मन को कैसे मारते हैं ?
_ कोई मन को मारने का तरीका बताए.
_ मुझे अपने मन को मारना है.
_ यह हर पल स्वयं को सुखी समझ कर उछलता-फुदकता रहता है.
_ इस मूरख को यही नहीं पता कि सुख क्या होता है ?
_ यह समझता है कि जो ‘अपने’ होते हैं, वही सुख होता है, पर अपना तो कोई होता ही नहीं.
_ तो जो हमारे साथ रहते हैं, रोज़ मिलते-जुलते हैं, कहते हैं, हम तुम्हारे हैं, वो कौन हैं ?
_ अरे मूरख, वो सिर्फ संयोग से साथ हैं.
_ कहने का क्या है ? कुछ भी कह लो.
_ कहने में झूठ, सच एक ही अंदाज़ से बोला जाता है.
_ यह झूठ क्या होता है? मुझे लगता है, जो होता है, सब सच होता है.
_ ओफ़, तुझे यदि सब सच लगता है तो तू वाकई अपने मन को मार.
_ पर मन को मारते कैसे हैं ?
_ कोई मन को मारने का तरीका तो बताए.
_ तू सबसे मुँह फेर ले.. आगे बढ़, पीछे मुड़ कर मत देखना, आगे बढ़, और बढ़.
_ पर आगे भी लोग हैं जो कहते हैं, वो मेरे अपने हैं.
_ आँखें बंद कर, कान बंद कर, किसी की न सुन कुछ, किसी से न कह कुछ.
_ फिर भी, मन है कि मर ही नहीं रहा.
_ क्या करूँ ? क्या करूँ ?
– Manika Mohini