मस्त विचार 913
_ लेकिन औरों को गिराने का इरादा कभी नहीं.
_ लेकिन औरों को गिराने का इरादा कभी नहीं.
1. इस ख्याल में रहना कि जवानी और तन्दुरुस्ती हमेशा रहेगी।
2. खुद को दूसरों से बेहतर समझना।
3. अपनी अक्ल को सबसे बढ़कर.समझना।
4. दुश्मन को कमजोर समझना।
5. बीमारी को मामुली समझकर शुरु में इलाज न करना।
6. अपनी राय को मानना और दूसरों के मशवरें को ठुकरा देना।
7. किसी के बारे में मालुम होना फिर भी उसकी चापलुसी में बार-बार आ जाना।
8. बेकारी में आवारा घुमना और रोज़गार की तलाश न करना।
9. अपना राज़ किसी दूसरे को बता कर उससे छुपाए रखने की ताकीद करना।
10. आमदनी से ज्यादा खर्च करना।
11. लोगों की तक़लिफों में शरीक न होना, और उनसे मदद की उम्मीद रखना।
12. एक दो मुलाक़ात में किसी के बारे में अच्छी राय कायम करना।
13. माँ-बाप की खिदमत न करना और अपनी औलाद से खिदमत की उम्मीद रखना।
14. किसी काम को ये सोचकर अधुरा, छोड़ना कि फिर किसी दिन पुरा कर लिया जाएगा।
15. दुसरों के साथ बुरा करना और उनसे अच्छे की उम्मीद रखना।
16. आवारा लोगों के साथ उठना बैठना।
17. कोई अच्छी राय दे तो उस पर ध्यान न देना।
18. खुद हराम व हलाल का ख्याल न करना और दूसरों को भी इस राह पर लगाना।
19. झूठी कसम खाकर, झूठ बोलकर, धोखा देकर अपना माल बेचना, या व्यापार करना।
20. इल्म, दीन या दीनदारी को इज्जतन समझना।
21. मुसिबतों में बेसब्र बन कर चीख़ पुकार करना।
22. फकीरों, और गरीबों को अपने घर से धक्का दे कर भगा देना।
23. ज़रुरत से ज्यादा बातचीत करना।
24. पड़ोसियों से अच्छा व्यवहार नहीं रखना।
25. बादशाहों और अमीरों की दोस्ती पर यकीन रखना।
26. बिना वज़ह किसी के घरेलू मामले में.दखल देना।
27. बगैर सोचे समझे बात करना।
28. तीन दिन से ज्यादा किसी का.मेहमान बनना।
29. अपने घर का भेद दूसरों पर ज़ाहिर करना।
30. हर एक के सामने अपना दुख दर्द सुनाते रहना।
कैसे मान लूँ कि तुझे मेरी परवाह नहीं…….. कैसे मान लूँ कि तू दूर है पास नहीं………. देर मैंने ही लगाई पहचानने में…..मेरे यार वरना तू ने जो दिया उस का तो कोई हिसाब नहीं. जैसे जैसे मैं सर को झुकाता चला गया वैसे वैसे तू मुझे उठाता चला गया.
बचपन में जब हम ट्रेन की सवारी करते थे, तो मां घर से सफर के लिए खाना बनाकर लें जाती थी, पर ट्रेन में जब कुछ लोगों को खाना खरीद कर खाते देखते, तो बड़ा मन करता कि हम भी खरीद कर खायें. पापा ने समझाया कि ये हमारे बस का नहीं है. अमीर लोग इस तरह पैसे खर्च कर सकते हैं, हम नहीं. बड़े होकर देखा, जब हम खाना खरीद कर खा रहें हैं, तो वो अमीर लोग घर से भोजन बांध कर ले जा रहें हैं. स्वास्थ के प्रति चेतन हैं वे.
आखिर वो अंतर रह ही गया……
बचपन में जब हम सूती कपड़ा पहनते थे, तब वो वर्ग टेरीलीन का वस्त्र पहनता था. बड़ा मन करता था टेरीलीन पहनने का, पर पापा कहते कि हम इतना खर्च नहीं कर सकते.
बड़े हो कर जब हम टेरीलीन पहने, तब वो वर्ग सूती के कपड़े पहनने लगा. सूती कपड़े महंगे हो गए. हम अब उतना खर्च नहीं कर सकते.
आखिर अंतर रह ही गया……
बचपन में जब खेलते खेलते हमारी पतलून घुटनो के पास से फट जाती, तो मां बड़ी ही कारीगरी से उसे रफू कर देती और हम खुश हो जाते. बस उठते बैठते अपने हाथों से घुटनो के पास का वो हिस्सा ढक लेते. बड़े हो कर देखा वो वर्ग घुटनो के पास फटे पतलून महंगे दामों में बड़े दुकानों से खरीद कर पहन रहा है, और हम उसे खरीद नहीं पा रहे हैं.
आखिर अंतर रह ही गया……
बचपन में हम साईकल बड़ी मुश्किल से पाते, और वे स्कूटर पर जाते. जब हमने स्कूटर खरीदा, तो वो कार की सवारी करने लगे और जब तक हमने मारुती खरीदी, वो बीएमडब्लू पर जाते दिखे.
आखिर अंतर रह ही गया……
और हमने जब अंतर मिटाने के लिए रिटायरमेंट का पैसा लगाकर BMW खरीदी, तो वो वर्ग साइकिलिंग करता नजर आया.
आखिर अंतर रह ही गया……
मौसम की हर अदा आपके नाम कर दी. दिल ने चाहा कुछ ख़ास तोहफा दें आपको. तो दिल से निकली हर दुआ आपके नाम कर दी.
ज़िन्दगी एक भोर है सूरज की तरह निकलते रहिये, ठहरोगे एक पाँव पर तो थक जाओगे, धीरे धीरे ही सही मगर राह पर चलते रहिये.
जी लीजीए ज़िन्दगी को भरपूर, ये अवसर शायद फिर न आएगा.