप तिवारी

सुविचार – समाज – सोसायटी – सोसाइटी – Society – Social – 073

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“समाज हमारी ताकत है”

_ समाज का अर्थ होता हैं, एक दूसरे को मदद करने वाले लोगों का समूह,
_ अगर मनुष्य एक दूसरे को समझ कर, एक दूसरे की सहायता करके, जीते हैं तो..
_ वह समाज हमारे लिए ताकत बन जाता है.
__ पर अभी हमने समाज के नाम पर कुछ और ही बना रखा है..
जिस समाज में हम रहते हैं, वह हमसे और आपसे ही बनता है, ऐसे में अगर समाज को बदलना या फिर उसमें नये विचारों को शामिल करना है तो, इसकी पहल हमें खुद करनी होगी.
“समाज की परवाह न करना तभी ठीक है जब हम इतने स्पष्ट और सक्षम हों कि अपना रास्ता खुद बना सकें — वरना सामाजिक नियमों से हटकर चलने वालों को समाज जीने नहीं देता.”
अगर कोई मुसीबत में है, तो आपको अपनी शांति की कीमत पर भी उसकी परवाह करनी होगी. अपने लिए जीना एक स्वार्थी जीवन शैली है.

If someone is in distress, you have to care even at the cost of your peace. Living for yourself is a selfish way of life.

समाज में लोगों की आदत होती है कि वे बुराइयों पर ज्यादा ध्यान देते हैं.

__ कुछ लोगों में इतनी कुंठा भरी होती है कि वे किसी के भी गुणों की चर्चा नहीं करते है, केवल आलोचना करते हैं.
__ किसी की अच्छाईयों की सराहना करें तो सामने वाले को नई ऊर्जा मिल जाती है,
_बस नजरिया बदलने की जरुरत है.
हम जिस समाज में रहते हैं वहां सिर्फ परफेक्ट लोगों के साथ संबंध रखना बुद्धिमानी नहीं है, क्योंकि हर आदमी में कुछ न कुछ कमी जरूर रहती है. _

_ हमें दूसरों की कमियों को स्वीकार करते हुए उनके भीतर की अच्छाइयों के लिए तारीफ कर अपने दोस्तों- संबंधियों का दायरा बढ़ाना चाहिए.

हम सामाजिक रूप से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिए तो..

_ कुछ लोग होते हैं ..जिनके चले जाने पर अनजाना गम छा जाता है,
_ बिना कोई जान पहचान हुए, बिना कोई व्यक्तिगत भाव हुए भी…
_ यह दिखाता है कि हम एक दूसरे से कितना जुड़े हुए हैं, संवेदना के तल पर…
_ यह कहना कि किसी का किसी पर क्या फ़र्क पड़ता है गलत साबित होता है…
_ फर्क पड़ता है…बिल्कुल पड़ता है एक दूसरे का…
_ जो ऊपर से नहीं जुड़े वो कहीं न कहीं जुड़े हैं…अदृश्यता में…जीवन बोध में…
रूढ़िवादी विचारधारा एक दिन में नहीं बदली जा सकती.

_ न ही नई वैज्ञानिक विचारधारा कोई ऐसी चीज है, जिसे दूसरों पर जबरदस्ती थोप सकें.
_ वह तो धीरेधीरे किंतु दृढ़ता से विकसित हो रही है और हमारे परिवार और समाज का ढांचा बदलती जा रही है.
_ इसलिए हमें सिर्फ अपने विचारों की चिंता करनी चाहिए कि वे कहाँ तक रूढ़िवाद से मुक्त हो सके हैं और कहाँ तक नए वैज्ञानिक विचारों को ग्रहण कर रहे हैं.
समाज में निःस्वार्थ व्यक्ति कोयले के ढेर में हीरे की तरह है.

_ ऐसे व्यक्ति की पहचान, प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता स्वतः अलग हो जाती है.
_ ऐसा व्यक्ति हर किसी के लिए प्रिय होता है.
_ निःस्वार्थता एक उत्कृष्ट गुण है.
_ अपनी दया और करुणा को यदि निःस्वार्थता से जोड़ दिया जाए, तो आप का व्यक्तित्व दो गुना निखर जाएगा.
_ निःस्वार्थता की भावना को बढ़ाने से आप में अपनाने की छमता बढ़ती रहेगी.
_ कभी भी जीवन में किसी को धोखा देने के बारे में न सोचें,
_ क्योंकि ऐसा करने से आप को चंद मिनटों का आनंद तो मिल सकता है,
_ लेकिन भविष्य में आप को जिंदगीभर का दुख भी मिल सकता है.
_ इसलिए अपने अंदर निःस्वार्थता की भावना को विकसित करें.
_ ऐसा करने से आप के व्यक्तित्व में चमत्कारिक बदलाव होगा.
हर उम्र में हम दो जीवन जीते हैं एक अपनों के लिए, एक समाज के लिए,

_ अब आप तय करें कि आप किस को लगातार जीना चाहते हैं.
_ क्योंकि ज्यादातर लोग लगातार सामाजिक जीवन जीते हैं और दूसरे को तदनुसार बदल देते हैं, लेकिन यह इसके विपरीत होना चाहिए.
_ आप किस के साथ स्थिर रहने के लिए चुनेंगे ?
हमारे मन में बचपन से ही यह डर बैठा दिया जाता है कि हम समाज के बिना अधूरे हैं, कि अकेले रहना कमजोरी है.

_ हमें सिखाया जाता है कि ज़िंदगी तभी सही है जब उसके गवाह हों, जब हर उम्र में कोई साथ चलने वाला हो..
_ धीरे-धीरे यह बात इतनी गहरी उतर जाती है कि हम अपने ही साथ रहना भूल जाते हैं.!
_ हम भीड़ में सुरक्षित महसूस करने लगते हैं, पर अपने साथ बैठना भूल जाते हैं.
_ अकेलापन नहीं डराता..- अपने ही भीतर से सामना डराता है.
_ समस्या अकेले रहने में नहीं है, समस्या यह मान लेने में है कि हम अपने लिए पर्याप्त नहीं हैं.
_ समाज ने हमें साथ रहने का हुनर सिखाया, पर खुद के साथ रहने की कला नहीं.!!
एक समाज जो इलाज को गुप्त रखता है ताकि वे भारी मुनाफे के लिए दवा बेचना जारी रख सकें, वह वास्तविक समाज नहीं बल्कि एक विशाल पागलखाना है.

A society that keeps cures a secret so they can continue to sell medication for huge profits is not a real soceity but a huge mental asylum.

समाज इतना नकली हो गया है कि सच्चे लोगों को परेशान कर देता है.

Soceity has become so fake that the truth actually bothers people.

हम वास्तव में एक सड़े हुए समाज में जी रहे हैं.. जहाँ सिर्फ़ झूठा सच, धोका और नफ़रत है.!!

_ संस्कृति की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह हमें कुछ निश्चित विचारों में कैद कर देती है.!!

चुप रहना ही सिखाती है सोसाइटी हमारी..

_बस सहे जाओ किसी को बताओ नहीं.!!
“समाज बनाने का गुमान रखना आसान है.

_ मनोरंजन और भोज में भीड़ तो हर कोई इकट्ठा कर लेता है…
_ सच्ची परीक्षा तो तब है —
_ जब आप विज्ञान, पुस्तक, चिंतन के नाम पर दस-बीस मन भी साथ नहीं जोड़ पाते.”
_ पर असली समाज वही बनाता है,, जो विचार, पुस्तक, और चिंतन के नाम पर
कुछ गिने-चुने सच्चे खोजियों को जोड़ पाए.”
कोई कितना भी डेवलप या मॉर्डन हो जाए लेकिन सामाजिक दृष्टिकोण से संकीर्णता के मामले में उबर जाने में अभी और वक्त लगेगा.
दूसरे के पैसों पर समाज सेवा करने का फैशन बहुत बढ़ गया है,
_ जबकि वास्तविक सेवा अपनी पसीने की कमाई का अंश लोगों की मदद में खर्च करना है.!!
— वह जमाना कुछ और था, जो आदेश मिला, चुपचाप मान लिया, जिससे विवाह हुआ, निभा लिया, जो परोस दिया गया वह खुश होकर खा लिया;

_वह वक्त जैसे अब न रहा..
_अब सवाल पर सवाल हैं, मुंहतोड़ जवाब है, गुणा-भाग है, चतुराई है और सबसे ऊपर ‘मेरी मर्जी’
_परिवर्तन शाश्वत है, हर पल आधुनिक समय होता है.
_समय के अनुरूप सोच और रुझान बदलते रहते हैं,
_रिश्तों की गर्माहट में भी परिवर्तन आता है _किन्तु लोग स्वयं को इस तरह स्वकेन्द्रित कर लेंगे तो _सामाजिक निर्वाह की भावना कैसे बचेगी ?
_आश्चर्य यह है कि _व्यवहार के तरीके बदल गए _लेकिन मनुष्य की अनुभूतियाँ यथावत हैं,
_उस समय भी लोग दुखी थे और आज भी दुखी हैं.
ज़िंदा लाश बन जाओ ; कोई भी बात कितनी ही गलत क्यों न हो, बस मौन रहकर हाँ में हाँ मिलाने लग जाओ.

_ अपनी राय, अपने सपने और अपनी इच्छाएँ मत बताओ और कुछ नया या अपनी इच्छानुसार करने की भी मत सोचो, बल्कि बस वही करो जो दुनिया, समाज और घर वाले करने को कह रहे हैं.
_ यक़ीन मानो, आप अपने घर और समाज के सबसे अच्छे और संस्कारी बच्चे कहलाओगे.!!
– Mayank Mishra
जब हम किसी से कुछ उम्मीद करते हैं, तो अक्सर हम निराश होने की संभावना में होते हैं.

_ इसलिए किसी से कुछ भी उम्मीद न करें, जो कुछ भी मिला है उसके लिए आभारी रहें.
– प्रकृति से जुड़ी हर चीज उसका सम्मान करती है और उसकी सबसे ज्यादा परवाह करती है.
– जो कुछ भी प्यार, देखभाल और करुणा के साथ किया जाता है, वह बहुत आगे तक जाता है और यह कई गुना और परिमाण में आता है.
– अगर कोई आपको कुछ नहीं देता है और आपको किसी चीज की सख्त जरूरत है, तो उसकी मदद करें और वह आपके बिना पूछे ही आपकी मदद करेगा.
-अपने आप पर विश्वास करें जैसे कि आप केवल खुद पर विश्वास नहीं करते हैं कि कौन करेगा.
_ हर कोई अपने आयाम में अद्वितीय है,
_ उनके मार्ग में व्यापक अनुभव है, _इसपर विश्वास करो.
_ एक इंद्रधनुष में सात रंग होते हैं,
_ मनुष्यों के पास लाखों और करोड़ों रंग होते हैं _जो विभिन्न प्रकार के लोगों के विभिन्न रंगों से भरे रंगीन जीवन जीने के लिए वास्तव में आवश्यक हैं.
– समाज को कुछ देना शुरू करें
_जैसे कि जब हम कमजोर होने के लिए पैदा हुए हैं और खुद से पूछें कि क्या आप कपड़े का एक टुकड़ा या एक कील भी लाए हैं.
_ नहीं, यह परोक्ष रूप से आपको प्रकृति द्वारा दिया गया है और आप कुछ भी वापस भुगतान नहीं कर सकते हैं बस आप उत्पादन कम कर सकते हैं.
– प्रोत्साहित करने की तुलना में हंसना आसान है और हां मानवता का द्रव्यमान भी ऐसा ही करता है.
_ यदि आप मदद नहीं कर सकते हैं तो उस व्यक्ति और उसके विचारों को अवमानना ​​में न डालें,
_ क्योंकि यह आपके प्रोग्राम किए गए दिमाग के अनुरूप नहीं है, सरल !
– अंत में, चीजों को आसान बनाएं, जीवन आसान है हम इंसान इसे जितना जटिल बना रहे हैं उतना ही जटिल बना रहे हैं.
_ नौकरी के लिए डिग्री की आवश्यकता हो सकती है
_ लेकिन जीवन में पास होने के लिए अनुभवों से सीखने के अलावा कोई डिग्री नहीं है.
— रोहन अग्रवाल [ Hiker ]
मैं खुदको Anti-social नहीं– Selective social मानता हूँ।

_ सबसे घुलना-मिलना ज़रूरी नहीं– हर बातचीत meaningful नहीं–
_ कुछ दुनिया को सिर्फ Black & white में देखते हैं।🔲
_ कुछ सुनते ही reject करते हैं— हमेशा से ऐसा ही होता आया है।
या ये सब फालतू है।
_ बिना समझे जज करना– बिना सोचे criticize करना, बिना जाने opinion बना लेना— Dramebazi इनकी आदत है।
_ कुछ लोग ऐसे भी होते हैं— Argument खत्म हो जाए, तो आवाज़ loud कर लेते हैं।📢
_ Dialogue नहीं, monologue करते हैं। पूरा स्पेस occupy कर लेते हैं।
_ सच कहूँ तो— loud + small-minded👽 एक Dangerous Combination है।
_मैं Anti-social नहीं–❌ बस high-quality✔️Interactions पसंद करता हूँ।
_ मैं Tolerate करने से ज़्यादा choose करना पसंद करता हूँ।
_ लोग कहते हैं— बददिमाग है। मुंहफट है।☹️
_ हाँ, हूँ– मैं चुप रहकर भीतर सड़ना नहीं चाहता।😐
_ मैं बस अपनी energy बचाता हूँ।
_ मैं बस अपनी सीमाएँ तय करता हूँ।
_ सच यह है—👈 मुझे भीड़ नहीं, संवाद चाहिए।
_ मुझे शोर नहीं, समझ चाहिए।
_ और जहाँ ये नहीं मिलता— वहाँ मैं दूसरों को नहीं, खुद को चुन लेता हूँ।🌷
– Yu Hi
एक लाइन है जो उम्र के साथ धीरे-धीरे समझ आती है, खासकर तब, जब इंसान 40-45 के पार निकल जाता है.

_ ऑर्थर शॉपनहॉवर ने कहा था, इंसान तब तक ही खुद रह सकता है, जब तक वो अकेला है.
_ सुनने में ये बात थोड़ी कठोर लगती है, लेकिन जिसने ज़िंदगी जी है, लोगों के बीच रहा है, रिश्तों को निभाया है, वो जानता है कि इसमें कितनी सच्चाई छिपी है.
_ शुरुआत में हमें लोगों के साथ रहना अच्छा लगता है, दोस्त, बातें, हंसी, मेल-जोल.
_ लेकिन धीरे-धीरे एहसास होने लगता है कि हर बातचीत में, हर रिश्ते में, हमें थोड़ा-थोड़ा खुद को रोकना पड़ता है.
_ कहीं अपनी बात नरम करनी पड़ती है, कहीं अपनी सच्चाई छुपानी पड़ती है, कहीं सिर्फ इसलिए हँसना पड़ता है ताकि माहौल खराब ना हो.
_ और ये जो छोटे-छोटे समझौते हैं, यही धीरे-धीरे हमें थका देते हैं.
_ समाज बुरा नहीं है, लेकिन समाज चलता ही समझौतों पर है.
_ अगर आप बिल्कुल वैसे ही रहेंगे जैसे आप हैं, तो टकराव होगा.
_ इसलिए हम अपने असली विचार, अपनी असली भावनाएँ, अपने असली रूप को थोड़ा-थोड़ा दबाते जाते हैं.
_ और एक दिन ऐसा आता है जब हम खुद से ही दूर हो जाते हैं.
_ हम “लोगों के बीच ठीक” तो दिखते हैं, लेकिन अंदर से खाली होने लगते हैं.
_ सबसे खतरनाक बात ये है कि ये सब बहुत चुपचाप होता है.
_ आपको लगेगा कि आप बस “एडजस्ट” कर रहे हैं.
_ लेकिन सच में आप खुद को छोटा कर रहे होते हैं, फिट होने के लिए.
_ धीरे-धीरे आपकी सोच की धार कम हो जाती है, आपकी अलग पहचान घुल जाती है. _ और आप भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं, बिना ये समझे कि आपने क्या खो दिया.
_ कोई इंसान जितना भीतर से गहरा होता है, उतना ही उसे समाज भारी लगता है.
_ क्योंकि जिसके अंदर बहुत कुछ चल रहा होता है, उसे हर वक्त खुद को रोकना पड़ता है.
_ उसकी हर बात, हर सोच “ज्यादा” लगती है दूसरों को.
_ और फिर वो या तो चुप हो जाता है… या खुद को बदल लेता है.
_ धीरे-धीरे इंसान एक अजीब सी हालत में पहुँच जाता है… जहाँ वो लोगों के बीच रहकर भी अकेला होता है, और अकेले रहकर थोड़ा सुकून महसूस करता है.
_ क्योंकि अकेले में उसे कुछ छुपाना नहीं पड़ता, कुछ निभाना नहीं पड़ता.
_ वो जैसा है, वैसा रह सकता है.
_ लेकिन हम अकेले रहने से डरते क्यों हैं ?
_ क्योंकि हमें अपने ही दिमाग की खामोशी से डर लगता है.
_ जब बाहर शोर नहीं होता, तब अंदर की आवाज़ें साफ सुनाई देती हैं, और हर कोई उन आवाज़ों का सामना नहीं कर पाता.
_ इसलिए हम खुद को व्यस्त रखते हैं, फोन, बातें, मीटिंग्स, शोर… ताकि हमें खुद से मिलने का मौका ही ना मिले.
_ शोपेनहावर कहते हैं. जिनके अंदर कुछ नहीं होता, वो बाहर ज़्यादा ढूंढते हैं.
_ उन्हें हर वक्त किसी का साथ चाहिए, कोई डिस्ट्रैक्शन चाहिए.
_ लेकिन जिसके अंदर सोच है, गहराई है, वो अकेले में भी पूरा होता है.
_ उसे हर वक्त लोगों की ज़रूरत नहीं होती.
_ समाज एक अजीब खेल खेलता है, वो औसत लोगों को आराम देता है, और गंभीर लोगों को असहज करके रखता है.
_ अगर आप कुछ अलग सोचते हैं, कुछ अलग महसूस करते हैं, तो आपको या तो चुप रहना पड़ेगा, या “अजीब” कहलाना पड़ेगा.
_ इसलिए बहुत से लोग अपनी असली सोच छुपा लेते हैं… सिर्फ फिट होने के लिए.
_ धीरे-धीरे यही आदत बन जाती है, और दिमाग सिकुड़ने लगता है.
_ हम वही बातें करने लगते हैं जो सब करते हैं, वही सोचने लगते हैं जो सब सोचते हैं.
_ और एक दिन हम खुद को खो देते हैं, बिना किसी शोर के.
_ असल में, अकेलापन समस्या नहीं है.
_ बिना खुद के साथ रह पाने की क्षमता ही असली समस्या है.
_ अगर आप अकेले रह सकते हैं, अपने विचारों के साथ सहज रह सकते हैं, तो आप सच में आज़ाद हैं.
_ और अगर नहीं… तो चाहे आप कितनी भी भीड़ में हों, आप भीतर से कमजोर ही रहेंगे.
_ सच तो ये है, हर बार जब आप भीड़ में खुद को दबाते हैं, आप एक कीमत चुकाते हैं.
_ और हर बार जब आप अकेले रहकर खुद को समझते हैं, आप कुछ वापस पा लेते हैं.
– इसलिए शायद ज़िंदगी का असली संतुलन यही है, भीड़ में बेशक रहो, लेकिन खुद को इसके लिए मत खोओ.
– Krishna Chaudhary
समाज का प्रत्येक सदस्य बाकियों की जासूसी करता है और उनके विरुद्ध मुखबिरी करना उसका कर्तव्य है.

_सभी गुलाम हैं और अपनी गुलामी में समान हैं… इसके बारे में सबसे बड़ी बात समानता है… गुलाम समान होने के लिए बाध्य हैं.
Every member of the society spies on the rest, and it is his duty to inform against them. All are slaves and equal in their slavery…
The great thing about it is equality… Slaves are bound to be equal.
– Fyodor Dostoevsky
एक व्यक्ति जो पूरी तरह से अलग-थलग नहीं हुआ है,

_ जो संवेदनशील बना हुआ है और महसूस करने में सक्षम है,
_ जिसने गरिमा की भावना नहीं खोई है, जो अभी तक ‘बिकाऊ’ नहीं है,
_ जो अभी भी दूसरों की पीड़ा सह सकता है,
_ जिसने अर्जित नहीं किया है पूरी तरह से अस्तित्व का तरीका –
_ संक्षेप में, एक व्यक्ति जो एक व्यक्ति बनकर रह गया है और एक वस्तु नहीं बन पाया है
– वह वर्तमान समाज में अकेला, शक्तिहीन, अलग-थलग महसूस करने से बच नहीं सकता है.
A person who has not been completely alienated, who has remained sensitive and able to feel, who has not lost the sense of dignity, who is not yet ‘for sale’, who can still suffer over the suffering of others, who has not acquired fully the having mode of existence – briefly, a person who has remained a person and not become a thing – cannot help feeling lonely, powerless, isolated in present-day society. – Erich Fromm
अधिकांश लोगों का मानना ​​है कि जब तक किसी बाहरी शक्ति द्वारा उन्हें कुछ करने के लिए खुलेआम मजबूर नहीं किया जाता है, तब तक उनके निर्णय उनके हैं,
_ और यदि वे कुछ चाहते हैं, तो वे ही इसे चाहते हैं.
_ लेकिन यह हमारे अपने बारे में मौजूद सबसे बड़े भ्रमों में से एक है.
_ हमारे अधिकांश निर्णय वास्तव में हमारे अपने नहीं होते _ बल्कि हमें बाहर से सुझाए जाते हैं;
_ हम खुद को यह समझाने में सफल हो गए हैं कि यह निर्णय हमने ही लिया है,
_ जबकि हम वास्तव में दूसरों की अपेक्षाओं के अनुरूप हैं, अलगाव के डर से और हमारे जीवन, स्वतंत्रता और आराम के लिए अधिक प्रत्यक्ष खतरों से प्रेरित हैं
Most people are convinced that as long as they are not overtly forced to do something by an outside power, their decisions are theirs, and that if they want something, it is they who want it.
But this is one of the great illusions we have about ourselves.
A great number of our decisions are not really our own but are suggested to us from the outside; we have succeeded in persuading ourselves that it is we who have made the decision, whereas we have actually conformed with expectations of others, driven by the fear of isolation and by more direct threats to our life, freedom, and comfort.
– Erich Fromm
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